जुड़वा नागिन बेहेने
दूसरी ओर, एक अंधेरी गुफा के भीतर...
वहाँ प्रकाश का नामोनिशान तक नहीं था।
गुफा इतनी विशाल थी कि उसका दूसरा छोर आँखों से दिखाई नहीं देता था। चारों ओर केवल काला अंधकार फैला हुआ था। गुफा की दीवारें एक विशेष प्रकार के काले पत्थर से बनी थीं, जिसे साधक-जगत में नागाश्म कहा जाता था। यह ऐसा पत्थर था जो साधना-ऊर्जा को सोख लेता था और किसी भी ऊर्जा को बाहर या भीतर जाने नहीं देता था।
गुफा के मध्य एक विशाल पत्थरीला प्रांगण था।
वहाँ सातवें क्षेत्र के कई साधक मौन बैठे हुए थे।
उनकी आँखें बंद थीं, परंतु वे साधना नहीं कर रहे थे।
वे प्रतीक्षा कर रहे थे।
अचानक—
आकाश में एक भयानक गर्जना गूँजी।
गुफा के ऊपर का शून्य फट गया।
एक रक्तिम दरार प्रकट हुई और उससे लाल प्रकाश की तीव्र किरणें बाहर निकलने लगीं। कुछ ही क्षणों में पूरा प्रांगण लाल आभा से भर गया।
सभी साधक तुरंत खड़े हो गए।
उनकी दृष्टि उसी रक्तिम दरार पर टिक गई।
अगले ही पल एक आकृति उस दरार से बाहर निकली।
सिर से पैर तक काले वस्त्र।
चेहरे पर काला मुखौटा।
और शरीर से निकलती भयावह आभा।
नकाबपोश साधक।
"क्या आपको वह वस्तु मिल गई?"
एक साधक ने उत्सुकता से पूछा।
नकाबपोश साधक ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने केवल हल्के से सिर हिला दिया।
यह देखकर कई साधकों के चेहरे उतर गए।
स्पष्ट था कि वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ था।
लेकिन तभी...
नकाबपोश साधक ने एक क्षण के लिए अपनी आँखें बंद कीं।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, उनमें एक विचित्र चमक थी।
लोभ।
उत्साह।
और पागलपन।
मानो उसे वह चीज़ नहीं मिली जिसकी उसे तलाश थी, लेकिन उससे कहीं अधिक मूल्यवान कुछ मिल गया हो।
फिर भी उसने अपने साथियों को कुछ नहीं बताया।
वह बिना एक शब्द बोले आगे बढ़ गया।
गुफा के सबसे भीतरी भाग में एक विशाल पत्थर का द्वार था।
यह कारागार नहीं था।
यह उससे बुरा कुछ था।
उस द्वार के पार — अंधकार में — दो आकृतियाँ थीं।
नागकन्याएँ।
दो ऐसी अलौकिक सुंदरियाँ, मानो स्वयं प्रकृति ने अपनी समस्त कलात्मकता और सौंदर्य को उनमें समेट दिया हो।
उनके शरीर सुडौल और लचीले थे, हर अंग में एक सहज आकर्षण झलकता था। उनकी त्वचा चाँदनी की तरह उज्ज्वल और कोमल प्रतीत होती थी, जबकि उनकी बड़ी, मोहक आँखों में रहस्य और सम्मोहन की गहराई बसी हुई थी। लंबे, रेशमी केश उनकी कमर तक लहराते थे, मानो काली रात्रि की धारा बह रही हो।
उनके प्रत्येक कदम में अद्भुत गरिमा थी, और उनके चेहरे पर ऐसी दिव्य आभा थी कि कोई भी उन्हें देखकर कुछ क्षणों के लिए मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता था। ऐसा लगता था जैसे वे किसी स्वर्गीय चित्रकार की कल्पना से निकलकर वास्तविकता में उतर आई हों।
उनकी मुस्कान में मधुरता थी, उनकी दृष्टि में आकर्षण, और उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा रहस्यमय जादू जो देखने वाले के मन पर अमिट छाप छोड़ देता था। वे केवल सुंदर नहीं थीं—वे उस दुर्लभ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थीं जिसके बारे में कवि कविताएँ लिखते हैं और जिसके लिए राजाओं तक ने युद्ध छेड़ दिए हों।
दो आकृतियाँ उस अँधेरे में थीं।
एक-दूसरे के पास। इतनी पास कि एक की साँस दूसरी को सुनाई देती थी। इतनी पास क्योंकि इस ठंड में, इस अँधेरे में, यही एकमात्र उष्मा थी जो बची थी।
कालिंदी — बड़ी बहन — की पीठ दीवार से टिकी थी। उसके हाथ-पाँव लोहे की जंज़ीरों में थे। साधारण लोहा नहीं — उस पर नागबंधन-मंत्र उकेरे गए थे, हर कड़ी में, हर जोड़ में। वे मंत्र नाग-जाति की ऊर्जा को विशेष रूप से कुंठित करते थे — जैसे किसी ने नाग की फन के ऊपर पत्थर रख दिया हो। हर साँस के साथ वह दबाव महसूस होता था। जैसे कोई उसके भीतर की शक्ति को मुट्ठी में पकड़कर धीरे-धीरे मसल रहा हो।
मंदाकिनी — छोटी बहन — उसके बगल में थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन वह सोई नहीं थी। सोना यहाँ संभव नहीं था। यहाँ केवल वह अवस्था संभव थी जो नींद और जागरण के बीच होती है — जहाँ न सपने आते हैं, न चैन मिलता है। एक लंबा, खाली, थका देने वाला वर्तमान।
कितने दिन हो गए थे यहाँ?
