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अंत से आरंभ
📚 Arjun The Black Heavenly Fire | Hindi Fantasy Audio Novel | Dark Cultivation Saga

अंत से आरंभ

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गंगा का जल आज असामान्य रूप से शांत था।

न हवा थी, न पक्षियों की आवाज़। केवल मंत्रों की धीमी, भारी गूँज, जो तट पर बने विशाल यज्ञ-मंडप से उधकर आकाश में ठहर जाती थी।

चाँदी की जंजीरों में जकड़ा हुआ वह घुटनों के बल बैठा था।

कभी उसके नाम से राजाओं की नींद उड़ जाती थी। आज उसका सिर झुका हुआ था — पर टूटा नहीं।

उसकी पीठ पर कोड़े के ताज़ा निशान थे। रक्त बहकर कमर तक जम चुका था। कंधों पर धूल और राख चिपकी थी। फिर भी उसकी रीढ़ सीधी थी, जैसे वह अभी भी किसी सिंहासन पर बैठा हो।

सभा-स्थान अर्धवृत्ताकार था। पत्थर की ऊँची आसंदियों पर विभिन्न गुरुकुलों के आचार्य बैठे थे। केसरिया, सफेद, गेरुए वस्त्र। माथों पर भस्म, चंदन, रक्त-चिह्न।

बीच में वह।

और सबसे ऊँची आसंदी पर — वह।

उसकी दृष्टि उठी।

नीले रेशमी वस्त्र, कंधों पर स्वर्ण-जटित कवच, ललाट पर त्रिपुंड्र। बाल पहले से अधिक छोटे, सधे हुए। आँखें… ठंडी।

“महाधिष्ठात्री आर्या देविका,” सभा के एक वृद्ध ने घोषणा की, “दोषी को अंतिम अवसर दिया जाए?”

वह — काली अग्नि — हल्का हँसा।

जंजीरें खनकीं।

“अंतिम अवसर?” उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पर काँपी नहीं। “कब से आप लोग अवसर देने लगे?”

सभा में हलचल हुई।

एक युवा आचार्य क्रोध से उफनता हुआ अचानक खड़ा हो गया। उसकी आँखों में आग जल रही थी। “अब भी व्यंग्य कर रहे हो?” उसने कड़कती आवाज़ में कहा, “तुम्हारी वजह से 108 शिष्यों की सातों चक्र भस्म हो चुकी हैं!”

उसने गर्दन टेढ़ी की। “कमज़ोर थे।”

भीड़ में से एक महिला की सिसकी सुनाई दी। सैनिकों ने उसे पीछे धकेल दिया।

देविका ने हाथ उठाया। शोर थम गया।

वह धीरे-धीरे खड़ी हुई। उसके खड़े होते ही शंखनाद हुआ। जैसे कोई युद्ध फिर से आरंभ हो रहा हो।

वह सीढ़ियाँ उतरकर उसके सामने आई। दोनों के बीच केवल एक भुजा भर की दूरी थी।

“तुम्हें पश्चाताप है?” उसने पूछा।

उसने ऊपर देखा। सीधे उसकी आँखों में।

“तुम चाहती हो कि हो?”

उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। “यह तुम्हारा अंतिम उत्तर है?”

वह झुका नहीं। “तुमने मुझे तब नहीं रोका जब मैंने साम्राज्य तोड़ा। आज क्यों रोकोगी?”

एक पल।

गंगा की सतह पर हल्की लहर उठी।

सभा के प्रधान ने ऊँचे स्वर में मंत्रोच्चार प्रारंभ किया। चारों दिशाओं में अग्निकुंड प्रज्वलित हुए। धुएँ की लकीरें आकाश में मिलकर एक चक्र बनाने लगीं।

“काली अग्नि,” प्रधान ने घोषणा की, “तुम पर आरोप है — निषिद्ध तंत्र-साधना, प्राण-हरण, और देव-विरुद्ध अस्त्र प्रयोग का। क्या तुम इन आरोपों को स्वीकारते हो?”

