माधवी के चले जाने के बाद कमरे में फिर से वही निस्तब्धता उतर आई, पर अब वह निस्तब्धता स्थिर नहीं थी। हवा में जैसे कोई अदृश्य तरंगें तैर रही थीं। दीपक की लौ बहुत धीमी हो चुकी थी, और उसकी काँपती हुई छाया दीवारों पर लंबी आकृतियाँ बना रही थी।
रूद्र… नहीं, अब वह स्वयं को भीतर से अर्जुन ही पुकार रहा था—पर उसके भीतर का संकल्प किसी रुद्र-तत्व की भाँति जाग चुका था।
वह फिर से पद्मासन में बैठ गया।
श्वास भीतर… श्वास बाहर…
उसने अपनी चेतना टूटी हुई नाड़ियों की ओर केंद्रित की। पुराने मार्गों के अवशेष अब केवल राख जैसे थे। उसने उन पर ध्यान न देकर नई संरचना पर ध्यान केंद्रित किया। पतली ऊर्जा-रेखा जो उसने मूलाधार के समीप बनाई थी, अब थोड़ी स्थिर हो चुकी थी। वह काली जड़—स्वर्गीय ज्वाला का सूक्ष्म अंश—अभी भी गहराई में शांत पड़ा था, जैसे देख रहा हो कि यह मानव उसे पुकारेगा या नहीं।
उसने अपनी ही प्राणशक्ति को संकेंद्रित किया। धीरे-धीरे उसने एक वृत्ताकार संरचना गढ़नी शुरू की—मूलाधार के आसपास एक नया चक्र, जो पुरानी नाड़ियों से स्वतंत्र हो। यह मार्ग कठिन था। हर क्षण दर्द की लहर उठती, जैसे भीतर की नसें फिर से खिंच रही हों।
पर वह रुका नहीं।
धीरे-धीरे उसकी देह के चारों ओर हल्की-सी पारदर्शी तरंग बनने लगी। यदि कोई साधारण व्यक्ति वहाँ होता, तो उसे केवल हवा का कंपन महसूस होता। पर किसी साधक के लिए यह स्पष्ट था—नई नाड़ी संरचना सक्रिय हो रही थी।
और तभी…
खिड़की के बाहर एक अत्यंत सूक्ष्म सरसराहट हुई।
अर्जुन की चेतना तुरंत बाहर फैल गई।
तीन… नहीं, चार उपस्थिति।
वे छिपे हुए थे, पर पूरी तरह नहीं। उनके भीतर की ऊर्जा में लोभ की गंध थी—अस्थिर, लालची, असंतुलित।
“तो यह पहला कदम है,” अर्जुन ने सोचा।
अचानक दरवाजे पर तेज प्रहार हुआ।
किवाड़ टूटकर भीतर गिरा।
चार छायाएँ कमरे में घुस आईं। उनके चेहरे कपड़े से ढँके थे, पर उनकी चाल और ऊर्जा से स्पष्ट था—वे गुरुकुल के ही विद्यार्थी थे। उनके हाथों में साधारण अस्त्र थे—लकड़ी के दंड, एक के पास छोटी तलवार, और दूसरे के पास विष-मिश्रित सूईयाँ।
“शांतिपूर्वक चलो हमारे साथ,” एक ने धीमी, पर कठोर आवाज़ में कहा, “तो तुम्हें कम कष्ट होगा।”
अर्जुन धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
“गुरुकुल में आधी रात को इस प्रकार?” उसकी आवाज़ स्थिर थी।
“बहुत प्रश्न मत पूछो।”
दूसरे ने आगे बढ़ते हुए कहा, “हमें केवल तुम्हें घायल करना है। जीवित रहोगे।”
अर्जुन ने उनकी ऊर्जा को परखा।
उनकी साधना तीसरे या चौथे स्तर से अधिक नहीं थी। पर वे एक साथ आक्रमण करने वाले थे। पुरानी नाड़ियों के साथ वह शायद संघर्ष करता… पर अब—
पहला दंड उसकी ओर बढ़ा।
अर्जुन ने श्वास भीतर खींची।
नई नाड़ी संरचना सक्रिय हुई।
मूलाधार से उठी ऊर्जा सीधी रीढ़ के मध्य तक गई—पर पुराने मार्ग से नहीं। उसने स्वयं का बनाया हुआ नया सूक्ष्म मार्ग अपनाया। ऊर्जा तेज थी, पर नियंत्रित। उसके हाथ ने दंड को बीच में पकड़ लिया।
प्रहार की शक्ति उसके भीतर समा गई—और तुरंत लौट गई।
पहला आक्रमणकारी पीछे उछल गया, जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकराया हो।
“यह क्या—?” दूसरे ने तलवार चलाई।
इस बार अर्जुन ने कदम नहीं हटाया। उसने अपनी हथेली से तलवार के सपाट भाग को स्पर्श किया। नई नाड़ी से निकली ऊर्जा ने तलवार को कंपा दिया। धातु में दरार-सी पड़ गई। आक्रमणकारी के हाथ सुन्न हो गए।
तीसरा और चौथा एक साथ झपटे।
अर्जुन ने अपनी नई संरचना का दूसरा प्रवाह सक्रिय किया। ऊर्जा अब केवल रक्षा नहीं कर रही थी—वह धक्का दे रही थी। एक वृत्ताकार तरंग उसके चारों ओर फैली।
चारों विद्यार्थी दीवारों से टकरा गए।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्जुन स्वयं भी एक क्षण के लिए स्थिर रह गया। उसकी नई नाड़ी संरचना ने अपेक्षा से अधिक सुगमता से काम किया था। दर्द कम था। प्रवाह स्थिर था।
“तो यह संभव है…” उसने मन ही मन सोचा।
वह धीरे-धीरे उनके पास गया।
एक का कंधा उतर चुका था। दूसरे की कलाई मुड़ गई थी। तीसरे के सीने पर आघात का निशान था। चौथा अभी भी साँस सँभाल रहा था।
“तुम लोग,” अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “गुरुकुल के ही विद्यार्थी हो। फिर यह?”
