वीरेंद्र के महल की उस भयावह रात को कई दिन बीत चुके थे।
राज्य में जीवन धीरे-धीरे सामान्य होने लगा था, पर उस घटना का भय अभी भी लोगों के मन में गहरा बैठा हुआ था। नगर के लोग जब भी उस दिशा की ओर देखते जहाँ कभी विशाल महल खड़ा था, तो उन्हें अब केवल राख, टूटी हुई दीवारें और जली हुई भूमि दिखाई देती।
और उस सबके बीच—
वीरेंद्र के परदादा।
वह अब पहले जैसे नहीं रहे थे।
उनके वस्त्र साधारण हो गए थे, शरीर पर अभी भी घावों के निशान थे, और उनकी आँखों में लगातार एक ही प्रश्न जल रहा था—
“आख़िर हुआ क्या था?”
उस रात उन्होंने स्वयं स्वर्गीय बादलों को उतरते देखा था।
उन्होंने बिजली को गिरते देखा था।
उन्होंने काले कमल को विस्फोट करते देखा था।
पर एक प्रश्न उनके मन में बार-बार उठता था—
वह कमल वहाँ आया कैसे?
क्योंकि उन्हें अच्छी तरह याद था—
वह बक्सा वर्षों से महल के राजकोष में रखा हुआ था।
पुराना। भूला हुआ। और कभी खतरनाक नहीं।
तो फिर उस रात अचानक उसमें ऐसा क्या बदल गया?
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उत्तर पाने के लिए उन्होंने राज्य के सबसे प्रसिद्ध ज्योतिषियों, तांत्रिकों और भविष्यदर्शियों को बुलाया।
महल के खंडहरों के पास एक अस्थायी मंडप बनाया गया था।
वहीं पर वे सब एकत्र हुए।
कई दिनों तक अनुष्ठान चलते रहे।
भूमि पर विशाल यंत्र बनाए गए। दीप जलाए गए। मंत्रों की गूँज चारों ओर फैलती रही।
आख़िरकार एक रात—
ज्योतिषियों ने घोषणा की—
“हम उस रात का प्रारंभिक दृश्य पुनः देख सकते हैं।”
वीरेंद्र के परदादा चुपचाप बैठे रहे।
उनकी आँखें स्थिर थीं।
मंडप के बीच एक जलपात्र रखा गया। उसके ऊपर कई दर्पण और रत्न लगाए गए। मंत्रों के उच्चारण के साथ उनमें धीरे-धीरे एक धुँधला दृश्य बनने लगा।
पहले केवल धुआँ दिखाई दिया।
फिर—
महल का राजकोष।
वही कक्ष।
वही पत्थर की दीवारें।
वही बक्सा।
वीरेंद्र के परदादा की आँखें सिकुड़ गईं।
“यही है…”
दृश्य धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।
उन्होंने देखा—
बक्सा बंद था।
और उसके भीतर—
काला कमल।
ज्योतिषियों की आवाज़ धीमी हो गई।
“देखिए… यहीं से सब शुरू हुआ।”
अचानक—
आकाश में बादल घिरते दिखाई दिए।
नीली बिजली चमकी।
और वह सीधे महल की ओर उतर आई।
बिजली का पहला प्रहार—
सीधा उसी बक्से पर पड़ा।
पर दृश्य यहीं समाप्त नहीं हुआ।
सबने देखा—
बिजली उस कमल में समा गई।
जैसे वह उसे सोख रहा हो।
कमल धीरे-धीरे फैलने लगा।
उसकी पंखुड़ियाँ खुलने लगीं।
उसकी ऊर्जा बढ़ने लगी।
कमरा काँपने लगा।
फिर—
दूसरी बिजली।
तीसरी।
हर प्रहार के साथ कमल और बड़ा होता गया।
और फिर—
वह सीमा से अधिक हो गया।
क्षण भर के लिए दृश्य पूरी तरह सफेद हो गया।
और अगले ही पल—
भयानक विस्फोट।
मंडप में बैठे सभी ज्योतिषी एक साथ काँप उठे।
दृश्य अचानक टूट गया।
जलपात्र में पानी उछल पड़ा।
कुछ दीप बुझ गए।
और पूरा मंडप कुछ पल के लिए शांत हो गया।
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वीरेंद्र के परदादा धीरे-धीरे उठे।
उनकी आँखें गहरी हो चुकी थीं।
उन्होंने उस स्थान की ओर देखा जहाँ कभी उनका महल था।
उनकी मुट्ठियाँ कस गईं।
“तो कारण… वही बक्सा था।”
पर अगले ही पल उनके मन में दूसरा विचार आया।
“पर कैसे?”
वह बक्सा वर्षों से वहीं था।
यदि उसमें ऐसा कमल था—
तो पहले कभी ऐसा क्यों नहीं हुआ?
उन्होंने ज्योतिषियों की ओर देखा।
“क्या तुम यह देख सकते हो… कि वह कमल उस बक्से में कब आया?”
