लापता आख़री निसानी
अर्जुन के पुस्तकालय से बाहर निकलते ही वहाँ फिर से गहरा सन्नाटा छा गया। लंबे-लंबे लकड़ी के रैक, धूल से भरे प्राचीन ग्रंथ… और खिड़की से आती हल्की चाँदनी। कुछ क्षण तक सब कुछ बिल्कुल स्थिर रहा। फिर अचानक… पुस्तकालय के सबसे अंधेरे कोने में हल्की सी काली छाया हिलती हुई दिखाई दी। वह छाया धीरे-धीरे फर्श पर सरकती हुई आगे बढ़ी। उसका कोई स्पष्ट रूप नहीं था। जैसे कोई धुंध… या अंधकार का टुकड़ा। वह सीधा पुस्तकालय के उस हिस्से की ओर बढ़ी जहाँ निषिद्ध ग्रंथ रखे हुए थे। लोहे का भारी दरवाजा वहाँ खड़ा था। दरवाजे पर कई पुराने मंत्रों की मुहरें लगी हुई थीं। लेकिन जैसे ही वह काली छाया दरवाजे के पास पहुँची… मुहरों पर हल्की काली रेखाएँ दौड़ गईं। दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया। छाया अंदर चली गई। और अगले ही पल— धड़ाम… दरवाजा फिर से बंद हो गया। पुस्तकालय फिर से शांत हो गया। जैसे वहाँ कभी कुछ हुआ ही नहीं था। दूसरी ओर… अर्जुन अपने कक्ष की ओर जा रहा था। उसकी मुट्ठी में अभी भी माधवी का सोने का कड़ा था। कुछ देर तक वह उसे देखते हुए चलता रहा। उसने सोचा— “कल उसे लौटा दूँगा।” लेकिन अगले ही पल उसे एक बात याद आई। माधवी उन विद्यार्थियों के भवन में रहती थी, जिन्होंने मूलाधार चक्र को जागृत कर लिया था और जो अपनी साधना के माध्यम से उस चक्र को संतुलित करने का अभ्यास कर रहे थे। वह स्थान गुरुकुल के सामान्य विद्यार्थियों के क्षेत्र से थोड़ा अलग था। और अभी रात का समय था। अर्जुन ने कुछ क्षण सोचा। फिर उसने हल्का सा सिर हिला दिया। “कल…” “कल इसे लौटा दूँगा।” उसी समय उसे एक और बात याद आई। अब जब उसका मूलाधार चक्र जागृत हो चुका था… तो उसे गुरुकुल में इसकी आधिकारिक रिपोर्ट करनी होगी। ऐसा करने के बाद गुरुकुल उसे अधिक संसाधन देगा। बेहतर औषधियाँ… विशेष प्रशिक्षण… और उन विद्यार्थियों के साथ रहने का अवसर जो पहले से साधना के अगले स्तर पर पहुँच चुके थे। अर्जुन ने मन ही मन निर्णय लिया। “रिपोर्ट… मैं कल कर दूँगा।” यह सोचकर वह अपने कक्ष में चला गया। उधर… माधवी अपने कक्ष में थी। वह सोने की तैयारी कर रही थी। लेकिन जैसे ही वह बिस्तर पर बैठी… उसे अचानक एक अजीब सा एहसास हुआ। जैसे… कुछ महत्वपूर्ण गायब हो। उसने भौंहें सिकोड़ लीं। “क्या…?” उसने अपने हाथों की ओर देखा। और अगले ही पल उसकी आँखें फैल गईं। उसकी कलाई खाली थी। “मेरा कड़ा…!” वह तुरंत खड़ी हो गई। वह कड़ा उसके लिए सिर्फ आभूषण नहीं था। वह उसकी माँ की आखिरी निशानी था। उसका दिल तेज धड़कने लगा। वह तुरंत अपने कक्ष से बाहर निकल गई। माधवी ने अपनी साधना की हल्की ऊर्जा को फैलाया। वह उन जगहों को याद करने लगी जहाँ वह आज गई थी। प्रशिक्षण स्थल… कक्षा… उद्यान… और अंत में— पुस्तकालय। वह तेजी से वहाँ तक गई। लेकिन वहाँ पहुँचने पर भी उसे कहीं कड़ा नहीं मिला। उसने लगभग हर कोना देख लिया। लेकिन कुछ नहीं मिला। उसके चेहरे पर धीरे-धीरे निराशा उतरने लगी। काफी देर बाद… वह हार मानकर वापस अपने कक्ष में लौट आई। वह चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई। उसकी