पहले ने दाँत भींचे। “हमें छोड़ दो…”
“मैंने अभी तक तुम्हारी हत्या नहीं की है,” अर्जुन ने ठंडे स्वर में कहा, “और न करूँगा। पर उत्तर दोगे।”
कुछ क्षण का मौन।
फिर चौथे ने, जो सबसे कम घायल था, धीरे से कहा, “वीरेंद्र…”
अर्जुन की आँखें स्थिर हो गईं।
“उसके परिवार ने हमें प्रस्ताव दिया। सोने के सिक्के… दुर्लभ औषधियाँ… उन्नत गोलियाँ। उन्होंने कहा, बस तुम्हें कमजोर करना है। ताकि अगला आक्रमण सरल हो।”
“और तुमने स्वीकार कर लिया,” अर्जुन ने कहा।
“हमारे पास संसाधन नहीं हैं,” दूसरे ने कराहते हुए कहा, “उच्च स्तर की साधना के लिए औषधियाँ चाहिए। हमारे कुल निर्धन हैं। उन्होंने जो वादा किया… वह अस्वीकार करना कठिन था।”
अर्जुन कुछ क्षण उन्हें देखता रहा।
“तो तुमने अपने ही गुरुकुल के एक विद्यार्थी को बेच दिया।”
उनमें से कोई उत्तर न दे सका।
अर्जुन झुका। उसने उनके थैलों की जाँच की। भीतर औषधियाँ थीं—उन्नत जड़ी-बूटियाँ, ऊर्जा-वर्धक गोलियाँ, और कुछ दुर्लभ उपचारक रस।
उसने सब निकाल लिया।
“ये अब मेरे हैं,” उसने शांत स्वर में कहा।
“पर—” एक ने विरोध करना चाहा।
अर्जुन की दृष्टि उस पर पड़ी। वह चुप हो गया।
“मैं तुम्हें जीवित छोड़ रहा हूँ,” उसने निर्विकार स्वर में कहा, “क्योंकि गुरुकुल के नियम हत्या की अनुमति नहीं देते। जाओ… और वीरेंद्र के परिवार से कह देना—अगली बार सोने के सिक्के कुछ अधिक लेकर आएँ।”
चारों लड़खड़ाते हुए उठे। किसी ने प्रतिरोध नहीं किया। वे जैसे-तैसे कमरे से बाहर निकल गए।
दरवाजा टूटा पड़ा था। हवा भीतर आ रही थी।
अर्जुन ने एक गहरी श्वास ली।
नई नाड़ी संरचना में हल्की-सी थकान थी, पर स्थिरता भी थी। उसने महसूस किया—प्रवाह पहले से अधिक सुगम हो रहा है। जैसे शरीर स्वयं नए मार्ग को स्वीकार कर रहा हो।
उसने औषधियाँ एक ओर रखीं।
“तो यह पहला प्रहार था,” उसने सोचा। “वे सीधे नहीं आएँगे। पहले मुझे थकाएँगे। कमजोर करेंगे।”
पर अब वह पहले जैसा नहीं था।
उसी समय—
गुरुकुल के दूसरे छोर पर, आचार्य ध्रुव ध्यान में थे।
अचानक उनकी भौंहें सिकुड़ीं।
ऊर्जा में एक तीव्र कंपन उठा था—क्षणिक, पर स्पष्ट। फिर तुरंत स्थिरता।
उन्होंने अपनी चेतना उस दिशा में फैलाई।
“संघर्ष…” उन्होंने मन ही मन कहा।
उन्हें रक्तपात की गंध नहीं मिली। केवल आघात और ऊर्जा का तीव्र विस्फोट। और उस विस्फोट में कुछ और भी था—नई संरचना की स्पष्ट छाप।
“उसने प्रयोग कर लिया,” आचार्य ध्रुव की आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
वे उठे नहीं। हस्तक्षेप भी नहीं किया।
उनकी दृष्टि गंभीर हो गई।
“बालक… तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह तुम्हें साधारण योद्धा नहीं रहने देगा।”
