पुस्तकलय की हत्या
मुख्य आचार्य ने अर्जुन की ओर एक लंबी नज़र डाली। उनके मन में हल्की-सी असहजता हुई—कुछ ऐसा संदेश महसूस हुआ जिसे वे स्पष्ट शब्दों में नहीं कह सकते थे।
अर्जुन का मूलाधार चक्र इतना असामान्य और शक्तिशाली तरीके से जागृत हुआ था कि यह बिना किसी मदद के संभव नहीं लगता था। आचार्य समझ गए कि यह साधन किसी सामान्य विद्यार्थी का नहीं हो सकता। उनके मन में अर्जुन के प्रति संदेह पैदा हुआ।
फिर उनकी दृष्टि धीरे-धीरे कक्षा और गलियारे में मौजूद अन्य विद्यार्थियों पर चली गई—वे सभी जो कल रात पुस्तकालय में आए थे। उनका अनुभव और आभा कुछ ऐसा कह रही थी कि उनमें से कोई इस रहस्य में शामिल हो सकता है।
मुख्य आचार्य ने गंभीर स्वर में घोषणा की— “पूरे गुरुकुल में तत्काल प्रभाव से सभी विद्यार्थियों के बाहर जाने पर प्रतिबंध लागू किया जाता है। किसी भी विद्यार्थी को अपने कक्ष से बाहर निकलने की अनुमति नहीं होगी। पुस्तकालय तक किसी का भी प्रवेश निषिद्ध है। जो भी नियम तोड़ेगा, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी।”
उनकी आवाज़ में वह शक्ति और गंभीरता थी, जिसे सुनकर सभी विद्यार्थी एक झटके में शांत हो गए।
फिर उन्होंने सभी को आदेश दिया— “अब सभी अपने-अपने कक्षों में लौट जाएँ। और ध्यान दें, किसी को भी पुस्तकालय या निषेध ग्रंथों के क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं है। किसी भी स्थिति में नियम का उल्लंघन न हो।”
विद्यार्थी धीरे-धीरे अपने-अपने कक्षों की ओर बढ़े, और पुस्तकालय में कोई भी हिलचाल नहीं हुई।
अर्जुन चुपचाप पीछे हटकर देखने लगा—मुख्य आचार्य की यह सतर्कता केवल अनुशासन के लिए नहीं थी। उनकी तीखी निगाहें और चेतावनी इस बात का संकेत थीं कि गुरुकुल में अब कुछ बड़ा घटित होने वाला था। _ अर्जुन अपने कक्ष की ओर बढ़ते हुए रास्ते में माधवी को देखता है। उसने धीरे-धीरे उसके पास जाकर पूछा, “असल में यहाँ क्या हुआ?”
माधवी ने गहरी सांस ली और धीरे-धीरे सारी घटना अर्जुन को बतानी शुरू की। उसने बताया कि कैसे उसने लाल रक्त जमीन पर देखा था, और कैसे उसने तुरंत पुस्तकालय के आचार्य को इस बात की सूचना दी थी। उसने विस्तार से बताया कि उसके बाद पुस्तकालय के अंदर क्या हुआ—निषेध पुस्तकों के क्षेत्र में छाया की गतिविधि, और यह कि आचार्य ने तुरंत जाँच शुरू की।
अर्जुन ने ध्यान से सुनते हुए पूछा, “तो तुम्हें क्या लगता है, इतनी शक्तिशाली आचार्य की हत्या किसने की होगी?”
माधवी ने कुछ पल सोचा और फिर बोली, “मैं भी नहीं जानती, लेकिन जो भी था, वह बहुत शक्तिशाली होना चाहिए।”
“तुम्हारे हिसाब से कौन हो सकता है?” उसने अर्जुन से पूछा।
अर्जुन बस अपने कंधे ऊँचे करके मुस्कुरा दिया और बोला, “मुझे क्या पता… मैं तो अभी-अभी मूलाधार चक्र को जागृत करने के पास पहुँचा हूँ। अभी मेरा काम इसे संतुलित करना है। मुझसे ज्यादा जानकारी तो तुम्हारे पास है। तुम तो पहले ही स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत कर चुकी हो और अब मणिपूर चक्र जागृत करने वाली हो।”
इतनी बातें करते हुए अर्जुन लगभग यह भी भूल ही गया कि उसे माधवी को उसका कड़ा वापस देना चाहिए था।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद, अर्जुन ने उसे पूछा, “और अनंत रहस्येश्वर मंदिर में जाने का क्या विचार है तुम्हारा?”