मुट्ठियाँ हल्के गुस्से से भींची हुई थीं। “मैं इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हूँ…” उसने खुद से कहा। उसकी आँखों में गुस्सा भी था… और दुख भी। वह धीरे से बिस्तर पर लेट गई। कमरे में हल्की चाँदनी फैल रही थी। कुछ क्षण बाद… उसकी आँखों से एक छोटी सी आँसू की बूंद निकली। वह बूंद धीरे से गिरकर उसके बिस्तर पर फैल गई। उसने आँखें बंद कर लीं। लेकिन उसके मन में बार-बार वही विचार घूम रहा था— “अगर वह कड़ा सच में खो गया… तो मैं माँ की आखिरी निशानी भी खो दूँगी…” उसे यह नहीं पता था… कि वही कड़ा अभी भी अर्जुन के पास सुरक्षित था। और शायद… बहुत जल्द यही छोटी सी चीज़ दोनों की किस्मत को फिर से एक ही रास्ते पर ले आने वाली थी। _ अगली सुबह का समय था।
गुरुकुल में सूरज की पहली किरणों के साथ ही जीवन फिर से जाग उठा था। आंगनों में शिष्य साधना कर रहे थे… कहीं तलवारों की टकराहट की आवाजें आ रही थीं… कहीं आचार्य मंत्रो का उच्चारण कर रहे थे।
लेकिन इन सबके बीच—
माधवी का मन बिल्कुल शांत नहीं था।
रात भर वह ठीक से सो भी नहीं पाई थी।
उसकी आँखों के नीचे हल्की थकान दिखाई दे रही थी।
जैसे ही प्रातः प्रार्थना समाप्त हुई, बाकी विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षाओं की ओर जाने लगे।
पर माधवी वहीं खड़ी रह गई।
उसने अपनी कलाई की तरफ देखा।
खाली।
उसका दिल फिर से बेचैन हो उठा।
“मुझे उसे ढूंढना ही होगा…”
उसने मन ही मन कहा।
वह तुरंत गुरुकुल के अलग-अलग स्थानों पर जाने लगी।
सबसे पहले वह प्रशिक्षण मैदान पहुँची।
वहीं जहाँ वह कल अभ्यास करने आई थी।
वहाँ कई विद्यार्थी लकड़ी की तलवारों से अभ्यास कर रहे थे।
माधवी जमीन को ध्यान से देखने लगी।
वह हर उस जगह को देख रही थी जहाँ उसके कड़े के गिरने की संभावना हो सकती थी।
एक छात्र ने उसे देखा।
“क्या ढूंढ रही हो माधवी?”
माधवी ने हल्का सा सिर उठाया।
“एक कड़ा… सोने का।”
छात्र ने कुछ पल सोचा।
फिर सिर हिला दिया।
“मैंने तो नहीं देखा।”
माधवी ने हल्की सी निराश सांस ली।
“अगर मिले तो मुझे बता देना।”
वह वहाँ से आगे बढ़ गई।
अब वह उद्यान की तरफ गई।
यह वही जगह थी जहाँ अक्सर विद्यार्थी साधना के बीच आराम करने आते थे।
पेड़ों के नीचे कई पत्थर की चौकियाँ थीं।
माधवी ने हर जगह ध्यान से देखा।
लेकिन वहाँ भी कुछ नहीं मिला।
उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
“क्या सच में… वह खो गया?”
उसने खुद से कहा।
फिर उसे अचानक पुस्तकालय याद आया।
उसका दिल हल्का सा धड़क उठा।
“शायद…”
वह तुरंत पुस्तकालय की ओर चल दी।
पुस्तकालय अभी-अभी खुला था।
कुछ विद्यार्थी पहले से ही अंदर बैठकर ग्रंथ पढ़ रहे थे।
माधवी धीरे-धीरे अंदर गई।
उसने वही जगह देखी जहाँ कल वह अर्जुन के पास बैठी थी।
फर्श…
मेज…
रैक के पास की जगह…
लेकिन वहाँ भी कड़ा नहीं था।
माधवी कुछ क्षण वहीं खड़ी रही।
उसकी आँखों में अब निराशा साफ दिखाई दे रही थी।
तभी पास बैठे दो विद्यार्थी आपस में बात कर रहे थे।
“सुना तुमने?”
“क्या?”
“कल अर्जुन का मूलाधार चक्र जाग गया।”
माधवी का ध्यान तुरंत उनकी बातों की तरफ गया।
“अर्जुन…?”