उसने मुस्कराकर कहा, “आपने जो सुना है, वही सत्य मान लीजिए।”

“स्पष्ट उत्तर दो!” एक अन्य आचार्य गरजा।

उसने गर्दन मोड़ी, जैसे थक गया हो। “हाँ। मैंने किया। और जो नहीं किया, उसका श्रेय भी दे दीजिए।”

सभा में क्रोध की लहर दौड़ी।

देविका की उँगलियाँ क्षणभर के लिए मुट्ठी बनीं, फिर ढीली हो गईं।

“दंड,” प्रधान ने घोषणा की, “चक्र-वध।”

चार सैनिक आगे बढ़े। उनके हाथों में विशाल त्रिशूल थे, जिनकी नोक पर नीली ज्वाला जल रही थी — विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित।

जंजीरों को और कस दिया गया। उसकी कलाई से रक्त की नई धार निकली।

वह झुका नहीं।

देविका उसके और निकट आई। इतनी कि उसके केश उसकी भुजा से छू गए।

“तुमने मुझे धोखा दिया,” उसने धीमे स्वर में कहा, जो केवल वही सुन सकता था।

वह हल्का झुका, जैसे सुनने में कठिनाई हो रही हो। “तुम्हें? या तुम्हारे धर्म को?”

उसकी आँखें पहली बार काँपीं।

“तुम्हें चेतावनी दी थी,” उसने फुसफुसाया, “निषिद्ध अग्नि मत जगाओ।”

वह हँसा। इस बार धीमे, गहरे। “तुम्हें उसकी ऊष्मा पसंद थी।”

एक सैनिक ने त्रिशूल उसकी पीठ में धँसा दिया।

भीड़ से एक साथ साँस खिंचने की आवाज़ आई।

नीली ज्वाला उसके शरीर में फैलने लगी। त्वचा जलने की गंध हवा में घुली।

उसने दाँत भींचे, पर कोई चीख नहीं निकली।

दूसरा त्रिशूल उसके कंधे के आर-पार हुआ।

देविका ने नज़र नहीं हटाई।

“तुम्हारा अंत आवश्यक है,” उसने ऊँचे स्वर में कहा, ताकि सभा सुन सके। “धर्म की रक्षा हेतु।”

वह मुश्किल से साँस ले रहा था। फिर भी बोला — “धर्म… किसका?”

तीसरा त्रिशूल उसके वक्ष में उतरा।

उसका शरीर झटका खाकर पीछे गया, जंजीरें तन गईं।

मंत्रों की गति तेज़ हो गई। अग्निकुंडों की लपटें ऊँची उठीं।

प्रधान ने अंतिम घोषणा की — “प्राणाग्नि विच्छेद!”

देविका ने स्वयं आगे बढ़कर उसके ललाट पर अंगूठा रखा। उसके नाखून से रक्त की एक बूँद निकली।

“अब भी समय है,” उसने अंतिम बार धीमे कहा।

उसने आँखें आधी खोलीं। उनमें दर्द था — पर विनती नहीं।

“तुम देर से आई हो,” उसने फुसफुसाया।

आकाश में गर्जना हुई। मंत्रों का शिखर।

देविका ने हाथ पीछे खींचा।

चौथा त्रिशूल ऊपर उठा — सीधा उसकी गर्दन की ओर।

भीड़ ने साँस रोक ली।

नीली ज्वाला की धार हवा चीरती हुई नीचे उतरी —

और त्रिशूल की नोक उसकी त्वचा से छू गई।

क्षण थम गया।

जैसे समय ने स्वयं अपनी श्वास रोक ली हो।

त्रिशूल की नोक गर्दन में धँसी — मांस फटा — रक्त की एक गरम रेखा नीचे बह निकली। भीड़ से दबा हुआ क्रंदन उठा, फिर मंत्रों की आवाज़ उसे ढँक गई।

पर उसी क्षण…

उसे कुछ और महसूस हुआ।

दर्द नहीं।

दर्द तो वह पहचानता था। यह कुछ और था।

उसकी प्राण-नाड़ी में — जहाँ से नीली ज्वाला भीतर उतर रही थी — एक सूक्ष्म, काली चिंगारी टकराई।

काली।

वह ज्वाला उसकी नहीं थी।

उसने आँखें खोलीं। आधी दृष्टि धुँधली थी। रक्त उसके गाल से होकर ठुड्डी तक आ चुका था।

पर उसकी दृष्टि ऊपर नहीं गई।

देविका पर भी नहीं।

उसने बाएँ देखा।

सभा के तीसरे वलय में, जहाँ निम्न आचार्य बैठे थे — एक चेहरा।

सफेद दाढ़ी, झुकी हुई आँखें, स्थिर मुख।

आचार्य वत्सराज।

उसके पुराने गुरु।

वही जिसने उसे पहली बार निषिद्ध तंत्र का सूत्र दिखाया था — और फिर सार्वजनिक रूप से उसका विरोध किया था।

वत्सराज की आँखें उससे मिलीं।

एक क्षण।

और उस क्षण में… भय था।

भय?