उन्होंने दूर आकाश की ओर देखा।
“वीरेंद्र का परिवार… तुमने गलत लक्ष्य चुना है।”
उधर अर्जुन अपने कमरे में टूटा दरवाजा देख रहा था।
रात अभी शेष थी।
उसने दीपक को फिर से प्रज्वलित किया।
फिर वह वापस पद्मासन में बैठ गया।
“अब वे जान चुके हैं,” उसने सोचा।
उसकी नई नाड़ी संरचना फिर से सक्रिय हुई—धीमी, स्थिर, और पहले से अधिक दृढ़।
यह केवल शुरुआत थी।
_ रात के उस गुप्त संघर्ष के बाद सब कुछ ऊपर से सामान्य दिखाई दे रहा था।
सूर्य प्रतिदिन की तरह उगा। शंखध्वनि हुई। छात्र अपने-अपने अभ्यास क्षेत्र में पहुँचे। आचार्य अपने मंडपों में स्थित हुए। औषधि-गृह में भीड़ लगी रही। और अर्जुन… वह भी अपने कर्तव्यों में उपस्थित था।
परंतु परिवर्तन आरम्भ हो चुका था।
पहले दिन उसे लगा कि यह केवल संयोग है।
जब वह अभ्यास-भूमि पर पहुँचा, तो जिन विद्यार्थियों के साथ वह प्रतिदिन दंड-युद्ध का अभ्यास करता था, वे उससे दृष्टि चुराने लगे। एक ने कहा, “आज मैं अन्य समूह के साथ हूँ।” दूसरा बिना उत्तर दिए दूर हट गया।
उसने कुछ नहीं कहा।
दूसरे दिन भोजन-गृह में उसके बैठते ही सामने बैठे तीन विद्यार्थी उठकर चले गए। एक ने जाते-जाते धीमे स्वर में कहा, “अलग बैठो।”
अर्जुन ने थाली में रखा अन्न शांत भाव से खाया। पर उसके भीतर एक सूक्ष्म ठंडक उतर गई।
तीसरे दिन यह स्पष्ट हो गया कि यह संयोग नहीं है।
जब वह जलाशय के समीप ध्यान करने बैठा, तो दो कनिष्ठ विद्यार्थी आपस में फुसफुसा रहे थे—
“वही है…”
“कहते हैं उसने निषिद्ध ऊर्जा छू ली है।”
“इसीलिए वीरेंद्र की हड्डियाँ उस तरह टूटीं।”
“आचार्य उसे छिपा रहे हैं…”
शब्द हवा में तैर रहे थे।
अर्जुन ने आँखें नहीं खोलीं, पर उसके भीतर हल्की-सी मुस्कान आई। अफवाह… यह अपेक्षित था।
वीरेंद्र का परिवार केवल बल प्रयोग नहीं करेगा। वे उसके नाम को कलंकित करेंगे। यदि गुरुकुल स्वयं उससे दूरी बना ले, तो अगला आक्रमण और सरल हो जाएगा।
दिन बीतते गए।
धीरे-धीरे उसके चारों ओर एक अदृश्य वृत्त बन गया—जिसके भीतर कोई प्रवेश नहीं करता था।
पाठ के समय यदि वह किसी प्रश्न का उत्तर देता, तो कुछ चेहरे उपहास से भर जाते। यदि वह मौन रहता, तो कहते—“देखो, अब छिप रहा है।”
एक दिन औषधि-गृह में जब वह जड़ी-बूटियाँ लेने पहुँचा, तो सेवक-शिष्य ने कहा, “आज भंडार सीमित है।”
पर उसी समय उसने देखा—पीछे खड़े अन्य विद्यार्थियों को वही औषधि बिना संकोच दी जा रही थी।
अर्जुन समझ गया।
यह सब योजनाबद्ध था।
उस रात जब वह अपने कक्ष में लौटा, तो दरवाजे के पास कोयले से लिखा हुआ शब्द मिला—
“निषिद्ध।”
वह कुछ क्षण उसे देखता रहा।
निषिद्ध ऊर्जा।