माधवी ने हल्की झिझक के साथ उत्तर दिया, “मैं अपनी सहेलियों के साथ वहां जाने का सोच रही हूं, लेकिन डर भी है। वहां मौत का खतरा बहुत ज्यादा है। मैंने अपनी जांच में देखा कि स्वाधिष्ठान चक्र वाले साधक भी वहां मरे हैं।”
फिर उसने अर्जुन की ओर देखा और पूछा, “तुम वहां जाने का सोच रहे हो?”
अर्जुन ने गंभीरता से कहा, “हाँ, लेकिन सावधानी रखनी होगी।”
माधवी ने चेतावनी भरे स्वर में कहा, “तुम्हारा अभी सिर्फ मणिपूर चक्र जागृत हुआ है। यह पूरी तरह संतुलित नहीं है। अगर वहां कुछ गलत हुआ, तो तुम्हारे मरने की संभावना अधिक है।”
अर्जुन मुस्कराया और बोला, “मैं सावधान रहूँगा।”
माधवी ने सिर हिलाया, फिर धीरे-धीरे वहां से चली गई, उसका मन अभी भी उस खतरनाक मंदिर की ओर खिंचा हुआ था, लेकिन उसके कदम में डर भी साफ झलक रहा था।
अर्जुन कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसकी नजर दूर-दूर तक फैले गुरुकुल पर टिकी हुई थी। उसके मन में धीरे-धीरे यह विचार उभरने लगा कि आने वाला समय इस मंदिर और गुरुकुल—दोनों को ही नई चुनौतियों के बीच डालने वाला है।
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अर्जुन धीरे-धीरे अपने कक्ष की ओर लौट रहा था। गुरुकुल के गलियारों में अब पहले जैसी चहल-पहल नहीं थी। मुख्य आचार्य के आदेश के बाद लगभग सभी विद्यार्थी अपने-अपने कक्षों में लौट चुके थे। चारों ओर एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया था, मानो पूरा गुरुकुल किसी अनजाने भय की छाया में डूब गया हो।
अपने कक्ष के सामने पहुँचकर अर्जुन कुछ क्षण के लिए रुका। उसने चारों ओर ध्यान से नज़र दौड़ाई, फिर दरवाज़ा खोलकर अंदर प्रवेश किया और तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया।
अंदर आते ही उसने गहरी साँस ली।
उसे अच्छी तरह पता था कि अभी गुरुकुल के अंदर जो कुछ भी चल रहा है, वह सामान्य नहीं है। इसलिए उसने बिना समय गँवाए अपने कक्ष की सुरक्षा को मजबूत करने का निर्णय लिया।
अर्जुन ने धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और आँखें बंद कर लीं।
उसकी उंगलियों के बीच हल्की लाल आभा चमकने लगी।
वह धीमे स्वर में मंत्र बोलने लगा—
“ॐ रक्षाय नमः… ॐ कवचाय नमः…”
जैसे ही मंत्र पूरे हुए, कमरे की चारों दीवारों पर हल्की-सी लाल रेखाएँ उभर आईं। वे रेखाएँ धीरे-धीरे एक दूसरे से जुड़ने लगीं और पूरे कमरे के चारों ओर एक सूक्ष्म ऊर्जा-कवच बन गया।
यह वही सुरक्षा कवच था जिसे गुरुकुल से बाहर जाते समय अर्जुन ने स्थापित किया था। इसके भीतर तब तक प्रवेश नहीं किया जा सकता था, जब तक अंदर से कोई अनुमति न दे।
कवच बनने के बाद अर्जुन ने आँखें खोलीं और कमरे के बीच में बैठ गया।
अब उसके सामने सबसे महत्वपूर्ण काम था—
अपने चक्रों को संतुलित करना।
उसने पद्मासन लगाया और धीरे-धीरे अपनी साँसों को नियंत्रित करना शुरू किया।
कुछ ही क्षणों में उसका मन शांत होने लगा।
सबसे पहले उसने अपने भीतर मूलाधार चक्र की ऊर्जा को महसूस किया।
उसकी नाभि के नीचे गहरी लाल ऊर्जा धीरे-धीरे घूम रही थी। वह स्थिर और शक्तिशाली थी—मानो स्वयं धरती की जड़ों से जुड़ी हुई हो।
यहीं वह स्थान था जहाँ स्वर्गीय काली अग्नि पूरी तरह मूलाधार चक्र से एकीकृत हो चुकी थी और उसकी टूटी हुई नाड़ियों से भी जुड़कर उन्हें फिर से जीवंत करने लगी थी।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी चेतना को थोड़ा ऊपर उठाया—
उसने अपने स्वाधिष्ठान चक्र की ओर ध्यान केंद्रित किया।
और तभी समस्या शुरू हुई।
उसके भीतर अचानक एक तीव्र गर्म ऊर्जा उठी। उसे एक झटका-सा महसूस हुआ। स्वाधिष्ठान चक्र में नारंगी रंग की ऊर्जा अनियंत्रित रूप से घूमने लगी। यही वह स्थान था जहाँ स्वर्गीय बिजली विराजमान थी।
अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।
“यह…?”