नहीं।

गणना।

जैसे वह देख रहा हो — क्या यह वध सफल होगा?

त्रिशूल की ज्वाला भीतर और धँसी। उसकी प्राण-नाड़ी फटने लगी। शरीर काँपा।

मगर उसी टूटती हुई नाड़ी में उसे स्पष्ट अनुभव हुआ — उसकी प्राणाग्नि को कोई बाहर से खींच रहा था।

चक्र-वध की विधि में ऐसा नहीं होता।

चक्र-वध प्राण को काटता है। यह… कोई उसे सोख रहा था।

उसने खाँसते हुए रक्त उगला। आवाज़ टूटी, पर निकली — “यह… तुम्हारा मंत्र नहीं है…”

प्रधान आचार्य ने भौंहें सिकोड़ दीं। “मंत्र पूर्ण है। उसका प्राण विघटित हो रहा है।”

“झूठ…” उसने बमुश्किल कहा।

देविका ने झुककर उसके चेहरे को देखा। “क्या कहना चाहते हो?”

उसने फिर बाएँ देखा। वत्सराज अब मंत्रोच्चार कर रहा था। होंठ हिल रहे थे — पर उसका लय बाकी मंत्रों से अलग था।

सूक्ष्म। अलग।

उसकी दृष्टि तेज़ हो गई।

हाँ।

वह वही लय थी।

निषिद्ध तंत्र — “अग्नि-आहरण।”

जो उसने कभी अधूरा सीखा था।

वत्सराज ने उसे सिखाया था — “यह केवल ज्ञान के लिए है।”

झूठ।

वह उसे इसलिए सिखा रहा था… क्योंकि वह पूर्ण नहीं कर सकता था।

त्रिशूल की ज्वाला उसकी रीढ़ तक पहुँच गई। पैर सुन्न होने लगे।

देविका ने कठोर स्वर में पूछा, “क्या कहना चाहते हो? बोलो!”

वह हँसा। खून के साथ बुलबुले उठे।

“तुम्हें… किसने यह कह दिया… कि मैंने देवताओं के विरुद्ध कोई अस्त्र गढ़ने की चेष्टा की थी?”

देविका का चेहरा क्षणभर कड़ा हुआ। “गुरु वत्सराज ने साक्ष्य प्रस्तुत किया।”

उसकी आँखें चमकीं।

“साक्ष्य…” उसने बमुश्किल दोहराया।

फिर उसकी दृष्टि सीधी वत्सराज पर टिकी।

वृद्ध ने मंत्र की गति और तेज़ कर दी।

अब स्पष्ट था।

नीली ज्वाला उसके भीतर केवल जल नहीं रही थी — कोई उसकी काली अग्नि को बाहर खींच रहा था।

उसकी अपनी शक्ति।

उसकी साधना।

उसके वर्षों की तपस्या।

चुरा रहा था।

“तुम…” उसने बमुश्किल स्वर निकाला।

वत्सराज की आँखें फिर उससे मिलीं।

इस बार… एक क्षीण मुस्कान।

बहुत हल्की।

जैसे कोई गणित का कठिन प्रश्न हल कर चुका हो।

त्रिशूल चौथा भी धँस गया।

गर्दन से रक्त फव्वारे की तरह नहीं, बल्कि मोटी धार बनकर बहा।

भीड़ अब जयघोष कर रही थी।

“धर्म की जय!” “अधर्म का नाश!”

देविका ने हाथ उठाया। शांति हुई।

वह झुकी।

“तुम्हें अंतिम अवसर दिया था,” उसने ठंडे स्वर में कहा। “तुमने चुना।”

उसने आँखें उसके चेहरे पर टिकाईं।

अब उसमें आरोप नहीं था।

केवल समझ।

“तुम… मोहरा हो,” उसने फुसफुसाया।

देविका की भौंह हल्की काँपी। “क्या?”

