यह व्यवस्था लगभग एक सप्ताह तक लगातार चलती रही।
धीरेधीरे गुरुकुल की गति सामान्य होती दिख रही थी, लेकिन भीतर की सतर्कता अब पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी थी। हर गतिविधि पर नज़र रखी जा रही थी… हर छात्र, हर साधक—जैसे कोई अदृश्य आँख सब पर निगरानी कर रही हो।
और फिर—
सातवें दिन की सुबह।
चिकित्सा कक्ष के भीतर, जहाँ अब तक सन्नाटा पसरा रहता था, एक हलचल हुई।
मुख्य आचार्य की उंगलियाँ हल्के से हिलीं।
कुछ क्षण बाद… उनकी आँखें धीरेधीरे खुलीं।
पहली अनुभूति—सूखा हुआ गला। दूसरी—भारी शरीर। लेकिन तीसरी…
तेज़, असामान्य रूप से जाग्रत चेतना।
उन्होंने गहरी सांस लेने की कोशिश की, और उनकी दृष्टि धीरेधीरे स्पष्ट होने लगी। पत्थर की छत… औषधियों की गंध… और आसपास का परिचित वातावरण।
"चिकित्सा कक्ष…" उन्होंने मन ही मन पहचाना।
उन्होंने सिर को थोड़ा घुमाया।
पास ही, दोनों वरिष्ठ आचार्य अब भी अचेत अवस्था में लेटे थे। उनके शरीर स्थिर थे, पर उनकी श्वास बता रही थी कि वे जीवित हैं।
मुख्य आचार्य की आँखों में एक क्षण के लिए राहत की झलक आई—
लेकिन अगले ही पल…
उनका मन बिजली की गति से दौड़ने लगा।
युद्ध का हर दृश्य… हर टकराव… हर ऊर्जा—
सब कुछ एक साथ उनकी स्मृति में कौंध गया।
और फिर—
वह काला कमल।
उनकी पुतलियाँ सिकुड़ गईं।
"स्वर्गीय… काली अग्नि…"
उन्होंने धीरे से फुसफुसाया।
वह अंतिम क्षण—जब सब कुछ नियंत्रण से बाहर जा रहा था… जब 'नागवज्र तंत्र ग्रंथ' अपने पूर्ण रूप में जागने ही वाला था…
और तभी—
अंधकार से उभरा वह कमल… जिसने सब कुछ समाप्त कर दिया।
ग्रंथ नष्ट हो चुका था।
ज्ञान… मिट चुका था।
लेकिन—
मुख्य आचार्य की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं।
"ऐसी विद्या… कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होती…"
उनकी दृष्टि कहीं दूर टिक गई।
"यह गुरुकुल ही नहीं… और भी स्थान हैं… जहाँ ऐसे रहस्य छिपाए गए होंगे…"
उनके भीतर का अनुभव उन्हें चेतावनी दे रहा था—
जो नष्ट हुआ है… वह केवल एक भाग था।
बाकी… कहीं न कहीं अभी भी जीवित है।
और उसे ढूंढना—
आसान नहीं होगा।
उन्होंने धीरे से उठने की कोशिश की।
शरीर ने विरोध किया… पर उन्होंने उसे अनदेखा कर दिया।
कुछ क्षणों तक स्थिर बैठकर उन्होंने अपनी श्वास को नियंत्रित किया, फिर पास रखे पात्र की ओर देखा।
उसी समय—
कक्ष के द्वार पर खड़ा एक छात्र यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया।
"आ… आचार्य!" वह तुरंत भीतर आया और झुककर प्रणाम किया।
मुख्य आचार्य ने उसे देखा—
"जल…"
उनका स्वर हल्का था, पर आदेश स्पष्ट।
