सम्राट से मुलाकात
भव्य फाइनल की पिछली रात सम्राट का संदेश आया।
यह एक राजदूत के माध्यम से आया — असली राजदूत, शाही मुहर, लाल-सोने के रंग में और उस भाषा में जो शाही संचार की थी: विनम्र, अपरिवर्तनीय। सम्राट ने अगले दिन के मुकाबले से पहले दोनों गुटों के साथ अलग-अलग भेंट का अनुरोध किया था।
अग्नि मार्ग के साथ भेंट का समय: भोर के बाद का पहला घंटा।
वे उस समय राजमहल में थे।
बगीचे नहीं — इस बार आंतरिक महल, सम्राट की परामर्श कक्ष, उस स्थान पर जहाँ वास्तविक शक्ति बैठती है। कक्ष बड़ा था, स्पष्ट रूप से। दीवारों पर नक्शे, पुराने — प्रांतों के, व्यापार मार्गों के, उस दायरे के जो साम्राज्य के अंतर्गत था और उसके बाहर। एक मेज जिस पर फाइलें थीं। एक खिड़की जो पूर्व की ओर खुलती थी, सूर्योदय की पहली रोशनी कक्ष में आती हुई।
सम्राट विक्रमादित्य चतुर्थ अपेक्षा से कम प्रभावशाली था।
यह उसका अपमान नहीं था — बल्कि एक अवलोकन। वह मध्यम आयु का, मध्यम कद का था, उस थकान के साथ जो किसी ऐसे व्यक्ति में होती है जिसने दशकों तक शक्ति संभाली हो और उसका वजन महसूस किया हो। उसकी आँखें हालाँकि तेज थीं — अनुभव से परिष्कृत, धारणा से तेज नहीं।
उसने चारों को उनके प्रवेश पर देखा, और पहले अर्जुन को देखा, और चिह्न को देखा, और कुछ उसके भाव में स्थिर हुआ।
'बैठो,' उसने कहा।
वे बैठे।
'मैं तुम्हें धमकी नहीं दूँगा,' सम्राट ने कहा। 'यह बैठक उस उद्देश्य की होती तो मैंने इसे अलग तरीके से बुलाया होता।' उसने अपनी उँगलियाँ मेज पर एक साथ रखीं। 'मैं जानना चाहता हूँ कि तुम क्या हो। अपने स्वयं के शब्दों में।'
अर्जुन ने देखा कि वह किसका उत्तर चाहते हैं।
सम्राट उसकी ओर देख रहे थे।
'हम अग्नि मार्ग के साधक हैं,' अर्जुन ने कहा। 'चार आत्मीयताओं के साथ जो संरेखित हुईं क्योंकि वे हमेशा संरेखित होने वाली थीं। यह कोई दुर्घटना नहीं थी और यह कोई षड्यंत्र नहीं था।'
'मेरे सलाहकारों ने मुझे बताया कि यह एक अस्थिरता है,' सम्राट ने कहा।
'तुम्हारे सलाहकारों ने तुम्हें वह बताया जो उनके ढाँचे के भीतर सच था,' विक्रम ने कहा। 'उनका ढाँचा अपूर्ण है।'
एक छोटा मौन। सम्राट ने विक्रम को देखा — उस मूल्यांकन के साथ जो राजनीतिक लोग किसी ऐसे व्यक्ति को देते हैं जो उनसे सीधे असहमत हो।
'कैसे?' सम्राट ने पूछा।
'क्योंकि उन्होंने असुर को ध्यान में नहीं रखा,' राहु ने कहा। 'आपके सलाहकारों के पास असुर शक्ति के उठान की जानकारी नहीं है या वे इसे स्वीकार करने में असमर्थ हैं।'
सम्राट की आँखें बदलीं।