उसने उत्तर नहीं दिया।

उसकी दृष्टि फिर वत्सराज पर गई।

वृद्ध अब पसीने में था। मंत्रोच्चार के साथ उसकी उँगलियाँ सूक्ष्म मुद्राएँ बना रही थीं — सभा से छिपी हुई।

और तब…

उसने देखा।

वत्सराज के पीछे — आकाश में, अग्निधूम के भीतर — एक काला चक्र बन रहा था।

सूक्ष्म। अदृश्य लगभग।

पर उसकी आँखें उसे पहचानती थीं।

वह उसकी अग्नि थी।

खींची जा रही थी।

संग्रहित।

“तुम… मेरे बिना…” वह बुदबुदाया, “पूर्ण नहीं कर सकते…”

उसकी प्राण-नाड़ी अंतिम बार काँपी।

देविका ने उसका चेहरा पकड़ लिया। “किसकी ओर देख रहे हो?”

उसने प्रयास किया — शब्द स्पष्ट हों।

“पीछे…”

देविका ने स्वाभाविक रूप से पीछे देखा।

पर उस क्षण वत्सराज ने मंत्र रोक दिया।

काला चक्र विलीन।

सब सामान्य।

“कुछ नहीं,” देविका ने कहा, फिर उसकी ओर देखा। “तुम भ्रम देख रहे हो।”

उसकी दृष्टि धुँधली होने लगी।

ध्वनियाँ दूर जा रही थीं।

भीड़, मंत्र, गंगा की लहर…

सब पीछे हटते हुए।

केवल एक बात स्पष्ट थी।

उसे युद्धभूमि में नहीं हराया गया था।

उसे प्रयोग किया गया था।

त्रिशूलों की ज्वाला भीतर अंतिम बार भड़की।

उसकी रीढ़ की जड़ — मूलाधार चक्र के समीप — एक अतिसूक्ष्म काली बूँद शेष रह गई थी, और शेष सातों चक्रों में भी कहीं-कहीं वैसी ही अत्यंत महीन अंधेरी कणिकाएँ अब भी टिमटिमा रही थीं।

इतनी छोटी कि कोई देख न सके।

पर वह जीवित थी।

उसने अंतिम साँस खींची।

देविका की आँखें उसके चेहरे पर थीं।

“अब समाप्त,” उसने कहा।

उसकी गर्दन ढीली पड़ गई।

जंजीरें स्थिर।

त्रिशूल जमे हुए।

भीड़ से विजय-ध्वनि उठी।

और उसी क्षण —

उसके भीतर की वह सूक्ष्म काली बूँद… काँपी।

काँपी — जैसे राख के नीचे दबा अंगारा अंतिम बार लाल हुआ हो।

त्रिशूल अब भी उसके शरीर में धँसे थे। रक्त ठंडा होने लगा था। गर्दन एक ओर झुक चुकी थी। आँखें आधी खुली, पर उनमें जीवन का प्रतिबिंब नहीं।

सभा ने निर्णय घोषित कर दिया था। “प्राणाग्नि विच्छेद पूर्ण।”

पर भीतर…

अंधकार नहीं आया।

पहले उसे लगा — यह मृत्यु का विस्तार है। एक लंबा, खिंचा हुआ शून्य।

फिर उसने महसूस किया — वह गिर रहा है।

शरीर नहीं।

कुछ और।

जैसे चेतना किसी गहरे कुएँ में उतर रही हो, बिना दीवारों के, बिना तली के।

चारों ओर स्याह शून्य।

न मंत्र। न भीड़। न देविका। न वत्सराज।

केवल गिरना।

और उस गिरते हुए शून्य में — वह बूँद।

वही सूक्ष्म काली बिंदु।

मूलाधार के पास जो बची थी।

अब वह अलग थी। शरीर से मुक्त।

जैसे उसकी समूची सत्ता उस एक बिंदु में सिमट गई हो।

“यह… मृत्यु है?” उसकी चेतना में विचार उठा।

पर विचार भी पूरा नहीं बना। शब्द जैसे पिघलकर आकार खो देते थे।

गिरना जारी।

अचानक—

धप्प।

न आवाज़, न टक्कर।

बस गिरना थम गया।

वह तैर रहा था।

शून्य में।

और उस शून्य में, धीरे-धीरे, धुँधली आकृतियाँ बनने लगीं।

अग्निकुंड। गंगा का तट। त्रिशूल।

पर वे स्थिर नहीं थे। जैसे स्मृति हो, जो पूरी नहीं बन पा रही।

फिर एक और दृश्य उभरा।

गुरुकुल का आँगन।

वह युवा था। घुटनों तक धोती। बाल खुले। सामने वत्सराज।

“निषिद्ध तंत्र का उद्देश्य केवल उसे जानना है,” गुरु का स्वर गंभीरता से प्रतिध्वनित हुआ। “जो इसे सिद्ध करने का साहस करेगा, वह देवों और दानवों—दोनों का शत्रु बन जाएगा।”