ज्योतिषियों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उनके चेहरों पर संकोच था।
सबसे वृद्ध ज्योतिषी आगे आया।
“महाराज… हमने प्रयास किया था।”
“पर उस बिंदु के आगे दृश्य धुँधला हो जाता है।”
“क्योंकि इसमें स्वर्गीय बिजली का प्रकोप समाया हुआ है, इसलिए हम लोग इसमें अधिक हस्तक्षेप नहीं कर सकते।”
वीरेंद्र के परदादा की आँखों में एक नई चमक उभरी।
अब यह केवल दुर्घटना नहीं लग रही थी।
यह किसी की योजना भी हो सकती थी।
उन्होंने खंडहरों की ओर देखा।
जहाँ कभी उनका वंश, उनका परिवार, उनका घर था।
अब वहाँ केवल राख थी।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी मुट्ठी और कस ली।
“मैं पता लगाऊँगा।”
उनकी आवाज़ धीमी थी—
पर उसमें क्रोध की गहराई थी।
“चाहे जिसने भी यह किया हो…”
“चाहे वह पृथ्वी पर हो या स्वर्ग में…”
“मैं उसे ढूँढ कर रहूँगा।”
उनकी दृष्टि आकाश की ओर उठी।
और उसी क्षण— _
वीरेंद्र के परदादा जी ने महल में बचे हुए सभी लोगों को तुरंत स्थाही सभा कक्ष में बुलाने का आदेश दिया। उनकी आवाज़ बूढ़ी जरूर थी, पर उसमें अब भी वही कठोर अधिकार था जिससे कभी पूरा राज्य काँप जाया करता था।
कुछ ही समय में महल के सैनिक, सेवक, दासियाँ और प्रहरी एक-एक करके सभा कक्ष में इकट्ठा होने लगे। पूरे वातावरण में एक अजीब सी बेचैनी फैली हुई थी। हर किसी को ऐसा महसूस हो रहा था मानो कोई बड़ा संकट मंडरा रहा हो। हालाँकि, कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस समय किसी काम से बाहर गए हुए थे या छुट्टी पर थे, और इसी कारण वे इस घटना से बच गए थे।
परदादा जी अपनी लंबी, चाँदी जैसी दाढ़ी को सहलाते हुए सबको गंभीर निगाहों से देख रहे थे। उनकी आँखों में उम्र की थकान अवश्य झलकती थी, लेकिन उनकी बुद्धि अब भी तलवार की धार जितनी तेज़ थी।
“मैं सच जानना चाहता हूँ,” उन्होंने भारी स्वर में कहा, “पिछले कुछ दिनों में महल में जितने भी झगड़े, विवाद या संदिग्ध घटनाएँ हुई हैं… सब कुछ एक-एक करके बताओ। कुछ भी छुपाना मत।” सैनिकों में से एक आगे आया। “महाराज… दो दिन पहले शस्त्रागार के पास कुछ युवकों में झगड़ा हुआ था। कहा जा रहा था कि वे किसी गुप्त ऊर्जा के बारे में बात कर रहे थे।” दूसरा प्रहरी बोला, “और कल रात उत्तर द्वार के पास भी हलचल हुई थी। कुछ लोग अर्जुन का नाम ले रहे थे… और कह रहे थे कि वह निषिद्ध शक्ति को छू चुका है।” यह सुनते ही सभा कक्ष में हल्की फुसफुसाहट फैल गई। परदादा जी की आँखें सिकुड़ गईं। “अर्जुन…” उन्होंने धीरे से नाम दोहराया। उन्हें अच्छी तरह पता था कि अफवाहें कभी भी यूँ ही पैदा नहीं होतीं। या तो कोई बहुत डर गया है… या फिर कोई बहुत बड़ा खेल खेल रहा है। उन्होंने सभा में मौजूद सभी लोगों को गहरी नज़र से देखा। “जिसने भी यह बात शुरू की है… वह सामने आए,” उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा, “वरना मैं खुद सच निकालना जानता हूँ।” सभा में सन्नाटा छा गया। किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस सन्नाटे के पीछे एक साज़िश धीरे-धीरे आकार ले रही थी… और उसका लक्ष्य केवल एक था — अर्जुन। __ वीरेंद्र के परदादा जी — राजऋषि भानुदेव — अपनी ऊँची पीठ वाली काले पत्थर की कुर्सी पर बैठे गहरी सोच में डूबे हुए थे।