कालिंदी को नहीं पता था।
अँधेरे में दिन और रात का भेद मिट जाता है।
उसने एक बार फिर अपनी जंजीरों को खींचा।
उसे याद था — कैद के पहले दिन भी उसने यही किया था। तब उसके भीतर ताज़ा क्रोध धधक रहा था। उसने पूरी शक्ति से बंधनों को झकझोरा था।
पहली बार आशा में। दूसरी बार क्रोध में। तीसरी बार हताशा में।
और फिर न जाने कितनी बार।
लेकिन हर प्रयास का परिणाम एक-सा रहा।
जंजीरें तनिक भी नहीं हिलीं। वे बस मौन खड़ी रहीं — मानो उसका संघर्ष देखकर उपहास कर रही हों। वह निश्चिंत, मंत्रों से बँधा हुआ उपहास, जो केवल ऐसे बंधनों में होता है जिन्हें अपनी अटूट शक्ति पर पूरा विश्वास हो।
उसके बाद उसने नहीं खींचा।
अब वह सोच रही थी।
तभी बाहर से एक आवाज़ आई — पहले धीमी, फिर तेज़। वह आवाज़ जो तब होती है जब कोई बड़ी शक्ति किसी स्थान को चीर कर प्रकट होती है। आकाश फटने की आवाज़। अंतरलोक-द्वार की आवाज़।
और उसके साथ — लाल रोशनी।
दरवाज़े की दरारों से।
कालिंदी ने आँखें खोलीं।
मंदाकिनी का शरीर तन गया।
दरवाज़ा खुला।
वह आदमी भीतर आया।
रोशनी उसके पीछे थी — लाल, धुएँ जैसी, जैसे किसी दूसरे लोक से आई हो। उसकी काया लंबी थी, वस्त्र काले, किनारे पर नागफनी के चिह्न। नकाब चेहरे पर — वह विशेष नकाब जो नाग-जाति के उच्च साधक पहनते हैं जब वे किसी विशेष कार्य से आते हैं।
कालिंदी की दृष्टि उस पर टिकी रही।
कुछ था — उस चाल में, उन हाथों में, उस मुद्रा में — जो परिचित था। अत्यंत परिचित। वह तरीका जिससे वह एक पैर दूसरे के आगे रखता था — थोड़ा बाईं ओर झुककर, क्योंकि बचपन में एक युद्ध में उसके बाएँ पैर में चोट लगी थी जो पूरी तरह कभी ठीक नहीं हुई।
कालिंदी ने वह चाल सैकड़ों बार देखी थी।
नकाब उतरा।
और दोनों बहनों की साँस एक पल के लिए रुक गई।
वह बूढ़ा चेहरा था — झुर्रियों से भरा, आँखों में एक ठंडी, गहरी चमक। सफ़ेद दाढ़ी, भूरी त्वचा, वे बड़े हाथ जो कभी उन्हें कंधे पर उठाते थे जब वे छोटी थीं। वे आँखें जो कालिंदी ने बचपन से देखी थीं। वे आँखें जो उनकी माँ की मृत्यु के बाद सबसे पहले उनके पास आई थीं। जिन्होंने कहा था — "अब मैं हूँ। मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगा।"
"काका..."
उनका नाम विषेंद्र था।
वही विषेंद्र जो नागलोक के उन दावेदारों में से था जो एक बार नागासन के निकट पहुँचा था — और नाकाम रहा। वर्षों का वह घाव उसके भीतर पत्थर हो गया था। नागलोक के वर्तमान राजा के प्रति उसके मन में ऐसी घृणा थी जिसे उसने प्रेम का मुखौटा पहनाकर जीया था — अपनी भतीजियों के सामने भी। उसी मुखौटे की आड़ में उसने उन दोनों का अपहरण किया था। उन्हें बलि के रूप में इस्तेमाल करने के लिए, अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए।
और यह पूरी गुफ़ा — यह पूरा षड्यंत्र — वज्रवृष्टि अरण्य से कोसों दूर नहीं था। उसी वन में, जहाँ अर्जुन अभी ठहरा हुआ था।
मंदाकिनी के होंठ से निकला — इतना धीमे कि वह शब्द से कम, साँस से अधिक था।
बूढ़े के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
कोई लज्जा नहीं। कोई ग्लानि नहीं। कोई उस पुराने स्नेह की छाया भी नहीं जो कभी — शायद — रहा होगा।
"आप..." कालिंदी का स्वर काँपा — क्रोध से नहीं, उस विशेष वेदना से जो तब होती है जब सबसे विश्वसनीय व्यक्ति विश्वासघात करता है। वह वेदना जो तलवार से नहीं, अपनेपन के टूटने से होती है। "आप हमारे काका हैं। आपने... आप हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? हमारे माता-पिता ने आप पर इतना..."
