अर्जुन पीछे हटा… और छाया की तरह वहाँ से विलीन हो गया। कमरा अब शांत था। जैसे कोई आया ही न हो। अगले ही पल वह महल के दूसरे कोने में था—जहाँ घना अंधकार पसरा हुआ था। पर उस अंधेरे के भीतर दबे स्वर थे… कराहें, जंजीरों की खनक, पीड़ा में टूटी साँसों की आवाज़ें। वह स्थान महल का निजी कारागार था। अर्जुन कुछ क्षण मौन खड़ा रहा। उसकी आँखें अंधेरे में चमकीं। फिर उसने अपनी एग्री ऊर्जा को हल्के से मुक्त किया। ऊर्जा हवा की तरह फैल गई—न कोलाहल, न प्रकाश। बस एक मौन स्पर्श। कैदियों के टूटे हुए घाव धीरे-धीरे भरने लगे। टूटी हड्डियाँ अपनी जगह जुड़ गईं। सूजे हुए अंगों की वेदना शांत हो गई। पर जैसे ही उपचार पूर्ण हुआ—अर्जुन ने अपनी ऊर्जा का दूसरा स्पर्श छोड़ा। सभी कैदी गहरी बेहोशी में चले गए। उनके हाथों में बँधी जंजीरों और ताले पर उसने हल्की-सी शक्ति डाली। वे पूर्णतः नहीं टूटे… पर इतने कमज़ोर हो गए कि मामूली प्रयास में चटक जाएँ। “समय आने पर… तुम स्वयं मुक्त हो जाओगे,” उसने मन ही मन कहा। अगले ही क्षण वह कारागार से विलीन हो चुका था। अब वह राजकोषीय कक्ष में था—महल का वह भाग जहाँ राज्य की संपत्ति, दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ और गोपनीय सामग्री सुरक्षित रखी जाती थी। अंधेरे में उसकी स्वर्गीय काली अग्नि हल्के से प्रकट हुई। पर वह आग साधारण अग्नि नहीं थी। वह भस्म करती नहीं—आत्मसात करती थी। जो जड़ी-बूटियाँ आवश्यक थीं… जो दुर्लभ थीं… और जो वर्षों से संग्रहित थीं— सब उसकी अग्नि में विलीन होती गईं और उसकी ऊर्जा-संरचना में समाहित होती चली गईं। कुछ ही क्षणों में जो कक्ष औषधियों से भरा था, वह खंडहर-सा सूना दिखने लगा। तभी उसकी दृष्टि एक छोटे से बक्से पर पड़ी। अंदर एक अंगूठी थी। साधारण व्यक्ति उसे सामान्य धातु समझता। पर अर्जुन… जिसने पिछले जन्म में एक सम्पूर्ण राज्य पर शासन किया था… वह उसे पहचान गया। यह अंगूठी किसी प्राचीन राजवंश से जुड़ी थी—ऐसे रहस्य से, जिसका संकेत उसे अपने पूर्व जन्म में भी नहीं मिला था। उसने बिना संकोच उसे अपने पास रख लिया। फिर उसने दोनों हाथों से कई जटिल मुद्राएँ बनाईं। उसके सामने एक छोटा-सा काला कमल प्रकट हुआ। कमल बंद था। अर्जुन ने अपनी स्वर्गीय ऊर्जा उसमें प्रवाहित करनी शुरू की। धीरे-धीरे वह कमल बढ़ता गया—एक हथेली जितना बड़ा हो गया। उसकी आभा गहरी, रहस्यमयी और भयावह थी। अर्जुन ने चुपचाप वह कमल उसी बक्से के भीतर रख दिया जहाँ अंगूठी थी। कमल अभी बंद था… पर भीतर ही भीतर वह खिलना आरम्भ कर चुका था। जितनी तीव्रता से वह महल में प्रवेश किया था, उतनी ही तीव्रता से वह छत से बाहर निकला। रात्रि के प्रहरी अपनी ड्यूटी में व्यस्त थे। कोई उसकी छाया तक नहीं देख पाया। वह नगर की गलियों से होता हुआ तेज़ी से गुरुकुल लौट आया। उसके कक्ष में अभी भी उसकी कृत्रिम ज्योति जल रही थी—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह पूरे समय वहीं उपस्थित रहा हो। अर्जुन शांतिपूर्वक अपने आसन पर बैठ गया। बाहर रात स्थिर थी। भीतर—एक नया खेल आरम्भ हो चुका था।
