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औषधि पाना
📚 Arjun The Black Heavenly Fire | Hindi Fantasy Audio Novel | Dark Cultivation Saga

औषधि पाना

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औषधि कक्ष के बाहर की वायु में जड़ी-बूटियों की एक मिश्रित गंध तैर रही थी — कुछ कड़वी, कुछ तीखी, कुछ ऐसी जो नाक में घुसते ही आँखें भिगो दे।

अर्जुन वहीं खड़ा था।

दरवाजे के चौखट से पीठ टिकाए, भुजाएँ छाती पर मुड़ी हुईं, और दृष्टि उन काँच के पात्रों पर टिकी हुई थी जिनमें दुर्लभ वनस्पतियाँ संरक्षित रखी गई थीं।

वह जानता था कि उनमें से कई जड़ी-बूटियाँ उसके स्वाधिष्ठान चक्र की उस उद्दाम ऊर्जा को वश में करने के काम आ सकती थीं जो पिछले कुछ सप्ताहों से उसके भीतर किसी बाढ़ की तरह उमड़ती रहती थी। लेकिन औषधि कक्ष का द्वार केवल आचार्यों के आदेश पर खुलता था — और अर्जुन के पास न अनुमति थी, न पर्याप्त अंक।

उसने एक लंबी साँस ली।

जो मेरे पास नहीं है, उसे माँगने से नहीं — कमाने से मिलेगा।

यह सोचकर वह वहाँ से मुड़ा और सीधे कार्य कक्ष की ओर चल दिया।

ऋत्विज वेदाश्रम का कार्य कक्ष उन स्थानों में से था जहाँ छात्रों की महत्वाकांक्षा और उनकी सीमाएँ — दोनों एक साथ परखी जाती थीं।

दीवारों पर लकड़ी के पट्टों पर कार्यों की सूचियाँ टँगी हुई थीं। कुछ पट्टे सफेद थे — सरल कार्य, कम अंक। कुछ पीले — मध्यम कठिनाई। और एक कोने में कुछ गहरे लाल पट्टे थे जिन पर लिखे कार्यों को देखकर कई छात्र मुँह फेर लेते थे।

अर्जुन सीधे उसी कोने में गया।

उसकी आँखें एक-एक पट्टे पर टिकती रहीं, और अंत में रुक गईं एक विशेष पट्टे पर।

वज्रवृष्टि अरण्य — औषधि संकलन कार्य लगातार वर्षा, गर्जना और बिजली से आच्छादित रहस्यमय वन। दुर्लभ दिव्य वनस्पतियों का एकमात्र ज्ञात स्रोत। खतरनाक वन्य प्राणी, अज्ञात राक्षसी उपस्थिति और अनेक अप्रकट रहस्य। कार्य पूर्णता पर पुरस्कार: पाँच हजार अंक।

पाँच हजार अंक।

अर्जुन के होंठों पर एक शांत मुस्कान उभरी। इतने अंकों से न केवल औषधि कक्ष का द्वार खुलता — बल्कि आश्रम की उच्च श्रेणी की साधना पुस्तकों तक भी पहुँच बन सकती थी।

उसने पट्टा उठाया और कार्य प्रभारी आचार्य के पास पहुँचा।

आचार्य ने उसे ऊपर से नीचे तक एक बार देखा। फिर पट्टे को देखा। फिर वापस अर्जुन को।

"यह कार्य तृतीय वर्ष के छात्रों के लिए है," उन्होंने धीरे से कहा — न रोकने के लिए, न चेताने के लिए, बल्कि केवल तथ्य बताने के लिए।

"मैं प्रथम वर्ष का छात्र हूँ," अर्जुन ने उतने ही शांत स्वर में उत्तर दिया। "क्या नियमों में ऐसा कोई प्रतिबंध है?"

आचार्य ने एक पल रुककर पंजी देखी। फिर लेखनी उठाई और अर्जुन का नाम उस कार्य के आगे अंकित कर दिया।

"समय सीमा पंद्रह दिन," उन्होंने कहा। "यदि निर्धारित वनस्पतियाँ लेकर नहीं लौटे, तो कार्य निरस्त होगा और किसी अन्य को आवंटित हो जाएगा। आश्रम की ओर से कोई सहायता नहीं मिलेगी।"

अर्जुन ने सिर हिलाया।

"समझ गया।"

और वह मुड़ गया।

जो अर्जुन को नहीं पता था — वह यह था कि उस पूरे दृश्य का एक मूक साक्षी वहाँ उपस्थित था।

कार्य कक्ष के एक स्तंभ की आड़ में खड़ा नकुल — एक साधारण दिखने वाला छात्र जिसकी आँखें असाधारण रूप से चौकस थीं — अर्जुन की हर हरकत देख रहा था।

वह शर्वित का आँख और कान था।

अर्जुन के जाते ही नकुल तुरंत पलटा और आश्रम के पिछले खंड की ओर तेज़ कदमों से चल दिया।

शर्वित अपने कक्ष में बैठा साधना पत्थरों से खेल रहा था।

वे छोटे-छोटे क्रिस्टल जैसे पत्थर उसकी हथेली पर रखे थे और उनसे एक मंद नीली आभा उठ रही थी। शर्वित की उँगलियाँ उन पर फिरती रहतीं — यह उसकी आदत थी जब वह सोचता था।

नकुल ने द्वार पर दस्तक दी और भीतर आकर सब कुछ बताया।

शर्वित ने एक पल के लिए पत्थर रोक दिए।

फिर उसके चेहरे पर एक धीमी, ठंडी मुस्कान उभरी।

"वज्रवृष्टि अरण्य," उसने दोहराया। "स्वयं चलकर वहाँ जा रहा है।"

उसने एक पोटली उठाई और नकुल की ओर फेंकी। उसमें साधना पत्थर थे — पारिश्रमिक।

"अच्छा काम किया। अब जा।"