यह पुष्टि थी — किसी ऐसी बात की जो वह पहले से जानते थे या संदेह करते थे।
'मंगलपुर,' उन्होंने कहा।
'हाँ,' अर्जुन ने कहा। 'और इससे पहले। और इससे पहले भी।'
'असुर-राज उठ रहा है,' किरण ने कहा। 'और हम — चार चिह्न, अग्नि मार्ग — वह हैं जो पुराने पाठ कहते हैं उस उठान का सामना करने के लिए विशेष रूप से अस्तित्व में हैं। यह साम्राज्य के लिए खतरा नहीं है। यह उस खतरे का समाधान है जिसका साम्राज्य को भी सामना करना होगा।'
सम्राट ने एक लंबी क्षण उन्हें देखा।
'ब्रह्मास्त्र पुस्तकालय,' उन्होंने कहा। 'यही वह पुरस्कार है जिसके लिए तुम टूर्नामेंट में हो।'
'हाँ।'
'और यदि तुम आज जीतते हो।'
'तब हमें उस पहुँच की जरूरत है।'
सम्राट उठे और खिड़की की ओर चले, पूर्व की रोशनी में। वह एक पल के लिए वहाँ खड़े रहे।
'मेरे पूर्वजों ने वह पुस्तकालय बनाया,' उन्होंने कहा, 'क्योंकि वे जानते थे कि एक दिन ऐसा होगा जब उस ज्ञान की जरूरत होगी। मुझे हमेशा लगता था कि यह प्रतीकात्मक था। इतिहास का एक टुकड़ा।'
उन्होंने पलटकर देखा।
'मुझे अपना दृष्टिकोण अद्यतन करना होगा।'
अर्जुन ने पूछा: 'क्या आप हमें पुस्तकालय तक पहुँचने देंगे — जीत की परवाह किए बिना?'
सम्राट ने एक क्षण सोचा। फिर: 'टूर्नामेंट नियम बाध्यकारी हैं। लेकिन विजेता को दिया गया पुरस्कार — पुस्तकालय पहुँच — मैं आज दोपहर के बाद किसी तरीके से व्याख्या कर सकता हूँ जो अधिक... उदार हो।' उसकी आवाज में राजनीतिक सावधानी थी — किसी ऐसे व्यक्ति की जो वादा किए बिना संकेत दे। 'पहले जीतो। फिर हम बात करेंगे।'
भेंट समाप्त हो गई।
वे राजमहल से बाहर निकले, सूर्योदय की रोशनी में, सूर्यपुर की सुबह उनके चारों ओर जागती हुई।
मीरा उनका इंतजार कर रही थी।
'कैसी गई?' उसने पूछा।
'अप्रत्याशित,' विक्रम ने कहा।
'वह हमसे डरा हुआ नहीं है,' किरण ने कहा। 'वह जिज्ञासु है। और शायद थोड़ा राहत में।'
'राहत?' अर्जुन ने उसकी ओर देखा।
'वह वर्षों से जानता था कि कुछ आ रहा है,' किरण ने कहा। 'आज पहली बार किसी ने उसे बताया कि वह क्या है और उसका क्या समाधान है।'
वे वापस सराय की ओर चले।
अखाड़ा दोपहर में खुलेगा।
भव्य फाइनल — अग्नि मार्ग और सूर्यवंशी।
सम्राट देखेगा।
असुर का गुप्तचर देखेगा।
पुस्तकालय इंतजार कर रहा था।
चिह्न जल रहे थे।
धर्म का टूर्नामेंट अपने अंतिम पल में था।
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अखाड़ा उसने पहले कभी इस तरह नहीं देखा था।