दृश्य टूट गया।

अंधकार फिर घना।

उस काली बूँद से हल्की गर्मी उठी।

वह गर्मी फैलने लगी — जैसे वह शून्य को पहचान रही हो।

“मैं… समाप्त नहीं हुआ,” चेतना में एक कंपन उठा।

और तभी—

धक।

एक ध्वनि।

बहुत दूर से।

फिर—

धक।

फिर—

धक… धक…

नियमित।

लयबद्ध।

उसने ध्यान लगाया।

यह मंत्र नहीं था।

न शंखनाद।

यह… धड़कन थी।

हृदय की।

पर उसका शरीर तो गंगा तट पर पड़ा था। प्राण-विच्छेद पूर्ण हो चुका था।

फिर यह धड़कन किसकी?

धक। धक। धक।

हर धड़कन के साथ शून्य में हल्की लहर उठती।

जैसे कोई दरवाज़ा भीतर से खटखटा रहा हो।

उस काली बूँद ने उस लय की ओर खिंचना शुरू किया।

पहले धीमे।

फिर तेज़।

शून्य खिंचने लगा। जैसे सुरंग बन रही हो।

धड़कन स्पष्ट होती गई।

धक। धक। धक।

अब उसमें दर्द था।

घबराहट।

साँस की खड़खड़ाहट।

यह किसी जीवित शरीर की धड़कन थी — जो संकट में था।

उसकी चेतना उस ध्वनि की ओर लपकी।

अचानक—

एक झटका।

अंधकार फट गया।

सफेद प्रकाश नहीं।

बल्कि — धूल।

मिट्टी की गंध।

पसीने की तीखी गंध।

और—

चाबुक की आवाज़।

चटाक!

किसी की कराह।

धड़कन तेज़।

धकधकधकधक।

उस काली बूँद को जैसे किसी संकीर्ण स्थान में धकेला गया।

संकरी नाड़ियाँ।

टूटी हुई प्राण-रेखाएँ।

कमज़ोर, बिखरी हुई ऊर्जा।

“यह…” चेतना काँपी।

यह शरीर उसका नहीं था।

यह प्राण-पथ उसका नहीं था।

चक्र… अवरुद्ध।

नाड़ियाँ… जली हुई।

और हृदय — तेज़ी से धड़कता हुआ।

चटाक!

फिर चाबुक।

“उठ! नाटक मत कर!” किसी युवक की कठोर आवाज़।

दर्द की लहर।

पर वह दर्द उसकी पुरानी पीड़ा जैसा नहीं था। यह सतही था। कच्चा।

उस काली बूँद ने उस शरीर के मूलाधार को छुआ।

टूटे हुए चक्र में हल्की चिंगारी जली।

धड़कन एक क्षण को रुकते-रुकते बची।

“मर मत यहाँ!” वही आवाज़ फिर आई।

उसकी चेतना पूरी तरह उस संकरे शरीर में समाने लगी।

भारीपन।

सीने में जकड़न।

फेफड़ों में धूल।

आँखों के पीछे जलन।

वह साँस लेना चाहता था—

पर फेफड़े उसके आदेश को पहचान नहीं रहे थे।

चटाक!

चाबुक इस बार पीठ पर।

और उसी क्षण—

उसने पहली साँस खींची।

धूल भरी।

कठोर।

पर जीवित।

धड़कन फिर स्पष्ट हुई।

धक।

धक।

धक।

अंधकार पूरी तरह हट गया।

पर आँखें अभी भी बंद थीं।

बाहर कोई चिल्ला रहा था — “इसे पानी डालो! अगर यहीं मर गया तो आचार्य हमें जला देंगे!”