नकुल चला गया।

शर्वित उठा, अपनी लेखनी उठाई और दो पत्र लिखे। पहला संक्षिप्त था — केवल एक पंक्ति। दूसरा थोड़ा विस्तृत।

उसने दोनों पत्रों को लपेटा और अपने दो विशेष कबूतरों के पैरों में बाँध दिए। ये साधारण कबूतर नहीं थे — इनकी आँखों में एक असामान्य बुद्धिमत्ता थी, और ये जंगल के बीहड़ रास्तों को भी भटके बिना पार कर सकते थे।

पहला कबूतर उन लोगों के पास जाएगा जो वज्रवृष्टि अरण्य के भीतर रहते थे — जिन्हें पहले से एक सुपारी मिली थी। उन्हें बस अब समय और लक्ष्य बताना था।

दूसरा कबूतर उड़ा राजऋषि भानुदेव की ओर — वीरेंद्र के परदादा, जो इस पूरे खेल के असली सूत्रधार थे।

शर्वित ने खिड़की से देखा जैसे दोनों कबूतर आकाश में विलीन हो गए।

"अर्जुन," उसने धीरे से कहा और हँसा — वह हँसी जिसमें घमंड था, योजना थी, और एक गहरी क्रूरता थी, "तुम्हारा क्या होगा।"

अगली सुबह

सूर्योदय से दो घड़ी पहले।

आश्रम के अधिकांश छात्र अभी भी गहरी नींद में थे। कुछ ध्यान कक्षों में साधनारत थे। रात्रि के प्रहरी दीपक की रोशनी में झपकियाँ ले रहे थे।

उस शांति में एक आकृति थी जो चुपचाप आश्रम के मुख्य द्वार से बाहर निकली।

अर्जुन।

उसकी पीठ पर एक साधारण चमड़े का थैला था। उसमें दो दिन का सूखा भोजन, एक पानी की मशक, एक छोटी वैद्यकीय पोटली और कुछ रिक्त बर्तन थे — वनस्पतियाँ रखने के लिए।

कमर पर लकड़ी की तलवार बँधी थी — वार्षिक परीक्षा में मिली थी। सरल, भारी, बिना किसी साधना-शक्ति के।

और हाथ में एक छोटा, तीखा चाकू।

बस।

कोई ताबीज़ नहीं। कोई सुरक्षा-कवच नहीं। कोई साथी नहीं।

अर्जुन ने एक बार पीछे मुड़कर आश्रम की ओर देखा। ऊँची दीवारें, शांत प्रांगण, दूर जलता एक दीपक।

फिर वह आगे चल दिया।

उसके क़दम दृढ़ थे।

वह जानता था कि वज्रवृष्टि अरण्य कोई साधारण वन नहीं है। लेकिन यह भी जानता था कि सुरक्षा की ओट में छुपकर बैठने वाले कभी नहीं बढ़ते।

जोखिम उठाए बिना शक्ति नहीं मिलती।

यह उसका मंत्र था। आज इसकी परीक्षा होनी थी।

तीन प्रहर की पैदल यात्रा।

मिट्टी के रास्ते, टूटे पत्थर, उबड़-खाबड़ ढलानें — अर्जुन इन सबको बिना रुके पार करता रहा। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया, वातावरण बदलने लगा।

हवा में नमी बढ़ गई।

वनस्पति घनी होती गई।

और फिर एक मोड़ के बाद — वज्रवृष्टि अरण्य।

अर्जुन वहीं रुक गया।

सामने जो दृश्य था, उसने एक पल के लिए उसकी साँस रोक दी।

आकाश का एक टुकड़ा वहाँ था जो शेष संसार से बिल्कुल अलग था। घने काले मेघ उस वन के ऊपर स्थायी रूप से जमे हुए थे — जैसे किसी ने उन्हें वहाँ बाँध रखा हो। बिजलियाँ मेघों के भीतर लगातार कौंधती रहती थीं — एक प्रकाश जो दिखता था पर पहुँचता नहीं था। वन के भीतर से एक धुंध उठ रही थी, धीमी और घनी, जैसे जंगल स्वयं साँस ले रहा हो।

और उस सबके ऊपर — एक भारी, दमघोंटू नीरवता।

वन ने अर्जुन को देखा।

अर्जुन ने वन को देखा।

फिर उसने गहरी साँस ली, अपने थैले की पट्टी कसी, और भीतर कदम रखा।

वन के भीतर आते ही संसार बदल गया।

बाहर की धूप यहाँ नहीं थी। पेड़ों के विशाल तने इतने मोटे थे कि दो-तीन व्यक्ति मिलकर भी उन्हें घेर नहीं सकते थे। उनकी शाखाएँ इतनी घनी थीं कि आकाश लगभग अदृश्य हो गया था। जो प्रकाश नीचे आता था, वह भी छन-छन कर आता था — हरा, धुँधला, अजीब।

वर्षा की बूँदें पत्तों पर पड़ती रहती थीं — एक निरंतर संगीत जो कहीं दूर की ओर जाता हुआ प्रतीत होता था।

अर्जुन ने अपनी चेतना फैलाई।

यह उसकी वह विशेष क्षमता थी जिसे वह स्वयं पूरी तरह नहीं समझता था — एक अनुभूति जो उसकी इंद्रियों से परे थी। जब वह ध्यान को बाहर की ओर धकेलता, तो आसपास का वातावरण उसे एक अस्पष्ट चित्र की भाँति दिखने लगता। जड़ी-बूटियों की ऊर्जा एक हल्की सी कंपन के रूप में अनुभव होती।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा।

वन उसे निगलता रहा।

लगभग आधे प्रहर की खोज के बाद।

एक बड़ी शिला के नीचे, जहाँ बारिश का पानी बूँद-बूँद टपकता था, अर्जुन रुका।

उसकी चेतना ने कुछ महसूस किया था।

उसने झुककर देखा — और एक लता थी। उसके पत्ते नीले रंग के थे — वह नीला जो आकाश में नहीं, पानी की गहराई में होता है। पत्तों की नसें बारीक रेशों की तरह चमक रही थीं, और उन पर ठहरी वर्षा की बूँदें ऐसे जगमग कर रही थीं जैसे उनमें अलग ही प्रकाश हो।