छात्र तुरंत आगे बढ़ा, पात्र उठाया और उन्हें जल प्रदान किया।
मुख्य आचार्य ने धीरेधीरे पानी पिया। जैसे ही ठंडा जल उनके भीतर उतरा, उनके शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ।
उन्होंने गहरी सांस ली—
"जाओ।"
छात्र तुरंत सतर्क हो गया।
"सभी आचार्यों को सूचित करो… कि मैं जाग चुका हूँ। उन्हें तुरंत यहाँ उपस्थित होने को कहो।"
"आज्ञा, आचार्य!" छात्र ने झुककर कहा और तेज़ी से कक्ष से बाहर निकल गया।
कुछ ही समय में—
चिकित्सा कक्ष के बाहर हलचल बढ़ने लगी।
एकएक कर आचार्य वहाँ पहुँचने लगे। उनके चेहरों पर चिंता, जिज्ञासा और राहत—तीनों भाव एक साथ दिखाई दे रहे थे।
जैसे ही वे भीतर आए, उन्होंने मुख्य आचार्य को जाग्रत अवस्था में देखा—
"आचार्य!" कई स्वर एक साथ गूँज उठे।
वे उनके पास आए, हालचाल पूछा, और स्थिति जानने का प्रयास करने लगे।
मुख्य आचार्य शांत भाव से सबको देख रहे थे।
लेकिन उनकी आँखों के पीछे—
कुछ और ही चल रहा था।
तभी—
कक्ष के द्वार पर फिर से आहट हुई।
इस बार प्रवेश हुआ—सेनापति, राजवैद्य राजवर्धन, और उनके साथ कुछ विशिष्ट सैनिकों का।
वातावरण तुरंत भारी हो गया।
सेनापति आगे बढ़े और झुककर बोले—
"आचार्य… आपको होश में देखकर हर्ष हुआ।"
राजवर्धन की नजरें सीधे मुख्य आचार्य के चेहरे पर टिकी थीं—मानो वे केवल उनके स्वास्थ्य ही नहीं, उनके मन की स्थिति भी पढ़ने का प्रयास कर रहे हों।
मुख्य आचार्य ने धीमे से सिर हिलाया।
"समय कम है," उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के कहा।
उनका स्वर अब पहले जैसा ही दृढ़ हो चुका था।
"जो हुआ… वह केवल एक आक्रमण नहीं था।"
कक्ष में सन्नाटा छा गया।
उनकी आँखों में एक गहरी चमक उभरी—
"…यह एक संकेत था।"
सभी उपस्थित लोग अनायास ही सतर्क हो गए।
मुख्य आचार्य ने धीरेधीरे चारों ओर देखा—
और फिर बोले—
"और इस संकेत का उत्तर… हमें तुरंत खोजना होगा।"
—
मुख्य आचार्य ने कुछ क्षण अपनी श्वास को संतुलित किया, फिर धीरेधीरे अपनी दृष्टि सभा में उपस्थित सभी लोगों पर डाली—सेनापति, राजवैद्य राजवर्धन, और अन्य आचार्य।
कक्ष में पूर्ण सन्नाटा था।
"जो कुछ भी हुआ…" उन्होंने गंभीर स्वर में कहना शुरू किया, "…उसे ध्यान से सुनो। क्योंकि यह केवल एक घटना नहीं… एक चेतावनी है।"
और फिर—
उन्होंने पूरी घटना का वर्णन करना शुरू किया।
गुफा में प्रवेश करने से लेकर… टूटे हुए तंत्रजाल… भंग हो चुकी सुरक्षा संरचनाएँ… दीवारों पर मुरझाए मंत्र…
हर एक विवरण।
उनका स्वर शांत था, लेकिन हर शब्द में छिपा हुआ तनाव स्पष्ट महसूस हो रहा था।