स्वर्गीय काली ज्वाला का नाम सीधे कोई नहीं ले रहा था, पर संकेत स्पष्ट थे। किसी ने देखा होगा। किसी ने अनुभव किया होगा। या शायद… केवल भय को हवा दी जा रही थी।
माधवी उससे दूरी बनाए हुए थी। वह पहले की तरह सीधे संवाद नहीं करती थी, पर उसकी दृष्टि कभी-कभी दूर से उसे परखती थी—जैसे वह सत्य जानना चाहती हो, पर सार्वजनिक रूप से उसके निकट आने का साहस नहीं कर रही हो।
रूद्र-तत्व उसके भीतर शांत नहीं था।
एक दिन अभ्यास-भूमि पर एक वरिष्ठ विद्यार्थी ने खुले शब्दों में कहा, “गुरुकुल में निषिद्ध साधना वर्जित है। जो उसे छुएगा, वह शापित होगा।”
दूसरे ने जोड़ा, “ऐसे व्यक्ति के साथ अभ्यास करना भी अशुभ है।”
कई दृष्टियाँ अर्जुन की ओर मुड़ीं।
अर्जुन ने केवल इतना कहा, “जिसे प्रमाण चाहिए, वह मेरे साथ अभ्यास कर सकता है।”
कोई आगे नहीं आया।
भीड़ में से धीमी आवाज़ आई, “हम देवताओं की ज्वाला से खेल नहीं सकते।”
यह शब्द सुनकर उसके भीतर की काली जड़ हल्का-सा स्पंदित हुई—जैसे उसे पुकारा गया हो।
उसने तुरंत अपनी चेतना भीतर खींच ली।
“नहीं,” उसने मन ही मन कहा, “मैं तुम्हारा उपयोग नहीं करूँगा।”
पर अफवाह अब केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं थी।
नगर में भी बातें फैलने लगीं।
“गुरुकुल में एक छात्र है जो निषिद्ध ऊर्जा साध रहा है।”
“कहते हैं उसकी नाड़ियों से काली आभा निकलती है।”
“वीरेंद्र का परिवार इसलिए क्रोधित है।”
भय हमेशा कथा को बढ़ा देता है।
कुछ कनिष्ठ विद्यार्थी जब उसे मार्ग में देखते, तो एक कदम पीछे हट जाते। कुछ आदर से नहीं, भय से सिर झुका लेते।
अलगाव पूर्ण हो चुका था।
उसके कक्ष के बाहर अब सन्नाटा अधिक रहता। टूटा हुआ दरवाजा बदल दिया गया था, पर कोई उसके पास रुकता नहीं था।
रात को जब वह साधना में बैठता, तो उसे अब बाहरी आक्रमण का भय नहीं था। पर भीतर एक नया प्रश्न उठता—
उसने अपनी नई नाड़ी संरचना को और सुदृढ़ करना आरम्भ किया। मूलाधार से उठती ऊर्जा अब स्थिर थी। उसने दूसरे केंद्र की रूपरेखा बनानी शुरू की—स्वाधिष्ठान के समीप। पर इस बार उसने सावधानी रखी। ऊर्जा का प्रवाह धीमा, संयमित।
उसे ज्ञात था—यदि उसने एक बार भी उस काली जड़ को सीधे सक्रिय किया, तो उसकी आभा में परिवर्तन स्पष्ट हो जाएगा। और तब अफवाह सत्य बन जाएगी।
उधर—
आचार्य ध्रुव सब देख रहे थे।
विद्यार्थियों की दूरी। भोजन-गृह की फुसफुसाहट। अभ्यास-भूमि का मौन।
उन्होंने अभी तक हस्तक्षेप नहीं किया।
एक संध्या उन्होंने अन्य आचार्यों से सामान्य वार्ता के बीच पूछा, “यदि कोई विद्यार्थी असाधारण मार्ग चुन ले, तो क्या उसे अलग कर देना उचित है?”
एक वृद्ध आचार्य ने कहा, “यदि मार्ग निषिद्ध हो, तो हाँ।”
दूसरे ने कहा, “पर यदि वह निषिद्ध केवल भय के कारण कहा गया हो?”
