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गुरुकुल मे युद्ध
📚 Arjun The Black Heavenly Fire | Hindi Fantasy Audio Novel | Dark Cultivation Saga

गुरुकुल मे युद्ध

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जल स्थिर हो गया।

प्रतिबिंब फिर सामान्य।

दुबला चेहरा। सूजी हुई आँख। फटी हुई त्वचा।

कोई और नहीं।

अर्जुन।

कुएँ की जगत ठंडी थी। पत्थर में दिनभर की धूप की बची हुई गर्मी अब उतर चुकी थी। हवा में मिट्टी और पसीने की गंध थी।

आँगन लगभग खाली था।

दूर अभ्यास-स्थल से लकड़ी के डंडों के टकराने की आवाज़ें आ रही थीं। “धप्प!” “ठाक!” “फिर से!” किसी आचार्य की कठोर आवाज़ गूँज रही थी।

वह चुपचाप बैठा रहा।

साँस धीरे।

गणना करते हुए।

एक… दो… तीन…

शरीर काँप रहा था — थकान से नहीं, कमजोरी से।

इस देह में मांसपेशियाँ थीं, पर उनमें संकल्प नहीं था। नाड़ियाँ थीं, पर उनमें प्रवाह नहीं था।

उसने हथेली उठाकर देखा।

पतली उँगलियाँ। नाखूनों में मिट्टी भरी हुई।

“अयोग्य,” किसी ने उसे कहा था।

वह शब्द भीतर घूम गया।

अयोग्य।

उसने आँखें बंद कीं।

भीतर उतरने की कोशिश की।

पहले अंधकार।

फिर टूटी रेखाएँ।

प्राण-पथ ऐसे फैले थे जैसे किसी ने जलती छड़ी से उन्हें जला दिया हो। प्राकृतिक प्रवाह रुक चुका था। इस शरीर ने कभी साधना का सही प्रारंभ नहीं किया था — शायद प्रयास किया था, पर असफल रहा।

और अब—

उसमें वह था।

उसने श्वास को धीरे-धीरे नीचे उतारा।

नाक से भीतर।

गला।

छाती।

फेफड़े आधे भरकर रुक गए।

उसने ज़ोर दिया।

दर्द उठा।

सीने में खिंचाव।

पर उसने श्वास रोकी नहीं।

धीरे-धीरे उसे नीचे धकेला।

मणिपुर तक।

वहाँ शून्य था।

सूखा।

पर उस शून्य के बगल में — मूलाधार के पास — वह बाल-सा पतला मार्ग।

काली बूँद स्थिर थी।

वह उस बिंदु को छूना चाहता था।

पर जैसे ही उसने ध्यान केंद्रित किया—

झटका।

रीढ़ में बिजली-सी दौड़ी।

उसकी आँखें खुल गईं।

शरीर आगे झुका।

साँस टूट गई।

“इतना दुर्बल?” उसने मन में कहा।

यह शरीर सीधा बलपूर्वक साधना नहीं सह सकता।

पुराने समय में वह बैठता था — और प्राण स्वयं प्रवाहित होते थे। यहाँ—

उसे विनती करनी पड़ रही थी।

दूर से शोर कम होने लगा।

अभ्यास समाप्त हो रहा था।

यदि कोई उसे यहाँ ध्यान में बैठा देख लेता — तो उपहास बनता।

या फिर दंड।

उसने धीरे-धीरे उठने की कोशिश की।

पैरों में कंपन।

जगत पकड़कर खड़ा हुआ।

रात उतर रही थी। आकाश बैंगनी होने लगा था।

गुरुकुल के पीछे की ओर एक संकरा मार्ग था — जहाँ लकड़ियाँ रखी जाती थीं। अंधेरा जल्दी घिरता था वहाँ।

वह चल पड़ा।

हर कदम भारी।

एड़ी मिट्टी में धँसती। घुटनों में जकड़न।

दो शिष्य सामने से आए। उसे देखते ही हँसे।

“अरे, जीवित है।”

“आज ज्यादा नहीं पिटा क्या?”