मेघरस लता।

अर्जुन ने एक पल उसे देखा।

यह अकेली लता ही हजारों अंकों की थी। आश्रम में इसकी माँग सदैव रहती थी क्योंकि यह स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र के बीच ऊर्जा के असंतुलन को स्थिर करने में सहायक होती थी।

उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान आई।

सावधानी से — बिना जड़ों को क्षति पहुँचाए — उसने लता को काटा। उसे एक नम कपड़े में लपेटकर अपने थैले में रख लिया।

अच्छी शुरुआत।

लेकिन तभी—

जंगल बदल गया।

यह बदलाव अचानक था।

वर्षा की बूँदों का वह निरंतर संगीत — जो तब से बज रहा था जब से वह भीतर आया था — एकाएक थम गया। या शायद थमा नहीं, बस अर्जुन को सुनाई देना बंद हो गया।

जंगल इतना शांत हो गया कि उसे अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगी।

यह स्वाभाविक शांति नहीं थी।

यह वह शांति थी जो शिकार से पहले होती है।

अर्जुन का हाथ तुरंत तलवार की मूठ पर चला गया। उसकी पीठ निकटतम वृक्ष की ओर हो गई। आँखें धीरे-धीरे चारों ओर घूमने लगीं।

पेड़।

धुंध।

और अंधकार।

कहीं कुछ नहीं।

लेकिन कुछ था — वह निश्चित था।

"अर्जुन..."

आवाज़ पीछे से आई।

वह नाम लेने वाला स्वर ऐसा था जैसे कोई उसे जानता हो, पहचानता हो — लेकिन उस परिचय में एक ठंडा, निर्मम उद्देश्य था।

अर्जुन झुका।

जहाँ उसका सिर था, वहाँ से एक तीर गुज़रा — इतनी तेज़ी से कि हवा कट गई।

वह पलटा।

पाँच आकृतियाँ।

काले वस्त्र। चेहरों पर काले नकाब। हाथों में विविध शस्त्र — धनुष, खंजर, एक छोटी तलवार।

ये साधारण डाकू नहीं थे। उनकी मुद्रा, उनकी स्थिति — यह प्रशिक्षित हत्यारों की मुद्रा थी।

"तुम लोग कौन हो?" अर्जुन ने पूछा। उसकी आवाज़ में भय नहीं था — जिज्ञासा थी। "और मुझ पर आक्रमण क्यों?"

नकाबपोशों में से एक आगे आया। उसकी आवाज़ में वह विशेष रूखापन था जो लंबे समय से हत्या को व्यवसाय बनाने वालों में आ जाता है।

"बच्चे," उसने कहा, "कुछ लोगों से पंगा लेने की सीमा होती है। तुमने वह सीमा पार कर ली। अब जो होगा, उसकी ज़िम्मेदारी तुम्हारी अपनी है।"

"मैंने किससे पंगा लिया?" अर्जुन ने पूछा।

कोई उत्तर नहीं मिला।

केवल संकेत मिला।

और पाँचों एक साथ झपटे।

युद्ध

अर्जुन पीछे नहीं हटा।

यह उसका चरित्र नहीं था — और इस क्षण में यह उसकी रणनीति भी नहीं थी।

वह आगे बढ़ा।

सीधे उनकी ओर।

पहला आक्रमणकारी जब उस पर झपटा, तब अर्जुन ने उसे आने दिया — एक पल के लिए — और फिर अंतिम क्षण में बाईं ओर सरक गया। खंजर उसकी बाँह को छूकर निकल गया, मांस पर एक लाल रेखा खींचता हुआ।

दर्द हुआ।

लेकिन अर्जुन का दाहिना हाथ पहले से ही चला था। लकड़ी की तलवार हत्यारे की कलाई से टकराई और उसका खंजर नीचे गिर गया।

इतने में दो और उस पर आए।

अर्जुन ने झुककर एक की लात से बचा और दूसरे की तलवार को अपनी लकड़ी की मूठ से रोका। टक्कर इतनी तेज़ थी कि लकड़ी में दरार आ गई।

वह जानता था कि तलवार जल्द ही टूट जाएगी।

उसने इसे फेंक दिया और चाकू उठाया।

तीन पर एक।

वे अनुभवी थे। उनके प्रहार समन्वित थे — एक आगे से, दो पार्श्व से। वे घेरे को धीरे-धीरे कसते जा रहे थे।

अर्जुन की बाईं जाँघ पर एक कट पड़ा।

दाहिने कंधे पर खंजर का बिंदु छुआ।

पीठ पर एक मुक्का पड़ा जिसने उसे एक पल के लिए डगमगाया।

लेकिन...

वह विचित्र था।

घाव हो रहे थे — यह सत्य था। लेकिन हर घाव के साथ, अर्जुन के भीतर कुछ हुआ। एक जलन। एक कंपन। और फिर — वह अनुभव जो उसे पहले कभी इतना स्पष्ट नहीं हुआ था।

घाव भर रहे थे।

धीरे नहीं — बल्कि उसकी आँखों के सामने।

बाईं जाँघ का कट, जो रक्त रिसाता था, एक पल में सिकुड़ने लगा। रक्त का प्रवाह रुका। मांस जुड़ने लगा।

हत्यारों ने यह देखा।

पहली बार उनकी मुद्रा में कुछ बदला। एक सूक्ष्म असमंजस।

"क्या हो रहा है इसे?" उनमें से एक ने फुसफुसाया।

"मारते रहो," दूसरे ने कहा।

लेकिन यह अब पहले जैसा नहीं था।

वे आक्रमण करते, घाव पड़ता, और अर्जुन उसे झेलकर पुनः तैयार हो जाता। जबकि उनके अपने घाव — जो अर्जुन के चाकू से पड़े थे — वैसे ही बने रहते। जमते रहते। भारी होते जाते।