उसने ऊर्जा को नियंत्रित करने की कोशिश की।
लेकिन ऊर्जा और तेज़ होने लगी।
मानो कोई जंगली धारा अचानक बांध तोड़कर बहने लगी हो।
अर्जुन के शरीर की नसें तनने लगीं।
उसकी साँसें भारी हो गईं।
स्वाधिष्ठान चक्र की ऊर्जा अचानक ऊपर उठने लगी और मणिपूर चक्र की ओर धक्का देने लगी।
“नहीं…!”
अर्जुन ने तुरंत अपनी चेतना को नीचे खींचने की कोशिश की।
लेकिन वह ऊर्जा उसके नियंत्रण से बाहर जा रही थी।
कुछ ही क्षणों में उसके माथे पर पसीना आ गया।
अगर यह ऊर्जा ऐसे ही बढ़ती रही—
तो उसका पूरा साधना संतुलन बिगड़ सकता था।
अर्जुन ने तुरंत अपनी आँखें खोल दीं।
उसने गहरी साँस ली और जल्दी से अपने हाथों से एक विशेष मुद्रा बनाई।
फिर उसने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में मंत्र बोलना शुरू किया—
“ॐ स्थिरत्वाय नमः… ॐ बंधनाय नमः… ॐ शांतये नमः…”
जैसे-जैसे मंत्र पूरे होते गए, उसके शरीर में दौड़ती हुई स्वर्गीय बिजली की ऊर्जा धीरे-धीरे शांत होने लगी। यदि उस समय कोई उसके स्वाधिष्ठान चक्र के भीतर झाँक पाता, तो वह अवश्य ही हैरान रह जाता। वहाँ असंख्य सूक्ष्म मंत्रों से बनी दिव्य स्वर्गीय बिजली एक कमल के चारों ओर लिपटी हुई थी, मानो उसे स्वाधिष्ठान चक्र से दृढ़ता से बाँध रखा हो।
कुछ क्षणों बाद वह ऊर्जा फिर से अपनी जगह पर लौट आई।
अर्जुन ने गहरी साँस ली।
उसका शरीर अभी भी हल्का काँप रहा था।
“लगता है… मैं अभी तैयार नहीं हूँ…”
उसने धीरे से खुद से कहा।
स्वाधिष्ठान चक्र को नियंत्रित करना उतना आसान नहीं था जितना उसने सोचा था।
अगर उसने जल्दबाज़ी की—
तो उसकी साधना उल्टी भी पड़ सकती थी।
अर्जुन कुछ देर तक वहीं बैठा रहा, अपनी साँसों को सामान्य करने की कोशिश करता हुआ। _ कमरे के भीतर गहरा सन्नाटा था। सिर्फ उसकी धीमी साँसों की आवाज़ और कभी-कभी बाहर से आती हवा की सरसराहट ही सुनाई दे रही थी। कुछ समय बाद उसके शरीर की कंपकंपी धीरे-धीरे शांत होने लगी। अर्जुन ने फिर से आँखें बंद कीं और इस बार उसने केवल मूलाधार चक्र पर ध्यान केंद्रित किया। वह जानता था कि जब तक उसकी जड़ें मजबूत नहीं होंगी, तब तक ऊपर के चक्रों को नियंत्रित करना असंभव है। धीरे-धीरे मूलाधार चक्र की लाल और काली ऊर्जा फिर से स्थिर होने लगी। वह ऊर्जा भारी थी… स्थिर थी… और बेहद गहरी थी। कुछ समय बाद अर्जुन ने ध्यान समाप्त किया। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। उसका मन अब पहले की तुलना में थोड़ा शांत था। लेकिन उसके मन में एक बात लगातार घूम रही थी— स्वाधिष्ठान चक्र इतनी उग्र प्रतिक्रिया क्यों दे रहा था? सामान्यतः किसी साधक का चक्र ऐसे अनियंत्रित नहीं होता। इसका केवल दो ही मतलब हो सकता था। या तो उसकी साधना बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी… या फिर उसके भीतर मौजूद स्वर्गीय बिजली उस चक्र को पूरी तरह बदल रही थी। अर्जुन ने धीरे से अपने माथे पर आया पसीना पोंछा। “अगर मैं इसे जल्दी नियंत्रित नहीं कर पाया…” वह मन ही मन बुदबुदाया। “तो अनंत रहस्येश्वर मंदिर में जाना आत्महत्या होगा।” वह धीरे-धीरे उठकर खिड़की के पास चला गया। बाहर पूरा गुरुकुल असामान्य रूप से शांत था। मुख्य आचार्य का आदेश प्रभावी हो चुका था। चारों ओर सुरक्षा आचार्य घूम रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा गुरुकुल किसी अदृश्य दुश्मन की तलाश में हो। अर्जुन कुछ देर तक बाहर देखता रहा। फिर अचानक उसे कुछ याद आया। उसने जल्दी से अपने वस्त्र की जेब टटोली। और उसके हाथ में वही सोने का कड़ा आ गया। माधवी का कड़ा। अर्जुन कुछ पल उसे देखते रहा। “अरे…” उसने हल्की हँसी के साथ कहा। “मैं इसे लौटाना ही भूल गया।” लेकिन अगले ही क्षण उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। क्योंकि अचानक उसे कुछ अजीब महसूस हुआ। उस कड़े से एक बहुत हल्की… लेकिन अलग प्रकार की ऊर्जा निकल रही थी। अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं। “यह…” उसने धीरे से कड़े को अपनी हथेली में घुमाया। यह साधारण आभूषण नहीं था। उसके भीतर कहीं बहुत गहराई में कोई सूक्ष्म ऊर्जा चिह्न मौजूद था। और वह चिह्न… उसे बहुत जाना-पहचाना लग रहा था। अर्जुन की आँखें धीरे-धीरे सिकुड़ गईं। “यह तो…” वह कुछ समझने ही वाला था कि— अचानक उसके कमरे के बाहर कदमों की आवाज़ सुनाई दी। ठक… ठक… ठक… कोई उसके दरवाज़े के सामने आकर रुक गया था। और अगले ही क्षण दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। “अर्जुन।” बाहर से एक गंभीर आवाज़ आई। “दरवाज़ा खोलो।” अर्जुन की आँखें एक पल में तेज़ हो गईं। क्योंकि वह आवाज़ किसी विद्यार्थी की नहीं थी। वह आवाज़ थी— एक वरिष्ठ शिष्य की।
और उसी क्षण अर्जुन के मन में एक ही विचार कौंधा— क्या मुख्य आचार्य को उस पर शक हो गया है…?