वह रुका नहीं।

न देखा।

बस चलता रहा।

उनकी हँसी पीछे छूट गई।

पीछे का आँगन छोटा था। लकड़ी के गट्ठर, सूखी घास, टूटा हुआ रथ का पहिया।

अंधेरा यहाँ घना था। दीपक की रोशनी नहीं पहुँचती थी।

वह लकड़ियों के सहारे बैठ गया।

पीठ में दर्द उठा।

पर यहाँ कोई नहीं था।

उसने फिर आँखें बंद कीं।

इस बार—

वह जल्दबाज़ी नहीं करेगा।

श्वास भीतर।

धीरे।

बहुत धीरे।

फेफड़ों को पूरा भरने की कोशिश नहीं।

बस जितना सहज हो।

फिर छोड़ना।

फिर भरना।

तीन बार।

पाँच बार।

दस बार।

धीरे-धीरे हृदय की धड़कन स्थिर हुई।

अब उसने श्वास को नाड़ी में धकेलने की कोशिश नहीं की।

बस उसे देखने लगा।

जैसे कोई नदी सूख चुकी हो — पर तल अब भी मौजूद हो।

वह नाड़ियों के किनारों को महसूस कर रहा था।

जहाँ दरारें थीं।

जहाँ जलन थी।

और फिर—

बहुत सावधानी से—

उसने श्वास को मूलाधार के पास रोका।

सीधा धकेला नहीं।

बस रोका।

वहाँ।

एक क्षण।

दो क्षण।

दर्द नहीं आया।

केवल हल्की गर्मी।

काली बूँद ने प्रतिक्रिया दी।

सूक्ष्म।

पर इस बार झटका नहीं।

उसने श्वास छोड़ी।

फिर दोहराया।

फिर।

समय बीत रहा था।

आकाश गहरा हो चुका था। दूर कहीं शंख बजा — रात्रि-भोजन का संकेत।

उसे जाना चाहिए था।

पर उसने आँखें नहीं खोलीं।

अब उस बाल-मार्ग में हल्की धड़कन थी।

बहुत हल्की।

पर स्थिर।

उसने तीसरी बार श्वास रोकी—

और इस बार—

उसे स्पष्ट महसूस हुआ।

उस शरीर के मूलाधार के पास, जली हुई नाड़ियों के किनारे… एक अत्यंत पतली, नई रेखा बनने लगी थी।

जैसे राख में कोई नाखून से खींच रहा हो।

धीरे।

धीरे।

अचानक—

पीछे कदमों की आहट।

किसी के रुकने की आवाज़।

“तू यहाँ क्या कर रहा है?” एक स्त्री-स्वर।

शांत।

पर पैना।

“उसकी आँखें खुलीं।”

अंधेरा अब घना था।

सामने लकड़ियों के ढेर के पार — एक आकृति खड़ी थी।

दीपक की हल्की रोशनी पीछे से आ रही थी, इसलिए चेहरा छाया में था। पर उसकी देह-रेखा स्पष्ट थी — सुन्दर, सीधी, संतुलित, निश्चल।

वह खड़ी नहीं थी।

वह देख रही थी।

“तू यहाँ क्या कर रहा है?” वही स्वर फिर आया।

न ऊँचा। न क्रोधित। बस सीधा।

उसने कुछ क्षण उसे देखा।

फिर सामान्य स्वर में कहा, “बैठा हूँ।”

हल्की खामोशी।

वह एक कदम आगे बढ़ी। अब चेहरा आधा रोशनी में आया।

उम्र लगभग उन्नीस-बीस। गहरा सफ़ेद रंग पर दीपक की लौ की झिलमिल। बाल कसकर पीछे बंधे। आँखें — स्थिर।

गले में रुद्राक्ष की छोटी माला।

वस्त्र साधारण शिष्या जैसे नहीं थे। कमर पर पतली चाँदी की करधनी। पैरों में घुँघरू नहीं, पर टखनों पर हल्की धातु की पत्तियाँ।

“रात्रि-भोजन का शंख बज चुका है,” उसने कहा। “या तूने तय कर लिया है कि आज भी उपवास करेगा?”