"विश्वास।"
बूढ़े ने वह शब्द काटा।
फिर हँसा।
वह हँसी धीमी नहीं थी। जोर से थी — उस गुफ़ा की दीवारों से टकराकर लौटती, गूँजती, जैसे एक ही हँसी हज़ार हँसियाँ बन गई हों। वह नागाश्म की दीवारें जो साधना-ऊर्जा को सोखती थीं, उन्होंने वह हँसी नहीं सोखी। वह हँसी ऊर्जा नहीं थी — वह कुछ और था।
"तेरे बाप ने मुझ पर कभी विश्वास नहीं किया।" आवाज़ में वह कड़वाहट थी जो वर्षों में जमती है — एक-एक अपमान की परत के साथ। "उसे बस मुझे दिलासा देना था। यह दिखाना था कि वह मुझसे बहुत ताकतवर है — कि वह मुझ पर एहसान कर रहा है। मैं उसका छोटा भाई था। छोटा। और छोटे को सदैव एहसान चाहिए — यही उसका विश्वास था।"
वह आगे आया। एक-एक कदम। उसके कदमों की आहट उस पत्थर पर जैसे घड़ी की सुइयाँ।
"तुम्हें पता है मैं आज कहाँ से आ रहा हूँ?" उसने बिना किसी भावना के कहा — जैसे कोई दैनिक कार्य का विवरण दे रहा हो। "उस गुरुकुल के पुस्तकालय से — जहाँ नागवज्र तंत्र रखा था। वह ग्रंथ जिसमें वह विधि है — जिससे नाग-जाति के दो रक्तशुद्ध उत्तराधिकारियों की बलि देकर, उनके प्राण और शक्ति को अपने भीतर उतारकर — मैं उन तांत्रिकों जितना शक्तिशाली बन सकता था जिन्होंने सहस्रों वर्ष पूर्व पूरे नागलोक को पलट कर रख दिया था।"
मंदाकिनी ने साँस खींची।
"नाकाम रहा।"
पहली बार बूढ़े की आवाज़ में एक हल्का कसैलापन उभरा, जैसे पुरानी हार का स्वाद अब भी उसकी जिह्वा पर बाकी हो।
"वहाँ एक साधक था... ऐसी शक्ति का स्वामी, जिसकी मैंने कल्पना तक नहीं की थी। वह मेरी सारी गणनाओं से बाहर था।"
उसकी आँखें क्षणभर के लिए सिकुड़ गईं।
"उसने मेरे वर्षों के परिश्रम को एक ही क्षण में भस्म कर दिया। अपनी विशेष अग्नि से... ऐसी अग्नि, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था।"
बूढ़ा कुछ पल रुका।
"काली अग्नि।"
वह रुका।
उसकी आँखों में वह चमक — जो नकाब हटाने से पहले भी थी — और गहरी हो गई। वह चमक जो लोभ में होती है — लेकिन उस लोभ से अधिक पुरानी, उस लोभ से अधिक गहरी।
"...उसी काली अग्नि ने मुझे एक नई राह दिखाई है।" अब उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी। षड्यंत्र के स्वर में। "उस साधक की हत्या करके उसकी काली अग्नि को अपने भीतर उतार लूँ — तो न केवल नागलोक, न केवल आर्यावर्त... बल्कि स्वर्गलोक पर भी शासन करना संभव होगा। दिव्यास्त्र का निर्माण। वह शक्ति जिसके सामने देव भी नहीं टिकते।"
वह वहीं खड़ा रहा।
दोनों बहनों को देखता रहा — जैसे वे उसके लिए केवल वस्तुएँ हों। उपयोगी। या अनुपयोगी।
"आप कामयाब नहीं होंगे।"
यह कालिंदी ने कहा।
धीमे स्वर में। लेकिन स्पष्ट। वह दृढ़ता जो हार के बाद भी नहीं जाती।
बूढ़े की हँसी बंद हो गई।
एक पल की नीरवता जो किसी भी शोर से अधिक भारी थी।
और फिर — बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी संकोच के — उसने अपना पैर उठाया।
पहला आघात कालिंदी के मुँह पर पड़ा।
दूसरा मंदाकिनी के।
दोनों दीवार से जा टकराईं। जंज़ीरें खनखनाईं। होंठ फट गए। कालिंदी के मुँह में खून का स्वाद आया।
बूढ़ा मुड़ा और बाहर चला गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
लाल रोशनी फीकी पड़ी।
अँधेरा फिर से लौट आया।
लेकिन इस बार वह अँधेरा थोड़ा अलग था।
मंदाकिनी ने आँखें खोलीं।
कितना समय बीता था — उसे नहीं पता था। होंठ की वेदना एक मंद, स्थायी धड़कन बन गई थी। उसकी जीभ ने उस कटे होंठ को छुआ — और वह रुक गई।
रक्त।
नाग-जाति का रक्त साधारण नहीं होता। उसमें वह सहजात विष होता है जो उनकी नस-नस में बहता है। वह विष जिसे कोई मंत्र नहीं रोक सकता क्योंकि वह ऊर्जा नहीं है — वह रक्त है। हड्डी है। जीवन का सबसे पुरातन हिस्सा।
उसने एक पल सोचा।
"दीदी।"
"हाँ।" कालिंदी की आवाज़ शांत थी। इतनी शांत कि मंदाकिनी को एक पल के लिए डर लगा।
"दीदी, आप..."