किसी ने उसके चेहरे पर ठंडा पानी फेंका।

त्वचा सिहर उठी।

चेतना अब उस शरीर में अटक चुकी थी।

पूरी तरह नहीं — पर काफ़ी।

उस काली बूँद ने उस टूटी प्राण-नाड़ी में जगह बना ली।

कमज़ोर।

पर जीवित।

और पहली बार—

उसे अहसास हुआ।

वह मरकर भी समाप्त नहीं हुआ।

वह किसी और के भीतर धड़क रहा था।

बाहर से आवाज़ आई — “आँख खोल, कीड़े!”

उसकी पलकों ने हल्का-सा काँपना शुरू किया।

पलकें काँपीं।

भारी। जैसे किसी और की हों।

धूप सीधे आँखों पर पड़ रही थी। तेज़, चुभती हुई। उसने उन्हें आधा खोला।

सब धुँधला। _ आकाश नहीं — मिट्टी का आँगन।

पीली धूल, जिस पर पसीने और पैरों के निशान थे।

और उसके सामने — नंगे पाँव खड़ा एक युवक।

उम्र बीस के आसपास। चौड़ा सीना। भुजाएँ कसी हुईं। माथे पर लाल तिलक। हाथ में चमड़े का चाबुक।

“ओहो,” युवक झुका, उसके चेहरे के पास आकर बोला, “मरा नहीं अभी तक।”

उसकी साँस में तंबाकू और इलायची की मिली-जुली गंध थी।

वह बोलना चाहता था।

पर गला सूखा था। जीभ जैसे किसी और की।

पीठ पर आग-सी जलन थी। उसने हल्का-सा करवट लेने की कोशिश की—

सारी देह चीख उठी।

कमज़ोर।

हड्डियाँ हल्की।

मांसपेशियाँ ढीली।

यह शरीर… युद्ध का नहीं था।

“नाटक कर रहा है,” युवक सीधा हुआ। “तीन दिन से हम लोगो से भाग रहा है। आज देखता हूँ कैसे भागता है।”

चटाक!

चाबुक फिर उतरा।

इस बार उसने दाँत भींचे।

आवाज़ नहीं निकाली।

युवक ठिधका।

“अरे? आवाज़ कहाँ गई तेरी?”

आसपास खड़े अन्य शिष्य हँसे।

“शायद सच में मर गया था थोड़ी देर,” एक बोला।

“कौन रखेगा ऐसे को अखाड़े में? प्राण भी नहीं जागे इसके।”

प्राण।

शब्द भीतर गूँजा।

उसने आँखें पूरी खोल दीं।

आँगन चौकोर था। चारों ओर पत्थर की दीवारें। एक ओर तुलसी का चौरा। दूसरी ओर लकड़ी के शस्त्र टंगे हुए।

गुरुकुल।

हाँ।

यह किसी बड़े नगर का नहीं। वन-सीमा का छोटा गुरुकुल था। दीवारों पर चूने की परत उखड़ी हुई। कुएँ के पास रस्सी लटक रही थी।

उसने भीतर देखने की कोशिश की।

नाड़ियाँ।

प्राण-पथ।

और जैसे ही उसने ध्यान केंद्रित किया—

झटका।

दर्द की लहर रीढ़ से सिर तक दौड़ी।

नाड़ियाँ टूटी हुई थीं।

जली हुई।

जैसे किसी ने भीतर से उन्हें खुरच दिया हो।

मूलाधार — बंद।

स्वाधिष्ठान — सूखा।

मणिपुर — लगभग मृत।

यह शरीर कभी प्राण-जागरण तक नहीं पहुँचा था।

और अब… उसमें वह था।

काली बूँद हल्के से काँपी।

कमज़ोर शरीर में वह बिंदु जैसे विशाल लग रहा था — पर ऊर्जा नहीं थी।

युवक फिर झुका। “सुन रहा है न, अर्जुन?”

अर्जुन।

तो यह नाम है।

“उठ,” युवक ने उसकी ठुड्डी चाबुक की मूठ से ऊपर उठाई। “या फिर मैं उठाऊँ?”