मौन छा गया।
ध्रुव ने आगे कुछ नहीं कहा।
उस रात उन्होंने ध्यान में अर्जुन की ऊर्जा को पुनः परखा।
वहाँ अंधकार था—पर अराजक नहीं। वह नियंत्रित था। जैसे कोई शिल्पकार काले पत्थर से मूर्ति गढ़ रहा हो।
“अफवाहें बढ़ेंगी,” ध्रुव ने सोचा। “और जब भीड़ किसी को शापित मान ले, तो सत्य की आवश्यकता नहीं रहती।”
उधर अर्जुन अपने कक्ष में बैठा था।
उसने मेज पर फैली औषधियाँ देखीं—वे जो उसने गुप्त आक्रमणकारियों से ली थीं। यही अब उसके संसाधन थे। कोई मित्र नहीं। कोई सहयोगी नहीं।
उसने एक गोली उठाई। उसे देखा। फिर वापस रख दी।
“मैं भिक्षुक नहीं हूँ,” उसने मन में कहा। “पर यदि वे मुझे निषिद्ध कहेंगे, तो मैं अपनी शक्ति से उत्तर दूँगा।”
खिड़की के बाहर से कुछ विद्यार्थियों की आवाज़ आई—
“उसे मत छुओ।”
“कहते हैं उसकी छाया भी अशुभ है।”
क्षणभर के लिए उसके भीतर क्रोध की लहर उठी। नई नाड़ी संरचना में ऊर्जा तेज हुई।
पर उसने श्वास रोकी। आँखें बंद कीं।
ऊर्जा फिर से स्थिर हो गई।
“अलगाव भी एक साधना है,” उसने स्वयं से कहा। “यदि देवत्व चाहिए, तो अकेलापन स्वीकार करना होगा।”
पर उसे यह ज्ञात नहीं था कि यह अलगाव केवल प्रारम्भ है।
क्योंकि अफवाहें जब जड़ पकड़ लेती हैं, तो या तो सत्य उन्हें काटता है… या रक्त।
रात गहरी हो रही थी।
गुरुकुल शांत था।
_ अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
बाहर से आती फुसफुसाहटें अब उसके लिए केवल ध्वनि थीं—अर्थहीन, खोखली। भीतर उसका मन अत्यंत स्पष्ट था। कुछ क्षण तक वह मौन बैठा रहा। विचार एक-एक कर सामने आए—वीरेंद्र की टूटी हड्डियाँ… गुप्त आक्रमण… अफवाहें… अलगाव… भय…
फिर अचानक उसके होंठों पर एक धीमी, तीखी मुस्कान उभरी।
“वीरेंद्र का परिवार अफवाहों का बड़ा शौक़ीन है…?” उसने मन ही मन कहा। “तो चलो… तुम्हें असली अफवाह का स्वाद चखाता हूँ।”
उसकी दृष्टि भीतर गई—उस गहरे अंधकार में जहाँ स्वर्गीय काली ज्वाला का सूक्ष्म अंश जड़ की तरह स्थित था। अब तक उसने उसे केवल आधार की तरह रखा था, छुआ नहीं था। परंतु वह जानता था—यदि वह चाहे, तो उसकी मात्र छाया भी पूरे गुरुकुल में हलचल मचा सकती है।
“अभी तक कोई नहीं जानता कि यह मेरे भीतर है,” उसने सोचा। “पर तुम लोगों को यह बात ‘पता’ है… है ना?”
उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
वह उठ खड़ा हुआ।
कमरे में दीपक की लौ स्थिर हो गई—जैसे हवा भी रुक गई हो। अर्जुन ने दोनों हथेलियाँ सामने रखीं। नई नाड़ी संरचना सक्रिय हुई। मूलाधार से ऊर्जा उठी—पर इस बार उसने उसे रोका नहीं। उसने उसे उस काली जड़ के समीप पहुँचने दिया… केवल छूने जितना।
बस एक स्पर्श।
अगले ही क्षण उसके भीतर एक गहन, घना कंपन उठा। वह ज्वाला भड़क कर बाहर नहीं आई—पर उसकी छाया, उसकी गंध, उसकी अनुभूति… नाड़ी मार्गों से होकर उसकी आभा में फैल गई।
कमरे का तापमान एक पल को गिरा… फिर बढ़ा।
दीवारों पर पड़ती छाया गहरी हो गई—मानो प्रकाश को निगल रही हो।
अर्जुन ने अपनी चेतना को स्थिर रखा। यदि वह नियंत्रण खो देता, तो सब कुछ भस्म हो सकता था। पर उसने केवल इतना किया—अपनी आभा को क्षणभर के लिए तीव्र कर दिया।
कमरे के बाहर से गुजर रहे दो विद्यार्थियों को अचानक रुकना पड़ा।
“तुमने महसूस किया?”
“यह… यह कैसी ऊर्जा है?”