__ गुरुकुल की रात सामान्य थी। शिष्य ध्यान में लीन थे, आचार्य अपने-अपने कक्षों में। परंतु उस शांति के भीतर एक सूक्ष्म विचलन उठा। वीरेंद्र के लोगों में से एक—तीसरे चरण का साधक—अचानक ठिठका। उसकी नासिका हल्की-सी फड़की। “यह… कैसी ऊर्जा है?” उसने धीमे स्वर में कहा। वह ऊर्जा तीव्र नहीं थी। न ही स्पष्ट। बस एक क्षणिक गंध… जैसे जली हुई औषधि और किसी अज्ञात अग्नि का मिश्रण। उसकी दृष्टि धीरे-धीरे शिष्यों के कक्षों की ओर घूमी… और अंततः अर्जुन के कक्ष पर आकर ठहर गई। अर्जुन उस समय ध्यानमग्न बैठा था। उसका चेहरा शांत। श्वास नियंत्रित। साधक ने भीतर झाँकने का प्रयास किया। पर उसे केवल एक सामान्य प्रथम-स्तर का साधक दिखाई दिया—जिसकी साधना अभी प्रारंभ भी ठीक से नहीं हुई थी। अर्जुन तो अभी तक मणिपुर चक्र को पूर्ण रूप से विस्तारित भी नहीं कर पाया था। “संभवतः भ्रम है…” उसने सोचा। पर संदेह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उसने बिना कुछ कहे निगरानी आरंभ कर दी। अर्जुन ने आँखें बंद रखीं… पर भीतर उसकी चेतना सब देख रही थी। उसने जानबूझकर अपनी ऊर्जा को और भी मंद कर दिया। यह समय टकराव का नहीं था। “अभी नहीं…” उसने मन में कहा। उधर— वीरेंद्र के महल में अराजकता भड़क चुकी थी। निजी कारागार के कैदी एक-एक कर जागे। उनके घाव भर चुके थे। उनकी हड्डियाँ जुड़ चुकी थीं। पहले उन्होंने विस्मय से अपने शरीर को देखा… फिर अपनी जंजीरों को खींचा। चटाक! ताले मामूली प्रयास में टूट गए। कुछ ही क्षणों में कारागार का द्वार भीतर से धकेला गया। और वर्षों से दबा हुआ क्रोध ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा। “स्वतंत्रता!” “प्रतिशोध!” चिल्लाहटें महल के गलियारों में गूँज उठीं। पहरेदारों ने तलवारें खींचीं— पर वे उन कैदियों को पहचान नहीं पा रहे थे। ये वही लोग थे… पर अब उनकी आँखों में भय नहीं था। उनके शरीर में अद्भुत शक्ति थी। पहला प्रहरी गिरा। दूसरा दीवार से जा टकराया। तीसरे का शस्त्र छिनकर उसी पर चला दिया गया। कुछ ही क्षणों में महल के भीतर युद्ध छिड़ गया। अफरा-तफरी, धुआँ, रक्त, चीत्कार। वीरेंद्र के विश्वस्त अधिकारी एकत्र हुए। “यह भीतर से किसी की सहायता के बिना संभव नहीं!” “कोई गुप्त गुट सक्रिय है!” “राजकोषीय कक्ष भी जाँचो!” सैनिक दौड़े। महल के ऊपरी प्रांगण में खड़े होकर वीरेंद्र ने नीचे फैलते अराजक दृश्य को देखा। उसकी आँखें संकुचित हो गईं। “जिसने भी यह किया है…” “वह खेल खुलकर खेल रहा है।” और उसी समय— गुरुकुल के शांत कक्ष में अर्जुन ने अपनी आँखें खोलीं। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। उसने कुछ भी सीधे नहीं किया था। उसने बस परिस्थितियों को हल्का-सा धक्का दिया था। अब लहरें स्वयं उठ रही थीं।