उसने धीरे से नाम दोहराया।
कुछ पल के लिए उसका ध्यान कड़े से हट गया।
उसके मन में अचानक कल की घटना घूम गई—
पुस्तकालय… अर्जुन… ग्रंथ… और फिर उसका गुस्से में वहाँ से चले जाना।
उसने हल्का सा भौंहें सिकोड़ लीं।
“क्या…?”
एक अजीब सा विचार उसके मन में आया।
लेकिन उसने तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”
फिर भी…
उसके मन में हल्की सी शंका जरूर पैदा हो चुकी थी।
उसे यह नहीं पता था—
कि जिस कड़े को वह पूरे गुरुकुल में ढूंढ रही थी…
वह अभी भी अर्जुन के पास सुरक्षित रखा हुआ था।
और दूसरी तरफ—
अर्जुन आज गुरुकुल में अपने मूलाधार चक्र जाग्रति की आधिकारिक रिपोर्ट करने वाला था।
किस्मत धीरे-धीरे दोनों को फिर से एक ही रास्ते पर लाने वाली थी।
_ माधवी पुस्तकालय से जाने ही वाली थी। उसका मन पहले ही भारी था। कड़ा नहीं मिला… और ऊपर से अर्जुन के बारे में सुनी हुई बातें उसके मन में घूम रही थीं। वह दरवाज़े की ओर बढ़ी ही थी कि अचानक उसकी नज़र निषेध पुस्तकों वाले क्षेत्र की तरफ चली गई। वह जगह हमेशा बंद रहती थी। वहाँ भारी लोहे का दरवाज़ा लगा हुआ था… और उसके चारों तरफ विशेष मंत्रों की मुहरें भी थीं। सामान्य विद्यार्थी उस क्षेत्र के पास भी नहीं जाते थे। लेकिन आज— कुछ अजीब था। माधवी की आँखें अचानक सिकुड़ गईं। दरवाज़े के नीचे… फर्श पर… लाल रंग की एक पतली रेखा दिखाई दे रही थी। उसका कदम वहीं रुक गया। उसका दिल हल्का सा धड़क उठा। “यह…?” वह धीरे-धीरे उस दरवाज़े के पास गई। घुटनों के बल बैठकर उसने ध्यान से देखा। लाल रंग थोड़ा सूख चुका था… पर उसके अनुभव ने तुरंत पहचान लिया। यह खून था। माधवी की सांस एक पल के लिए रुक गई। उसकी आवाज़ गले में अटक गई। क्योंकि— निषेध पुस्तकालय के बाहर खून होना बिल्कुल असंभव था। उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। “आचार्य!” उसने जोर से पुकारा। पुस्तकालय के एक कोने में बैठे एक वृद्ध आचार्य तुरंत उठकर उसकी ओर आए। वे वही आचार्य थे जो पुस्तकालय की सभी पुस्तकों की देखरेख करते थे। “क्या हुआ माधवी?” माधवी ने काँपते हाथ से दरवाज़े के नीचे की तरफ इशारा किया। “आचार्य… यह देखिए…” आचार्य झुककर देखने लगे। जैसे ही उनकी नज़र उस लाल निशान पर पड़ी— उनका चेहरा तुरंत गंभीर हो गया। उन्होंने उँगली से हल्का सा छूकर देखा। फिर उनकी भौंहें कस गईं। “यह…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा। “खून है…” माधवी की धड़कन तेज हो गई। आचार्य तुरंत खड़े हो गए। अब उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। निषेध पुस्तकालय का दरवाज़ा बिना अनुमति के खुलना तो दूर… कोई उसके पास भी नहीं जा सकता था। उन्होंने बिना देर किए अपनी कमर से एक मंत्रित चाबी निकाली। “पीछे हटो।” माधवी तुरंत कुछ कदम पीछे हो गई। आचार्य ने दरवाज़े पर लगे मंत्रचिह्नों पर हाथ रखा और एक छोटा सा मंत्र बोला। खर्र… भारी लोहे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया। दरवाज़ा खुलते ही— अंदर से एक ठंडी, भारी हवा बाहर आई। आचार्य ने अंदर कदम रखा। माधवी भी डरते हुए दरवाज़े के पास खड़ी हो गई। और फिर— अंदर का दृश्य देखकर दोनों की आँखें फैल गईं। कमरे के बीचों-बीच… दीवार पर एक शरीर ठोका हुआ था। लोहे की बड़ी-बड़ी कीलों से… किसी ने उसे दीवार में जड़ दिया था। वह एक आचार्य थे। निषेध ग्रंथों के रक्षक। उनका शरीर खून से लथपथ था। कमरे की दीवारों पर खून के छींटे फैले हुए थे। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी— उनकी आँखें अभी भी खुली हुई थीं। जैसे मरने से पहले उन्होंने अपने हत्यारे को देखा हो। माधवी के मुँह से अनायास एक चीख निकल गई। “आचार्य!” पुस्तकालय के आचार्य कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर खड़े रहे। उनके चेहरे पर गहरी गंभीरता थी। क्योंकि— जिस व्यक्ति की हत्या हुई थी… वह साधारण व्यक्ति नहीं था। वह एक शक्तिशाली साधक था। उसी कारण उसे निषेध ग्रंथों की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन— आज… उसे इतनी निर्दयता से मार दिया गया था। इसका केवल एक ही मतलब था— हमलावर बेहद शक्तिशाली था। पुस्तकालय के आचार्य तुरंत बाहर आए। उन्होंने जोर से आदेश दिया— “घंटी बजाओ!” कुछ ही क्षणों में गुरुकुल की आपातकालीन घंटी बज उठी। टन … टन … टन … पूरे गुरुकुल में वह आवाज़ गूंजने लगी। विद्यार्थी इधर-उधर देखने लगे। “क्या हुआ?” “आपातकालीन घंटी क्यों बज रही है?” कुछ ही समय में खबर पूरे गुरुकुल में आग की तरह फैल गई। निषेध पुस्तकालय में हत्या हुई है। और वह भी— एक आचार्य की। यह सुनते ही पूरे गुरुकुल में भय और बेचैनी फैल गई। क्योंकि अब सभी को एक ही बात समझ आ रही थी— गुरुकुल के अंदर… कोई बहुत खतरनाक व्यक्ति मौजूद है। _ आपातकालीन घंटी की आवाज़ अभी भी पूरे गुरुकुल में गूंज रही थी। कुछ ही समय में पुस्तकालय के बाहर विद्यार्थियों और आचार्यों की भीड़ जमा होने लगी। लेकिन किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। निषेध पुस्तकालय के बाहर दो वरिष्ठ आचार्य खड़े कर दिए गए थे। तभी भीड़ अचानक दो हिस्सों में बँटने लगी। धीरे-धीरे एक वृद्ध व्यक्ति आगे बढ़ते हुए दिखाई दिए। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी… गंभीर चेहरा… और आँखों में अजीब सी गहराई थी। गुरुकुल के मुख्य आचार्य। उनके आते ही आसपास खड़े सभी आचार्य तुरंत झुक गए। “प्रणाम मुख्य आचार्य।” मुख्य आचार्य ने हल्का सा सिर हिलाया और सीधे दरवाज़े की ओर बढ़ गए। उन्होंने दरवाज़े के नीचे सूखे हुए खून के निशान को देखा। उनकी आँखें कुछ क्षण के लिए स्थिर हो गईं। “किसने पाया इसे?” पुस्तकालय के आचार्य आगे आए। “मुख्य आचार्य… माधवी ने सबसे पहले इसे देखा था।” मुख्य आचार्य की नज़र पहली बार माधवी पर पड़ी। माधवी थोड़ा घबरा गई लेकिन उसने सिर झुका लिया। मुख्य आचार्य ने शांत स्वर में कहा— “तुमने अच्छा किया जो तुरंत सूचना दी।” इसके बाद वे धीरे-धीरे निषेध पुस्तकालय के अंदर चले गए। अंदर का दृश्य देखते ही कमरे का वातावरण और भी भारी हो गया। दीवार पर ठोकी हुई आचार्य की लाश… कमरे में फैला सूखा हुआ खून… और टूटे हुए कुछ मंत्र चिह्न। मुख्य आचार्य कुछ देर तक बिना कुछ बोले खड़े रहे। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। उन्होंने अपनी हथेली हवा में उठाई। धीरे-धीरे उनके हाथ से हल्की सुनहरी ऊर्जा निकलने लगी। वह ऊर्जा पूरे कमरे में फैल गई। यह एक विशेष साधना थी— ऊर्जा-अवशेष निरीक्षण। इस साधना से किसी स्थान पर हुई ऊर्जा की हलचल को महसूस किया जा सकता था। कुछ क्षण तक कमरा बिल्कुल शांत रहा। फिर मुख्य आचार्य की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं। उन्होंने धीरे से कहा— “अजीब…” पास खड़े आचार्य ने पूछा। “क्या हुआ मुख्य आचार्य?” मुख्य आचार्य धीरे-धीरे कमरे में चलते हुए दीवारों को देखने लगे। “यह साधारण हत्या नहीं है।” उन्होंने उस दीवार को देखा जहाँ लाश ठोकी हुई थी। “हमलावर बहुत शक्तिशाली था…” “और उसने जानबूझकर अपने ऊर्जा-चिह्न छिपाए हैं।” यह सुनकर बाकी आचार्य चौंक गए। ऊर्जा छिपाना… यह बहुत उन्नत साधना थी। मुख्य आचार्य अचानक झुककर फर्श पर पड़े एक छोटे से निशान को देखने लगे। वह खून से बना हुआ एक बहुत हल्का सा चिह्न था। मानो किसी ने अनजाने में कदम रखते समय बना दिया हो। मुख्य आचार्य की आँखें थोड़ी संकरी हो