खंडहर महल के स्थाही सभा कक्ष में जलती हुई मशालों की लौ टूटी दीवारों पर अजीब-सी परछाइयाँ बना रही थी। तभी बाहर से तेज़ कदमों की आवाज़ आई। एक सैनिक अंदर आया और झुककर बोला, “महाराज, आपसे कोई मिलना चाहता है… वह गुरुकुल से आया है।” भानुदेव की भौंहें सिकुड़ गईं। “गुरुकुल से?” उन्होंने धीमे स्वर में दोहराया, “गुरुकुल का कोई व्यक्ति मुझसे क्यों मिलना चाहेगा?” वह अभी सोच ही रहे थे कि दूसरा सैनिक जल्दी से बोला, “महाराज, वह कह रहा है कि वह उसी गुरुकुल से आया है जहाँ अर्जुन शिक्षा ग्रहण कर रहा है।” यह सुनते ही भानुदेव की आँखों में अचानक एक लाल चमक उतर आई। “उसे अंदर लेकर आओ,” उन्होंने ठंडी आवाज़ में कहा। कुछ क्षण बाद सभा कक्ष का दरवाज़ा खुला। अंदर एक दुबला-पतला युवक आया। उसके शरीर से हल्की ऊर्जा की लहरें निकल रही थीं। उसकी साधना तीसरे चरण तक पहुँच चुकी थी। उसका नाम था — साधक शर्वित। वह तुरंत झुक गया। “पूर्वज को मेरा प्रणाम।” भानुदेव ने ठंडी निगाह से उसे देखा। “अपना परिचय दो।” युवक ने सिर झुकाए हुए कहा, “मेरा नाम शर्वित है, पूर्वज। मैं वही साधक हूँ जिसे अर्जुन पर नज़र रखने के लिए भेजा गया था।” सभा कक्ष में हल्की खामोशी छा गई। शर्वित ने आगे कहा, “कुछ दिन पहले अर्जुन ने वीरेंद्र पर हमला करने का प्रयास किया था। इसके बाद वीरेंद्र के पिता — युवराज रुद्रवीर — ने मुझे आदेश दिया कि मैं उसके खिलाफ अफवाहें फैलाऊँ… ताकि उसे गुरुकुल से निलंबित किया जा सके।” भानुदेव की आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं। “तुम लोगों ने कौन-सी अफवाह फैलाई?” शर्वित ने तुरंत उत्तर दिया, “हमने यह अफवाह फैलाई कि गुरुकुल का एक विद्यार्थी काली स्वर्गीय अग्नि को जगाने की कोशिश कर रहा है।” सभा कक्ष में बैठे कुछ लोग हल्का काँप उठे। शर्वित आगे बोला, “पूर्वज… अभी के समय में यही सबसे खतरनाक अफवाह है। यह सुनते ही कोई भी साधक बिना सोचे उस व्यक्ति की हत्या कर सकता है।” भानुदेव ने कुछ क्षण तक चुप रहकर उसे देखा। फिर उन्होंने पूछा, “वह किस वंश से आता है?” शर्वित ने सिर झुकाए जवाब दिया, “पूर्वज… वह किसी वंश से नहीं आता।” “वह पूरी तरह अनाथ है। उसे बचपन में एक अनाथ आश्रम में रखा गया था। वहीं उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया… इसलिए उसे गुरुकुल में प्रवेश मिल गया।” “लेकिन पिछले तीन वर्षों में उसका मूलाधार चक्र अब तक जागृत नहीं हो पाया है।” यह सुनते ही भानुदेव का चेहरा गुस्से से भर गया। धड़ाम! उन्होंने अपनी पत्थर की कुर्सी के हत्थे पर जोर से मुक्का मारा। “रुद्रवीर!” उन्होंने क्रोध में नाम लिया। “यह मूर्ख लड़का किस काम का है!” उनकी आवाज़ पूरे सभा कक्ष में गूँज उठी। “जिस लड़के का मूलाधार चक्र तीन साल में भी जागृत नहीं हुआ… उसके लिए इतनी बड़ी-बड़ी अफवाहें फैलाने की क्या जरूरत थी?” भानुदेव गुस्से से खड़े हो गए। “ऐसे निकम्मे को खत्म करने के लिए तो कुछ छोटे साधक ही काफी थे!” उन्होंने तिरस्कार से कहा, “अगर गुरुकुल में ही किसी बड़े छात्र को थोड़ा धन दे देता… तो वही उसे वहीं खत्म कर देता।” सभा कक्ष में सन्नाटा छा गया। लेकिन किसी को यह अंदाज़ा नहीं था कि जिस लड़के को वे इतना कमजोर समझ रहे थे… वही आने वाले समय में इस पूरे साम्राज्य की किस्मत बदलने वाला था। __ सभा कक्ष में कुछ क्षणों तक सन्नाटा बना रहा। मशालों की लौ धीमे-धीमे जल रही थी और उनकी परछाइयाँ दीवारों पर अजीब आकृतियाँ बना रही थीं। शर्वित ने सिर झुकाकर कहा, “पूर्वज… बात इतनी सरल नहीं है।” भानुदेव ने भौंहें सिकोड़ लीं। “स्पष्ट बोलो।” शर्वित ने गहरी साँस ली। “युवराज रुद्रवीर ने हमें पहले यही आदेश दिया था कि हम अर्जुन की बड़े छात्रों को उकसाकर उसकी हत्या करा दे... लेकिन बात योजना के अनुसार नहीं हुई।” भानुदेव की निगाह तेज़ हो गई। “क्या मतलब?” शर्वित ने कहा, “पूर्वज… अर्जुन ने उन बड़े छात्रों को