"सोच रही हूँ।"
"क्या?"
"जंज़ीरें।" कालिंदी ने कहा। "नागबंधन-मंत्र से बनी हैं। हमारी साधना-ऊर्जा उन पर काम नहीं करेगी — यह हम जानते हैं। कई बार कोशिश कर चुके हैं।"
"तो?"
"नाग-विष।"
मंदाकिनी ने एक पल रुककर सोचा। फिर उसकी आँखें खुलीं — उस तरह जैसे किसी को सूझा हो।
"विष ऊर्जा नहीं है।"
"नहीं।"
"मंत्र उसे नहीं पकड़ सकते।"
"नहीं।"
एक पल की नीरवता।
"अँधेरे में यह कैसे होगा?"
"स्पर्श से।" कालिंदी ने कहा। "जंज़ीर कहाँ है — यह हम जानते हैं। हमें देखने की ज़रूरत नहीं।"
मंदाकिनी ने अपने होंठों को हल्का-सा भींचा — धीरे, सावधानी से। उसके विषदंतों के ठीक पीछे वह छोटी-सी विष-ग्रंथि थी, जो हर नाग-जाति में होती है। सामान्यतः वह विष स्वयं बाहर नहीं आता; उसके लिए संकल्प चाहिए, नियंत्रण चाहिए।
आज दोनों थे।
एक बूँद।
लोहे पर।
और उस बूँद के स्पर्श से लोहा धीरे-धीरे गलना शुरू हुआ — जैसे अग्नि में बर्फ। उस अँधेरे में एक अत्यंत धीमी, फुसफुसाती आवाज़ आई — विष और लोहे के बीच उस अदृश्य युद्ध की।
कालिंदी मुस्कुराई।
अँधेरे में। जहाँ कोई देख नहीं सकता था।
द्वार टूटने में एक घड़ी का समय लगा।
धीरे-धीरे। सावधानी से। क्योंकि शोर नहीं करना था।
जब अंतिम कड़ी गली तब कालिंदी ने अपनी पूँछ — जो अब पूर्ण नागिन-रूप में थी — उस बंधे हुए ताले पर लपेटी। एक क्षण। संकल्प। एक झटका।
लकड़ी चरमराई।
धातु टूटी।
दरवाज़ा खुला।
बाहर रात थी।
वह रात जो वर्षा से भरी थी — हल्की, निरंतर। ऐसी वर्षा जो दृश्य धुंधला कर देती है। ऐसी वर्षा जो कदमों की आहट छुपा लेती है।
कालिंदी ने पहले बाहर देखा।
गुफ़ा के बाहर वह विशाल प्रांगण था जहाँ काका के साधक पहरा देते थे। उनमें से दो मशाल लिए खड़े थे — वर्षा में मशालें आधी बुझी, आधी जलती। तीसरा बैठा था, चौथा किसी से बात कर रहा था।
सातवें क्षेत्र के साधक।
उनमें से एक ने उसी क्षण दरवाज़े की दिशा में देखा।
"वे भाग रही हैं!"
दौड़।
उस दौड़ में जो होती है जब समय नहीं होता सोचने का — केवल चलते जाने का।
कालिंदी आगे थी, मंदाकिनी पीछे। उनके पाँव वर्षा में भीगी मिट्टी पर थे — फिसलन थी, लेकिन नाग-जाति के पाँव अजीब होते हैं। वे सर्प की तरह ज़मीन को पढ़ते हैं, हर असमतलता को जानते हैं।
चार साधक पीछे थे।
उनकी गति कालिंदी और मंदाकिनी से अधिक थी — सातवाँ क्षेत्र, छठे की तुलना में लगभग दोगुनी शक्ति। खुले मैदान में वे एक घड़ी में पकड़ लिए जाते।
कालिंदी ने सीधी रेखा में भागना बंद किया।
वह पेड़ों के बीच से निकली — एक विशाल वृक्ष के दाईं ओर से, फिर बाईं ओर एक और के आगे से। झाड़ियों में घुसी — उनकी शाखाएँ कपड़ों में उलझीं, लेकिन वे निकलती रहीं। एक सूखी नदी की तलहटी मिली — उसमें उतरीं, उसके साथ कुछ दूर चलीं, फिर ऊपर चढ़ गईं एक अलग किनारे से।
उसकी नागिन-प्रकृति यहाँ काम आ रही थी।
तंग जगहों में, घुमावदार रास्तों में — सर्प सहजता से चलता है जहाँ मानव लड़खड़ाता है।
पीछे आवाज़ें कम हुईं।
दो साधकों ने रास्ता खो दिया — वर्षा और अँधेरे में दिशा भटक गई।
लेकिन दो अभी भी थे।
"दीदी!" मंदाकिनी ने फुसफुसाया — दौड़ते हुए ही। "वे अभी भी..."