उसने उत्तर देने से पहले श्वास को सामान्य किया।

मूलाधार के पास की गर्मी अभी भी हल्की धड़क रही थी। वह उसे छिपाना चाहता था।

“भूख नहीं है,” उसने कहा।

वह और पास आई।

अब वह उससे दो हाथ की दूरी पर थी।

उसकी दृष्टि नीचे नहीं — सीधे उसकी आँखों में थी।

“झूठ बोलते समय पलकें ज्यादा झपकती हैं,” उसने कहा। “तेरी नहीं झपक रही।”

वह चुप रहा।

“और,” उसने धीमे जोड़ा, “तेरी नाड़ी अभी-अभी हिली है।”

उसके भीतर हल्का-सा झटका उठा।

यह शिष्या कौन है?

साधारण प्रशिक्षु नाड़ियों का कंपन नहीं देख सकता।

“तू सुन भी रहा है?” उसने पूछा।

“सुन रहा हूँ,” उसने शांत स्वर में कहा।

“तो जवाब दे। तूने अभी क्या किया?”

“साँस ली।”

उसकी आँखें क्षणभर सिकुड़ीं।

“मज़ाक मत कर।”

“मज़ाक नहीं,” उसने कहा। “साँस ली। छोड़ी। फिर ली।”

वह उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

अब वह झुककर उसके चेहरे को देखने लगी। इतनी निकट कि वह उसकी त्वचा पर चंदन की हल्की गंध महसूस कर सकता था।

“तीन दिन पहले तक,” वह ठंडी निगाहों से उसे देखते हुए बोली, “तू उन लोगों के सामने दो चाबुक भी सह नहीं पाता था। और आज… पचास प्रहार झेलकर भी सीधा खड़ा है

“गिरा तो था,” उसने सहज कहा।

“गिरा,” उसने सिर हिलाया, “पर टूटा नहीं।”

खामोशी।

उसने भीतर झाँका — मूलाधार के पास की रेखा अब स्थिर थी। उसने श्वास साधारण रखी।

“नाम क्या है तेरा?” उसने पूछा।

“अर्जुन,” उसने कहा।

वह मुस्कराया नहीं। केवल देखा।

“गुरुकुल के लेख में यही नाम है,” उसने कहा।

वह सीधी हुई।

कुछ पल उसे देखती रही।

फिर बोली, “तूने अभी मूलाधार के पास कुछ छेड़ा है।”

उसका शरीर क्षणभर के लिए तन गया — पर चेहरे पर भाव नहीं आया।

“तुझे कैसे पता?”

“क्योंकि,” उसने अपनी छाती पर उँगली रखी, “मेरी नाड़ी प्रतिक्रिया देती है।”

वह रुकी।

“और अभी… उसने प्रतिक्रिया दी।”

हवा में सूखी घास की गंध घुली हुई थी।

दूर से बर्तनों के टकराने की आवाज़ आ रही थी।

वह हल्का-सा हँसी। पर हँसी में खिलंदड़ापन नहीं था।

“यह प्रश्न मुझे पूछना चाहिए।”

वह मुड़ी, जैसे जाने वाली हो। फिर रुकी।

पीछे देखे बिना बोली—

“अगर तू फिर से वही करेगा… तो सावधान रह।”

“क्यों?” उसने पूछा।

अब वह उसकी ओर मुड़ी।

“क्योंकि इस गुरुकुल में हर कोई अंधा नहीं है।”

उसने एक कदम और पास आकर फुसफुसाया—

“और कुछ लोग… प्रतीक्षा में हैं।”

उसकी आँखें अंधेरे में हल्की चमकीं।

फिर वह मुड़ी और धीरे-धीरे चल दी।

उसके कदमों की आहट मिट्टी में समा गई।

वह वहीं बैठा रहा।

भीतर—

काली बूँद स्थिर थी।

नई बनी पतली रेखा अभी भी काँप रही थी।

और अब—

एक नया प्रश्न।

यह स्त्री—

शत्रु है?

या अवसर?

दूर भोजनालय से किसी ने पुकारा—

“अर्जुन! अगर खाना है तो आ जा!”