दर्शक-दीर्घाएँ भरी थीं — हर स्तर पर, हर कोने में। जो सीटें नहीं मिलीं उनके लिए लोग बाहरी गलियारों में खड़े थे। शहर की छतों पर झुककर देखने वाले थे। सूर्यपुर के भव्य फाइनल की भीड़ वह नहीं थी जो किसी प्रतियोगिता को देखने आती है — यह वह भीड़ थी जो यह जानती है कि वह कुछ ऐसा देखने आई है जो बाद में याद किया जाएगा।
सम्राट का बॉक्स खुला था आज — परदा हटा दिया गया था। पहली बार।
अर्जुन ने लड़ाकों के मंचन क्षेत्र से यह देखा और समझा कि यह संकेत था।
'वह हमें देखना चाहता है,' विक्रम ने कहा, शांत।
'वह सूर्य को देखना चाहता है,' राहु ने सुधारा। 'हम उसके विरुद्ध पृष्ठभूमि हैं।'
किरण ने कुछ नहीं कहा। उसकी उँगलियाँ लहर-चिह्न पर थीं — हल्के से, जैसे नब्ज़ टटोल रही हो।
अर्जुन ने मैदान देखा।
सूर्यवंशी पहले से वहाँ था।
तीन में से एक — केवल एक — काम का था जिस तरह पाँचवाँ स्तर काम का होता है। बाकी दोनों अच्छे साधक थे, पेशेवर, वर्षों के अनुशासन के साथ। लेकिन सूर्य अलग था।
वह मैदान के बीच में खड़ा था जैसे मैदान उसके आसपास था, उसके नीचे नहीं।
पाँचवाँ स्तर की उपस्थिति — अर्जुन ने उसे महसूस किया था सेमी-फाइनल के बाद से, और उस दिन से नहीं। आश्रम में, भीष्म ने एक बार कहा था: *पाँचवाँ स्तर एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपनी आत्मीयता को इतना आत्मसात किया है कि वह अलग नहीं रही — वह स्वभाव बन गई।* सूर्य के लिए सूर्य-आत्मीयता वह थी जो पानी मछली के लिए होता है।
अर्जुन पृथ्वी-अग्नि में द्वितीय स्तर था।
अंतर वास्तविक था।
अधिकारी ने शुरुआती संकेत उठाया।
पहले दस सेकंड में अर्जुन ने समझ लिया कि सूर्यवंशी की रणनीति क्या थी।
दोनों सहायक साधक — एक पूर्व-आत्मीयता, एक अग्नि-आत्मीयता — किरण और राहु पर थे। सूर्य खुद विक्रम और अर्जुन के बीच की रेखा पर था, इस तरह कि एक को लेने के लिए दूसरे की सुरक्षा खोनी पड़े।
यह समझदारी की रणनीति थी। सूर्य ने सेमी-फाइनल देखा था — वह जानता था कि अर्जुन की पृथ्वी-अग्नि सबसे आगे है, और विक्रम की वायु-गैर-दिशा समन्वय का आधार है। दोनों को एक साथ अलग करो।
विक्रम ने वायु-गैर-दिशा लागू की — वह गुणवत्ता जो भीष्म से आई थी।
वह संरचना से वैसे निकला जैसे वह हमेशा निकलता था।
सूर्य ने उसका पीछा नहीं किया।
यह पहली बार था जब किसी प्रतिद्वंद्वी ने उस युक्ति को अनदेखा किया था।
अर्जुन ने यह देखा और एक पल — सिर्फ एक पल — रुका। सूर्य जानता था कि विक्रम का मूल्य उसकी स्थिति में नहीं बल्कि उसके समन्वय में था। उसे मैदान से हटाने की जरूरत नहीं थी — बस उसे अप्रासंगिक बना दो जब तक सूर्य अर्जुन से निपट रहा हो।
सूर्य सीधे अर्जुन पर आया।