"जानती हूँ।"
कालिंदी रुकी नहीं।
आगे — पेड़ों के ऊपर से — वह आभा। नीली-सफ़ेद। रुक-रुककर कौंधती।
बिजली।
उसकी गरज यहाँ से भी सुनाई देती थी। एक निरंतर, लयबद्ध — धड़ाम, धड़ाम। जैसे पृथ्वी के हृदय की धड़कन।
यह शायद वज्रवृष्टि जंगल है।
"वहाँ?" मंदाकिनी ने देखा।
"वहाँ।"
"वहाँ कोई नहीं जाता।"
"इसीलिए।" कालिंदी ने एक पल के लिए पीछे देखा — दो मशालें अभी भी थीं। "और इसीलिए वे भी नहीं आएँगे। वे मूर्ख नहीं हैं।"
वे उस दिशा में भागीं।
पीछे वाले दो साधकों में से एक ने अपने साथी को देखा जब वे उस सीमा के पास पहुँचे — जहाँ वज्रवृष्टि का प्रभाव महसूस होने लगता है। हवा बदल जाती है। साधना-चेतना को एक दबाव लगता है — जैसे कोई अदृश्य हाथ रोक रहा हो।
एक साधक आगे बढ़ा।
दूसरे ने उसकी बाँह पकड़ी।
"नहीं।"
वे रुक गए।
वज्रवृष्टि अरण्य की बाहरी सीमा पार करते ही संसार बदल गया।
एकाएक। जैसे किसी ने किसी भिन्न ऋतु का द्वार खोल दिया हो।
नमी। जो हवा में इतनी घुली थी कि साँस के साथ पानी आता महसूस हो। घनत्व — पेड़ यहाँ और सघन थे, उनकी जड़ें आपस में इतनी उलझी थीं कि ज़मीन एक जाल जैसी लगती थी। और वह विशेष भारीपन जो इस वन की हवा में था — जैसे हर साँस में थोड़ी बिजली भी आती हो। जैसे यहाँ की हवा जीवित हो।
दोनों बहनें एक पल के लिए रुकीं।
मंदाकिनी ने अपनी पीठ एक विशाल पेड़ से टिकाई। उसकी साँसें तेज़ थीं। घुटने थोड़े काँप रहे थे।
"वे नहीं आए।"
"नहीं।"
कालिंदी ने पीछे देखा। बाहर अँधेरे में दो मशालें थीं — स्थिर। आगे नहीं बढ़ रही थीं।
मंदाकिनी ने उस भारी हवा को महसूस किया। "यहाँ कुछ... अलग है।"
"हाँ।"
"यह वन जीवित है।"
"सभी वन जीवित होते हैं।"
"नहीं।" मंदाकिनी ने सिर हिलाया। "यह अलग है। जैसे इस वन में कोई चेतना है। एक बड़ी चेतना।"
कालिंदी ने उसे देखा। मंदाकिनी हमेशा से ऐसी थी — वह चीज़ें महसूस करती थी जो दिखती नहीं थीं। उनके पिता कहते थे कि यह उनकी माँ की विरासत है — माँ जो एक साधिका थीं, जिनकी अंतर-दृष्टि असाधारण थी।
"आगे जाते हैं।"
वे उस आभा की दिशा में चलीं।
अर्जुन उस समय उस वृक्ष से दूर था।
वह वन के भीतरी भाग में और गहरे आ चुका था — उस दिशा में जहाँ से वह असाधारण ऊर्जा-प्रवाह आ रहा था। उसकी चेतना कई घड़ियों से उस स्रोत को महसूस कर रही थी। पहले एक हल्की अनुभूति थी — जैसे किसी ने दूर से आवाज़ लगाई हो। फिर वह और स्पष्ट होती गई। और स्पष्ट।
जब तक वह उस स्थान के निकट पहुँचा — वह एक खिंचाव बन गई थी। वह खिंचाव जो किसी की इच्छा पर नहीं था — जो बस था।
पेड़ों के बीच से एक विशाल रोशनी दिखी।
अर्जुन रुक गया।
वह जो सामने था — उसे देखकर उसकी समस्त थकान, उसके समस्त विचार, क्षण भर के लिए थम गए।
वह वृक्ष।
उसकी ऊँचाई का अनुमान लगाना संभव नहीं था। तना इतना मोटा था कि पचास व्यक्ति मिलकर भी उसे नहीं घेर सकते थे। उसकी छाल में वे रेखाएँ थीं जो लाखों वर्षों की आँधियाँ और बिजलियाँ छोड़ती हैं — गहरी, काली, किसी प्राचीन लिपि की तरह जिसे अभी कोई पढ़ना नहीं जानता। उसकी जड़ें ज़मीन से ऊपर उठी थीं — विशाल, उलझी, किसी विशाल जीव की उँगलियों की तरह।
और उसके ऊपर — बिजली।