_ महल के भीतर कैदियों का विद्रोह चरम पर था। तभी— वीरेंद्र के पिता ने अपनी कमर से एक प्राचीन टोकन निकाला। उस पर उकेरे गए चिह्न हल्के से चमके। उन्होंने उसे अपनी मुट्ठी में दबाकर कुचल दिया। टक! क्षण भर के लिए समय जैसे थम गया। महल की छत के ऊपर आकाश काँपा। हवा भारी हो गई। और फिर— एक प्राचीन आभा प्रकट हुई। वीरेंद्र के परदादा। उनका शरीर धरती से कई हाथ ऊपर तैर रहा था। वस्त्र वायु में लहरा रहे थे। केश पीछे की ओर बह रहे थे। आँखें गहरी—जैसे शून्य स्वयं उन्हें निहार रहा हो। वे अमर साधक की भाँति आकाश में स्थिर थे। उन्होंने नीचे देखा। कोई क्रोध नहीं। कोई उत्तेजना नहीं। बस… निरपेक्ष दृष्टि। उन्होंने धीरे से अपना दायाँ हाथ नीचे किया। उसी क्षण— एक अदृश्य, रहस्यमयी दबाव नीचे उतरा। कैदियों के शरीर अचानक काँप उठे। उनके पैर भारी हो गए। फिर— धड़ाम! वे एक-एक कर भूमि पर गिरने लगे। गुरुत्वाकर्षण जैसे कई गुना बढ़ गया हो। हवा स्वयं उनके विरुद्ध हो गई हो। वे अपने पैर तक नहीं उठा पा रहे थे। हड्डियाँ चटकने लगीं। साँस लेना कठिन हो गया। उनका अपना ही शरीर उनका शत्रु बन चुका था। कुछ ही क्षणों में विद्रोह समाप्त हो गया। परदादा अब भी आकाश में तैर रहे थे। नीचे जो हो रहा था… उससे मानो उनका कोई लेना-देना ही नहीं था। उनकी दृष्टि कहीं और थी। उसी समय— राजकोषीय कक्ष में रखा काला कमल… धीरे-धीरे खुलने लगा। उसकी पंखुड़ियाँ एक-एक कर फैलती गईं। और फिर— उसके केंद्र से एक सूक्ष्म प्रकाश उठा। वह प्रकाश दीवार पर नहीं… भूमि पर नहीं… सीधे आकाश की ओर गया। महल के ऊपर एक रहस्यमयी चिह्न उभर आया—काला और स्वर्णिम। और फिर— आकाश बदलने लगा। बादल घिर आए। पर वे साधारण बादल नहीं थे। उनका रंग गहरा नीला था—भीतर से बिजली की रेखाएँ चमक रही थीं। वीरेंद्र के परदादा ने ऊपर देखा। उनकी आँखों का रंग क्षण भर में बदल गया। “स्वर्गीय बादल…” उन्होंने धीमे से कहा। ये वही बादल थे जो तब प्रकट होते थे— जब कोई साधक देवस्थान की सीमा को छूने का प्रयास करता था। जब कोई साधारण मार्ग से ऊपर उठने की चेष्टा करता था। ये बादल परीक्षा नहीं लेते— ये रोकते हैं। कई महान साधक… इनके प्रहार में अपने प्राण गँवा चुके थे। नीचे सैनिक स्तब्ध थे। वीरेंद्र के पिता भयभीत होकर ऊपर देख रहे थे। परदादा की भौंहें सिकुड़ीं। “कौन…” उन्होंने मन ही मन कहा। “किसने यह सीमा छूने का साहस किया?” बादल और घने हो गए। आकाश में गर्जना हुई। पहली नीली बिजली नीचे उतरी— पर लक्ष्य कोई व्यक्ति नहीं था। वह सीधे राजकोषीय कक्ष की दिशा में गिरी। महल काँप उठा। और उसी क्षण— दूर गुरुकुल में ध्यानमग्न बैठे अर्जुन ने अपनी आँखें खोलीं। उसके भीतर की ऊर्जा हल्की-सी थरथराई। उसने कुछ नहीं कहा। पर उसकी दृष्टि क्षितिज की ओर उठ गई। खेल अब साधारण राजनीति से ऊपर उठ चुका था। अब स्वर्ग ने भी ध्यान देना शुरू कर दिया था। _ स्वर्गीय बादल गर्जे। नीली बिजली की अगली धार सीधी राजकोषीय कक्ष पर उतरी— पर इस बार कुछ अप्रत्याशित हुआ। काला कमल पूर्ण रूप से खिल चुका था। उसकी पंखुड़ियाँ अब केवल ऊर्जा नहीं, बल्कि शून्य जैसी गहराई धारण किए हुए थीं। बिजली उसके केंद्र में गिरी— पर नष्ट करने के स्थान पर… वह सोख ली गई। कमल काँपा। उसकी पंखुड़ियाँ और फैल गईं। उसका आकार बढ़ने लगा। एक हाथ से दो हाथ… दो से पाँच… कुछ ही क्षणों में वह कक्ष की सीमा को छूने लगा। स्वर्गीय