उसने पहली बार बोलने की कोशिश की।

आवाज़ खुरदरी निकली — “हटा… हाथ।”

आसपास हँसी फूटी।

युवक की भौंह उठी। “ओहो। आज तो जवाब भी देगा।”

उसने धीरे-धीरे हथेली मिट्टी पर टिकाई।

देह काँपी।

मांसपेशियाँ साथ नहीं दे रहीं।

पर उसने उठना शुरू किया।

घुटने मुड़े। रीढ़ सीधी होने लगी।

हर इंच ऊपर उठते हुए जैसे भीतर की टूटी नाड़ियाँ विरोध कर रही थीं।

युवक पीछे हट गया। आँखों में मनोरंजन।

“देखो देखो, हमारा महान योद्धा।”

वह खड़ा हो गया।

लड़खड़ाता हुआ।

पर खड़ा।

धूप आँखों में चुभ रही थी। पसीना माथे से बहकर आँखों में जा रहा था।

उसने चारों ओर देखा।

कोई उसे दया से नहीं देख रहा था।

न उपहास से।

बस तिरस्कार।

कमज़ोर।

अयोग्य।

अतिरिक्त बोझ।

युवक ने चाबुक कंधे पर टिका लिया। उसकी आँखों में ठंडी चमक उभरी। “अब बता… कर-भरेगा, या फिर कायरों की तरह भाग खड़ा होगा?”

उसने युवक की आँखों में देखा।

गहरा।

सीधा।

क्षणभर के लिए युवक का चेहरा स्थिर हुआ।

इस दृष्टि में कुछ था।

अर्जुन की नहीं।

कुछ और।

“अभ्यास,” उसने धीमे कहा।

आवाज़ अभी भी कमजोर थी।

युवक हँसा। “तेरे बस का नहीं है। प्राण भी नहीं जागे तेरे। दूसरों की थालियाँ धो, वही ठीक है।”

भीतर काली बूँद ने हल्की गर्मी छोड़ी।

प्राण नहीं जागे?

उसने फिर भीतर देखा।

हाँ — इस शरीर में प्राकृतिक जागरण की क्षमता लगभग शून्य थी।

पर उसके पास अनुभव था।

ज्ञान था।

निषिद्ध तंत्र की अधूरी स्मृति।

और—

चोरी की गई अग्नि की गंध अभी भी उसकी चेतना में थी।

वत्सराज।

वह नाम भीतर से उठा।

तो खेल अभी समाप्त नहीं हुआ।

युवक ने फिर चाबुक उठाया। “घुटनों के बल बैठ। दंडवत। पचास बार।”

आँगन में सन्नाटा।

सभी देख रहे थे।

उसने युवक को देखा।

फिर धीरे-धीरे—

घुटने मोड़े।

मिट्टी पर टिकाए।

पर दंडवत नहीं हुआ।

सिर झुकाया नहीं।

युवक की आवाज़ कठोर हुई। “नीचे!”

उसने ऊपर देखा।

धूप उसकी आँखों में थी — पर उनमें झुकाव नहीं।

“तू… मेरा गुरु नहीं,” उसने कहा।

आँगन में हवा थम गई।

युवक के चेहरे पर क्रोध चढ़ा।

“क्या कहा?”

उसने दोहराया नहीं।

बस देखा।

सीधा।

युवक ने चाबुक पूरी ताकत से घुमाया—

और चमड़ा उसकी छाती पर आकर पड़ा।

धप्प।

देह पीछे डगमगाई।

पर इस बार—

वह गिरा नहीं।

काली बूँद भीतर फिर काँपी।

और उसके टूटी नाड़ियों के बीच… एक अत्यंत सूक्ष्म, लगभग अदृश्य… चिंगारी जली

चिंगारी।

इतनी क्षीण कि यदि वह अपने पूर्व जीवन का साधक न होता — तो उसे महसूस भी न कर पाता।

छाती पर पड़े चाबुक का दर्द अभी भी जल रहा था।

त्वचा फट चुकी थी। गर्म रक्त पतली रेखा बनाकर नीचे बह रहा था।

पर उसका ध्यान वहाँ नहीं था।

वह भीतर था।

मणिपुर चक्र के अवशेषों के पास।

जहाँ सब सूखा, जला और मृत-सा पड़ा था।

वहीँ।

वह सूक्ष्म कंपन।

युवक फिर गरजा, “झुकेगा या और पड़ेगा?”

उसने सिर थोड़ा घुमाया। युवक की आँखों में झाँका। इस बार न चुनौती थी, न घृणा।

बस… शांति।

युवक का हाथ एक क्षण के लिए रुक गया।

“क्या देख रहा है?”