पहला आदान-प्रदान सूर्य-आत्मीयता का था — शुद्ध, केंद्रित, उस प्रकार जो पाँचवाँ स्तर उत्पन्न करता है जब वह वास्तव में उपस्थित होना चाहता हो। यह अर्जुन के चिह्न-क्षेत्र से टकराया और अर्जुन ने महसूस किया — न दर्द, न दबाव — बल्कि *गर्मी*, उस प्रकार जो बाहरी तापमान से अलग होती है, चिह्न के भीतर से उठती।
पृथ्वी-अग्नि ने प्रतिक्रिया की।
ब्रह्मांडीय प्रतिवर्त — चिह्न अपनी प्रकृति से जवाब देता है, साधक की योजना से नहीं।
अर्जुन ने उस प्रतिक्रिया को चैनल किया।
यह नियंत्रित नहीं था — कल के सेमी-फाइनल की तरह, जहाँ क्रोध आधार था। यह अलग था: कल वह जल रहा था। आज वह जल रहा था और जानता था कि आग कहाँ जानी चाहिए।
दूसरा आदान-प्रदान: अर्जुन ने मिट्टी को महसूस किया — द्वितीय स्तर की वह भूगर्भीय संवेदनशीलता जो अब उसकी थी, सूर्यपुर के अखाड़े की प्रत्येक परत, पाँच फुट नीचे तक। उसने उसका उपयोग किया — मैदान की एकमात्र संरचना जो सूर्य के पास नहीं थी। सूर्य सूर्य-आत्मीयता था, ऊपर की ओर, प्रकाश की ओर। पृथ्वी उसकी भाषा नहीं थी।
पहली बार सूर्य ने एक कदम समायोजित किया।
अखाड़े में किसी ने देखा। शायद।
बारह मिनट में मैदान का नक्शा बदल गया था।
राहु ने छाया-आकाश विस्तारित की थी — उस व्यापक-क्षेत्र जागरूकता से नहीं, बल्कि उस दूसरी गुणवत्ता से, वह जो अंधेरे में उपस्थिति को मिटा देती है। सूर्यवंशी अग्नि-साधक — जो राहु पर था — उससे उस भूल की तरह लड़ रहा था जो लड़ाकू करते हैं जब उनका प्रतिद्वंद्वी ठीक वहाँ नहीं होता जहाँ होना चाहिए: अतिरिक्त ऊर्जा, अतिरिक्त प्रयास, उन स्थानों पर जहाँ कुछ नहीं था।
किरण मैदान के बाएँ हिस्से में थी।
पूर्व-आत्मीयता साधक उसके पीछे था — या था। किरण ने जल-आत्मीयता उस दिशा में नहीं लगाई जो स्पष्ट थी। उसने इसे उस दिशा में लगाई जहाँ संरचना का अंत था — उस फाँक में जो पूर्व-आत्मीयता अपने व्यापक प्रसार के कारण हमेशा बनाती है।
पानी फाँकों में जाता है।
पूर्व-साधक दो बार पीछे हटा, फिर तीसरी बार संतुलन खोया।
विक्रम वहाँ था जब वह खोया।
सूर्यवंशी के दोनों सहायक साधक मैदान के किनारे थे — *हटाए* नहीं गए थे, लेकिन उस जगह से बाहर थे जहाँ वे काम कर सकते थे।
यह दस मिनट का काम था।
यह वह काम था जिसके लिए वे दो महीनों से प्रशिक्षण कर रहे थे।
सूर्य और अर्जुन मैदान के बीच में थे।
बाकी सब परिधि पर।
यह टूर्नामेंट का अंत नहीं था — दोनों सहायक साधक अभी भी खड़े थे, अभी भी लड़ाई में थे। लेकिन जो था वह वह था: दो साधक, एक जो जानता था वह क्या था और एक जो जानना शुरू कर रहा था।
सूर्य ने एक पल उसे देखा।