बादलों ने मानो चुनौती स्वीकार की। और अधिक बिजली उतरी। नीला प्रकाश। काली अग्नि। दोनों का टकराव नहीं—विलय होने लगा। ऊर्जा अस्थिर हो गई। आकाश में खड़े वीरेंद्र के परदादा का चेहरा बदल गया। “यह वस्तु… सोख रही है?” उन्होंने अपनी संपूर्ण साधना सक्रिय की। दोनों हाथ फैलाए। एक पारदर्शी ऊर्जा-गोलक महल के ऊपर बनने लगा—एक रक्षा कवच। परंतु— काला कमल अब सीमा पार कर चुका था। उसके केंद्र से एक श्वेत-काली किरण फूटी। और फिर— धम्म्म्म!!! ऐसा विस्फोट हुआ जिसकी गूँज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई। पूरा राज्य कुछ क्षणों के लिए प्रकाश में डूब गया। रात… दिन बन गई। महल— उसकी दीवारें, स्तंभ, प्रांगण— सब प्रकाश की लपट में विलीन हो गए। स्वर्गीय अग्नि और बिजली ने मिलकर ऐसा दाहक प्रहार किया कि पत्थर तक भस्म हो गए। वीरेंद्र… उसके पिता… उसका समूचा परिवार… सैनिक… कैदी… जो भी उस महल के भीतर था—क्षण में राख हो गया। वीरेंद्र का विशाल वंश, जो पीढ़ियों से इस राज्य की शक्ति का प्रतीक था— उस रात लगभग समाप्त हो गया। विस्फोट थमा। बादल धीरे-धीरे विलीन हो गए। आकाश पुनः अंधकारमय हो गया। अब वहाँ महल नहीं था— केवल धधकते अवशेष थे। वीरेंद्र के परदादा—जो आकाश में तैर रहे थे—अब धरती पर खड़े थे। वे घायल थे। उनके वस्त्र फट चुके थे। शरीर पर जलन के गहरे चिह्न थे। श्वास भारी थी। वे धीरे-धीरे राख के ढेरों के बीच चलने लगे। “वीरेंद्र…” “पुत्र…” उनकी आवाज़ भारी थी—पर टूट चुकी थी। वे राख को हाथों से हटाते। पत्थरों को पलटते। पर कोई देह नहीं थी। कोई अवशेष नहीं। कोई अंतिम चीख की स्मृति तक नहीं। स्वर्गीय अग्नि ने सब कुछ भस्म कर दिया था। उस रात महल पूर्ण रूप से भरा हुआ था— सैनिक, परिवार, सेवक—सब भीतर विश्राम कर रहे थे। और यही कारण था— कि कोई भी जीवित नहीं बचा। वीरेंद्र के परदादा घुटनों के बल बैठ गए। उनकी आँखों में पहली बार निरपेक्षता नहीं—शून्यता थी। “यह दैवी प्रकोप नहीं था…” उन्होंने धीमे से कहा। “यह किसी की योजना थी।” दूर क्षितिज की ओर उन्होंने देखा। उनकी साधना अभी शेष थी। उनका जीवन अभी शेष था। और अब— उनके पास केवल एक उद्देश्य था। जिसने यह खेल आरम्भ किया… वह बचेगा नहीं। दूर गुरुकुल में— अर्जुन ने अपनी ध्यानावस्था से बाहर आकर गहरी साँस ली। उसने विस्फोट को महसूस किया था। पर उसके चेहरे पर न उत्साह था, न भय। “कभी-कभी,” उसने मन में कहा, “बीज इतना गहरा बोया जाता है कि वृक्ष बनने पर पूरा वन जल जाता है।” रात फिर शांत हो गई। पर अब राज्य की शक्ति-संरचना बदल चुकी थी। और एक प्राचीन अमर साधक—अपने वंश की राख पर खड़ा—अब अकेला था।