उसने आँखें बंद कीं।

एक बार और श्वास भीतर ली।

मूलाधार के पास की हल्की गर्मी इस बार पहले से स्पष्ट थी।

उसने आँखें खोलीं।

“और अंधेरे में — जहाँ वह खड़ी थी कुछ क्षण पहले — उसे लगा जैसे छाया अभी भी उसे देख रही हो।” उसने दृष्टि हटाई। श्वास सामान्य। देह अभी भी काँप रही थी — पर भीतर हल्की स्थिरता थी। वह लकड़ियों का सहारा लेकर उठा। पीठ की त्वचा खिंची। घाव फिर जल उठे। पर इस बार दर्द उसके केंद्र तक नहीं पहुँचा। भोजनशाला की ओर जाने वाला मार्ग पत्थरों से पटा था। दोनों ओर नीम के पेड़। रात पूरी तरह उतर चुकी थी। दीयों की लौ हवा में काँप रही थी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, आवाज़ें स्पष्ट होने लगीं। हँसी। बर्तनों की खनखनाहट। भाप में पकते चावल की गंध। भोजनशाला लंबी, खुली संरचना थी। छत लकड़ी की, खंभे पत्थर के। भीतर पंक्तियों में बैठे शिष्य। बीच में बड़े मृद्भांड — दाल, चावल, सब्ज़ी। जैसे ही वह भीतर प्रवेश किया— कुछ सिर उसकी ओर मुड़े। फिर कुछ और। फिर फुसफुसाहट। “आ गया।” “अभी जिंदा है।” “देख पीठ पर निशान।” वह बिना रुके अंत की ओर चला — जहाँ प्रायः कमज़ोर या दंडित शिष्यों को बैठाया जाता था। पर आज— उसके कदमों की चाल अलग थी। धीमी। पर स्थिर। वह बैठ गया। सामने पत्तल रखी गई। एक शिष्य ने दाल डालते हुए कहा, “आज ज्यादा मत खा लेना।” कुछ हँसी। उसने पत्तल की ओर देखा। चावल सादे। दाल पतली। सब्ज़ी में नमक कम। उसने पहला कौर उठाया। हाथ हल्का काँपा। कमज़ोरी अभी भी थी। पर भीतर — मूलाधार के पास की पतली रेखा अब शांत थी। वह खा रहा था — पर ध्यान भीतर था। अचानक— उसके सामने कोई बैठ गया। उसने ऊपर देखा। वही स्त्री। अब रोशनी में उसका चेहरा स्पष्ट था। आँखें गहरी। उनमें थकान नहीं, बल्कि निरीक्षण था। उसने बिना कुछ कहे अपनी पत्तल रखी। दोनों के बीच कुछ क्षण मौन। फिर उसने सामान्य स्वर में पूछा— “दर्द हो रहा है?” “हाँ,” उसने कहा। “अच्छा है,” उसने उत्तर दिया। उसने भौंह हल्की उठाई। “अच्छा?” “दर्द बताता है कि देह अभी हार नहीं मानी।” वह चावल का कौर तोड़ रही थी। उसकी उँगलियाँ साफ़, संतुलित। “तू आज अभ्यास-स्थल पर अलग था,” उसने बिना उसकी ओर देखे कहा। “कैसा?” उसने पूछा। “जैसे कोई देख रहा हो… और गणना कर रहा हो।” उसने कौर मुँह में रखा। चबाया। “तू बहुत देखती है,” उसने कहा। “और तू बहुत छिपाता