पाँच में से एक पहले ही घुटनों पर था — उसकी भुजा पर एक गहरा घाव था जिससे वह अपना हथियार ठीक से पकड़ भी नहीं सकता था।

अर्जुन ने सब देखा।

और सोचा।

यह गलत है।

यह विचार युद्ध के बीच में भी उसके मन में आया — और जब वह आया, तो उसने उसे रोका।

मूलाधार चक्र के प्रारंभिक चरण में यह शरीर इतना सक्षम नहीं होना चाहिए।

साधना-पथ की पहली सीढ़ी पर खड़े किसी साधक के घाव इतनी शीघ्रता से नहीं भरते। यह क्षमता उससे कहीं आगे की थी — शायद नवम या दशम स्तर के साधकों में होती थी।

लेकिन वह यहाँ थी। उसके भीतर।

और वह उसका था

पिछला जन्म।

यह उत्तर था।

पिछले जन्म में जो साधना की गई थी, जो शरीर-अभ्यास वर्षों के परिश्रम से पाया गया था — वह इस जन्म में बीज के रूप में उपस्थित था। उसकी जड़ें गहरी थीं। और वे बिना पूछे, बिना नियंत्रण के — अपने आप खिल रही थीं।

यही समस्या थी।

अर्जुन ने एक क्षण के लिए लड़ाई को थोड़ा पीछे धकेला और उस विचार को पकड़ा।

यदि इन शक्तियों पर नियंत्रण नहीं रहा — यदि मैं इनका स्वामी नहीं बना बल्कि ये मेरी स्वामी बन गईं — तो अंत बुरा होगा।

शक्ति एक नदी की तरह होती है। उसपर बाँध बनाकर उसे सींचने का साधन बनाया जा सकता है। लेकिन यदि बाँध न हो, यदि दिशा न हो — तो वही नदी विनाश बन जाती है।

मुझे इनका स्वामी बनना है। दास नहीं।

यह अनुभूति उस क्षण में हुई — एक जंगल के बीच, पाँच हत्यारों से लड़ते हुए — और इसने अर्जुन के भीतर कुछ बदल दिया।

उसकी आँखें शांत हो गईं।

और लड़ाई का स्वरूप बदल गया।

अब अर्जुन सिर्फ लड़ नहीं रहा था — वह देख रहा था।

अपने भीतर।

वह शक्ति जो स्वयंभू रूप से प्रकट हो रही थी, उसे उसने पहली बार सचेत रूप से अनुभव करने की कोशिश की। वह चेतना जो फैलती थी, वह ऊर्जा जो घावों को भरती थी — उसे एक सूत्र पकड़ाया।

यहाँ। इतनी। बस।

परिणाम तत्काल नहीं था — लेकिन था।

घावों का भरना थोड़ा धीमा हुआ। लेकिन जो ऊर्जा बचाई गई, वह उसकी गति में आ गई।

वह तेज़ हो गया।

तीसरा हत्यारा पलक झपकने से पहले चारों खाने चित था — अर्जुन का चाकू उसकी कलाई पर, और उसका मुक्का उसकी ठुड्डी पर। वह उठने की कोशिश में था जब दूसरा प्रहार हुआ और वह निश्चेत हो गया।

चौथा भागने की सोच रहा था — पर वन इतना घना था कि वह कहाँ जाता। अर्जुन ने उसे एक लंबे पत्थर के पीछे घेर लिया।

"बताओ," अर्जुन ने कहा। आवाज़ शांत थी। "किसने भेजा तुम्हें?"

हत्यारा चुप रहा।

"मैं तुम्हें मार नहीं रहा," अर्जुन ने कहा। "मैं बस जानना चाहता हूँ।"

हत्यारे की आँखों में कुछ हुआ। डर नहीं — असमंजस।

लेकिन उसने कोई नाम नहीं लिया।

पाँचवाँ हत्यारा — जो सबसे पहले बोला था — पहले ही पेड़ों के बीच गायब हो चुका था।

अर्जुन ने पीछा नहीं किया।

उसके पास अभी उससे ज़रूरी काम था।

वन के ऊपर।

आकाश में — बहुत ऊँचाई पर।

एक कौवा उड़ रहा था।

साधारण आँखों को वह साधारण ही लगता। काला पंख, काली चोंच, काला शरीर।

लेकिन उसकी आँखें काली नहीं थीं।

उसकी आँखों में आँखें नहीं थीं।

जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ दो ज्वालाएँ थीं — नीली, मंद, अतल। और उन ज्वालाओं में जो दृश्य था, वह कहीं और दिख रहा था।

राजऋषि भानुदेव के आवास में।

एक वृद्ध व्यक्ति बैठा था — बहुत वृद्ध, लेकिन इतना क्षीण नहीं जितना उम्र से होना चाहिए था। उनकी देह पर वर्षों की साधना की वह छाप थी जो समय को पीछे धकेलती है।

उनके सामने एक जलते दीपक की लौ थी।

और उस लौ में — वे सब दिख रहा था जो जंगल में हुआ था।

कौवे की आँखों के माध्यम से।

भानुदेव ने पाँच हत्यारों को धराशायी होते देखा। उन्होंने अर्जुन के घावों को भरते हुए देखा। उन्होंने उस बालक को देखा — जो उनके अनुमान से कहीं अधिक था।

उनके माथे पर एक रेखा गहरी हुई।

उनके होंठ धीरे-धीरे भींचे।

"बहुत अच्छे।"

यह प्रशंसा नहीं थी।

यह एक परखी हुई शत्रुता थी — वह जो तब प्रकट होती है जब सामने वाले की क्षमता का सही आकलन हो जाता है।