'तुम द्वितीय स्तर हो,' उसने कहा — बयान, प्रश्न नहीं।
'हाँ।'
'और तुमने पाँच महीने में यह किया।'
अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।
सूर्य की आँखों में कुछ था जो अर्जुन ने पहले किसी प्रतिद्वंद्वी में नहीं देखा था — न क्रोध, न अहंकार। जिज्ञासा। असली, तकनीकी जिज्ञासा — एक साधक जो कुछ ऐसा देख रहा हो जो उसके ढाँचे में फिट नहीं बैठता।
'पट्टिका,' सूर्य ने कहा। 'तुमने कहीं से पट्टिका के अंश पढ़े हैं।'
अर्जुन ने एक पल सोचा। फिर: 'हाँ।'
'मैंने भी।' सूर्य ने अपनी हथेली देखी — वहाँ कोई चिह्न नहीं था, सूर्यवंशी उस प्रकार के साधक नहीं थे। लेकिन उसकी उँगलियों पर साधना-प्रशिक्षण के वर्षों के निशान थे। 'मैं जानता था तुम आओगे। पट्टिका में उल्लेख है।'
यह बातचीत नहीं थी — यह उस प्रकार का आदान-प्रदान था जो दो साधकों के बीच होता है जो एक-दूसरे को समझने की कोशिश में हैं, लड़ते हुए भी।
सूर्य ने फिर आक्रमण किया।
यह पहले से अलग था — अब वह शक्ति के साथ नहीं बल्कि समझ के साथ आया। उसने अर्जुन की पृथ्वी-अग्नि की प्रकृति को मापा था — वह देखा था कि यह प्रतिक्रियाशील है, कि चिह्न उत्तेजना से बढ़ता है। उसने एक ऐसा प्रवाह बनाया जो उत्तेजित नहीं करता — शांत, व्यापक, वह प्रकाश जो गर्म नहीं होता बल्कि ढकता है।
चिह्न ने उसका अलग तरीके से जवाब दिया।
अर्जुन ने महसूस किया — वह गुणवत्ता जो उसने कभी-कभी शून्य में महसूस की थी लेकिन लड़ाई में नहीं — चिह्न का वह स्तर जो द्वितीय स्तर से नीचे था, उससे पुराना, उससे गहरा।
देवपुर। खेत का मकान। प्रिया बंधी हुई।
माँ, मृत्तिका में, अकेली।
काल दृष्टि की योजना जो लोगों को उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है।
असुर-राज जो उठ रहा है।
यह सब उसके भीतर था — क्रोध नहीं, जो कल था — बल्कि *स्पष्टता*। क्रोध के आगे की चीज, जब आप उसे पार कर लेते हैं और वह जड़ बन जाती है।
पृथ्वी-अग्नि ने उस जड़ से उत्तर दिया।
वह आग नहीं थी जो जलाती है। वह आग थी जो रोशनी करती है।
सूर्य ने एक कदम पीछे लिया।
पहली बार।
बाईस मिनट।
दर्शक-दीर्घाएँ उस चुप्पी में थीं जो तब होती है जब हजारों लोग एक साथ साँस रोक लेते हैं।
सूर्यवंशी के दोनों सहायक साधक — राहु और किरण और विक्रम के साथ — अब मैदान के बाहरी किनारे पर थे, संरचनात्मक रूप से समाप्त, लेकिन अभी खड़े। टूर्नामेंट नियमों में तीनों सदस्यों को मैदान से बाहर होना आवश्यक था — हटाए नहीं गए, बस...अप्रासंगिक बना दिए गए।
मैदान के बीच में केवल दो।