है।” पास बैठे दो शिष्य अब स्पष्ट रूप से उनकी ओर देख रहे थे। एक ने धीरे से दूसरे से कहा, “माधवी उसके साथ क्यों बैठी है?” माधवी। तो यह नाम है। माधवी ने उनकी ओर देखा नहीं। पर आवाज़ सुन ली। “कल से तुझे फिर दंड मिलेगा,” उसने कहा। “क्योंकि आज तूने झुकने से इनकार किया।” “झुकना चाहिए था?” उसने पूछा। वह पहली बार हल्का-सा मुस्कराई। “गुरुकुल में जीवित रहने के लिए — हाँ।” “और जीने के लिए?” उसने पूछा। वह रुकी। उसकी दृष्टि उससे मिली। “जीने के लिए,” उसने कहा, “या तो शक्ति चाहिए… या संरक्षण।” “और तुझे क्या है?” उसने पूछा। वह चावल का कौर उठाकर मुँह तक ले गई। “दोनों में से थोड़ा-थोड़ा।” पास से आवाज़ आई— “माधवी।” दोनों ने उधर देखा। भोजनशाला के प्रवेश पर वही चाबुक वाला युवक खड़ा था। उसकी दृष्टि सीधे उन पर। “यहाँ क्या कर रही हो?” उसने पूछा। माधवी ने सामान्य स्वर में कहा, “भोजन।” “इसके साथ?” युवक की भौंह तनी। “पंक्ति में जहाँ स्थान मिला।” युवक भीतर आया। उनके सामने खड़ा हो गया। “अर्जुन,” उसने कहा, “कल सूर्योदय से पहले अखाड़े में मिलना। विशेष अभ्यास होगा।” कुछ शिष्य हँसे। अर्जुन ने ऊपर देखा। “ठीक,” उसने कहा। युवक झुका। धीमे स्वर में बोला— “आज आँखों में कुछ और था। संभालकर रखना। यहाँ बहुत लोग उसे बुझाने में आनंद लेते हैं।” वह सीधा हुआ। मुड़ा। चला गया। भोजनशाला में शोर फिर सामान्य होने लगा। माधवी ने धीरे से कहा— “तूने उसे क्रोधित किया है।” “उसे कारण चाहिए था,” उसने उत्तर दिया। “और तुझे?” “मुझे?” उसने पत्तल से अंतिम कौर उठाया। “मुझे कारण नहीं चाहिए।” माधवी कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली— “यदि तू सच में अपने टूटे हुए मूलाधार का मार्ग बना रहा है… तो अकेला मत कर।” उसने उसकी ओर देखा। “क्यों?” वह झुकी। इतनी कि उसके शब्द केवल वही सुन सके। “क्योंकि किसी ने पहले भी ऐसा किया था।” उसकी धड़कन एक क्षण को रुकी। “और?” उसने पूछा। माधवी ने सीधा होकर पानी पिया। फिर बिना उसकी ओर देखे कहा— “वह जीवित नहीं रहा।” वह उठी। पत्तल उठाई। जाते-जाते एक क्षण को रुकी। “सूर्योदय से पहले… मैं भी अखाड़े में रहूँगी।” वह चली गई। भोजनशाला का शोर अब दूर-सा लग रहा था। उसने अपनी हथेली देखी। उँगलियाँ अभी भी काँप रही थीं। पर भीतर— मूलाधार के पास की वह पतली रेखा… पहले से थोड़ी मोटी हो चुकी थी।