"हमने जब उस अंतिम कक्ष में प्रवेश किया…" उनकी आँखें हल्की सिकुड़ गईं, "…तो वहाँ वह तालाब था… और उसके मध्य—कमल के आकार का मंच।"
कुछ आचार्यों ने अनायास ही गहरी सांस ली।
"और उस मंच पर…" उन्होंने धीमे से कहा, "…एक नकाबपोश साधक।"
उन्होंने बताया कि किस प्रकार वह साधक 'नागवज्र तंत्र ग्रंथ' के साथ अनुष्ठान कर रहा था… कैसे उन्होंने उसे रोकने का प्रयास किया… कैसे युद्ध हुआ… और कैसे उनकी सारी शक्तियाँ भी उसे रोकने में असफल हो रही थीं।
कक्ष का वातावरण धीरेधीरे भारी होता जा रहा था।
फिर—
मुख्य आचार्य कुछ क्षण के लिए रुके।
उनकी आँखों में उस अंतिम दृश्य की झलक उभरी।
"और फिर…" उनका स्वर और भी गहरा हो गया, "…अंतिम क्षण में… वह प्रकट हुआ।"
"कौन?" एक आचार्य के होंठों से अनायास निकला।
मुख्य आचार्य ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
"अंधकार से… एक कमल उभरा।"
कक्ष में बैठे सभी लोग स्थिर हो गए।
"काली अग्नि से बना हुआ कमल…"
राजवर्धन की आँखों में एक चमक कौंधी।
"उसने…" मुख्य आचार्य ने आगे कहा, "…सीधे उस ग्रंथ को लक्ष्य किया… और एक ही क्षण में…"
उन्होंने अपनी मुट्ठी कस ली—
"…'नागवज्र तंत्र ग्रंथ' को पूर्णतः नष्ट कर दिया।"
कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला।
यह जानकारी… जितनी राहत देने वाली थी… उतनी ही भयावह भी।
सेनापति ने अंततः मौन तोड़ा।
उन्होंने मुख्य आचार्य की ओर गहरी दृष्टि से देखा और पूछा—
"तो आपको क्या लगता है… वह कौन था?"
प्रश्न सीधा था।
मुख्य आचार्य ने भी उतनी ही शांति से उनकी ओर देखा।
कुछ क्षणों तक दोनों के बीच केवल मौन रहा।
फिर उन्होंने कहा—
"संभव है… वह कोई बाहरी व्यक्ति हो।"
"बाहरी?" सेनापति की भौंहें सिकुड़ गईं।
"हाँ," मुख्य आचार्य ने धीमे से कहा, "शायद वह उस नकाबपोश साधक का शत्रु था… जिसने केवल उसे रोकने के लिए हस्तक्षेप किया।"
कक्ष में हल्की हलचल हुई।
लेकिन सेनापति… चुप रहे।
उन्होंने मुख्य आचार्य को ध्यान से देखा।
उनकी आँखों में एक गहरी समझ उभर रही थी।
मानो दोनों के बीच बिना शब्दों के ही बहुत कुछ स्पष्ट हो गया हो—
शक… संकेत… और छुपा हुआ सत्य।
कुछ क्षणों बाद, मुख्य आचार्य ने सभा की ओर देखा—
"फिलहाल… इतना ही पर्याप्त है। आप सभी जा सकते हैं।"
आदेश स्पष्ट था।
एकएक कर सभी आचार्य कक्ष से बाहर निकलने लगे।
कुछ ही देर में वहाँ केवल तीन लोग रह गए—
मुख्य आचार्य… सेनापति… और राजवर्धन।
वातावरण अब और भी गंभीर हो चुका था।
सेनापति ने एक कदम आगे बढ़ाया।
"आचार्य…" उनका स्वर पहले से धीमा था, "…आपने ऐसा उत्तर क्यों दिया?"
मुख्य आचार्य ने उनकी ओर देखा—
"कौन सा?"