"मुझे ऐसा प्रतीत होता है," उन्होंने धीमे स्वर में कहा, और उनकी आवाज़ में वर्षों से दबी हुई अग्नि की तपिश झलक रही थी, "कि मेरे परिवार पर जो विपत्ति आई थी... उसके पीछे कहीं न कहीं तुम्हारा हाथ अवश्य था।"

उन्होंने दीपक की लौ पर अपनी मुट्ठी बंद की।

लौ बुझ गई।

अंधेरे में उनकी आँखें खुली रहीं।

"तुम्हें यह भूल नहीं करनी चाहिए थी, अर्जुन। अब नहीं छोड़ूँगा।"

यह कसम थी।

शब्दों में नहीं — रक्त में।

जंगल में।

जब सब शांत हो गया।

अर्जुन एक चट्टान पर बैठ गया।

उसके शरीर पर कई घाव थे जो धीरे-धीरे सिकुड़ रहे थे। थकान थी — वह प्रकार की थकान जो केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन के उस हिस्से से आती है जो खतरे में अत्यधिक सचेत रहता है।

उसने आँखें बंद कीं।

वर्षा फिर शुरू हो गई थी। बूँदें पत्तों से टकरा रही थीं — वही निरंतर संगीत जो उसके आने पर था।

उसने अपने भीतर देखा।

मूलाधार के नीचे, उस जगह जहाँ ऊर्जा का मूल था — एक शांत ज्योति थी। वह हमेशा से थी। लेकिन आज पहली बार उसने उसे इतने स्पष्ट रूप से देखा था।

और उस ज्योति के चारों ओर — एक बेड़ा था।

एक अदृश्य सीमा।

जिसे उसे स्वयं बनाना था।

ताकि शक्ति उसकी सेवक हो — स्वामी नहीं।

यही साधना है।

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

जंगल अभी भी रहस्यमय था। खतरे अभी भी थे। मेघरस लता थैले में थी — लेकिन वनस्पतियों की सूची अभी लंबी थी।

पंद्रह दिन।

कार्य अधूरा था।

और कहीं दूर — एक बुझी लौ के सामने बैठे एक वृद्ध व्यक्ति ने उसके विरुद्ध एक अटल संकल्प ले लिया था।

अर्जुन उठा।

उसने कंधे सीधे किए।

थैला उठाया।

और वह वज्रवृष्टि के घने जंगलों तथा गहरे अंधकार की ओर बढ़ गया।

राजऋषि भानुदेव ने जब बुझी लौ के सामने से उठे, तब उनके कक्ष में कोई नहीं था।

कोई था भी नहीं होना चाहिए।

जो कार्य वे करने वाले थे — वह साक्षियों के लिए नहीं था।

उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। एक श्वास ली — लंबी, गहरी, उस प्रकार की जो फेफड़ों तक नहीं, बल्कि प्राण के केंद्र तक जाती है। उनके शरीर के चारों ओर की वायु धीरे-धीरे बदलने लगी। कक्ष में जलते दीपकों की लौ एकाएक पीली पड़ गई — जैसे उनके आसपास की समस्त ऊर्जा किसी अदृश्य चुंबक की ओर खिंचने लगी हो।

भानुदेव ने अपनी दाहिनी मुट्ठी बंद की।

और फिर खोली।

हथेली पर कुछ नहीं था — दिखने में।

लेकिन उनकी उँगलियों के बीच से एक बारीक सी कंपन उठ रही थी। वायु का नहीं — शून्य का। उस रिक्तता का जो हर वस्तु के बीच में होती है, जो हर स्थान को एक-दूसरे से जोड़ती और एक-दूसरे से अलग करती है।

सप्त चक्र साधना का वह स्तर जहाँ भानुदेव खड़े थे — वहाँ शरीर केवल शरीर नहीं रहता।

वह दिशा बन जाता है।

वह आज्ञा बन जाता है।

उन्होंने अपनी हथेली ऊपर की ओर उठाई — छत की ओर, आकाश की ओर — और फिर एक तीखे, निर्मम झटके से उसे बाईं ओर मोड़ा।

जैसे किसी ने एक चादर को पकड़कर फाड़ दिया हो।

वैसे ही — आकाश फटा।

कक्ष की छत से लेकर बाहर के ऊपर तक — एक रेखा खिंच गई। वह रेखा प्रकाश की नहीं थी, अंधकार की भी नहीं थी — वह उस रंग की थी जो दोनों के बीच होता है। दरार के किनारों पर वायु के टुकड़े काँच की भाँति टूटकर लटक गए — स्थिर, पारदर्शी, और असंभव रूप से वास्तविक।

शीशे की तरह।

आकाश के शीशे के टुकड़े।

भानुदेव उस दरार में समा गए।

और कक्ष खाली हो गया।

वज्रवृष्टि जंगल के भीतर।

अर्जुन अभी भी चल रहा था।

पांचो हत्यारों को छोड़ने के बाद उसने कोई समय व्यर्थ नहीं किया था। उसे पता था कि जो हाथ उन्हें भेजने वाले थे, वे हाथ अभी भी सक्रिय होंगे। जंगल के भीतर की वनस्पतियाँ उसे मिलती जा रही थीं — यहाँ एक जड़, वहाँ एक पत्ती — और वह एक-एक को सावधानी से थैले में रखता जाता था।

लेकिन उसकी चेतना बँटी हुई थी।

आधी वनस्पतियों पर। आधी आसपास पर।

वन का स्वभाव उसे अब थोड़ा समझ में आने लगा था। यहाँ के पक्षी एक विशेष ताल में बोलते थे — और जब वह ताल टूटती थी, तो उसका अर्थ होता था कि कुछ आ रहा है। जब पत्तियाँ एक विशेष दिशा में काँपती थीं, तो वायु का प्रवाह उलटा हो रहा होता था — जो किसी बड़ी ऊर्जा के हस्तक्षेप का संकेत था।

अभी तक सब ठीक था।

अभी तक।

फिर एक क्षण आया — और सब बदल गया।

पक्षी चुप हो गए।

पत्तियाँ हिलनी बंद हो गईं।

वायु रुक गई।

यह वह शांति नहीं थी जो हत्यारों के आने से पहले थी। वह शांति एक शिकारी की थी — सतर्क, निर्देशित।