गईं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “यह गुरुकुल का कोई सामान्य विद्यार्थी नहीं हो सकता…” “या फिर…” वह कुछ पल के लिए रुक गए। “किसी ने गुरुकुल के अंदर घुसपैठ की है।” यह सुनकर कमरे में खड़े सभी आचार्य गंभीर हो गए। मुख्य आचार्य ने फिर एक और बात महसूस की। कमरे के एक कोने में रखी निषेध पुस्तकों की अलमारी हल्की सी खुली हुई थी। उन्होंने धीरे-धीरे वहाँ जाकर उसे खोला। अंदर कई प्राचीन ग्रंथ रखे हुए थे। लेकिन… एक जगह खाली थी। मुख्य आचार्य कुछ पल तक उस खाली स्थान को देखते रहे। फिर उन्होंने गहरी सांस ली। “एक ग्रंथ… गायब है।” पास खड़े आचार्य घबरा गए। “कौन सा ग्रंथ?” मुख्य आचार्य ने धीरे से कहा— “नागवज्र तंत्र।” यह नाम सुनते ही बाकी आचार्यों के चेहरों का रंग उड़ गया। क्योंकि वह ग्रंथ… एक अत्यंत खतरनाक साधना से जुड़ा हुआ था। मुख्य आचार्य ने धीरे से लाश की ओर देखा। उनकी आँखों में अब गंभीरता के साथ-साथ चिंता भी थी। “लगता है…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “गुरुकुल के अंदर कोई बहुत बड़ा खेल शुरू हो चुका है।” बाहर खड़ी भीड़ अभी भी बेचैन थी। लेकिन किसी को नहीं पता था— कि यह हत्या… केवल शुरुआत थी। _ निषेध पुस्तकालय के अंदर वातावरण भारी हो चुका था। दीवार पर ठोकी हुई आचार्य की लाश… फर्श पर सूखा हुआ रक्त… और खाली स्थान जहाँ से वह प्राचीन ग्रंथ गायब हो चुका था। मुख्य आचार्य कुछ देर तक उसी स्थान को देखते रहे। फिर उन्होंने धीरे-धीरे कहा— “नागवज्र तंत्र…” कमरे में खड़े बाकी आचार्यों की साँसें जैसे रुक गईं। उनमें से एक वृद्ध आचार्य ने काँपती आवाज़ में कहा— “मुख्य आचार्य… वह ग्रंथ तो केवल इतिहास के लिए रखा गया था… उसकी साधना तो हजारों वर्षों से निषिद्ध है।” मुख्य आचार्य ने गंभीर दृष्टि से उसकी ओर देखा। “हाँ… क्योंकि वह केवल एक ग्रंथ नहीं है।” उन्होंने धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए कहा— “वह एक बली यज्ञ का विधान है।” कमरे में खड़े कई युवा आचार्य इस बात को पूरी तरह नहीं जानते थे। उनके चेहरों पर उलझन दिखाई दे रही थी। मुख्य आचार्य ने गहरी साँस ली और बोले— “नागवज्र तंत्र… एक ऐसी तांत्रिक साधना है जिसमें नाग शक्ति को जागृत करने के लिए नाग लोक के लोगो की बली चढ़ाई जाती है।” कमरे में सन्नाटा फैल गया। एक आचार्य ने अविश्वास से कहा— “लेकिन… नाग लोक के लोगो की बली? यह तो नागवंश के लिए सबसे बड़ा अपमान होगा।” मुख्य आचार्य ने सिर हिलाया। “सिर्फ अपमान नहीं… यह युद्ध का निमंत्रण है।” उन्होंने धीरे-धीरे कमरे में चलते हुए कहना शुरू किया— “बहुत समय पहले… जब यह ग्रंथ पहली बार प्रयोग में लाया गया था… तब मनुष्यों के कुछ तांत्रिकों ने शक्ति के लालच में यह साधना करने की कोशिश की थी।” “उन्हें लगा था कि नाग शक्ति को अपने वश में करके वे अजेय बन जाएंगे।” लेकिन… उनकी साधना के लिए जिस नागिन को पकड़ा गया… वह कोई साधारण नागिन नहीं थी। वह नागराज वंश की थी। और… वहा के राजा की एक पुत्री थीं। मुख्य आचार्य की आवाज़ और भारी हो गई। “उस नागकन्या की … उसी नागवज्र यज्ञ में बली चढ़ा दिया गया था।” यह सुनकर कुछ आचार्य स्तब्ध रह गए। क्योंकि नागवंश अपने बच्चों के लिए अत्यंत संवेदनशील माना जाता था। मुख्य आचार्य आगे बोले— “जब नागराज को यह पता चला…” “तब उन्होंने मनुष्यों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।” “और वही युद्ध… इतिहास में महानाग युद्ध के नाम से जाना गया।” कमरे में खड़े सभी लोग अब ध्यान से सुन रहे थे। मुख्य आचार्य ने धीरे-धीरे कहा— “वह युद्ध… एक या दो वर्ष नहीं चला।” “वह बीस वर्षों तक चला था।” “नदियाँ विष से भर गई थीं…” “जंगल