"यह कि वह कोई बाहरी व्यक्ति हो सकता है," सेनापति ने स्पष्ट किया। "जबकि…"
वह थोड़ा रुके—
"…आप भी जानते हैं कि वह बात पूरी सच्चाई नहीं है।"
राजवर्धन चुपचाप दोनों को देख रहे थे।
मुख्य आचार्य ने कुछ क्षणों तक कुछ नहीं कहा।
फिर उन्होंने धीरे से उत्तर दिया—
"शायद… वह कोई ऐसा व्यक्ति हो…"
उनकी आँखों में एक हल्की चमक उभरी—
"…जो इस गुरुकुल या इस राज्य को हानि नहीं पहुँचाना चाहता।"
सेनापति की दृष्टि और पैनी हो गई।
"…और जो चुपचाप… अपनी साधना के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।"
अब बात लगभग स्पष्ट थी।
सेनापति ने गहरी सांस ली।
"तो… आपको किसी पर शक है।"
मुख्य आचार्य ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
लेकिन उनकी खामोशी ही पर्याप्त थी।
कुछ क्षणों तक दोनों एकदूसरे को देखते रहे—मानो बिना शब्दों के ही अगला निर्णय तय हो चुका हो।
फिर सेनापति बोले—
"आचार्य… भरोसा करना उचित है।"
उनका स्वर अब कठोर हो गया—
"लेकिन आँख मूँदकर भरोसा करना… कभी भी उचित नहीं होता।"
उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा—
"आप उस शक्ति को जानते हैं… 'काली अग्नि' साधारण नहीं है।"
उनकी आँखों में चेतावनी थी—
"फिर भी… आप उसकी रक्षा क्यों करना चाहते हैं?"
कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया।
मुख्य आचार्य ने धीरेधीरे सेनापति की ओर देखा।
उनके चेहरे पर अब एक अजीब सी शांति थी।
"मुझे यह नहीं पता… वह कौन है," उन्होंने स्पष्ट कहा।
फिर—
उनका स्वर और गहरा हो गया—
"लेकिन…"
उन्होंने अपनी दृष्टि स्थिर कर दी—
"मैं उसके भविष्य की जिम्मेदारी लेता हूँ।"
सेनापति की भौंहें हल्की उठीं।
"वह व्यक्ति…" मुख्य आचार्य ने आगे कहा, "…आगे चलकर कुछ बड़ा करेगा।"
उनके शब्दों में अटूट विश्वास था—
"और संभव है… वही इस गुरुकुल… और इस राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बने।"
कक्ष में एक गहरा मौन छा गया।
राजवर्धन ने यह सब ध्यान से सुना, लेकिन उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया।
सेनापति कुछ क्षणों तक मुख्य आचार्य को देखते रहे।
फिर—
उन्होंने धीरे से सिर झुका दिया।
"जैसी आपकी आज्ञा, आचार्य।"
उनके स्वर में सहमति तो थी… लेकिन पूर्ण विश्वास नहीं।
उन्होंने मुड़कर कक्ष से बाहर निकलना उचित समझा।
राजवर्धन भी उनके साथ चल दिए।
कक्ष के भीतर अब केवल मुख्य आचार्य रह गए।
उन्होंने अपनी आँखें कुछ क्षणों के लिए बंद कीं—
और उनके मन में एक ही विचार गूंज रहा था—
"क्या मैंने सही निर्णय लिया…?"
लेकिन उनके अंतर्मन की गहराइयों से एक उत्तर उभरा—
"हाँ... क्योंकि कभीकभी सबसे बड़ा जोखिम ही सबसे बड़ी आशा का द्वार बनता है।"
उनकी आँखों में एक दृढ़ चमक उभरी।
निर्णय लिया जा चुका था।
मुख्य आचार्य ने तुरंत पास खड़े एक छात्र को संकेत दिया। आदेश मिलते ही वह बिना एक क्षण गंवाए वहाँ से दौड़ पड़ा।
कुछ ही देर बाद अर्जुन तक संदेश पहुँच चुका था।
और शीघ्र ही—
अर्जुन चिकित्सा कक्ष के प्रवेशद्वार पर खड़ा था।
उसकी दृष्टि सामने के बंद द्वार पर टिकी हुई थी, जबकि मन में अनेक प्रश्न एक साथ उमड़ रहे थे। मुख्य आचार्य ने उसे अचानक क्यों बुलाया था? और ऐसा कौनसा विषय था, जिसके लिए उसे तुरंत उपस्थित होना आवश्यक समझा गया?