हरा दिया।” सभा कक्ष में हवा जैसे अचानक भारी हो गई। कुछ पल के लिए भानुदेव बिल्कुल स्थिर रह गए। फिर उनकी आँखों में हल्की-सी चमक उभरी। “एक ऐसा लड़का… जिसका मूलाधार चक्र तक जागृत नहीं हुआ… उसने गुरुकुल के उन वरिष्ठ छात्रों को पराजित कर दिया, जिनके मूलाधार चक्र पहले से जागृत थे?” उनके स्वर में आश्चर्य भी था और अविश्वास भी। लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने सिर झटका। “असंभव!” भानुदेव ने कठोर आवाज़ में कहा, “गुरुकुल का कोई भी छात्र चाहे कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो… जब तक उसके सातों चक्र जागृत नहीं हो जाते, वह एक पूर्ण साधक नहीं बन सकता।” उन्होंने तिरस्कार से हाथ हिलाया। “और बिना पूर्ण साधना के… वह कोई बड़ा खतरा नहीं हो सकता।” भानुदेव ने जैसे अपने ही मन को समझाने के लिए कहा, “शायद वह लड़के कमजोर रहे होंगे… या फिर तुम लोगों ने बढ़ा-चढ़ाकर देखा है।” उन्होंने शर्वित की तरफ देखा। “बस। इस विषय को यहीं समाप्त समझो।” फिर उन्होंने आदेश दिया, “तुम जा सकते हो।” शर्वित झुककर मुड़ने ही वाला था कि अचानक भानुदेव ने कहा, “रुको।” शर्वित फिर से पलटकर खड़ा हो गया। भानुदेव ने अपनी उँगली में पहनी हुई एक भारी स्वर्ण अंगूठी को हल्का-सा घुमाया। अंगूठी में जड़ी मणि हल्की चमकने लगी और अगले ही पल उसके भीतर से एक छोटी सोने की पोटली उनके हाथ में आ गई। उन्होंने वह पोटली शर्वित की ओर बढ़ाई। “इसे ले जाओ।” शर्वित ने दोनों हाथों से उसे ग्रहण किया। भानुदेव ने धीमी आवाज़ में कहा, “इसे उस संगठन को दे देना… जो हत्या के काम उठाते हैं।” उनकी आँखों में ठंडी चमक उतर आई। “वह लड़का थोड़ा शक्तिशाली हो सकता है… लेकिन ऐसे साधकों के सामने वह कुछ भी नहीं है जिनके चक्र जागृत हैं।” शर्वित ने सिर झुकाया। “जैसी आपकी आज्ञा, पूर्वज।” कुछ ही क्षणों बाद वह सभा कक्ष से बाहर चला गया। दरवाज़ा बंद होते ही कक्ष में फिर से सन्नाटा फैल गया। भानुदेव धीरे-धीरे अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उनकी आँखें दूर कहीं टिकी हुई थीं। उनके मन में विचारों का तूफान उठ रहा था। “बिना चक्र जागृत किए… बड़े छात्रों को हरा देना…” उन्होंने मन ही मन कहा, “यह साधारण बात नहीं है।” उनकी आँखें संकरी हो गईं। “और वह भी एक अनाथ लड़का…” कुछ क्षण बाद उनके होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी। “अनाथ…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “इसका मतलब है कि उसका परिवार या तो छिपा हुआ है… या फिर वह किसी ऐसी शक्ति से जुड़ा है जिसे दुनिया नहीं जानती।” भानुदेव की आँखों में लाल चमक फिर से उभरी। “शायद… देवताओं के वंशज?” उन्होंने कुर्सी की पकड़ कस ली। “अगर ऐसा है… तो मैं उसे यूँ ही नहीं छोड़ सकता।” उन्होंने ठंडी आवाज़ में कहा, “लेकिन पहले मुझे यह पता लगाना होगा कि उसके पीछे कोई रक्षक है या नहीं।” उनकी नजरें दरवाज़े की ओर उठीं। “अगर कोई उसकी रक्षा कर रहा है… तो जब उस पर हमला होगा, वह अवश्य सामने आएगा।” उनके चेहरे पर क्रूर मुस्कान फैल गई। “और अगर कोई नहीं आया…” उन्होंने धीरे से कहा, “तो एक अनाथ के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा ” मशालों की लौ उनके चेहरे पर भयानक छाया बना रही थी। भानुदेव की आँखों में अब केवल एक ही भाव था — प्रतिशोध। _ गुरुकुल से कुछ दूरी पर, घने साल और पीपल के पेड़ों के बीच एक संकरा रास्ता था। वहीं छाया में खड़ा शर्वित चार काले वस्त्र पहने लोगों के सामने खड़ा था। उनकी आँखों में ठंडी क्रूरता थी — वे साधारण लोग नहीं, बल्कि