जल गए थे…” “और शहर खंडहर बन गए थे।” उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मानो वह दृश्य उनकी स्मृतियों में फिर से जीवित हो गया हो। “उस युद्ध में…” “मनुष्यों की लगभग आधी आबादी समाप्त हो गई थी।” “और नागवंश की भी एक बहुत बड़ी जनसंख्या नष्ट हो गई थी।” कमरे में खामोशी छा गई। इतिहास के उस भयावह अध्याय को सुनकर कई आचार्यों के शरीर में सिहरन दौड़ गई। मुख्य आचार्य ने फिर कहा— “अंततः… जब दोनों पक्ष पूरी तरह विनाश के कगार पर पहुँच गए…” “तब त्रिदेवों ने हस्तक्षेप किया।” “उनकी मध्यस्थता से एक समझौता हुआ।” “उस समझौते के अनुसार—” कोई भी मनुष्य नागवज्र तंत्र की साधना नहीं करेगा नागवंश मनुष्यों पर आक्रमण नहीं करेगा और यह ग्रंथ हमेशा के लिए निषिद्ध घोषित किया जाएगा लेकिन… मुख्य आचार्य ने उस खाली स्थान की ओर देखा। “इतिहास को छुपाया नहीं जा सकता।” “इसीलिए उसकी कुछ प्रतियाँ… केवल ज्ञान के लिए सुरक्षित रखी गईं।” “ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि शक्ति का लालच कितनी बड़ी तबाही ला सकता है।” कमरे में खड़े एक आचार्य ने धीरे से पूछा— “तो… क्या कोई फिर से वही साधना करना चाहता है?” मुख्य आचार्य कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा— “अगर किसी ने यह ग्रंथ चुराया है…” “तो उसके दो ही उद्देश्य हो सकते हैं।” “या तो वह मूर्ख है…” “या फिर…” उन्होंने धीरे-धीरे कहा— “वह इतना शक्तिशाली बनना चाहता है कि पूरी दुनिया को युद्ध में झोंकने से भी नहीं डरता।” यह सुनकर कमरे में मौजूद सभी लोगों की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई। मुख्य आचार्य ने आदेश दिया— “आज से गुरुकुल के सभी द्वारों की सुरक्षा दोगुनी कर दी जाए।” “और किसी भी विद्यार्थी को बिना अनुमति बाहर जाने की इजाजत नहीं होगी।” फिर उन्होंने अंतिम बात कही— “क्योंकि अगर यह ग्रंथ सच में प्रयोग में लाया गया…” “तो शायद…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “इतिहास का सबसे भयानक युद्ध… फिर से शुरू हो सकता है।” उसी समय… दूर गुरुकुल के एक अंधेरे कोने में… एक काली छाया खड़ी थी। उसके हाथ में वही ग्रंथ था। नागवज्र तंत्र। और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “तो… यही है वह शक्ति…” उसने धीरे से कहा। “जिससे देवता भी डरते हैं…” _ दूसरी तरफ…
अर्जुन इन सब घटनाओं से पूरी तरह अनजान था।
उसके लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसका मूलाधार चक्र आखिरकार जागृत हो चुका था।
सुबह की प्रार्थना समाप्त होने के बाद वह सीधे गुरुकुल के प्रशासनिक भवन की ओर चला गया।
यह वही स्थान था जहाँ हर विद्यार्थी अपनी साधना की प्रगति की आधिकारिक सूचना देता था, ताकि गुरुकुल उसके अनुसार उसका निवास स्थान, औषधियाँ, साधना के संसाधन और उसे सौंपे जाने वाले कार्य निर्धारित कर सके।
पत्थर से बना वह भवन काफी पुराना था। उसके अंदर कई बड़े-बड़े कक्ष थे जहाँ आचार्य बैठकर विद्यार्थियों की साधना का लेखा-जोखा रखते थे।
अर्जुन एक कक्ष के सामने जाकर रुका।
दरवाजे के ऊपर लकड़ी की पट्टिका लगी हुई थी जिस पर लिखा था—
“साधना अभिलेख कक्ष”
अर्जुन ने धीरे से दरवाजा खटखटाया।
अंदर से आवाज आई—
“आओ।”
अर्जुन अंदर चला गया।
कक्ष के भीतर एक मध्य आयु के आचार्य बैठे हुए थे। उनके सामने कई ताड़पत्र और अभिलेख रखे हुए थे जिनमें गुरुकुल के हजारों विद्यार्थियों का विवरण लिखा था।
आचार्य ने बिना सिर उठाए पूछा—
“किसलिए आए हो?”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—
“आचार्य… मैं अपनी साधना की रिपोर्ट दर्ज कराने आया हूँ।”
आचार्य ने तब पहली बार उसकी ओर देखा।
“कौन सी साधना?”