सूर्य की सूर्य-आत्मीयता अब पूरी तरह खुली थी — वह जो उसने पहले आरक्षित रखा था। पाँचवाँ स्तर खुला हुआ अखाड़े में महसूस होता है जैसे दोपहर की धूप एक बंद कमरे में — अचानक, सर्वव्यापी, समझौते की अनुमति न देने वाली।
अर्जुन के चिह्न ने उसे महसूस किया और जवाब दिया।
यह उसकी योजना नहीं थी।
यह चिह्न की योजना थी।
पृथ्वी-अग्नि — सूर्य-आत्मीयता के विपरीत। सूर्य ऊपर उठता था, प्रकाश फैलाता था, आकाश की ओर खिंचता था। पृथ्वी-अग्नि नीचे उतरती थी। मिट्टी में। उस गहराई में जहाँ तत्व अपनी सबसे शुद्ध अवस्था में रहते हैं — न पत्थर, न ज्वाला, केवल आधार। वह मौन शक्ति जिस पर संसार टिका था।
अखाड़े की धूप अर्जुन के ऊपर से बह गई।
वह वहाँ नहीं था जहाँ सभी उसकी उपस्थिति महसूस कर रहे थे।
वह नीचे था।
पृथ्वी की उस गहरी परत पर—जहाँ सूर्य-आत्मीयता का प्रकाश पहुँचते-पहुँचते अपनी शक्ति खो देता था।
तीसरा आदान-प्रदान शुरू हुआ।
और उसी क्षण अखाड़े की मिट्टी बदल गई।
अर्जुन का पैर आधा इंच धँसा। मिट्टी फटी नहीं — उसने प्रतिक्रिया दी। जैसे किसी सोई हुई चीज़ ने उसकी पुकार सुन ली हो।
फिर पृथ्वी-अग्नि ऊपर उठी।
सीधी नहीं। हिंसक नहीं। बल्कि नियंत्रित। भारी। अपरिहार्य।
वह सूर्य-आत्मीयता के विरुद्ध नहीं गई। उसने उससे टकराने की कोशिश नहीं की। उसने उस रिक्त स्थान को चुना जहाँ प्रकाश स्वयं छाया बनाता है।
वहीं से प्रहार आया।
प्रतिद्वंद्वी की सूर्य-ज्वाला नीचे गिरी, सुनहरी लपटें हवा को काटती हुईं। क्षणभर के लिए दोनों शक्तियाँ टकराईं।
सूर्य ने उसे रोक लिया—आधा।
बाकी आधा आर-पार चला गया।
धमाका हुआ।
मिट्टी का पूरा वृत्त काँप उठा। गर्म हवा की लहर दर्शक-दीर्घा तक पहुँची। कई शिष्य अनायास पीछे हट गए।
सूर्य के कदम पहली बार असंतुलित हुए।
अर्जुन पीछे नहीं हटा।
वह मैदान के केंद्र में स्थिर खड़ा रहा — जैसे उसका शरीर अखाड़े से जुड़ गया हो। उसकी भुजाओं पर उभरता एम्बर-चिह्न तेज़ जलने लगा। वह प्रकाश दोपहर की तीखी धूप में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
उसकी साँस नियंत्रित थी। हाथ स्थिर। आँखें शांत।
अधिकारी ने अपना संकेत ऊपर उठाया।
“चौंतीस मिनट।”
कुछ पल तक अखाड़े में पूर्ण सन्नाटा रहा।
फिर आवाज उठी।
वह सामान्य जयकार नहीं थी। न विजय का शोर, न उत्साह का विस्फोट।
वह उन लोगों की प्रतिक्रिया थी जिन्होंने कुछ असामान्य देखा हो—कुछ ऐसा जिसे उनका मन अभी समझ नहीं पा रहा था।
फुसफुसाहटें फैलने लगीं।
“उसने सूर्य-आत्मीयता को मोड़ा…?” “नहीं… उसने खाली स्थान का उपयोग किया…” “यह तकनीक थी या सहज प्रतिक्रिया…?”