पेशेवर हत्यारे थे। शर्वित ने धीमी आवाज़ में कहा, “वह लड़का इसी गुरुकुल में है।” एक हत्यारे ने पूछा, “तो फिर अभी अंदर जाकर उसका काम खत्म क्यों नहीं कर देते?” शर्वित ने तुरंत सिर हिला दिया। “नहीं। गुरुकुल के अंदर ऐसा करना आत्महत्या होगी। वहाँ कई आचार्य हैं जिनकी साधना हमसे कई गुना अधिक है।” उसने गुरुकुल की ऊँची दीवारों की ओर देखते हुए कहा, “लेकिन एक समस्या है… उसे अंक पाने के लिए कभी न कभी गुरुकुल से बाहर जाना ही पड़ेगा।” दूसरे हत्यारे ने भौंहें सिकोड़ लीं। “अगर वह बाहर ही ना आए तो?” शर्वित के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। “मैं अंदर से कोशिश करूँगा… उसे बाहर भेजने की।” उसने आगे कहा, “लेकिन याद रखना… वह बच्चा बहुत तेज है। जल्दबाजी मत करना।” फिर उसने हाथ से सामने फैले जंगल की ओर इशारा किया। “अगर वह किसी दिन जंगल में अभ्यास या गुरुकुल के कार्य से बाहर जाएगा… तो मैं तुम्हें खबर दे दूँगा।” एक हत्यारे ने धीरे से कहा, “और तब…” उसकी आँखों में हत्या की चमक उभरी। “…वह वापस गुरुकुल नहीं लौटेगा।” शर्वित ने सिर हिलाया और बिना कुछ कहे वापस गुरुकुल की ओर चल पड़ा। दूसरी ओर – गुरुकुल के भीतर रात का समय था। अर्जुन अपने कमरे में पद्मासन में बैठा था। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसके शरीर के भीतर ऊर्जा का एक अद्भुत परिवर्तन चल रहा था।
उसके मूलाधार चक्र में एक गहरी और रहस्यमयी स्वर्गीय काली अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। वह अग्नि सामान्य नहीं थी—उसकी लपटें लाल नहीं, बल्कि गहरी काली और बैंगनी आभा से चमक रही थीं, मानो किसी अंधकारमय तारे की ऊर्जा उसमें समाई हो।
दूसरी ओर उसका स्वाधिष्ठान चक्र भी अब एक बिल्कुल अलग रूप धारण कर चुका था। पहले वहाँ काली अग्नि के कुछ अंश और काले कमल के भीतर सिमटी हुई बिजली दोनों मौजूद थे। पर कई घंटों की गहन साधना के बाद अर्जुन ने निर्णय लिया।
उसने अपनी चेतना को पूरी तरह एकाग्र किया और मन ही मन उस ऊर्जा को एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने का आदेश दिया।
धीरे-धीरे स्वाधिष्ठान चक्र की सारी काली अग्नि नीचे बहने लगी। वह ऊर्जा सर्प की तरह घूमती हुई नीचे उतरी और सीधे मूलाधार चक्र में प्रवेश कर गई। अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। मूलाधार चक्र में काली अग्नि पहले से कई गुना प्रचंड हो गई। और स्वाधिष्ठान चक्र में अब केवल एक शक्ति रह गई थी— स्वर्गीय बिजली। अर्जुन के नाभि के पास हल्की-हल्की नीली बिजली चमक रही थी। वह बिजली किसी साधारण बिजली की तरह नहीं थी। उसमें एक दिव्य चमक थी — जैसे आकाश के देवताओं की शक्ति उसमें कैद हो। अर्जुन का शरीर उस ऊर्जा के कारण हल्का-सा कांप रहा था। उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं। “ह्ह…” उसने दाँत भींच लिए। स्वर्गीय बिजली को स्थिर करना आसान नहीं था। वह लगातार इधर-उधर भाग रही थी, जैसे उसे कैद होना पसंद ना हो। तभी अर्जुन के हाथ अपने-आप कुछ प्राचीन प्रतीक बनाने लगे। उसकी उँगलियाँ हवा में घूमीं। अचानक उसके स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर मंत्रों के सुनहरे अक्षर दिखाई देने लगे। वे मंत्र एक गोलाकार संरचना में घूमने लगे — जैसे कोई ऊर्जा-बंधन बन रहा हो। और धीरे-धीरे वह स्वर्गीय बिजली उस बंधन के भीतर स्थिर होने लगी। कमरे में हल्की-सी बिजली की आवाज़ गूँज रही थी। “क्र्र्र… टक…” कुछ क्षणों बाद अर्जुन ने गहरी साँस ली। अब उसका शरीर पहले से अधिक शांत था। उसने अपनी आँखें खोलीं। उसकी