उसने हथेली मुट्ठी में बाँधी। हल्की गर्मी भीतर स्थिर थी। भोजनशाला लगभग खाली हो चुकी थी। मिट्टी के दीप बुझाए जा रहे थे। रात गहरी थी — पर वह नहीं सोया। वह शिष्यों के शयन-कक्ष की ओर गया, पर भीतर नहीं गया। दीवार के सहारे बैठ गया। आँखें बंद नहीं कीं। सिर्फ प्रतीक्षा। आकाश काला से नीला होने लगा। पक्षियों की पहली हल्की आवाज़। और फिर— शंख। सूर्योदय से पहले का संकेत। अखाड़ा गुरुकुल के पूर्वी छोर पर था। गोल मिट्टी का विस्तृत मैदान। चारों ओर लकड़ी के खंभे। बीच में गीली मिट्टी की परत — ताकि गिरने पर हड्डी न टूटे। वह पहुँचा— और रुका। वहाँ पहले से लोग थे। सिर्फ वह चाबुक वाला युवक नहीं। और… माधवी। वह खंभे के पास खड़ी थी। बाँहें सीधी, दृष्टि स्थिर। युवक ने उसे आते देखा। होंठों पर हल्की मुस्कान। “आ गया,” उसने ऊँची आवाज़ में कहा। “हमारा पराक्रमी अर्जुन।” कुछ शिष्य हँसे। _____ उस युवक का नाम था — वीरेंद्र। लंबा। चौड़े कंधे। बाँहों पर उभरी नसें। कमर पर बँधी लकड़ी की अभ्यास-चाकू — पर सभी जानते थे, वह उसे खेल की तरह नहीं चलाता। मिट्टी गीली थी। सुबह की नमी अब भी सतह पर थी। अर्जुन बिना कुछ कहे अखाड़े के बीच पहुँचा। “आज विशेष अभ्यास है,” वीरेंद्र ने कहा। “सहनशक्ति और प्रतिक्रिया।” उसने लकड़ी का चाकू निकाला। ब्लेड कुंद था — पर प्रहार असली होते थे। “रक्षा मत करना,” उसने धीरे से कहा। “सीखने के लिए पहले टूटना पड़ता है।” कुछ शिष्य हँसे। माधवी चुप थी। उसकी आँखें अर्जुन पर टिकी थीं। “आरंभ!” अखाड़े पर निगरानी रख रहे आचार्य की कठोर, गूँजती हुई आवाज़ पूरे प्रांगण में फैल गई। पहला प्रहार — बिजली की तरह। अर्जुन ने देखने की कोशिश की— पर शरीर धीमा था। चाकू उसकी पसलियों के नीचे धँसा। धप्प। हवा निकल गई। दूसरा वार — कंधे पर। तीसरा — जाँघ पर। वह पीछे डगमगाया। मिट्टी उछली। भीतर — मूलाधार की पतली रेखा हल्की काँपी। पर उसने उसे छुआ नहीं। वीरेंद्र तेज था। प्रशिक्षित। हर प्रहार गणना किया हुआ। चौथा वार — पीठ पर। घुटने मिट्टी में धँस गए। हँसी। “यही है असली अर्जुन!” किसी ने कहा। पाँचवाँ वार — चेहरे के पास। ब्लेड कान छूता हुआ निकला। खून की पतली रेखा। अर्जुन गिर पड़ा। मिट्टी ठंडी थी। साँस टूट रही थी। “उठ,” वीरेंद्र ने कहा। “अभी तो शुरुआत है।” उसने बाल पकड़कर उसे घसीटा। घुटनों के निशान मिट्टी पर बनते गए। माधवी का हाथ खंभे पर कस गया। छठा वार — पेट पर। इस बार दर्द गहरा गया। अर्जुन की दृष्टि धुँधली होने लगी। भीतर— मूलाधार के पास की काली बूँद स्थिर थी। नई बनी पतली रेखा काँप रही थी। वह जानता था— यदि उसने उसे खुला छोड़ दिया… तो वह छिप नहीं पाएगा। सातवाँ वार। आठवाँ। एक लकड़ी की आवाज़ — पसलियों के पास। टिक। कुछ टूटने की सूखी ध्वनि। अर्जुन आधा मुड़ गया। भीतर कुछ हिल गया। “बस करो,” किसी ने धीमे कहा। पर वीरेंद्र रुका नहीं। “पराक्रमी था न?” उसने झुककर कहा। “आज भी खड़ा रहेगा?” उसने चाकू उठाया — इस बार सीधे कंधे के जोड़ पर मारने के लिए। और उसी क्षण— अर्जुन की आँखें खुलीं। गहरी। स्थिर। दर्द से नहीं। शून्य से। भीतर— उसने श्वास ली। गहरी नहीं। बस उतनी… जितनी पर्याप्त हो। और बहुत सावधानी से— मूलाधार के पास की पतली रेखा को छुआ। काली बूँद हिली। इस बार झटका नहीं। एक