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रात धीरे-धीरे गुरुकुल पर उतर आई थी। दिन भर की हलचल के बाद अब चारों ओर गहरा सन्नाटा छा चुका था। गलियारों में जलते दीपक हल्की पीली रोशनी फैला रहे थे, और हवा में एक अनजाना तनाव तैर रहा था।
मुख्य आचार्य अपने कक्ष में अकेले बैठे थे। उनके सामने कई ताड़पत्र खुले पड़े थे, लेकिन उनका ध्यान उन पर नहीं था।
उनके मन में बार-बार एक ही नाम घूम रहा था— अर्जुन। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें बंद कर लीं और याद करने लगे। “तीन वर्ष…” उन्होंने मन ही मन कहा। तीन वर्षों से अर्जुन गुरुकुल में था, और इतने लंबे समय तक वह अपने मूलाधार चक्र को जागृत नहीं कर पाया था। यह असामान्य था, लेकिन फिर भी संभव था। परंतु जिस प्रकार अचानक उसका मूलाधार चक्र जागृत हुआ था—वह बिल्कुल सामान्य नहीं था। इतना शक्तिशाली जागरण… वह भी बिना किसी गुरु की सहायता के। मुख्य आचार्य की भौंहें सिकुड़ गईं। “यह संयोग नहीं हो सकता…” उन्हें अर्जुन का अतीत भी याद आया। वह एक अनाथ बालक था, जिसने अकेले ही दूर के अनाथ आश्रम से यहाँ तक का कठिन सफर तय किया था। इतनी कम उम्र में ऐसा करना साधारण बात नहीं थी। और अर्जुन हमेशा से असाधारण बुद्धिमान भी रहा था। इन सब बातों को जोड़कर देखने पर मुख्य आचार्य का मन पूरी तरह शांत नहीं हो पा रहा था। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने निर्णय लिया। उन्होंने अपने पास खड़े एक शिष्य से कहा— “अर्जुन को तुरंत मेरे कक्ष में बुलाओ।” शिष्य ने सिर झुकाकर आदेश स्वीकार किया और तुरंत वहाँ से चला गया। कुछ देर बाद अर्जुन मुख्य आचार्य के कक्ष के सामने खड़ा था। उसने धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी। “अंदर आओ,” भीतर से गंभीर आवाज़ आई। अर्जुन अंदर प्रवेश कर गया। कमरे में हल्की धूप और औषधियों की मिश्रित सुगंध थी। मुख्य आचार्य अपनी जगह पर बैठे हुए उसे ध्यान से देख रहे थे। “गुरुदेव, आपने मुझे बुलाया?” अर्जुन ने विनम्रता से कहा। मुख्य आचार्य ने कुछ पल तक बिना बोले उसे देखा। उनकी दृष्टि इतनी गहरी थी कि मानो वे उसके भीतर तक झाँक रहे हों। फिर उन्होंने शांत स्वर में कहा— “अर्जुन, अपना हाथ आगे बढ़ाओ।” अर्जुन ने बिना कुछ पूछे अपना हाथ आगे कर दिया। मुख्य आचार्य ने अपनी दो उंगलियाँ उसकी कलाई पर रखीं। अगले ही क्षण उनकी आँखों में हल्की चमक उभरी। उनकी चेतना अर्जुन की नाड़ियों के भीतर प्रवेश कर चुकी थी। वे उसके मूलाधार चक्र की ऊर्जा को ध्यान से परखने लगे। लाल ऊर्जा स्थिर थी… लेकिन उसके भीतर कुछ और भी था। एक अजीब-सी शक्ति। मानो उस ऊर्जा के भीतर कोई और तत्व छिपा हुआ हो। मुख्य आचार्य की भौंहें और गहरी हो गईं। “हूँ…” वे अभी और गहराई से जाँच करने ही वाले थे कि तभी— धड़ाम! दरवाज़ा अचानक तेज़ी से खुला। एक आचार्य हाँफते हुए अंदर आए। “मुख्य आचार्य!” उनकी आवाज़ में घबराहट साफ झलक रही थी। मुख्य आचार्य तुरंत उठ खड़े हुए। “क्या हुआ?” आचार्य ने जल्दी से कहा— “गुरुकुल में फिर से हमला हुआ है!” कमरे का वातावरण अचानक और भारी हो गया। “कौन?” मुख्य आचार्य की आवाज़ कठोर हो गई। आचार्य ने कहा— “औषधि विभाग के आचार्य… किसी ने उन पर हमला करने की कोशिश की है। वे गंभीर रूप से घायल हैं।” एक पल के लिए पूरा कमरा मौन हो गया। मुख्य आचार्य की आँखों में ठंडी चमक उभरी। “कहाँ हैं वे?” “औषधि भवन में… हम उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं।” मुख्य आचार्य तुरंत आगे बढ़े। लेकिन जाने से पहले उन्होंने एक बार फिर अर्जुन की ओर देखा। “तुम यहीं रुको,” उन्होंने ठंडे स्वर में कहा।
लेकिन अर्जुन के मन में भी अब एक नया सवाल उठ चुका था— क्या यह सच में केवल हत्या का प्रयास था… या गुरुकुल के भीतर कोई किसी बड़े रहस्य को छिपाने की कोशिश कर रहा था?