वे एक के बाद एक गिरती रहती थीं। एक नहीं, दो नहीं — निरंतर। जैसे आकाश ने तय किया हो कि इस वृक्ष पर हमेशा बिजली गिरती रहेगी। धड़ाम। धड़ाम। धड़ाम।
और हर बार वह वृक्ष... अपरिवर्तित रहता।
जैसे बिजलियाँ उसे नष्ट करने नहीं, प्रणाम करने आती हों।
उसकी जड़ों और तने में वह ऊर्जा नीले-सुनहरे तंतुओं की तरह दौड़ती दिखती थी — जीवित, निरंतर, जैसे किसी विशाल जीव की नसों में रक्त।
और उस वृक्ष की एक लता पर।
एक फल।
उस फल के चारों ओर एक आभामंडल था जो उस घने, वर्षा-भरे जंगल में भी आँखों को चुभता था। जैसे फल स्वयं एक छोटा सूर्य हो। उसमें वह ऊर्जा थी जिसे अर्जुन अपनी काली अग्नि की चेतना से महसूस कर सकता था — एक गहरी, वृद्ध, लाखों वर्षों में संचित शक्ति जो किसी एक प्रतीक्षा में थी।
लेकिन वह अकेला नहीं था।
वे पहले से आए हुए थे।
नील-वज्र गरुड़ उस वृक्ष की सबसे ऊँची शाखा पर था — इतनी ऊँचाई पर कि वह बादलों के बीच था। उसके पंख नीले थे जिन पर मोर-जैसे गोलाकार चिह्न थे, जो बिजली की चमक में और चमकते थे। उसका आकार साधारण गरुड़ का चार गुना था। उसकी आँखें उस फल पर टिकी थीं — भूख से नहीं, उस एकाग्रता से जो हज़ारों वर्षों की साधना के बाद आती है।
ज़मीन पर — एक द्विशिर मकर। दो सिर, हर सिर में अलग चेतना, अलग व्यक्तित्व। उसका शरीर पत्थर जैसा था — उस प्राचीन प्रजाति का जो तब अस्तित्व में थी जब यह वन नया था। उसके दोनों मुँहों से हल्की धुआँ निकलती थी और उसकी हर साँस के साथ ज़मीन थोड़ी काँपती थी।
पेड़ों के बीच से — वज्रकिन्नरी। आधा मानव, आधा पक्षी। उसके नीले पंख भीगे हुए थे लेकिन उनमें एक विचित्र चमक थी जो बताती थी कि यह वर्षा में और शक्तिशाली होती है, कमज़ोर नहीं। उसका चेहरा अर्धमानव था — स्त्री के समान, लेकिन उसकी आँखें पक्षी की थीं, सुनहरी, घूमती हुई।
इंद्रहिरण — एक विशाल हिरण जिसके सींग बिजली के बने थे — हर हिलने पर उनसे नीली चिनगारियाँ निकलती थीं। वह वृक्ष के पीछे था, सावधान, लेकिन उसकी दृष्टि अटल थी।
और इन सबके बीच — मयूरवज्र।
वह मोर — जिसका आकार साधारण मोर से तीन गुना था — वृक्ष की जड़ों के निकट था। उसके पंख आधे खुले थे। उन पंखों में जो चमक थी — वह न केवल रंग थी। उसमें वह आभा थी जो सहस्रों वर्षों की साधना से आती है। प्रत्येक पंख-आँख में एक जागती हुई चेतना थी।
अर्जुन ने सब देखा।
और एक पेड़ की आड़ में चला गया।
यह उसकी लड़ाई नहीं थी।
नागकन्याएँ उस क्षण वहाँ पहुँचीं।
उन्होंने वह दृश्य देखा और दोनों के पाँव रुक गए।
मंदाकिनी ने एक पेड़ के पीछे खुद को छुपाया — सहज वृत्ति से। कालिंदी भी उसके साथ।
"यह क्या है?" मंदाकिनी ने फुसफुसाया।
कालिंदी का उत्तर नहीं आया। वह देख रही थी।
उसने उन जीवों को देखा — एक-एक को। उनकी ऊर्जा को महसूस किया। और उस फल को। उस वृक्ष को।
नागलोक में एक पुरानी कथा थी।
विश्ववृक्ष।
वह वृक्ष जो इस वन के जन्म से भी पहले खड़ा था।
उसकी जड़ें धरती की नसों में समाई थीं, और उसकी शाखाएँ उन ऊँचाइयों तक फैली थीं जहाँ सामान्य दृष्टि पहुँच ही नहीं सकती थी। लाखों वर्षों की साधना, लाखों वर्षों का अनुभव, और लाखों वर्षों की संचित शक्ति उसके भीतर प्रवाहित होती थी।
और आज...