गर्म, भारी प्रवाह उठा। पर उसने उसे बाहर नहीं आने दिया। न त्वचा तक। न नाड़ियों में फैलने दिया। उसने उसे मांसपेशियों के भीतर रोका। जैसे राख के भीतर आग दबाई जाती है। उसकी जाँघ की मांसपेशियाँ कस गईं। पीठ के स्नायु तने। पर बाहर से — वह अब भी टूटा हुआ दिख रहा था। वीरेंद्र ने वार किया। और उसी क्षण— अर्जुन ने करवट बदली। पहली बार। प्रहार खाली गया। क्षण भर का अंतर। बस उतना ही चाहिए था। अर्जुन की मुट्ठी मिट्टी में धँसी। भीतर छुपी काली अग्नि ने मांसपेशियों को एक झटका दिया। उसने पूरा बल एक ही बिंदु में समेटा। और ऊपर की ओर उठते हुए— उसकी कोहनी सीधे वीरेंद्र की पसलियों के नीचे लगी। धड़ाम। आवाज़ अलग थी। साधारण मांस पर प्रहार जैसी नहीं। कुछ भीतर धँसा। वीरेंद्र की साँस अटक गई। उसकी आँखें फैल गईं। अर्जुन रुका नहीं। वह अभी भी आधा घुटनों पर था। दूसरा वार — मुट्ठी से। सीधे कॉलरबोन पर। टिक। हड्डी में दरार। तीसरा — कंधे के जोड़ पर धक्का। वीरेंद्र पीछे गिरा। मिट्टी उछली। कुछ क्षण के लिए अखाड़ा बिल्कुल शांत हो गया। फिर— वीरेंद्र का शरीर तड़पा। उसके मुँह से हवा निकली — आवाज़ नहीं। उसकी बाँह अजीब कोण पर मुड़ी हुई थी। दो… शायद तीन हड्डियाँ। टूटी हुई। अर्जुन खड़ा होने की कोशिश में डगमगाया। भीतर की काली अग्नि अभी भी मांसपेशियों में जल रही थी। पर उसने उसे फैलने नहीं दिया। नाड़ी तक नहीं। त्वचा तक नहीं। उसकी आँखें सामान्य थीं। कोई लौ नहीं। कोई आभा नहीं। बस थकान। और फिर— अचानक वह प्रवाह उल्टा पड़ा। कमज़ोर शरीर इतना बल सह नहीं पाया। सीने में दर्द उठा। साँस टूटी। दृष्टि घूम गई। वह खड़ा नहीं रह सका। मिट्टी में गिर पड़ा। अखाड़े में सन्नाटा। फिर शोर। “क्या हुआ?” “यह कैसे—?” “वीरेंद्र की हड्डी—?” माधवी दौड़कर आई। उसने पहले वीरेंद्र की नाड़ी देखी। धड़क रही थी। फिर अर्जुन की ओर मुड़ी। उसका शरीर काँप रहा था — भीतर की अग्नि अब बुझ रही थी। पर मूलाधार के पास— वह पतली रेखा अब पहले से मोटी थी। स्थिर। माधवी ने बहुत धीमे फुसफुसाया— “तूने उसे हरा दिया…” आचार्य आगे बढ़ रहे थे। शिष्य घेर रहे थे। पर उस क्षण— अर्जुन कुछ नहीं सुन रहा था। उसके भीतर केवल एक अनुभूति थी— दर्द। और उसके पीछे— गहरी, अंधेरी शक्ति। जो अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। और वह अंधकार— उसे स्वीकार कर चुका था। फिर सब काला हो गया। _ अखाड़े की मिट्टी अब भी उलझी हुई थी। दोनों देहें स्थिर पड़ी थीं — अर्जुन और वीरेंद्र। कुछ क्षण पहले तक जहाँ हँसी थी, वहाँ अब सन्नाटा था। “यह कैसे हुआ…?” “वीरेंद्र गिर गया…?” “उसकी बाँह देखो…” फुसफुसाहटें हवा में तैर रही थीं। माधवी घुटनों के बल बैठी थी। उसकी उँगलियाँ पहले वीरेंद्र की कलाई पर गईं। नाड़ी चल रही थी — तेज, अस्त-व्यस्त। फिर उसने अर्जुन की नाड़ी जाँची। धीमी। पर गहरी। “दोनों को चिकित्सालय ले जाओ,” एक आचार्य की कठोर आवाज़ आई। चार शिष्यों ने उन्हें उठाया। मिट्टी उनके घावों से चिपकी हुई थी। सुबह की धूप अब अखाड़े के किनारों पर उतर रही थी — पर किसी को उसका भान नहीं था। आज— अर्जुन ने वीरेंद्र को पराजित किया था। गुरुकुल का चिकित्सक-कक्ष मुख्य भवन के पीछे था। पत्थर की दीवारें। भीतर हल्की औषधियों की गंध। छत से लटके सूखे जड़ी-बूटियों