उसी क्षण—
अर्जुन का शरीर धुँधला होने लगा।
न यह पूर्ण अदृश्यता थी, न सामान्य गति। उसने अपनी नई नाड़ी संरचना के प्रवाह को अत्यधिक तीव्र किया। ऊर्जा उसके पैरों तक पहुँची—फिर एक बिंदु में सिमट गई।
अगले ही पल— ___ अर्जुन ने अंतिम बार अपनी श्वास को भीतर रोका।
मूलाधार से उठती ऊर्जा उसकी नई नाड़ी संरचना में तीव्रता से प्रवाहित हुई। उसने स्वर्गीय काली ज्वाला को पूरी तरह मुक्त नहीं किया—केवल उसकी छाया को अपनी आभा के बाहरी आवरण में बुन दिया।
अगले ही क्षण—
वह अपनी जगह से विलीन हो गया।
न कोई ध्वनि। न कोई पदचिह्न। न कोई छाया।
कमरा खाली था।
पर पूरी तरह नहीं।
जहाँ वह कुछ क्षण पहले खड़ा था, वहाँ एक ज्योति जल रही थी—असामान्य, स्थिर, गहरी। वह न श्वेत थी, न पूर्णतः काली। वह ऐसी थी जैसे अंधकार के भीतर छिपा हुआ प्रकाश—धीमे-धीमे धधकता हुआ। वह भस्म नहीं कर रहा था, पर उसकी उपस्थिति साधारण नहीं थी।
वह उसकी आभा का प्रतीक था।
उस ज्योति में अर्जुन की ऊर्जा की छाप थी—इतनी स्पष्ट कि कोई भी संवेदनशील साधक उसे पहचान सकता था। ऐसा प्रतीत होता था मानो वह अभी भी कक्ष में ही ध्यानमग्न बैठा हो।
गुरुकुल में किसी को यह ज्ञात नहीं था कि अर्जुन वहाँ नहीं है।
सबको केवल वही ज्योति दिखेगी। सब उसी पर विश्वास करेंगे।
उसी समय—
अर्जुन गुरुकुल की सीमा से बहुत दूर निकल चुका था।
उसकी गति साधारण नहीं थी। नई नाड़ी संरचना ने उसके शरीर की सीमाएँ तोड़ दी थीं। ऊर्जा पैरों तक प्रवाहित होती, फिर एक विस्फोटक संकेंद्रण में बदलकर उसे आगे फेंक देती।
गुरुकुल से नगर की दूरी सामान्यतः छह घंटे की थी—घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ मार्ग, नदी की पतली धारा, और पहाड़ी ढलानें।
पर अर्जुन आधे घंटे में वह दूरी तय कर रहा था।
स्वर्गीय काली अग्नि की छाया उसकी नसों में ईंधन की तरह बह रही थी। उसने ज्वाला को मुक्त नहीं किया था, पर उसकी शक्ति को दिशा दी थी। उसकी देह हल्की हो गई थी—मानो वह धरती को छूकर नहीं, उसके ऊपर फिसल रहा हो।
जंगल में रात गहरी थी।
पेड़ों की ऊँची शाखाएँ आकाश को ढँक रही थीं। झींगुरों की आवाज़ें, दूर किसी जंगली पशु की गर्जना, और हवा में पत्तों की सरसराहट।
अर्जुन छाया की तरह आगे बढ़ रहा था।
उसके कदमों की ध्वनि नहीं थी। उसकी साँसें स्थिर थीं। उसकी आभा संकुचित थी।
नई नाड़ी संरचना का एक विशेष लाभ यह था—वह अपनी ऊर्जा को बाहर फैलाने के स्थान पर भीतर मोड़ सकता था। सामान्य साधक की आभा दूरी से महसूस की जा सकती थी, पर अर्जुन ने उसे सिमटा दिया था। काली ज्वाला की छाया ने उसकी उपस्थिति को ढँक लिया था—जैसे अंधकार स्वयं उसे निगल रहा हो।
कुछ ही समय में जंगल समाप्त हुआ।
दूर नगर की प्राचीर दिखाई दी—ऊँची दीवारें, मशालों की रेखाएँ, प्रहरी-स्तंभों पर जलते दीप, और घूमते हुए सैनिक।
नगर का प्रवेश-द्वार बंद था। रात का पहरा सख्त रहता था। ऊपर प्रहरी घूम रहे थे। कुछ सैनिक ऊर्जा-संवेदन में प्रशिक्षित थे—वे साधकों की आभा पहचान सकते थे।
अर्जुन रुका नहीं।
उसने अपनी ऊर्जा और संकुचित कर ली। स्वर्गीय काली अग्नि की छाया उसके चारों ओर धुँध की तरह फैल गई—पर केवल उतनी ही जितनी आवश्यक थी।
एक प्रहरी ने अचानक रुककर हवा को सूँघा।