यह शांति किसी और प्रकार की थी।

यह उस शांति जैसी थी जो तूफान के एकदम केंद्र में होती है।

अर्जुन के पैर अपने आप रुक गए।

उसने अपनी चेतना को पूरी शक्ति से बाहर फेंका — वह विस्तार जो उसे आसपास का चित्र देता था।

और जो उसे मिला, उसने उसका हृदय एक पल के लिए ठहरा दिया।

कुछ आ रहा था।

ऊपर से।

आकाश से।

लेकिन यह कोई साधारण उड़ान नहीं थी। जो ऊर्जा वह महसूस कर रहा था — उसका कोई आकार नहीं था, कोई किनारा नहीं था। वह एक तरंग की तरह थी जो हर दिशा में फैल रही थी, और उसके केंद्र में जो था — वह अर्जुन की समझ से परे था।

यह इंसान है?

और फिर — दरार।

आकाश में।

अर्जुन ने ऊपर देखा। वन के पेड़ों की शाखाओं के बीच से जो आकाश दिखता था, उसमें एक रेखा खिंच गई — वैसे ही जैसे किसी ने काँच पर नाखून से खरोंचा हो। रेखा के किनारों पर प्रकाश के वे अजीब टुकड़े लटके — पारदर्शी, ठहरे हुए, जैसे समय वहाँ एक पल के लिए जम गया हो।

और उस दरार से एक व्यक्ति उतरा।

वृद्ध।

श्वेत वस्त्र।

चेहरे पर वह शांति जो क्रोध से भी अधिक भयानक होती है।

भानुदेव के पैर जब भूमि पर पड़े, तो जंगल की समस्त वनस्पति एक क्षण के लिए झुकी — जैसे वन ने स्वयं उन्हें प्रणाम किया हो।

और ऊपर, आकाश में, वह दरार धीरे-धीरे बंद हो गई।

काँच के टुकड़े हवा में घुल गए।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

भानुदेव की आँखें अर्जुन पर पड़ीं।

और अर्जुन ने उस दृष्टि को अनुभव किया।

वह कोई साधारण दृष्टि नहीं थी। उसमें वह भार था जो दशकों की साधना, वर्षों के अभ्यास और अनेक युद्धों के अनुभव से आता है। वह दृष्टि किसी को परखती नहीं थी — वह जान लेती थी।

"बालक," भानुदेव ने कहा।

उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। वन में गूँजी भी नहीं। लेकिन अर्जुन ने उसे अपनी हड्डियों तक महसूस किया।

"मेरे परिवार ने जो गँवाया, उसे लौटाना तुम्हारे वश में नहीं है। लेकिन जो तुमने किया, उसकी कीमत तो चुकाओगे ही।"

अर्जुन एक पल खड़ा रहा।

उसके मन में कई विचार एक साथ आए।

यह कौन है? सप्त चक्र — इनका कौन सा चक्र जागृत है? क्या मैं इनसे लड़ सकता हूँ?

उत्तर तुरंत आए।

पहले का उत्तर — अभी नहीं पता। दूसरे का — कम से कम छठा, शायद सातवाँ। तीसरे का — नहीं।

नहीं।

स्पष्ट, निर्मम, बिना किसी संदेह के — नहीं।

मूलाधार चक्र के प्रारंभिक चरण में खड़ा एक साधक और सप्त चक्र का एक राजऋषि — यह युद्ध नहीं था। यह वधस्थल था।

अर्जुन को यह क्षण में समझ आया।

और उसी क्षण में उसने निर्णय लिया।

वह मुड़ा।

और भागा।

वन के भीतर भागना एक कला है।

साधारण भाग-दौड़ नहीं — जहाँ केवल पैर काम करते हैं। वन के भीतर भागना वह होता है जहाँ पूरा शरीर सोचता है। जड़ें, शाखाएँ, पत्थर, दलदल — हर अवरोध एक नई गणना माँगता है।

अर्जुन ने यह कला पिछले कुछ महीनों में सीखी थी। आश्रम के जंगल में प्रातःकाल के अभ्यास सत्रों में।

लेकिन वह पर्याप्त नहीं था।

उसके पीछे जो था, वह इस वन के नियमों से बँधा नहीं था।

भानुदेव चले — और यही उनकी गति थी।

चलना।

लेकिन वह चलना ऐसा था जैसे स्थान स्वयं उनके लिए सिकुड़ जाता हो। जहाँ अर्जुन दस कदम भागता, वहाँ भानुदेव एक कदम में पहुँच जाते। दोनों के बीच की दूरी — जो पहले एक बड़े वृक्ष जितनी थी — धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

भानुदेव का चेहरा शांत था।

क्रोध नहीं। उत्तेजना नहीं।

केवल एक निर्णय — जो हो चुका था और जिसे बदला नहीं जाना था।

यह देखकर अर्जुन के पेट में एक ठंडी सिहरन उठी।

क्रोधित शत्रु से बचा जा सकता है — उसकी गलतियों का लाभ उठाकर। लेकिन शांत शत्रु से बचना कठिन होता है। वह गलतियाँ नहीं करता।

अर्जुन ने गति बढ़ाई।

उसकी चेतना अब दो काम एक साथ कर रही थी — रास्ता देखना, और उपाय खोजना।

उसके पास शक्ति थी — हाँ। लेकिन वह कच्ची थी, अनियंत्रित थी। अभी के युद्ध में उसने उसे थोड़ा साधा था — लेकिन थोड़ा ही। एक नदी को मोड़ने के लिए बाँध चाहिए, और बाँध बनाने के लिए समय चाहिए।