ऊपर सम्राट का बॉक्स शांत बना रहा।
कोई टिप्पणी नहीं। कोई प्रतिक्रिया नहीं।
लेकिन वहाँ बैठे हर व्यक्ति की निगाह अब अखाड़े के केंद्र पर टिक चुकी थी।
अर्जुन अकेला खड़ा था।
और पहली बार… ऐसा लग रहा था जैसे अखाड़ा स्वयं उसकी उपस्थिति को स्वीकार कर रहा हो।
वह जीत नहीं महसूस कर रहा था।
वह वह महसूस कर रहा था जो जीत के बाद होता है जब जीत एक बड़ी चीज का हिस्सा हो — राहत नहीं, पूर्णता नहीं, बल्कि *अगला कदम*।
सूर्य उसके पास आया।
वह हारा था — उसकी मुद्रा में यह था, उस तरह से जैसे एक पेशेवर हार को संभालता है: पूरी तरह, बिना बहाने के। उसने अर्जुन की ओर देखा।
'पट्टिका क्या कहती है,' उसने कहा। 'वास्तव में।'
यह प्रश्न नहीं था।
यह उस व्यक्ति का कथन था जो जानता था कि उत्तर उसके पास नहीं था जो उसके पास होना चाहिए था।
अर्जुन ने एक पल सोचा। 'असुर-राज उठ रहा है। हम — चार चिह्न — उसका सामना करने के लिए हैं।' रुककर उसने कहा, 'सूर्यवंशी की भूमिका भी है। पट्टिका उसका उल्लेख करती है।'
सूर्य की आँखों में कुछ बदला।
'हाँ,' उसने कहा। 'करती है।'
एक पल की चुप्पी — उस प्रकार जो दो साधकों के बीच होती है जो अभी एक-दूसरे से लड़े हों और अब कुछ बड़े के बारे में सोच रहे हों।
'हम मिलेंगे,' सूर्य ने कहा। 'इसके बाद।'
'हाँ,' अर्जुन ने कहा।
सूर्य ने एक बार झुककर जवाब दिया — वही सटीक झुकाव जो सेमी-फाइनल के बाद था — और मैदान से चला गया।
किरण पहले अर्जुन के पास पहुँची।
वैद्य का हाथ — साधना मार्गों की जाँच, अति-विस्तार की जाँच।
'स्पष्ट,' उसने कहा। 'लेकिन तुमने कुछ ऐसा किया जो द्वितीय स्तर नहीं करता।'
'मुझे पता है।'
'चिह्न ने किया,' राहु ने कहा। वह पास आया था, उस विशेष ध्यान के साथ जो उसके पास तब होता है जब वह कुछ ऐसा देखे जो उसके विश्लेषण में फिट न हो। 'मैंने देखा। वह तुम नहीं थे।'
'मैं था,' अर्जुन ने कहा। 'बस... वह हिस्सा था जिसे मैं अभी तक नहीं जानता था।'
विक्रम ने मैदान देखा।
दो गड्ढे — कल के जैसे नहीं। आज मैदान की मिट्टी उस जगह दबी हुई थी जहाँ पृथ्वी-अग्नि और सूर्य-आत्मीयता एक-दूसरे से मिले थे — एक चक्राकार निशान, सूर्य की रोशनी के प्रभाव से पीला पड़ा हुआ केंद्र, और उसके चारों ओर पृथ्वी-अग्नि का एम्बर रंग।
सम्राट के बॉक्स में कोई हिला।
अखाड़े में अभी भी शोर था, लेकिन बदला हुआ — वह शोर जो प्रश्न होता है, उत्तर नहीं।
'पुस्तकालय,' विक्रम ने कहा।
'हाँ,' अर्जुन ने कहा।
चारों चिह्न एक साथ जले — एम्बर, चाँदी, नीला-सफेद, छाया-बैंगनी — उस संक्षिप्त क्षण में जो सेमी-फाइनल में नहीं हुआ था, क्वार्टर-फाइनल में नहीं हुआ था।
वे एक-दूसरे को पहचान रहे थे।
फिर जो भीड़ थी वह अर्जुन के लिए वापस आई — हजारों आवाजें, सूर्यपुर का भव्य फाइनल, विजय की घोषणा जो आधिकारी ने की थी और वह सुन नहीं पाया था।
उन्होंने जीता था।
और जो अगला था — पुस्तकालय, पट्टिका, असुर-राज — वह इंतजार कर रहा था।
लेकिन एक क्षण के लिए, मैदान पर, चार चिह्न जलते हुए, वह बस वहाँ खड़ा रहा।
यह पर्याप्त था।
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