उस शक्ति का एक अंश फल बनने वाला था।
वह स्वर्णिम फल अब लगभग पूर्णतः पक चुका था।
उसके चारों ओर फैली दिव्य आभा पहले से कहीं अधिक प्रखर हो गई थी। उसकी सतह पर सुनहरी रेखाएँ धीरे-धीरे बह रही थीं, मानो भीतर कोई जीवित ऊर्जा साँस ले रही हो।
पूरा वन मौन था।
वह अस्वाभाविक मौन।
जिसमें न पक्षियों का स्वर था, न पत्तों की सरसराहट।
मानो स्वयं प्रकृति किसी महत्वपूर्ण क्षण की प्रतीक्षा कर रही हो।
ऊपर एक विशाल शाखा पर बैठा नील-वज्र गरुड़ अपनी सुनहरी आँखों से फल को घूर रहा था।
उसके नीले पंखों के बीच बिजली की महीन धाराएँ दौड़ रही थीं।
हर कुछ क्षण बाद एक चिंगारी फूटती और हवा में विलीन हो जाती।
उसकी दृष्टि में धैर्य था।
लेकिन वह धैर्य अब समाप्ति के निकट था।
दूसरी ओर।
एक विशाल चट्टान के पास द्विशिर मकर स्थिर पड़ा था।
उसके दोनों सिर अलग-अलग दिशाओं में देख रहे थे।
एक सिर की आँखों में नीली ज्वाला जल रही थी।
दूसरे की आँखों में रक्तिम चमक।
दोनों सिरों के विचार भिन्न थे।
लेकिन लक्ष्य एक।
विश्ववृक्ष का फल।
उनसे कुछ दूरी पर वज्रकिन्नरी एक पतली शाखा पर बैठी थी।
वह आँखें बंद किए हुए थी।
मानो ध्यान में हो।
लेकिन उसके चारों ओर हवा लगातार कंपन कर रही थी।
उसके शरीर के आसपास छोटी-छोटी विद्युत-रेखाएँ जन्म ले रही थीं और नष्ट हो रही थीं।
उसकी उँगलियाँ अनजाने में किसी अदृश्य वीणा के तारों को छू रही थीं।
प्रत्येक स्पर्श के साथ हवा में सूक्ष्म तरंगें फैलतीं।
और फिर विलीन हो जातीं।
नीचे घास के विस्तृत मैदान में इंद्रहिरण खड़ा था।
उसकी रजत त्वचा चाँदनी जैसी चमक रही थी।
उसके विशाल सींगों में नीली ऊर्जा जमा हो रही थी।
वह स्थिर दिखाई दे रहा था।
लेकिन उसकी मांसपेशियाँ तन चुकी थीं।
मानो वह किसी भी क्षण बिजली की गति से दौड़ पड़ने वाला हो।
कालिंदी ने यह सब देखा।
उसकी आँखों में गंभीरता उतर आई।
"वे सब तैयार हैं।"
मंदाकिनी ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ..."
उसकी दृष्टि फल पर टिकी हुई थी।
"और उनमें से कोई भी पीछे हटने वाला नहीं है।"
उसी क्षण—
फल की सतह पर एक नई स्वर्णिम रेखा उभरी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
पूरा फल अचानक प्रकाशमान हो उठा।
धड़कन।
एक।
फिर दूसरी।
जैसे किसी विशाल हृदय ने धड़कना शुरू कर दिया हो।
धम्म।
धम्म।
धम्म।
हर धड़कन के साथ पूरे वन में ऊर्जा की लहर फैल रही थी।
पेड़ झूम उठे।
पत्तियाँ काँपने लगीं।
धरती के भीतर से गहरी गूँज उठी।
कालिंदी की आँखें सिकुड़ गईं।
"यह शुरू हो गया।"
और तभी—
नील-वज्र गरुड़ खड़ा हो गया।
उसके विशाल पंख धीरे-धीरे फैलने लगे।
एक पंख।
फिर दूसरा।
क्षणभर में उसका आकार दोगुना प्रतीत होने लगा।
पंखों के बीच बिजली चमकी।
कड़कड़ाहट की आवाज़ पूरे वन में गूँज उठी।
दूसरे सभी दिव्य जीव तुरंत सतर्क हो गए।
द्विशिर मकर के दोनों सिर एक साथ ऊपर उठे।
वज्रकिन्नरी की आँखें खुल गईं।
इंद्रहिरण के खुर धरती में धँस गए।
सभी समझ गए।
पहली चाल चल दी गई थी।
नील-वज्र गरुड़ ने एक तीखी गर्जना की।
और अगले ही क्षण—
वह आकाश से नीचे झपटा।
उसका शरीर नीली बिजली में बदलता हुआ प्रतीत हुआ।
वायु फट गई।
बादलों जैसी गर्जना हुई।
उसकी गति इतनी अधिक थी कि उसकी वास्तविक आकृति धुँधली पड़ गई।
सीधा लक्ष्य—
विश्ववृक्ष का फल।
लेकिन वह अकेला नहीं था जिसने अवसर देखा।
द्विशिर मकर ने उसी क्षण गर्जना की।
धरती काँप उठी।
और उसका विशाल शरीर बिजली की तरह आगे उछला।
दोनों महाशक्तियाँ एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ रही थीं।
टकराव अब केवल कुछ क्षण दूर था।
नील-वज्र गरुड़ आकाश को चीरता हुआ नीचे आ रहा था।
द्विशिर मकर धरती को फाड़ता हुआ आगे बढ़ रहा था।
एक ऊपर से।
एक नीचे से।
दोनों का लक्ष्य एक ही।
विश्ववृक्ष का फल।
और फिर—
वे टकराए।
धाआआआम!