पुतलियों में कुछ पल के लिए हल्की नीली बिजली की चमक दिखाई दी… और फिर सब सामान्य हो गया। अर्जुन ने धीरे से अपने हाथ खोले। “अब… यह शक्ति मेरी है।” उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि गुरुकुल के बाहर… कुछ लोग उसकी मृत्यु का इंतजार कर रहे थे। और बहुत जल्द उसकी नई शक्ति की पहली परीक्षा होने वाली थी। _ गुरुकुल के प्रांगण में उस दिन वातावरण कुछ अलग था। सुबह की कक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं, लेकिन कई आचार्य अभी भी सभा-मंडप में एकत्र थे। चर्चा धीमी आवाज़ों में चल रही थी, मानो कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जा रहा हो। सभा के किनारे खड़ा शर्वित शांत दिखाई दे रहा था, पर उसके भीतर विचारों का तूफ़ान चल रहा था। अर्जुन। पिछले कई सप्ताह से वह लड़का उसकी योजना को बिगाड़ता चला गया था। पहले अफवाहें फैलाई गईं। फिर उसे गुरुकुल से बाहर निकलवाने की कोशिश की गई। लेकिन अर्जुन ने कोई गलती नहीं की। वह चुपचाप अपने कमरे में रहता… साधना करता… और किसी को भी अपने करीब आने का मौका नहीं देता। शर्वित ने कई बार उसे दूर से देखा था। उसके भीतर अब कुछ बदल चुका था। कुछ ऐसा… जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। “अगर वह गुरुकुल के भीतर रहा… तो उसे छूना भी असंभव होगा…” शर्वित ने मन ही मन सोचा। “मुझे उसे बाहर निकालना ही होगा।” तभी सभा-मंडप में एक वृद्ध आचार्य बोले। “इस वर्ष एक विशेष घटना होने वाली है।” सभी आचार्यों का ध्यान उनकी ओर चला गया। शर्वित भी वहीं खड़ा सुन रहा था। वृद्ध आचार्य ने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा— “दस वर्षों के बाद… वह प्राचीन मंदिर फिर से प्रकट होने वाला है।” सभा में हल्की-सी फुसफुसाहट फैल गई। कई आचार्यों की आँखों में आश्चर्य था। किसी ने धीरे से कहा— “क्या आप उसी मंदिर की बात कर रहे हैं…?” वृद्ध आचार्य ने सिर हिलाया। “हाँ… वही।” फिर उन्होंने कहा— “वह मंदिर स्थायी नहीं है। वह हर दस वर्ष में केवल कुछ समय के लिए प्रकट होता है… और फिर गायब हो जाता है।” शर्वित की आँखों में हल्की चमक आई। उसे यह कथा पहले भी सुनाई गई थी। लेकिन उसने कभी सोचा नहीं था कि वह घटना उसके सामने घटेगी। आचार्य आगे बोले— “कई वर्षों से यह परंपरा है कि जब वह मंदिर प्रकट होता है… तब आसपास के सभी गुरुकुल अपने विद्यार्थियों को वहाँ भेजते हैं।” एक युवा आचार्य ने पूछा— “लेकिन वह स्थान तो अत्यंत खतरनाक है।” वृद्ध आचार्य मुस्कराए। “हाँ… खतरनाक तो है।” उन्होंने धीरे से कहा— “जो वहाँ जाते हैं… उनमें से कई कभी वापस नहीं आते।” सभा कुछ क्षण के लिए पूरी तरह शांत हो गई। फिर आचार्य की आवाज़ फिर गूंजी। “लेकिन जो वापस आते हैं…” उनकी आँखों में चमक उभरी। “…उनकी साधना कई गुना बढ़ जाती है।” कई आचार्यों के चेहरे पर गंभीरता आ गई। वृद्ध आचार्य ने आगे कहा— “ऐसा कहा जाता है कि उस मंदिर के भीतर एक प्राचीन शक्ति छिपी हुई है।” “और जो भी साधक वहाँ तक पहुँच जाता है… उसे किसी न किसी रूप में वरदान अवश्य मिलता है।” शर्वित अब पूरी तरह ध्यान से सुन रहा था। उसके मन में विचार तेजी से बनने लगे। अगर सभी विद्यार्थी उस मंदिर में जाएंगे… तो गुरुकुल की सुरक्षा सीमित हो जाएगी। और वहाँ जंगल के भीतर… कोई भी दुर्घटना हो सकती थी। उसने मन ही मन मुस्कुराया। “यही मौका है।” सभा में एक अन्य आचार्य ने प्रश्न किया— “क्या सभी विद्यार्थी वहाँ जा सकते हैं?” वृद्ध आचार्य ने तुरंत सिर हिला दिया। “नहीं।” उन्होंने स्पष्ट कहा— “केवल वही साधक वहाँ प्रवेश