“कुछ महसूस हुआ?” दूसरे ने पूछा।
पहले ने आँखें बंद कर क्षणभर ध्यान किया… फिर सिर हिला दिया।
“शायद भ्रम।”
उन्हें कुछ भी स्पष्ट नहीं मिला।
क्योंकि अर्जुन की आभा वहाँ थी ही नहीं—या यूँ कहें, वह इतनी गहरी परत में छिपी थी कि साधारण ऊर्जा-संवेदन उसे पकड़ नहीं सकता था।
वह दीवार के समीप पहुँचा।
नई नाड़ी संरचना सक्रिय हुई। पैरों में ऊर्जा का तीव्र संकेंद्रण हुआ। एक क्षण—और वह ऊपर की ओर उछला।
कोई आवाज़ नहीं।
वह दीवार के शीर्ष पर उतरा—छाया की तरह।
नीचे नगर फैला था—तंग गलियाँ, बंद बाजार, कुछ स्थानों पर जलती मशालें, और दूर एक बड़ा भवन जहाँ प्रहरी अधिक थे। संभवतः वहीं वीरेंद्र के परिवार के दूत ठहरे होंगे।
अर्जुन ने गहरी श्वास ली।
“अफवाह अब गुरुकुल में जल रही है,” उसने मन में कहा। “और मैं यहाँ हूँ… जहाँ खेल की असली बिसात बिछी है।”
वह दीवार से नीचे फिसला—अंधेरे को चीरता हुआ।
सैनिकों को कुछ पता नहीं चला। कोई चेतावनी नहीं बजी। कोई मशाल नहीं उठी।
अर्जुन नगर के भीतर था।
गुरुकुल में अभी भी उसकी आभा की ज्योति जल रही थी—सबको यही भ्रम दे रही थी कि वह वहीं है।
और यहाँ… रात के अंधेरे में, नगर की छायाओं के बीच, एक नई चाल चल दी गई थी।
अब शिकार कौन होगा— यह अभी किसी को ज्ञात नहीं था।
__ नगर की संकरी गलियों से निकलते हुए अर्जुन अंततः उस स्थान के सामने पहुँचा जिसे लोग “वीरेंद्र का घर” कहते थे।
घर।
उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ शब्द दोहराया।
वह घर नहीं था—वह एक लघु-महल था।
ऊँची दीवारें, संगमरमर के स्तंभ, द्वार पर स्वर्ण-जड़ित प्रतीक, चारों कोनों पर प्रहरी-स्तंभ, और भीतर-बाहर घूमते हुए सशस्त्र सैनिक। मुख्य द्वार पर दो भारी भालेधारी रक्षक खड़े थे। दीवारों के ऊपर मशालें जल रही थीं। आँगन के भीतर से घोड़ों की आहट और लोहे की झंकार सुनाई दे रही थी।
“तो यह है वह कुल… जो गुरुकुल में अफवाहें फैला रहा है,” अर्जुन ने मन में कहा।
उसकी आँखें शांत थीं।
वह जानता था—सीधे टकराना मूर्खता होगी। उसे युद्ध नहीं चाहिए था। उसे प्रमाण चाहिए था। ऐसा कुछ… जो इस कुल को भीतर से गिरा दे।
पिछले जन्म की स्मृतियाँ उसके भीतर हल्के-हल्के जागीं।
वह केवल साधक नहीं था—वह एक खलनायक रहा था। ऐसा जिसने कई राज्यों को भीतर से तोड़ा था। उसने सीखा था—सामर्थ्य तलवार से नहीं, रहस्यों से टूटता है। और जो जितना धनी होता है, उसके पाप उतने गहरे दफन होते हैं।
“सोना जितना चमकता है… कीचड़ उतना ही गहरा होता है,” उसने मन में दोहराया।
उसने अपनी आभा और भी सिमटा ली। स्वर्गीय काली अग्नि की छाया उसके चारों ओर एक अदृश्य आवरण बन गई। यह ज्वाला भड़कती नहीं थी—यह ढँकती थी।
वह मुख्य द्वार से नहीं गया।
महल की पश्चिमी दीवार के पीछे एक अंधेरा कोना था—जहाँ प्रकाश कम था और पहरा अपेक्षाकृत ढीला। दीवार चिकनी थी, पर अर्जुन के लिए वह बाधा नहीं थी।
नई नाड़ी संरचना सक्रिय हुई। ऊर्जा पैरों में संकेंद्रित हुई। वह बिना ध्वनि के ऊपर उठा और दीवार के किनारे पर स्थिर हो गया।
नीचे आँगन स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
सैनिक घूम रहे थे। कुछ सेवक भोजन ले जा रहे थे। बीच में एक फव्वारा था। दाईं ओर अस्तबल। बाईं ओर एक लंबा गलियारा जो भीतर के कक्षों की ओर जाता था।