समय।

वही एक चीज़ जो उसके पास नहीं थी।

एक विशाल वृक्ष के पास से गुज़रते हुए अर्जुन ने अचानक दाईं ओर मोड़ लिया। एक पतली झाड़ी के बीच से कूदा, एक पथरीली ढलान से नीचे उतरा, और एक पतली धारा को छलाँग लगाकर पार किया।

पीछे मुड़कर देखा।

भानुदेव वहीं थे।

उतनी ही दूरी।

कम होती हुई दूरी।

"भागने में ऊर्जा व्यर्थ मत करो," उनकी आवाज़ आई — शांत, जैसे वे सामान्य वार्तालाप कर रहे हों। "जो होना है, वह होगा।"

नहीं।

अर्जुन के मन में यही एक शब्द था।

नहीं।

वह आज नहीं मरेगा।

वह अभी बहुत कुछ करना चाहता था। यह जन्म अभी शुरू हुआ था। यह साधना-पथ अभी आरंभ हुआ था। और वह संकल्प — जो उसने इस जन्म में लिया था, जो पिछले जन्म की स्मृतियों की भट्टी में पका था — वह अभी पूरा नहीं हुआ था।

वह भागता रहा।

दो प्रहर।

दो प्रहर तक अर्जुन वन के भीतर भागता रहा।

उसके पैर थक गए थे। उसकी साँस असमान थी। शरीर पर जो घाव पहले भरे थे, उनमें से कुछ पुनः खुल गए थे — इतनी दौड़ में।

लेकिन सबसे भारी थकान मन की थी।

वह जानता था कि यूँ भागते रहना समाधान नहीं था। भानुदेव थकते नहीं थे — यह स्पष्ट था। सप्त चक्र की साधना के उस स्तर पर शरीर की सीमाएँ साधारण नहीं रहतीं। वे घंटों तक, शायद दिनों तक, इसी गति से चल सकते थे।

अर्जुन नहीं।

उसे एक विकल्प चाहिए था।

एक ऐसा स्थान जहाँ भानुदेव की शक्ति से भी बड़ी कोई बाधा हो।

उसने अपनी स्मृति खंगाली।

कार्य-पट्टे पर लिखा था — वज्रवृष्टि अरण्य: खतरनाक पशु, राक्षसी उपस्थिति और अप्रकट रहस्य।

आश्रम में जब इस जंगल के बारे में बात होती थी, तो वरिष्ठ छात्र एक बात हमेशा कहते थे।

"वन के बाहरी भाग में जाओ। भीतरी भाग में मत जाना। जो गए, कम ही लौटे।"

वन का भीतरी भाग।

मृत्यु का क्षेत्र।

अर्जुन ने एक पल सोचा।

भानुदेव उसे मार देंगे — यह निश्चित था, यदि वे पकड़ लें।

वन का भीतरी भाग उसे मार सकता था — यह संभव था।

निश्चित और संभव के बीच — संभव में जीने की गुंजाइश थी।

निर्णय हो गया।

वन का भीतरी भाग वहाँ से अधिक दूर नहीं था।

अर्जुन जानता था क्योंकि उसने महसूस किया था — पिछले दो प्रहरों में जैसे-जैसे वह भागता रहा, वातावरण बदलता गया था। पेड़ और घने हो गए थे। वर्षा और तेज़ हो गई थी। बिजलियाँ — जो बाहर मेघों के भीतर कौंधती थीं — यहाँ पेड़ों के बीच से गुज़रती थीं, मानो वे भी वन का हिस्सा हों।

और एक सीमा थी।

अदृश्य, लेकिन अनुभव में स्पष्ट।

जैसे हवा का तापमान एकाएक बदल गया हो। जैसे ध्वनि का स्वभाव बदल गया हो। जैसे आगे की भूमि पर चलने से पहले कुछ भीतर से रोके — आगे मत जाओ।

यह वह रेखा थी।

बाहरी और भीतरी वन के बीच की।

अर्जुन ने उस रेखा को देखा। उसने एक पल रुककर पीछे झाँका।

भानुदेव आ रहे थे।

अब दूरी बहुत कम थी।

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

ठीक है।

और वह उस रेखा के पार चला गया।

भीतर आते ही जो बदलाव हुआ, वह बाहरी नहीं था।

वायुमंडल में कोई नाटकीय परिवर्तन नहीं था — आकाश नहीं फटा, कोई विशाल जीव नहीं आया।

परिवर्तन था — अनुभव में।

अर्जुन की चेतना — वह जो वह बाहर फैलाता था — एकाएक भारी हो गई। जैसे उसे किसी ने दबाया हो। जैसे कोई बहुत बड़ा दबाव हो जो हर दिशा से आ रहा हो।

यह किसी एक जीव की उपस्थिति नहीं थी।

यह वन की उपस्थिति थी।

समग्र, एकत्रित, जागृत।

वज्रवृष्टि अरण्य का भीतरी भाग जीवित था — और इस जीवन का अपना एक चेतन था। एक ऐसी चेतना जो यह निर्धारित करती थी कि कौन इस भूमि पर खड़े रहने के योग्य है।

अर्जुन ने पैर जमाए।

वन ने उसे महसूस किया।

एक पल — जैसे कोई माप रहा हो।

फिर वह दबाव थोड़ा हल्का हुआ।

ठीक है। तुम आ सकते हो।

यह शब्दों में नहीं था। लेकिन था।

अर्जुन ने साँस छोड़ी।

और तभी — पीछे से एक आवाज़।

भानुदेव।

वे उस रेखा पर रुक गए थे।

अर्जुन ने मुड़कर देखा।

भानुदेव खड़े थे — उस सीमा पर, ठीक उस जगह जहाँ से अर्जुन ने कदम रखा था। उनके चेहरे पर पहली बार एक भाव था जो पहले नहीं था।

सतर्कता।

वे भीतर नहीं आए।

वह एक पल के लिए अर्जुन पर अपनी दृष्टि टिकाए रहे।

"चतुर हो," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में अब भी वही शांति थी, लेकिन उसके नीचे कुछ था — एक स्वीकृति, कि इस बालक ने उन्हें एक ऐसी जगह ले जाया जहाँ वे नहीं जाना चाहते थे।