विस्फोट की गर्जना पूरे वन में गूँज उठी।
क्षणभर के लिए ऐसा लगा मानो आकाश और धरती आपस में भिड़ गए हों।
गरुड़ के पंखों से निकली बिजली और मकर के शरीर से फूटी जलीय-ऊर्जा आपस में टकराईं।
नीली चमक का एक विशाल गोला बना।
उसके बाद ऊर्जा की लहर चारों दिशाओं में फैल गई।
दर्जनों प्राचीन वृक्ष जड़ों समेत उखड़ गए।
दूर खड़े पर्वतों की ढलानों से पत्थर टूटकर नीचे गिरने लगे।
कालिंदी और मंदाकिनी के सामने सुरक्षा-लताओं की एक दीवार उग आई।
विश्ववृक्ष स्वयं उन्हें बचा रहा था।
अन्यथा उस ऊर्जा की एक लहर ही दोनों को कई कोस दूर फेंक देती।
"इतनी शक्ति..." मंदाकिनी के मुँह से अनायास निकला।
कालिंदी का चेहरा गंभीर था।
"और यह तो केवल शुरुआत है।"
ऊर्जा का गोला बिखरा।
गरुड़ पीछे नहीं हटा।
उसने अपने दोनों पंजे आगे बढ़ाए।
उन पंजों के चारों ओर नीली विद्युत सर्पों की तरह लिपट गई।
अगले ही क्षण उसने प्रहार किया।
चमाक्!
बिजली की तीन विशाल धाराएँ एक साथ मकर की ओर गिरीं।
लेकिन द्विशिर मकर भी कोई साधारण जीव नहीं था।
उसके बाएँ सिर ने अपना मुँह खोला।
एक गहरी नीली धारा बाहर निकली।
वह जल था।
पर साधारण जल नहीं।
वह जल इतना सघन था कि लोहे से भी कठोर प्रतीत हो रहा था।
बिजली उससे टकराई।
विस्फोट हुआ।
भाप के बादल उठे।
और पूरे क्षेत्र को ढँक लिया।
उसी समय—
मकर के दाएँ सिर ने अवसर देखा।
उसके मुँह में रक्तिम प्रकाश जमा होने लगा।
क्षणभर बाद उसने उसे छोड़ दिया।
एक लाल ऊर्जा-किरण सीधी गरुड़ की ओर गई।
गरुड़ ने पंख फड़फड़ाए।
उसका शरीर ऊपर उठा।
किरण उसके नीचे से निकल गई।
लेकिन जहाँ वह गुज़री—
धरती पिघल गई।
सैकड़ों मीटर लंबी खाई बन गई।
कालिंदी की आँखें सिकुड़ गईं।
"वह अग्नि और जल दोनों तत्वों का स्वामी है।"
मंदाकिनी ने सिर हिलाया।
वह समझ रही थी।
द्विशिर मकर के दोनों सिर केवल दिखावे के लिए नहीं थे।
दोनों अलग-अलग शक्तियों का नियंत्रण रखते थे।
और दोनों का समन्वय भयावह था।
उधर गरुड़ फिर ऊपर उठ चुका था।
वह बादलों के बीच पहुँच गया।
कुछ क्षण तक वह दिखाई नहीं दिया।
फिर—
आकाश चमका।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
और अचानक पूरा आकाश नीली बिजली से भर गया।
दूर-दूर तक बादल घूमने लगे।
एक विशाल विद्युत-चक्र बन गया।
मंदाकिनी की साँस अटक गई।
"वह क्या कर रहा है?"
कालिंदी का उत्तर धीमा था।
"तूफ़ान बुला रहा है।"
अगले ही क्षण—
हजारों बिजली की धाराएँ आकाश से नीचे गिरीं।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
पूरा वन काँप उठा।
द्विशिर मकर ने गर्जना की।
उसके चारों ओर जल का एक विशाल गुंबद बन गया।
बिजलियाँ उस गुंबद से टकराने लगीं।
हर टक्कर पर विस्फोट होता।
धरती काँपती।
पेड़ टूटते।
और ऊर्जा की लहरें चारों दिशाओं में फैल जातीं।
लेकिन चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो—
हजारों बिजली की धाराओं को रोकना आसान नहीं था।
धीरे-धीरे जल-गुंबद में दरारें आने लगीं।
पहली दरार।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
गरुड़ की आँखों में विजय की चमक उभरी।
यही अवसर था।
उसने अपने पंख समेटे।
और बिजली के भाले की तरह नीचे झपटा।
यदि यह प्रहार सफल होता—
तो मकर युद्ध से बाहर हो सकता था।
लेकिन तभी—
एक मधुर स्वर वन में गूँजा।
इतना सुंदर कि एक पल के लिए मन उसे सुनने में खो जाए।
वज्रकिन्नरी।
अब तक वह केवल प्रतीक्षा कर रही थी।
उसने अपनी आँखें खोलीं।
और पहला सुर छेड़ा।
टन्न्न...
स्वर सुनते ही हवा काँप उठी।
दूसरा सुर।
तीसरा।
चौथा।
क्षणभर में पूरा क्षेत्र अदृश्य ध्वनि-तरंगों से भर गया।
लेकिन वे केवल ध्वनि नहीं थीं।
वे शक्ति थीं।
शुद्ध शक्ति।
वज्र की शक्ति।
उसके गीत के साथ बिजली स्वयं दिशा बदलने लगी।
जो धाराएँ मकर पर गिर रही थीं, वे मुड़ गईं।
जो ऊर्जा गरुड़ को बल दे रही थी, वह अस्थिर हो गई।
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