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औषधि भवन के अंदर गहरी हलचल मची हुई थी। कई शिष्य और वैद्य आचार्य घायल औषधि आचार्य को बचाने की कोशिश कर रहे थे। कमरे में औषधियों की तीखी गंध फैल चुकी थी, और चारों ओर बेचैनी का वातावरण था।
मुख्य आचार्य तेज़ी से अंदर पहुँचे।
उन्होंने देखा कि औषधि आचार्य जमीन पर बिछे एक आसन पर लेटे हुए थे। उनके कंधे और छाती पर गहरे घाव थे, और उनका वस्त्र रक्त से भीग चुका था। मुख्य आचार्य उनके पास घुटनों के बल बैठ गए। “किसने किया यह?” उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा। औषधि आचार्य की साँसें भारी थीं। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। कुछ क्षणों तक वे बोल ही नहीं पाए। फिर बहुत कठिनाई से उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा— “वह… कोई साधारण व्यक्ति नहीं था…” कमरे में मौजूद सभी लोग एकदम शांत हो गए। मुख्य आचार्य थोड़ा और पास झुक गए। “क्या तुमने उसे देखा?” औषधि आचार्य ने धीमे से सिर हिलाया। “उसका चेहरा… छाया में था… मैं पहचान नहीं पाया…” उनकी साँसें और भारी हो गईं। लेकिन फिर उन्होंने एक और बात कही— “पर… उसकी शक्ति…” मुख्य आचार्य की आँखें सिकुड़ गईं। “किस प्रकार की शक्ति?” औषधि आचार्य ने काँपती आवाज़ में कहा— “वह… एक साथ सातों चक्रों की शक्ति का उपयोग कर रहा था…” यह सुनते ही कमरे में मौजूद सभी आचार्य स्तब्ध रह गए। मुख्य आचार्य के मन में तुरंत एक विचार कौंधा। 7 चक्रों की शक्ति एक साथ… यह किसी साधारण विद्यार्थी के बस की बात नहीं थी। ऐसी क्षमता तो केवल अनुभवी साधकों या बाहरी शक्तिशाली व्यक्तियों में ही होती है। उन्हें अचानक अर्जुन की याद आई— लेकिन अगले ही पल उन्होंने सिर हिला दिया। “नहीं…” अर्जुन अभी केवल अपने मूलाधार चक्र को संतुलित कर रहा था। वह एक साथ 7 चक्रों की शक्ति का उपयोग नहीं कर सकता था। मुख्य आचार्य के मन में अर्जुन के प्रति जो संदेह था— वह उसी क्षण लगभग समाप्त हो गया। अब उनके मन में एक नया विचार स्पष्ट होने लगा। गुरुकुल के भीतर कोई बाहरी व्यक्ति घुस आया था। और वह साधारण नहीं था। मुख्य आचार्य धीरे-धीरे खड़े हो गए। उनकी आँखों में अब पहले से भी अधिक गंभीरता थी। उन्होंने उपस्थित आचार्यों से कहा— “यह अब केवल हत्या की घटना नहीं है।” “कोई शक्तिशाली साधक हमारे गुरुकुल में प्रवेश कर चुका है।” कमरे में सन्नाटा छा गया। मुख्य आचार्य ने कठोर स्वर में आदेश दिया— “पूरे गुरुकुल की सुरक्षा तुरंत दोगुनी कर दी जाए। सभी द्वारों पर पहरा लगाया जाए। कोई भी व्यक्ति बिना जाँच के अंदर या बाहर नहीं जाएगा।”
फिर उन्होंने धीमे, लेकिन ठंडे स्वर में कहा— “और उस व्यक्ति को… हम किसी भी कीमत पर ढूँढ निकालेंगे।”
लेकिन उस समय किसी को यह पता नहीं था कि गुरुकुल के अंधेरे कोनों में छिपी वह छाया अभी भी वहीं मौजूद थी… और उसका अगला लक्ष्य कौन होगा। _ औषधि भवन की हलचल धीरे-धीरे शांत होने लगी थी। घायल औषधि आचार्य को विश्राम कक्ष में ले जाया जा चुका था, और कई शिष्य उनकी देखभाल में लगे हुए थे। मुख्य आचार्य कुछ समय के लिए अन्य आचार्यों के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा करने चले गए थे।