अर्जुन ने सीधा उत्तर दिया—
“मेरा मूलाधार चक्र जागृत हो गया है।”
यह सुनते ही आचार्य के हाथ में पकड़ी कलम रुक गई।
उन्होंने अर्जुन को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा।
“नाम?”
“अर्जुन।”
आचार्य ने तुरंत सामने रखे अभिलेखों में खोज शुरू की।
कुछ ही क्षणों बाद उन्हें उसका नाम मिल गया।
उन्होंने धीरे से पढ़ा—
“अनाथ आश्रम से आया विद्यार्थी… तीन वर्ष से गुरुकुल में… अभी तक कोई चक्र जागृत नहीं…”
फिर उन्होंने भौंहें चढ़ाते हुए अर्जुन को देखा।
“और आज तुम कह रहे हो कि तुम्हारा मूलाधार चक्र जागृत हो गया?”
अर्जुन ने सिर हिला दिया।
आचार्य ने गंभीर स्वर में कहा—
“हाथ आगे बढ़ाओ।”
अर्जुन ने अपना दाहिना हाथ आगे कर दिया।
आचार्य ने उसकी कलाई पकड़कर उसकी नाड़ी की जाँच शुरू की।
कुछ क्षणों तक कमरे में केवल शांति रही।
फिर…
आचार्य की आँखें धीरे-धीरे चौड़ी हो गईं।
क्योंकि उन्हें अर्जुन की नाड़ियों में एक स्थिर और शक्तिशाली प्रवाह महसूस हो रहा था।
उन्होंने तुरंत दूसरी जाँच की।
इस बार उन्होंने अपनी साधना शक्ति से अर्जुन के मूलाधार चक्र को महसूस करने की कोशिश की।
और अगले ही क्षण उनके चेहरे पर आश्चर्य स्पष्ट दिखाई देने लगा।
“हूँ…”
उन्होंने धीरे से कहा।
“यह तो सच में जागृत हो चुका है…”
उन्होंने अभिलेख में कुछ लिखना शुरू कर दिया।
“विद्यार्थी अर्जुन… मूलाधार चक्र जागृत… स्थिति स्थिर… साधना स्वीकृत…”
फिर उन्होंने अर्जुन की ओर देखते हुए कहा—
“आज से तुम्हारा नाम मूलाधार साधकों की सूची में दर्ज कर दिया गया है।”
उन्होंने आगे कहा—
“अब तुम्हें सामान्य विद्यार्थियों के साथ नहीं रखा जाएगा।”
“तुम्हें मूलाधार साधकों के निवास क्षेत्र में स्थान मिलेगा।”
“वहाँ तुम्हें बेहतर औषधियाँ, बेहतर भोजन और अधिक साधना संसाधन मिलेंगे।”
अर्जुन शांत खड़ा रहा।
आचार्य ने अंतिम बात कही—
“और हाँ…”
“तीन महीने बाद जो अनंत रहस्येश्वर मंदिर प्रकट होने वाला है…”
“उसमें प्रवेश करने के लिए अब तुम भी पात्र हो।”
कक्ष में कुछ क्षणों तक शांति रही।
अर्जुन ने बस हल्के से सिर झुका दिया।
“आचार्य की आज्ञा।”
आचार्य ने फिर अपने अभिलेख में लिखते हुए कहा—
“जाओ… और आज से अपनी साधना को स्थिर करने पर ध्यान दो।”
अर्जुन मुड़ा और कक्ष से बाहर निकल गया।
लेकिन…
उसे यह बिल्कुल भी पता नहीं था कि इसी समय…
गुरुकुल के अंदर एक ऐसा रहस्य जन्म ले चुका था…
जो शायद आने वाले समय में पूरे गुरुकुल को संकट में डाल सकता था।
और उससे भी बड़ी बात—
अभी तक किसी को यह पता नहीं था कि नागवज्र तंत्र किसने चुराया है।
और वह उसे किस उद्देश्य से प्रयोग करना चाहता है।
दूर खड़ा एक विद्यार्थी अर्जुन को प्रशासनिक भवन से बाहर निकलते हुए देख रहा था।
उसकी आँखों में हल्की मुस्कान थी।