उसने उत्तर नहीं दिया।

भीतर उसने साँस रोकी।

धीरे।

लंबी।

इस शरीर के फेफड़े छोटे थे। साँस अधूरी भरते थे। पर उसने उन्हें मजबूर किया।

एक बार।

फिर छोड़ी।

फिर दोबारा भरी।

प्राण नहीं था।

पर श्वास तो थी।

और जहाँ श्वास है… वहाँ मार्ग बनाया जा सकता है।

उसने मन में एक पुराना सूत्र दोहराया — जो वत्सराज ने कभी सिखाया था।

“जब नाड़ी टूटे, उसे जोड़ो मत। उसके चारों ओर नया मार्ग बनाओ।”

तब उसने नहीं समझा था।

अब समझ आया।

चाबुक फिर उतरा।

इस बार पीठ पर।

देह काँपी।

घुटने मिट्टी में धँस गए।

कुछ शिष्य हँसे।

“देखा? यही है इसका स्थान।”

युवक झुका। “अब समझ आया?”

उसने धीमे स्वर में कहा — “हाँ।”

युवक संतुष्ट-सा मुस्कराया। “अच्छा है। बुद्धि आ गई।”

पर उसका “हाँ” उस अर्थ में नहीं था।

भीतर—

उसने श्वास को रीढ़ के आधार तक धकेला।

मूलाधार बंद था।

पर बंद दरवाज़े के बगल में… दीवार थी।

और दीवार में दरारें।

उसने श्वास को वहाँ टिकाया।

दर्द उठा।

तेज़।

आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

पर उसने छोड़ा नहीं।

धीरे-धीरे — काली बूँद ने प्रतिक्रिया दी।

हल्की गर्मी।

फिर—

टिक।

जैसे सूखी लकड़ी में नाखून धँसा हो।

मूलाधार के पास एक सूक्ष्म मार्ग खुला।

बहुत छोटा।

बहुत अस्थिर।

पर खुला।

उसने साँस छोड़ी।

देह पसीने से भीग गई।

युवक पीछे हट गया। “बस। आज के लिए काफी है। इसे कुएँ के पास ले जाओ। अगर मर गया तो साफ़ करना पड़ेगा।”

दो शिष्य आगे आए। उन्होंने उसके बाजू पकड़े।

देह अब भी कमजोर थी। पैरों में बल नहीं।

पर भीतर—

वह मुस्कराया।

बहुत हल्का।

इतना कि किसी ने देखा नहीं।

कुएँ की ओर घसीटते हुए एक शिष्य तिरस्कार से बोला, “क्यों जिद करता है बार-बार? ये सब तेरे बस की बात नहीं।” दूसरा शिष्य कड़वी हँसी हँसते हुए बोला, “देगा कैसे? अभी तो एक हफ्ते पहले ही सारी किमिया गोलियाँ गटक गया था।”

उसने सिर उठाया। आवाज़ धीमी थी — पर स्पष्ट।

“तुम्हारे बस का है?”

शिष्य चुप हो गया।

वे उसे पत्थर की जगत के पास छोड़ गए।

कुएँ से पानी की बाल्टी निकाली गई। ठंडा पानी उसके सिर पर उंडेल दिया गया।

देह काँपी।

पर इस बार — ठंड ने भीतर की गर्मी को बुझाया नहीं।

बल्कि उसे स्थिर किया।

वह धीरे-धीरे उधकर कुएँ की जगत से टिक गया।

आँगन अब खाली होने लगा था। शिष्य अभ्यास-स्थल की ओर जा रहे थे। चाबुक वाला युवक पीछे मुड़कर एक बार उसे देख गया।

दृष्टि में चेतावनी थी।

उसने आँखें बंद कीं।

फिर भीतर झाँका।

टूटी नाड़ियाँ अब भी टूटी थीं।

चक्र अब भी जले हुए।

पर मूलाधार के बगल में — एक बाल-सा पतला मार्ग।

उसमें काली बूँद स्थिर थी।

छोटी।

पर जीवित।

उसने आँखें खोलीं।

आकाश नीला था।

धूप कठोर।

देह दुर्बल।

नाम — अर्जुन।

पर भीतर जो था… वह वही था।

काली अग्नि।

और इस बार—

वह जल्दबाज़ी नहीं करेगा।

उसके होंठों पर वही सूक्ष्म, अदृश्य मुस्कान फिर लौटी।

और कुएँ के गहरे जल में उसका प्रतिबिंब… क्षणभर के लिए… वैसा नहीं दिखा जैसा होना चाहिए था।

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