अर्जुन उसी भवन के बाहर पत्थर के एक चौड़े आसन पर बैठा हुआ था। रात अब गहरी हो चुकी थी। आकाश में चाँद बादलों के बीच छिपता-उभरता दिखाई दे रहा था, और गुरुकुल के गलियारों में जलते दीपक हवा के हल्के झोंकों से काँप रहे थे। अर्जुन अपनी साँसों को शांत करने की कोशिश कर रहा था। तभी— अचानक उसके शरीर में एक हल्की सिहरन दौड़ गई। उसने तुरंत आँखें खोल दीं। हवा में कुछ बदल गया था। एक अजीब-सी ऊर्जा… बहुत गहरी… बहुत भारी… अर्जुन का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया। “यह…?” उसने अपनी चेतना को फैलाया। कुछ ही क्षणों में उसे उस ऊर्जा का स्रोत महसूस हो गया। और उसी पल उसकी आँखें फैल गईं। यह किसी ऐसे साधक की ऊर्जा थी जिसके सातों चक्र जागृत थे। ऐसी ऊर्जा को पहचानने में उसे जरा भी कठिनाई नहीं हुई। क्योंकि इस तरह की पूर्ण चक्र शक्ति की आभा बिल्कुल अलग होती है—गहरी, स्थिर और भयावह। “कोई… सातों चक्र जागृत करने वाला…?” अर्जुन ने मन ही मन सोचा। यह गुरुकुल के किसी भी आचार्य से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता था। वह तुरंत खड़ा हो गया। लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और समझ पाता— उसे अचानक एक हलचल दिखाई दी। दूर गलियारे के अंधेरे कोने में— एक छाया तेजी से दौड़ती हुई दिखाई दी। वह छाया कुछ ही क्षणों में मुड़ी और सीधा पुस्तकालय की दिशा में बढ़ने लगी। अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं। “वही है…” उसने बिना एक पल गंवाए दौड़ लगा दी। लेकिन दौड़ने से पहले उसने पास खड़े एक शिष्य को पकड़ लिया। “तुम तुरंत मुख्य आचार्य के पास जाओ!” अर्जुन ने तेजी से कहा। शिष्य घबराकर बोला, “क्या हुआ?” अर्जुन ने जल्दी से कहा— “उन्हें बताओ कि मैंने अभी एक संदिग्ध छाया को पुस्तकालय की ओर जाते देखा है। संभव है वही हमलावर हो।” शिष्य ने सिर हिलाया और तुरंत दौड़ पड़ा। अर्जुन भी उसी दिशा में भागा जहाँ वह छाया गायब हुई थी। कुछ ही क्षणों में वह पुस्तकालय के सामने पहुँच गया। रात के समय पुस्तकालय पूरी तरह बंद था। मुख्य द्वार भारी लकड़ी का था और उस पर सुरक्षा मंत्र अंकित थे। लेकिन जैसे ही अर्जुन ने अंदर कदम रखा— उसे तुरंत कुछ असामान्य महसूस हुआ। अंदर हवा में हल्की-सी धूल उड़ रही थी। मानो अभी-अभी कोई वहाँ से गुजरा हो। अर्जुन सावधानी से आगे बढ़ा। पुस्तकालय के अंदर गहरा सन्नाटा था। दीवारों पर रखे हजारों ग्रंथ अंधेरे में खामोश खड़े थे। लेकिन तभी— उसकी नजर फर्श पर गई। वहाँ पत्थर की एक बड़ी पट्टिका हल्की-सी खिसकी हुई थी। अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं। “यह पहले यहाँ नहीं था…” वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और उस पत्थर को पूरी तरह हटाया। अगले ही क्षण उसके सामने जो दृश्य आया— उसे देखकर वह चौंक गया। पत्थर के नीचे एक पुरानी सीढ़ी नीचे की ओर जा रही थी। अंधेरे में गायब होती हुई। यह एक गुप्त सुरंग थी। अर्जुन कुछ क्षणों तक उस सुरंग को देखता रहा। ठंडी हवा नीचे से ऊपर आ रही थी। स्पष्ट था कि यह सुरंग बहुत पुरानी थी—शायद गुरुकुल के निर्माण के समय से भी। उसने मन ही मन सोचा— “तो हमलावर… यहीं से आता-जाता है…” अचानक नीचे अंधेरे में कुछ हलचल हुई। मानो कोई दूर कहीं चल रहा हो। अर्जुन की पकड़ अपनी मुट्ठियों पर कस गई। अब उसे पहली बार यकीन हो गया था— गुरुकुल के भीतर छिपा हुआ दुश्मन अभी भी यहीं है। और यह गुप्त सुरंग शायद उसके रहस्य की पहली कड़ी थी। अर्जुन ने गहरी साँस ली… और धीरे-धीरे उस अंधेरी सुरंग में उतरने के लिए पहला कदम आगे बढ़ाया। _
अर्जुन ने जैसे ही गुप्त कक्ष की सीमा पार की, पीछे से एक ठंडी और अधिकारपूर्ण आवाज गूँजी—
“अर्जुन! वहीं रुक जाओ!”