कर सकते हैं जिनका मूलाधार चक्र जागृत हो चुका हो।” सभा में कई लोग सहमति में सिर हिलाने लगे। “यह नियम इसलिए रखा गया है… क्योंकि उस मंदिर के आसपास की ऊर्जा बहुत भारी होती है।” “जिसका मूलाधार चक्र जागृत नहीं है… उसका शरीर उस ऊर्जा को सहन नहीं कर पाएगा।” शर्वित के चेहरे पर कुछ पल के लिए चिंता उभरी। क्योंकि वह जानता था— अर्जुन का मूलाधार चक्र अभी तक आधिकारिक रूप से जागृत नहीं माना गया था। लेकिन अगले ही पल उसके मन में दूसरा विचार आया। “तीन महीने…” उसने सोचा। “अभी तीन महीने बाकी हैं।” सभा में आचार्य आगे बोले— “मंदिर के प्रकट होने में अभी लगभग तीन महीने का समय है।” “इस दौरान सभी गुरुकुल अपने विद्यार्थियों को तैयार करेंगे।” “और जब समय आएगा… तब सभी योग्य साधक वहाँ जाकर अपनी किस्मत आजमाएंगे।” सभा समाप्त होने लगी। आचार्य धीरे-धीरे वहाँ से जाने लगे। शर्वित भी चुपचाप बाहर निकल आया। लेकिन उसके मन में अब एक नई योजना बन चुकी थी। उसकी कई साजिशें अब तक असफल हो चुकी थीं। लेकिन इस बार… उसके पास समय भी था… और अवसर भी। उसने आकाश की ओर देखा। सूरज धीरे-धीरे पश्चिम की ओर झुक रहा था। शर्वित के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। “तीन महीने…” उसने मन ही मन कहा। “इन तीन महीनों में मैं सब कुछ तैयार कर दूँगा।” “और जब वह मंदिर खुलेगा…” उसकी आँखों में ठंडी चमक उभरी। “…तो अर्जुन भी वहाँ जाएगा।” वह कुछ क्षण चुप खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से कहा— “और शायद… वापस नहीं आएगा।” उधर गुरुकुल के एक शांत कोने में अर्जुन अपनी साधना में लीन था। उसे अभी इस आने वाले तूफान के बारे में कुछ भी पता नहीं था। लेकिन नियति धीरे-धीरे अपने मोहरे चला रही थी। और तीन महीने बाद… एक ऐसा स्थान खुलने वाला था जहाँ से कई लोग शक्ति लेकर लौटते थे… और कई लोग कभी लौटते ही नहीं थे। _ अगले दिन प्रातःकाल का समय था। सूरज अभी पूरी तरह उगा नहीं था और गुरुकुल के विशाल प्रांगण में हल्की सुनहरी रोशनी फैल रही थी। सभी विद्यार्थी रोज़ की तरह प्रातःकालीन प्रार्थना के लिए एकत्र हुए थे। घंटियों की धीमी ध्वनि हवा में गूंज रही थी। हजारों विद्यार्थी एक साथ खड़े होकर मंत्रोच्चार कर रहे थे। “ॐ भूर्भुवः स्वः…” उनकी आवाज़ें मिलकर एक ऐसी ध्वनि बना रही थीं जो पूरे गुरुकुल को एक शांत और पवित्र ऊर्जा से भर रही थी। कुछ ही देर में प्रार्थना समाप्त हुई। सामान्य दिनों में इसके बाद विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षाओं में चले जाते थे। लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ। मुख्य आचार्य ने हाथ उठाकर संकेत किया। “सभी विद्यार्थी… मुख्य कक्षा में एकत्र हों।” यह वही विशाल सभा-कक्ष था जहाँ पूरे गुरुकुल के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएँ की जाती थीं। यह सुनते ही विद्यार्थियों के बीच हलचल शुरू हो गई। “लगता है कोई बड़ी घोषणा होने वाली है।” “शायद किसी प्रतियोगिता की?” “या फिर किसी दूसरे गुरुकुल के साथ युद्ध-अभ्यास?” छोटे समूहों में खड़े विद्यार्थी तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे। कुछ ही देर में सैकड़ों विद्यार्थी उस विशाल कक्षा में एकत्र हो चुके थे। ऊँची पत्थर की दीवारें… विशाल स्तंभ… और सामने बना एक ऊँचा मंच। मंच पर कई आचार्य खड़े थे। कुछ ही क्षण बाद गुरुकुल के प्रधान आचार्य आगे आए। उनकी आवाज़ शांत लेकिन प्रभावशाली थी। “आज हम तुम सबको एक ऐसी बात बताने जा रहे हैं… जो केवल हर दस वर्ष में एक बार होती है।” पूरा कक्ष अचानक शांत हो