अर्जुन ने अपनी दृष्टि बंद कर क्षणभर ऊर्जा-संवेदन किया।
महल के भीतर कई साधक थे—कम से कम पाँच ऐसे जिनकी साधना गुरुकुल के सामान्य विद्यार्थियों से अधिक थी। संभवतः वीरेंद्र के कुल के निजी रक्षक।
“सीधे भीतर जाना जोखिम है,” उसने सोचा।
पर वह रुका नहीं।
वह दीवार से नीचे उतरा—छाया की तरह।
एक प्रहरी उसके निकट से गुज़रा, पर उसे कुछ महसूस नहीं हुआ। अर्जुन की आभा अब इतनी गहरी परत में छिपी थी कि सामान्य ऊर्जा-संवेदन उसे छू भी नहीं पा रहा था।
वह गलियारे की ओर बढ़ा।
भीतर संगमरमर की फर्श, दीवारों पर चित्र, स्वर्ण-कलश, और भारी परदे। यह संपन्नता केवल बाहरी वैभव नहीं थी—यह प्रभाव का प्रदर्शन था।
अर्जुन ने एक कक्ष का द्वार धीरे से खोला।
अंदर लेखा-जोखा रखने का कक्ष था। लकड़ी की अलमारियाँ। ताम्र-पत्र। कुछ मुहरबंद संदूक। उसने एक संदूक खोला—भीतर सोने के सिक्के। दूसरे में दुर्लभ औषधियाँ। तीसरे में… कुछ मुहरबंद पत्र।
उसकी आँखों में हल्की चमक आई।
उसने एक पत्र उठाया। मुहर तोड़ी नहीं—केवल ऊर्जा से उसके भीतर की स्याही की तरंगों को पढ़ने का प्रयास किया। नई नाड़ी संरचना का एक और प्रयोग।
शब्द धुँधले-से उसकी चेतना में उभरे—
“…गुरुकुल के भीतर हमारे लोग सक्रिय हैं…” “…अगली पूर्णिमा से पहले कार्य पूर्ण होना चाहिए…” “…यदि आवश्यकता पड़े तो निषिद्ध ऊर्जा का आरोप बढ़ाया जाए…”
अर्जुन की मुस्कान गहरी हो गई।
“तो यह केवल बदला नहीं है,” उसने सोचा। “यह षड्यंत्र है।”
उसने और पत्र देखे। एक में नगर के कुछ अधिकारियों को भेजे गए उपहारों का उल्लेख था। दूसरे में सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध औषधि-व्यापार का संकेत। तीसरे में एक नाम… जो उसे चौंका गया।
गुरुकुल का एक वरिष्ठ सेवक।
“तो जड़ें भीतर तक हैं,” उसने मन ही मन कहा।
अचानक उसे आभास हुआ—पास के कक्ष में कोई जागा है।
उसने तुरंत पत्रों को यथास्थान रखा। केवल एक छोटा-सा ताम्र-पत्र अपनी वस्त्र की भीतरी परत में सरका लिया—साक्ष्य के लिए।
कदमों की आहट बढ़ रही थी।
अर्जुन ने दीवार के पीछे स्वयं को समेट लिया। दो सैनिक भीतर आए।
“यहाँ कुछ हिला था?”
उन्होंने चारों ओर देखा—कुछ नहीं पाया—और चले गए।
अर्जुन की दृष्टि गंभीर हो गई।
उसे अब स्पष्ट था—वीरेंद्र का परिवार केवल क्रोधित कुल नहीं था। वे गुरुकुल को भीतर से प्रभावित कर रहे थे। अफवाहें केवल पहला चरण थीं। संभवतः आगे कोई बड़ा कदम उठने वाला था—शायद उसे निष्कासित करवाना, या सार्वजनिक रूप से अपमानित करना।
“यदि मैं केवल बचाव करता रहूँगा,” उसने सोचा, “तो वे जीत जाएँगे।”
वह और भीतर बढ़ा।
एक निजी कक्ष के सामने पहुँचकर वह रुका। भीतर से धीमी आवाज़ें आ रही थीं।
“…उसकी आभा सचमुच बदल गई है…” “…तो आरोप को और हवा दो…” “…यदि परिषद जाँच बैठाएगी, तो हम प्रमाण ‘प्रस्तुत’ कर देंगे…”
अर्जुन का रक्त ठंडा हो गया।
वे प्रमाण गढ़ने वाले थे।
अब यह केवल अफवाह नहीं था—यह योजनाबद्ध फँसाना था।
उसने मन ही मन निर्णय लिया।
उसे पर्याप्त जानकारी मिल चुकी थी। अभी टकराव का समय नहीं। अभी उसे इस जाल को उल्टा बुनना है।
वह चुपचाप पीछे हटा। __
Login to comment.