__ दूर राज्य में हुए महाविनाश की कंपन अभी भी सूक्ष्म तरंगों की तरह फैल रही थी। गुरुकुल के शांत कक्ष में बैठे अर्जुन ने अचानक अपनी आँखें खोलीं। कुछ… बदल गया था। वह स्थिर बैठा रहा। फिर उसके हाथ स्वतः ही चलने लगे। एक… दो… तीन जटिल मुद्राएँ। हवा में सूक्ष्म चिह्न उभरे—क्षण भर को चमके और फिर अदृश्य हो गए। अगले ही पल उसके कक्ष के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा-वृत्त खड़ा हो गया। बाहर से देखने पर सब सामान्य था। दीपक की लौ स्थिर। ऊर्जा की लय साधारण। जो भी झाँकता—उसे यही प्रतीत होता कि अर्जुन साधारण ध्यान में लीन है। पर भीतर— ऊर्जा की दिशा बदल चुकी थी। तभी… कक्ष के मध्य हवा हल्की-सी काँपी। एक काली चमक प्रकट हुई। वह पूर्ण कमल नहीं था— बस एक अंश। एक पंखुड़ी… या शायद उसका केंद्र-बिंदु। विस्फोट के बाद जीवित बचा हुआ अंश। वह धीरे-धीरे अर्जुन के सामने मंडराने लगा। उससे स्वर्गीय बिजली की सूक्ष्म चिंगारियाँ निकल रही थीं—नीली, तीव्र, पर नियंत्रित। अर्जुन ने उसे शांत दृष्टि से देखा। “तुमने सोख लिया…” उसने मन में कहा। अंश ने जैसे उत्तर दिया—एक हल्की कंपन के रूप में। फिर बिना किसी चेतावनी के— वह काला प्रकाश सीधा अर्जुन की छाती में प्रवेश कर गया। उसका शरीर क्षण भर को तन गया। नसें उभरीं। आँखों में नीली रेखाएँ चमकीं। पर उसने प्रतिरोध नहीं किया। वह भीतर उतर गया—अपने चेतना-क्षेत्र में। अर्जुन ने आँखें बंद कीं और अपने आंतरिक लोक में प्रवेश किया। वहाँ—जहाँ उसका मणिपुर चक्र अभी पूर्ण विकसित भी नहीं हुआ था— एक नया दृश्य उपस्थित था। काला कमल का अंश उसके ऊर्जा-केंद्र के ऊपर तैर रहा था। उसकी पंखुड़ी से नीली बिजली की सूक्ष्म धाराएँ निकलतीं— और फिर उसकी ऊर्जा-धारा में मिल जातीं। स्वर्गीय बिजली… और काली अग्नि… विलय हो रहे थे। पर टकराव नहीं था। वे संतुलन खोज रहे थे। अर्जुन ने अनुभव किया— उसकी ऊर्जा की गुणवत्ता बदल रही है। गहराई… बढ़ रही है। घनत्व… सघन हो रहा है। हालाँकि उसकी साधना अभी औपचारिक रूप से प्रारंभ भी नहीं हुई थी… पर उसके भीतर कुछ ऐसा जन्म ले चुका था जो सामान्य साधकों के मार्ग से भिन्न था। उसके होंठों पर धीमी मुस्कान आई। “स्वर्ग स्वयं वार करे… और उसका अंश मेरे भीतर स्थिर हो जाए…” उसने आँखें खोलीं। बाहर से सब कुछ शांत था। तीसरे चरण वाला साधक दूर से निगरानी कर रहा था— और उसे अब भी वही साधारण ऊर्जा दिख रही थी। अर्जुन पुनः ध्यान में बैठ गया। पर अब— उसके भीतर एक काला कमल था जिसमें स्वर्गीय बिजली की झलकियाँ चमक रही थीं। और यह केवल आरम्भ था। _ गुरुकुल का कक्ष बाहर से अब भी शांत था। पर भीतर— अर्जुन के शरीर में तूफ़ान उठ चुका था। काले कमल का अंश उसके आंतरिक लोक में स्थिर हुआ… और अचानक नीचे की ओर सरकने लगा। पहले उसने मूलाधार चक्र को छुआ। वहाँ पहले से ही स्वर्गीय काली अग्नि की सूक्ष्म चिनगारी विद्यमान थी—वह अग्नि जिसे अर्जुन ने साधारण अग्नि की तरह नहीं, बल्कि शून्य की ज्वाला की तरह धारण किया था। अब— स्वाधिष्ठान चक्र में नीली विद्युत की लहरें फैलने लगीं। काली अग्नि नीचे। स्वर्गीय बिजली ऊपर। दो विपरीत तत्त्व। दोनों जीवित। दोनों उग्र। अर्जुन का शरीर काँप उठा। उसकी नसों में मानो पिघला हुआ लोहा बह रहा था। त्वचा लाल पड़ने लगी। साँसें अनियमित हो गईं। उसे सचमुच लगा— जैसे उसकी चमड़ी भीतर से गल जाएगी। जैसे ऊर्जा उसकी देह को फाड़कर बाहर निकलना चाहती हो। उसकी साधना अभी प्रारंभिक थी। मणिपुर चक्र भी पूर्ण विकसित नहीं हुआ था। और अब दो दैवी तत्त्व उसके भीतर संघर्ष कर रहे थे। वेदना इतनी तीव्र थी कि उसकी दृष्टि धुंधली हो गई। पर उसने चीख नहीं मारी। उसने दोनों हाथ उठाए। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं— फिर भी वे जटिल प्रतीक बनाने लगीं। एक त्रिकोण। उसके भीतर एक वृत्त। फिर उसके ऊपर अर्धचंद्राकार रेखा। हवा में सूक्ष्म मंत्र-चिह्न प्रकट हुए। स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर चमकते अक्षर उभरे—नीले और काले मिश्रित। वे मंत्र साधारण भाषा के नहीं थे— वे ऊर्जा के सूत्र थे। जैसे ही अंतिम प्रतीक पूर्ण हुआ— नीली बिजली उछली। क्षण भर को लगा कि वह अर्जुन की चेतना को फाड़ देगी। पर मंत्रों ने उसे घेर लिया। स्वाधिष्ठान चक्र के चारों ओर एक ज्यामितीय ऊर्जा-जाल बन गया। बिजली की धाराएँ उस जाल से टकराईं— और भीतर सीमित हो गईं। वे पूर्णतः शांत नहीं हुईं— पर अब नियंत्रित थीं। नीचे मूलाधार में काली अग्नि भी स्थिर हो गई—मानो उसे पता हो कि समय अभी नहीं आया। अर्जुन का शरीर पसीने से भीग चुका था। उसकी साँस भारी थी। पर उसकी त्वचा अब नहीं जल रही थी। धीरे-धीरे पीड़ा कम हुई। उसने भीतर देखा— मूलाधार में काली अग्नि घूम रही थी। स्वाधिष्ठान में नीली बिजली बंधी हुई थी। दोनों सक्रिय… पर कैद। अर्जुन ने गहरी साँस ली। “अभी तुम दोनों मेरे नहीं हो,” उसने मन में कहा, “पर भाग भी नहीं सकते।” उसके होंठों पर थकी हुई मुस्कान आई। बाहर पहरा दे रहा तीसरे चरण का साधक केवल इतना देख पाया कि अर्जुन के कक्ष से ऊर्जा की लय थोड़ी तेज हुई—फिर स्थिर हो गई। उसे अब भी कुछ असामान्य प्रतीत नहीं हुआ। अंदर— एक ऐसा मार्ग बन चुका था जो सामान्य साधकों के लिए असंभव था।
_ रात की वह भीषण साधना अर्जुन के लिए सीमा से परे थी। स्वर्गीय बिजली को बाँधना… काली अग्नि को शांत करना… उसकी चेतना उस संघर्ष में लगभग टूट चुकी थी। जैसे ही ऊर्जा अस्थायी संतुलन में आई—उसका शरीर और मन साथ छोड़ गए। वह बिस्तर पर गिर पड़ा। बेहोश। पर उसके कक्ष के चारों ओर बना सुरक्षा-कवच अब भी सक्रिय था। मंत्र-चिह्न दीवारों में विलीन होकर सूक्ष्म कंपन बनाए हुए थे। बाहर से सब सामान्य। भीतर—एक मौन परिवर्तन आरम्भ हो चुका था। अर्जुन बेहोश था… पर उसके भीतर की ऊर्जा जाग रही थी। मूलाधार में काली अग्नि धीमे-धीमे घूम रही थी—जैसे किसी धातु को शुद्ध कर रही हो। स्वाधिष्ठान में बँधी स्वर्गीय बिजली उसकी नसों के भीतर सूक्ष्म स्पंदन भेज रही थी। उसकी मांसपेशियाँ धीरे-धीरे सघन होने लगीं। त्वचा के नीचे ऊर्जा का घनत्व बढ़ने लगा। जो पुराने घाव थे—जो वर्षों की कठिनाइयों के निशान थे— वे हल्के पड़ने लगे। त्वचा मानो भीतर से पुनर्निर्मित हो रही थी। उसकी श्वास गहरी हो गई। यह उपचार नहीं था— यह पुनर्गठन था। रात बीत गई। दीपक का तेल कब समाप्त हुआ… कक्ष कब अंधकार में डूबा… उसे कुछ ज्ञात नहीं। सूरज की पहली किरण खिड़की से भीतर आई— और सीधे उसकी आँखों पर पड़ी। अर्जुन की पलकें काँपीं। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। क्षण भर के लिए उसे समझ नहीं आया—वह कहाँ है। फिर स्मृति लौटी। उसने अपने शरीर को हिलाया। वह रुक गया। दर्द… लगभग गायब था। उसने मुट्ठी बाँधी। शक्ति—कल से अधिक थी। परंतु स्थिर नहीं। “अगर मैं ऐसे ही सोता रहा…” उसने हल्की हँसी के साथ सोचा, “तो शायद सचमुच मर जाऊँ।” वह तुरंत उठकर आसन पर बैठ गया। कुछ क्षण श्वास-साधना की। ऊर्जा की जाँच की। मूलाधार स्थिर। स्वाधिष्ठान नियंत्रित—पर भीतर गहराई में बिजली अब भी जीवित। उसने सुरक्षा-कवच हटाया। मंत्र-चिह्न हवा में घुले और अदृश्य हो गए। कुछ समय बाद गुरुकुल में चहल-पहल शुरू हुई। शिष्यों के कदमों की आहट। दूर कहीं लकड़ी के टकराने की ध्वनि। प्रातःकालीन घोष। अर्जुन ने साधारण वस्त्र धारण किए और कक्ष से बाहर निकला। गलियारे में चलते हुए कुछ शिष्य उसके पास से गुज़रे— फिर ठिठक गए। “यह… अर्जुन है?” उनकी आँखों में संदेह था। उसका चेहरा वही था— पर कुछ बदल चुका था। त्वचा अधिक स्वच्छ। आँखें गहरी। देह का संतुलन स्थिर। उसकी चाल में अनजाना आत्मविश्वास था। अर्जुन ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। वह सामान्य रूप से अपनी कक्षा की ओर चल पड़ा। जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर उसके भीतर— काली अग्नि और स्वर्गीय बिजली एक ही शरीर में धीरे-धीरे अपनी सीमा खोज रहे थे। और यह परिवर्तन अभी केवल प्रारंभ था। _ गुरुकुल की प्रातःकालीन वायु सामान्य थी—पर प्रधान आचार्य के मन में हलचल थी। रात के तृतीय प्रहर में, जब अधिकांश शिष्य निद्रा में थे, उन्होंने ध्यानावस्था में एक तीव्र ऊर्जा-विकृति महसूस की थी। वह विकृति गुरुकुल के भीतर नहीं… दूर कहीं से उठी थी। जैसे आकाश स्वयं फटा हो। प्रधान आचार्य ने उस समय अपनी चेतना फैलाने का प्रयास किया था, पर जो तरंगें उन्हें मिलीं—वे असामान्य थीं। स्वर्गीय प्रकृति की। और साथ ही… शून्य जैसी। “यह इस क्षेत्र की साधारण शक्ति नहीं थी,” उन्होंने मन ही मन सोचा। सुबह होते ही वे सभा-प्रांगण की ओर जा रहे थे कि एक युवा शिष्य हाँफता हुआ भीतर आया। “आचार्य! समाचार… समाचार!” प्रधान आचार्य रुके। “शांत हो कर कहो।” “वीरेंद्र का महल… नष्ट हो गया। पूरा वंश… लगभग समाप्त। रात में कोई भयंकर दैवी प्रहार हुआ।” सभा-स्थल में उपस्थित सभी शिष्य स्तब्ध रह गए। “क्या कहा?” एक वरिष्ठ शिष्य ने अविश्वास से पूछा। “कहते हैं… आकाश से नीली बिजली और अग्नि उतरी। पूरा महल भस्म हो गया। कोई जीवित नहीं बचा—सिवाय उनके परदादा के, जो स्वयं गंभीर रूप से घायल हैं।” प्रधान आचार्य की आँखें एक पल को स्थिर हो गईं। नीली बिजली। अग्नि। रात की ऊर्जा-विकृति स्मृति में पुनः उभरी। “स्वर्गीय बादल…” उन्होंने धीमे से कहा। सभा में मौन छा गया। उसी समय— सभा के एक कोने में तीसरे चरण का वह साधक बैठा था, जो वीरेंद्र के लोगों में से था। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। वह केवल शिष्य नहीं था—वह एक सेतु था। वीरेंद्र के परिवार और गुरुकुल के बीच सूक्ष्म लेन-देन, सूचनाएँ, कुछ गोपनीय समझौते… वह उन सबमें संलग्न था। “पूरा… वंश?” उसने भीतर से काँपते हुए सोचा। यदि वीरेंद्र का परिवार समाप्त हो गया— तो उसके संरक्षण का क्या? उसके रहस्यों का क्या? उसके नाम का क्या? उसकी आँखों में क्षण भर को भय चमका—फिर वह तुरंत शांत हो गया। उसने अपनी दृष्टि सभा में घूमाई… और अनायास अर्जुन पर ठहर गई। अर्जुन सामान्य शिष्यों की पंक्ति में खड़ा था। चेहरा शांत। आँखें स्थिर। पर… आज उसमें कुछ भिन्न था। तीसरे चरण का साधक अब स्पष्ट रूप से महसूस कर पा रहा था— अर्जुन की ऊर्जा-लय बदल चुकी है। वह अधिक गहरी थी। अधिक सघन। हालाँकि उसका साधना-स्तर अभी भी प्रारंभिक प्रतीत हो रहा था… पर उसकी आभा में एक विचित्र स्थिरता थी—जैसे किसी गहरे स्रोत को छिपा रही हो। “यह असंभव है…” उसने सोचा। “कल तक यह बालक मणिपुर चक्र तक नहीं पहुँचा था।” उसने ध्यान से देखा। अर्जुन की साँसें नियमित थीं। उसकी नाड़ी स्थिर। पर उसकी दृष्टि— वह अब साधारण शिष्य की नहीं थी। प्रधान आचार्य ने सभा समाप्त की और अपने कक्ष में लौट आए। उन्होंने पुनः ध्यान लगाया। ऊर्जा-विकृति की दिशा खोजने का प्रयास किया। पर अब वह तरंग लुप्त हो चुकी थी। केवल एक सूक्ष्म कंपन शेष था—गुरुकुल के भीतर। उन्होंने अपनी चेतना फैलाकर प्रत्येक शिष्य की ऊर्जा जाँची। जब वह अर्जुन तक पहुँचे— क्षण भर को उन्हें एक हल्का प्रतिरोध महसूस हुआ। जैसे कोई परदा। उन्होंने भौंहें सिकोड़ लीं। “यह…?” पर तुरंत सब सामान्य हो गया। अर्जुन की ऊर्जा पुनः साधारण प्रतीत हुई। प्रधान आचार्य ने आँखें खोलीं। “संयोग?” या कुछ और? दूसरी ओर— तीसरे चरण का साधक अब निर्णय ले चुका था। सीधी टक्कर मूर्खता होगी। वह गुप्त जाँच करेगा। उस दिन से उसने अर्जुन पर सूक्ष्म निगरानी आरम्भ कर दी। कक्षा में— भोजनालय में— ध्यान-स्थल पर— उसकी दृष्टि अनायास अर्जुन पर ठहर जाती। एक दिन उसने अभ्यास के दौरान जानबूझकर अपनी ऊर्जा-लहर थोड़ी-सी फैलाकर देखी। सामान्य शिष्य असहज हो उठे। पर अर्जुन— क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं हुआ। बल्कि उसकी आँखें एक पल को उस साधक से मिलीं। सीधी। निर्भीक। जैसे वह सब जानता हो। तीसरे चरण के साधक के भीतर एक सिहरन दौड़ गई। “यह बालक…” “या तो अत्यंत मूर्ख है—या अत्यंत खतरनाक।” और उसी क्षण उसने तय किया— वह स्वयं नहीं, बल्कि परिस्थितियों के माध्यम से अर्जुन को परखेगा। धीरे-धीरे। सावधानी से। उधर प्रधान आचार्य खिड़की से बाहर देखते हुए विचारमग्न थे। “यदि स्वर्गीय प्रहार हुआ है… तो कारण अवश्य होगा। और यदि कारण यहाँ है…” उनकी दृष्टि अनायास शिष्यों के अभ्यास-स्थल की ओर चली गई। जहाँ अर्जुन शांत भाव से लकड़ी की तलवार घुमा रहा था। धीमा। पर सटीक। और उसके भीतर— काली अग्नि और स्वर्गीय बिजली अब मौन सहअस्तित्व में थीं। गुरुकुल की शांति बनी रही। पर अब— तीन दृष्टियाँ अर्जुन पर थीं। प्रधान आचार्य। तीसरे चरण का साधक। और… दूर कहीं घायल अमर साधक, जो अपने वंश की राख से उठकर उत्तर खोज रहा था। खेल गहरा हो चुका था। और अर्जुन— उसके केंद्र में खड़ा था।
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