के गुच्छे। एक ओर मिट्टी के पात्र, दूसरी ओर लकड़ी के पलंग। वीरेंद्र को पहले लिटाया गया। उसकी बाँह अस्वाभाविक कोण पर थी। पसलियों पर सूजन। “दो हड्डियाँ तो निश्चित टूटी हैं,” वैद्य ने गंभीर स्वर में कहा। अर्जुन को दूसरे पलंग पर रखा गया। उसकी पीठ पर चाबुक और प्रहारों के पुराने निशान थे। पसलियों के नीचे नीला पड़ता मांस। होंठ फटा हुआ। पर भीतर— मूलाधार के पास की वह रेखा शांत थी। स्थिर। मानो कुछ हुआ ही न हो। धीरे-धीरे— अंधकार में हल्की रोशनी घुलने लगी। अर्जुन की चेतना लौटी। पहले धुँधला। दीवारें जैसे पानी के भीतर दिखती हों। फिर ध्वनियाँ। कहीं पास में किसी के दाँतों से फल काटने की हल्की आवाज़। उसने पलकें झपकाईं। दृष्टि साफ़ होने लगी। सबसे पहली स्पष्ट चीज़— माधवी। वह उसके बगल में एक लकड़ी की चौकी पर बैठी थी। हाथ में फल। शायद सेब जैसा लाल जंगली फल। वह शांत भाव से उसे खा रही थी। बाल आज खुले नहीं थे, पर कुछ लटें ढीली होकर गाल के पास आ गई थीं। जब उसने देखा कि उसकी आँखें खुल गई हैं— उसने बिना चौंके बस उसे देखा। “जाग गया?” उसने सामान्य स्वर में पूछा। अर्जुन ने बोलने की कोशिश की। गला सूखा था। माधवी ने फल का एक टुकड़ा तोड़ा और उसकी ओर बढ़ाया। “खाएगा?” वह कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर धीरे से सिर हिलाया — हाँ। उसने फल उसके हाथ में रख दिया। “वैद्य ने कहा है पसलियों में दरार है,” उसने बताया। “पर जान को खतरा नहीं।” “वीरेंद्र?” उसकी आवाज़ धीमी थी। “जिंदा है,” माधवी ने कहा। “पर कुछ समय तक चाबुक नहीं चला पाएगा।” उसकी आँखों में हल्की, अनकही मुस्कान थी। कमरे में कुछ पल शांति रही। अर्जुन धीरे-धीरे फल चबा रहा था। शरीर भारी था। पर भीतर— वह काली अग्नि बुझी नहीं थी। बस गहराई में चली गई थी। माधवी ने फल का अंतिम कौर खाया। हाथ झाड़े। फिर खड़ी हो गई। “चलो,” उसने सहज स्वर में कहा, “अब तू जाग गया है तो मैं चलती हूँ।” वह मुड़ी। अर्जुन उसे जाते हुए देखता रहा। कुछ भीतर हिला। न मूलाधार। न अग्नि। कुछ और। “माधवी,” उसने पुकारा। वह रुकी। मुड़ी नहीं। बस ठिठक गई। “तुम मेरी मदद क्यों कर रही हो?” उसने पूछा। कमरे में हल्की हवा चली। जड़ी-बूटियों की गंध हिली। कुछ क्षण मौन रहा। फिर— वह बिना मुड़े, दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए बोली— “वक़्त आने पर तुम्हें पता चल जाएगा।” दरवाज़े की चौखट पर पहुँचकर उसने क्षणभर ठहरकर जोड़ा— “और उस वक़्त… शायद मुझे भी।” फिर वह बाहर चली गई। दरवाज़ा आधा खुला रह गया। अर्जुन छत की ओर देखता रहा। प्रश्न बढ़ गए थे। माधवी कौन है? उसे उसकी नाड़ी की गति कैसे महसूस होती है? और— क्या वह सच में सहायता कर रही है? या किसी बड़ी प्रतीक्षा का हिस्सा है? उसने धीरे से आँखें बंद कीं। भीतर उतरने की कोशिश की। मूलाधार के पास— वह पतली रेखा अब स्पष्ट थी। पहले से मोटी। स्थिर। और काली बूँद— पहले से अधिक भारी। आज उसने पहली बार उस अग्नि को शरीर में छुपाकर प्रयोग किया था। पर अगली बार— क्या वह उसे उतनी ही आसानी से बाँध पाएगा? बाहर गलियारे में कदमों की आहट गूँजी। किसी ने धीमे स्वर में कहा— “आचार्य उसे देखना चाहते हैं।” अर्जुन की आँखें फिर खुलीं।

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