“तो आखिरकार…”
उसने धीरे से कहा।
“तुम्हारा मूलाधार चक्र जाग ही गया, अर्जुन…”
लेकिन उसकी मुस्कान में मित्रता नहीं थी।
वह कुछ और ही सोच रहा था।
और शायद…
अर्जुन अभी तक यह नहीं समझ पाया था कि गुरुकुल के भीतर शुरू हो चुका यह खेल…
अब धीरे-धीरे और खतरनाक होने वाला था। _ अर्जुन अपने मणिपुर चक्र की जागृति की रिपोर्ट देकर कमरे से बाहर निकला ही था कि उसे गलियारे में कुछ विद्यार्थियों की धीमी-धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी। “तुमने सुना? निषेध पुस्तकालय में किसी आचार्य की हत्या हो गई…” “कहते हैं उनकी लाश दीवार में ठोक दी गई थी… इतना भयानक दृश्य किसी ने पहले कभी नहीं देखा…” अर्जुन के कदम अनायास ही रुक गए। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। निषेध पुस्तकालय… हत्या…? उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। गुरुकुल में इतने वर्षों में उसने कई कठोर घटनाएँ देखी थीं, पर किसी आचार्य की इतनी निर्मम हत्या… यह बात उसके लिए असंभव जैसी थी। बिना देर किए वह तेज़ कदमों से पुस्तकालय की ओर बढ़ गया। जैसे-जैसे वह करीब पहुँचता गया, वहाँ का वातावरण और भी भारी महसूस होने लगा। गलियारे में असामान्य सन्नाटा था, और कई विद्यार्थी दूर खड़े डर और जिज्ञासा से उस दिशा में देख रहे थे। अर्जुन ने जब पुस्तकालय के मुख्य कक्ष में कदम रखा तो उसने देखा— वहाँ माधवी और मुख्य आचार्य गहरी बातचीत में लगे हुए थे। माधवी के चेहरे पर चिंता और घबराहट साफ दिखाई दे रही थी, जबकि मुख्य आचार्य का चेहरा असामान्य रूप से गंभीर था। उनके हाथ में एक पुरानी पुस्तक थी, और उनकी दृष्टि बार-बार उस निषेध कक्ष की ओर जा रही थी जहाँ अभी-अभी वह भयानक हत्या हुई थी। अर्जुन कुछ दूरी पर रुक गया। “…इसका मतलब साफ है,” मुख्य आचार्य धीमी लेकिन कठोर आवाज़ में कह रहे थे, “जिसने भी यह किया है, वह केवल शक्तिशाली ही नहीं… बल्कि उसे निषेध ग्रंथों के बारे में भी पूरा ज्ञान है।” माधवी ने चिंतित स्वर में कहा, “आचार्य… अगर यह सच है, तो क्या इसका मतलब है कि कोई नागवज्र तंत्र तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है…?” मुख्य आचार्य की आँखें एक पल के लिए ठहर गईं। उन्होंने गहरी साँस ली और बहुत धीमे स्वर में बोले— “अगर ऐसा है… तो यह केवल गुरुकुल के लिए नहीं… पूरे मानव लोक के लिए खतरे की शुरुआत हो सकती है।” यह सुनते ही अर्जुन के मन में अनगिनत प्रश्न उठ खड़े हुए। वह आगे बढ़ने ही वाला था कि अचानक मुख्य आचार्य की नजर उस पर पड़ गई। उनकी तीक्ष्ण आँखें अर्जुन पर टिक गईं… जैसे वह केवल उसे देख ही नहीं रहे थे, बल्कि उसकी साधना की गहराई तक पढ़ रहे हों।
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