गया। सैकड़ों आँखें मंच की ओर टिक गईं। आचार्य ने धीरे से कहा— “तीन महीने बाद… एक प्राचीन मंदिर प्रकट होने वाला है।” विद्यार्थियों के बीच हल्की फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ ने उत्सुकता से एक-दूसरे की ओर देखा। आचार्य ने आगे कहा— “उस मंदिर का नाम है…” उन्होंने थोड़ी देर रुककर कहा— “अनंत रहस्येश्वर मंदिर।” यह नाम सुनते ही कुछ वरिष्ठ विद्यार्थियों के चेहरे बदल गए। वे इस नाम को पहले भी सुन चुके थे। लेकिन अधिकांश विद्यार्थी पहली बार यह कथा सुन रहे थे। आचार्य की आवाज़ फिर गूंजी— “यह मंदिर स्थायी नहीं है।” “यह केवल दस वर्षों में एक बार प्रकट होता है… और कुछ समय बाद फिर अदृश्य हो जाता है।” अब पूरे कक्ष में सन्नाटा था। “कहा जाता है कि यह मंदिर बहुत प्राचीन काल में देवताओं और महान साधकों के द्वारा बनाया गया था।” “लेकिन समय के साथ यह दुनिया से छिप गया।” “और अब… केवल कुछ समय के लिए ही प्रकट होता है।” एक विद्यार्थी खड़ा हो गया। “आचार्य… वहाँ जाने का क्या उद्देश्य होता है?” आचार्य ने उसकी ओर देखा और उत्तर दिया— “वहाँ साधना की अत्यंत दुर्लभ ऊर्जा होती है।” “जो साधक वहाँ प्रवेश करते हैं… उनमें से कई की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।” “और कुछ को तो ऐसे वरदान भी मिलते हैं… जो सामान्य संसार में असंभव माने जाते हैं।” यह सुनते ही विद्यार्थियों के चेहरे चमक उठे। कुछ के चेहरे पर उत्साह था। कुछ के मन में लालच। लेकिन कई के चेहरे पर डर भी साफ दिखाई दे रहा था। क्योंकि इस मंदिर के बारे में एक और कथा भी प्रसिद्ध थी। आचार्य ने वही बात आगे कही— “लेकिन…” उनकी आवाज़ थोड़ी गंभीर हो गई। “जो वहाँ जाते हैं… उनमें से कई कभी वापस नहीं आते।” यह सुनते ही कक्षा में फिर सन्नाटा छा गया। कुछ विद्यार्थियों ने अनजाने में गहरी साँस ली। आचार्य ने आगे कहा— “इसलिए वहाँ केवल वही साधक जा सकते हैं जिनका मूलाधार चक्र जागृत हो चुका हो।” “और जिनके शरीर उस स्थान की ऊर्जा को सहन करने में सक्षम हों।” अब विद्यार्थियों के बीच उत्साह और भय दोनों मिलकर फैल चुके थे। कुछ विद्यार्थी तुरंत अपने मित्रों से बात करने लगे। “अगर हमें वहाँ कोई वरदान मिल गया तो?” “सुना है वहाँ प्राचीन खजाने भी छिपे हैं।” “लेकिन कई लोग मर भी जाते हैं…” “जो भी हो… मैं तो जरूर जाऊँगा!” गुरुकुल के कई विद्यार्थी अब उसी के बारे में चर्चा करने लगे। कुछ तो उसी समय से अपनी तैयारी की योजनाएँ बनाने लगे। लेकिन इस पूरे शोर और उत्साह के बीच… एक व्यक्ति पूरी तरह शांत था। अर्जुन। वह भी वहीँ बैठा था… लेकिन उसकी आँखों में बाकी लोगों जैसा उत्साह नहीं था। उसकी नजरें नीचे थीं… और उसका मन तेज़ी से सोच रहा था। “दस वर्षों में एक बार प्रकट होने वाला मंदिर…” “और इतनी खतरनाक ऊर्जा…” उसने मन ही मन सोचा। “यह कोई साधारण स्थान नहीं हो सकता।” उसने धीरे से आँखें बंद कर लीं। उसके भीतर मूलाधार चक्र में स्वर्गीय काली अग्नि हल्की-सी लहराई। और स्वाधिष्ठान चक्र में कैद स्वर्गीय बिजली भी मानो उस नाम को सुनकर हल्की प्रतिक्रिया देने लगी। अर्जुन की आँखों में एक गहरी चमक उभरी। “अनंत रहस्येश्वर मंदिर…” उसने मन ही मन कहा। “मुझे इसकी सच्चाई पता लगानी होगी।” उसके आसपास बैठे विद्यार्थी अभी भी उत्साह में बातें कर रहे थे। लेकिन अर्जुन के मन में एक अलग ही विचार जन्म ले चुका था। वह जानता था— ऐसे स्थान केवल शक्ति ही नहीं देते। वे सच्चाइयाँ भी उजागर करते हैं… और कभी-कभी… नियति भी वहीं बदलती है।
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