उसके कदम अनायास थम गए।
मुख्य आचार्य स्वयं गुफा में प्रवेश कर चुके थे। उनके साथ कई वरिष्ठ आचार्य भी उपस्थित थे। मशालों की झिलमिलाती रोशनी उनके गंभीर चेहरों पर पड़ रही थी, जिससे वातावरण और भी तनावपूर्ण हो उठा था।
मुख्य आचार्य की दृष्टि अर्जुन पर पड़ी। उनकी आँखों में स्पष्ट असंतोष झलक रहा था।
“तुम्हें यहाँ आने की अनुमति नहीं है,” उन्होंने कठोर स्वर में कहा। “तुरंत अपने आवास में लौट जाओ। यह स्थान तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है।”
अर्जुन ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार करने का अभिनय किया, किंतु उसके भीतर विचारों का तूफ़ान चल रहा था।
वह अच्छी तरह जानता था कि गुरुकुल की सतह के नीचे अनगिनत रहस्य दफन हैं। और आज रात, संभवतः उनमें से किसी एक का पर्दाफाश होने वाला था। इतने निकट पहुँचकर वह वापस लौटने वाला नहीं था।
उसी क्षण उसके होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी।
उसने बिना किसी को आभास होने दिए अपनी आंतरिक ऊर्जा को सक्रिय किया। उसकी चेतना से एक सूक्ष्म ज्योति निकली और दूर उसके आवास की दिशा में प्रवाहित हो गई।
अगले ही पल उस ज्योति ने अर्जुन के समान एक ऊर्जा-अवतार का रूप धारण कर लिया।
दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वास्तविक अर्जुन आज्ञाकारी ढंग से अपने आवास की ओर लौट रहा हो।
मुख्य आचार्य ने उस दृश्य पर एक सरसरी दृष्टि डाली और संतुष्ट होकर आगे बढ़ गए। उन्हें तनिक भी संदेह नहीं हुआ कि वे एक भ्रम देख रहे हैं।
वास्तविक अर्जुन उसी समय अपनी उपस्थिति को पूर्णतः छिपाते हुए अंधकार में विलीन हो चुका था।
उसने सावधानी से पीछे हटकर दूरी बनाई और फिर चुपचाप आचार्यों का पीछा करने लगा।
सुरंग के भीतर ठंडी हवाएँ बह रही थीं। दीवारों से टकराकर लौटती हवा एक अजीब सी फुसफुसाहट उत्पन्न कर रही थी, मानो स्वयं यह स्थान अपने रहस्यों की रक्षा कर रहा हो।
अर्जुन ने अपनी साँसों तक को नियंत्रित कर लिया।
“जो भी रहस्य इन गहराइयों में छिपा है, वह साधारण नहीं हो सकता,” अर्जुन की आँखों में चमक उभरी। “और यदि वह मेरे लिए उपयोगी हुआ, तो मेरी प्रगति की गति कई गुना बढ़ जाएगी।”
आचार्य तेजी से सुरंग की गहराइयों की ओर बढ़ रहे थे और अर्जुन उनकी हर गतिविधि पर नज़र रखे हुए था।
गुफा में फैली भयावह खामोशी के बीच केवल कदमों की हल्की प्रतिध्वनि सुनाई दे रही थी।
उसे महसूस हो रहा था कि वह किसी ऐसे रहस्य के करीब पहुँच चुका है, जिसे गुरुकुल सदियों से दुनिया की नज़रों से छिपाए हुए है।
और आज, शायद पहली बार, उस रहस्य का द्वार खुलने वाला था।
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