"लेकिन यह जंगल तुम्हें बचाएगा नहीं। यह जंगल तुम्हें खाएगा।"

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

भानुदेव ने एक और पल उसे देखा। फिर धीरे-धीरे पीछे हटे।

"प्रतीक्षा करूँगा," उन्होंने कहा। "बाहर।"

और वे वन में — बाहर की ओर — चले गए।

जाते-जाते उन्होंने एक बात और कही, जो अर्जुन के कानों तक आई — शायद उनका इरादा था कि आए।

"यदि यह जंगल तुम्हें नहीं खाता — तो मैं खाऊँगा।"

अर्जुन वहीं खड़ा रहा जब तक कि भानुदेव की उपस्थिति की वह लहर पूरी तरह शांत नहीं हो गई।

फिर उसकी टाँगें जवाब दे गईं।

वह एक पुराने, विशाल वृक्ष की जड़ों के बीच बैठ गया — वे जड़ें इतनी बड़ी थीं कि तीन व्यक्ति उनके बीच आराम से छुप सकते थे। वर्षा यहाँ भी थी, लेकिन पत्तियों का आवरण इतना घना था कि अधिकांश बूँदें ऊपर ही रुक जाती थीं।

उसने अपने थैले को सामने रखा। उसमें मेघरस लता थी, और कुछ अन्य छोटी जड़ी-बूटियाँ जो उसने रास्ते में इकट्ठी की थीं।

उसके शरीर पर घाव थे।

उसकी माँसपेशियाँ अकड़ रही थीं।

उसका पेट खाली था — आखिरी बार उसने प्रातःकाल खाया था।

लेकिन यह सब उसे बाद में सोचना था।

अभी — वह सोच रहा था।

भानुदेव।

यह नाम मैंने पहले नहीं सुना। लेकिन उनकी शक्ति — सप्त चक्र। कम से कम छठा। शायद सातवाँ।

सप्त चक्र साधना की व्याख्या वेदाश्रम के ग्रंथों में थी — और अर्जुन ने उन्हें ध्यान से पढ़ा था।

प्रथम चक्र — मूलाधार। शरीर की आधारशक्ति। जिसे अर्जुन ने अभी-अभी स्पर्श किया था। द्वितीय — स्वाधिष्ठान। जल और भावना का केंद्र। तृतीय — मणिपुर। अग्नि। इच्छाशक्ति। चतुर्थ — अनाहत। वायु। प्रेम और करुणा — लेकिन युद्ध में यह केंद्र ऊर्जा का ऐसा स्तर खोलता था जो तृतीय से दस गुना अधिक था। पंचम — विशुद्ध। आकाश। ध्वनि और सत्य। षष्ठ — आज्ञा। वह स्तर जहाँ साधक स्थान और दिशा को मोड़ सकता है।

और जो भानुदेव ने किया — आकाश फाड़ना — वह आज्ञा चक्र का कार्य था।

तो भानुदेव षष्ठ स्तर पर थे।

या उससे आगे।

और अर्जुन प्रथम स्तर पर।

पाँच चरण का अंतर।

इतने समय में कोई बराबरी नहीं कर सकता।

लेकिन — उसने वह विचार पकड़ा जो उसे उस लड़ाई में आया था — बराबरी की आवश्यकता नहीं है।

बचना है। और बढ़ना है।

वन के भीतरी भाग में कुछ ऐसा था जो उसे महसूस हो रहा था — वह दबाव जो पहले था, वह अभी भी था, लेकिन अब उसमें एक अलग गुण था। जैसे कोई परीक्षा हो रही हो।

और अर्जुन — जिसने इस जंगल में कदम रखने का निर्णय अपनी इच्छा से लिया था — उसे यह परीक्षा देनी थी।

उसने आँखें बंद कीं।

वर्षा की आवाज़ थी।

विशाल वृक्ष की जड़ों में उसकी पीठ टिकी थी।

और भीतरी वन की वह विशाल, गहरी, अतल चेतना — उसके चारों ओर थी।

ठीक है,अर्जुन ने मन में कहा। मैं यहाँ हूँ। और मैं जाना नहीं चाहता — न बाहर, जहाँ भानुदेव प्रतीक्षा कर रहे हैं, और न वहाँ जहाँ से कोई नहीं लौटता।

मुझे यहाँ टिकना है।

मुझे यहाँ बढ़ना है।

और जब मैं बाहर निकलूँगा — तब वह होऊँगा जो आज नहीं हूँ।

वन ने सुना।

कहीं दूर — बहुत गहराई में — एक ध्वनि उठी। न पशु की, न वायु की। वह ध्वनि उस प्रकार की थी जो तब होती है जब दो चेतनाएँ पहली बार एक-दूसरे को पहचानती हैं।

अर्जुन की आँखें खुलीं।

वह उठा।

थैला उठाया।

और भीतरी वन में — और गहरे — चला गया।

बाहर, उस सीमा पर, जहाँ भीतर और बाहर का संधिस्थल था — भानुदेव बैठे थे। उनकी आँखें बंद थीं। उनकी साँसें स्थिर थीं।

वे प्रतीक्षा में थे।

एक ऐसी प्रतीक्षा जिसमें न अधीरता थी, न संदेह।

केवल वह दृढ़ता — जो वर्षों की साधना से आती है, और जो किसी बालक के भाग जाने से नहीं हिलती।

ऊपर आकाश में।

वह काला कौवा अभी भी उड़ रहा था।

लेकिन अब वह भीतरी वन की सीमा के ऊपर नहीं उड़ सका।

वहाँ कुछ था जिसने उसे रोक दिया।

कौवे ने एक बार चक्कर लगाया।

फिर वापस मुड़ गया।

और उसकी आँखों में — वे ज्वाला-नेत्र — एक पल के लिए कुछ बुझे।

जैसे संपर्क टूट गया हो।

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