कक्ष के भीतर से आती औषधियों की हल्की सुगंध और गंभीर वातावरण इस बात का संकेत दे रहे थे कि अंदर कोई अत्यंत महत्वपूर्ण चर्चा उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।
उसने भीतर प्रवेश किया, और जैसे ही उसकी दृष्टि मुख्य आचार्य पर पड़ी—वह तुरंत आगे बढ़ा और झुककर प्रणाम किया।
"आचार्य प्रणाम।"
मुख्य आचार्य ने शांत दृष्टि से उसे देखा।
"आओ… अर्जुन।"
उनका स्वर धीमा था, पर उसमें एक अजीब सी गहराई थी।
अर्जुन उनके समीप आया।
"और पास," आचार्य ने संकेत किया।
अर्जुन बिना किसी हिचकिचाहट के उनके बिल्कुल सामने खड़ा हो गया।
मुख्य आचार्य ने धीरेधीरे अपनी आँखें बंद कीं… और अपनी चेतना को विस्तार दिया।
अगले ही क्षण—
उनकी सूक्ष्म ऊर्जा अर्जुन के शरीर में प्रविष्ट होने लगी।
यह कोई साधारण परीक्षण नहीं था।
यह था—
सप्तचक्र परीक्षण।
उन्होंने अर्जुन की नाड़ियों को परखा… ऊर्जा के प्रवाह को महसूस किया… और उसके चक्रों की स्थिति को जानने का प्रयास किया…
लेकिन—
जैसे ही उनकी चेतना अर्जुन के मूलाधार के निकट पहुँची—
उन्हें एक क्षण के लिए रुकना पड़ा।
अंदर…
कुछ था।
कुछ अत्यंत गहरा… अत्यंत शक्तिशाली…
पर वह स्पष्ट नहीं था।
जैसे कोई परदा… जो सब कुछ छुपा रहा हो।
अर्जुन के भीतर की स्वर्गीय काली अग्नि… और वह सूक्ष्म स्वर्गीय बिजली—दोनों ही इतनी गहराई में समाई हुई थीं कि मुख्य आचार्य की चेतना भी उन्हें पूरी तरह स्पर्श नहीं कर पा रही थी।
एक क्षण के लिए—
मुख्य आचार्य की भौंहें हल्की सिकुड़ीं।
"हूँ…"
पर अगले ही पल—
उन्होंने अपनी चेतना को वापस खींच लिया।
उनके चेहरे पर फिर वही सामान्य शांति लौट आई।
अर्जुन स्थिर खड़ा था—बाहर से पूर्णतः शांत।
उसने कुछ भी प्रकट नहीं होने दिया।
"ठीक है…"
मुख्य आचार्य धीरे से फिर अपनी शैया पर लेट गए।
"तुम जा सकते हो—"
उन्होंने कहना शुरू किया… लेकिन फिर रुक गए।
उनकी आँखें अर्जुन पर टिक गईं।
"नहीं…"
उन्होंने धीरे से कहा—
"एक प्रश्न है।"
अर्जुन ने सिर झुकाया—
"आज्ञा, आचार्य।"
कुछ क्षणों का मौन।
फिर—
मुख्य आचार्य ने पूछा—
"अर्जुन… तुम भविष्य में क्या करना चाहते हो?"
प्रश्न सरल था।
लेकिन—
अर्जुन के लिए नहीं।
उसका मन एक क्षण के लिए पूरी तरह शून्य हो गया।
उसने कभी… इस बारे में सोचा ही नहीं था।
पुनर्जन्म के बाद से लेकर अब तक—
उसका केवल एक ही लक्ष्य था—
अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करना।
बस।
लेकिन…
उसके आगे?
कोई स्पष्ट दिशा नहीं थी।
उसके मन में विचारों की एक श्रृंखला उभरने लगी—
उसका पिछला जन्म… उसका राज्य… उसकी पहचान…
लेकिन—
यह सब अब जैसे धुंधला हो चुका था।
"वह राज्य… कहाँ है?" उसने मन ही मन सोचा।
उसने गुरुकुल के पुस्तकालय में उपलब्ध हर ग्रंथ को खंगाल डाला था—आसपास के राज्यों का इतिहास… भूगोल… वंशावली…
लेकिन—
उसे अपने पिछले जन्म के राज्य का कोई संकेत नहीं मिला।
"क्या इतना समय बीत चुका है…?" "या फिर… वह राज्य इतना छोटा था… कि इतिहास में उसका कोई उल्लेख ही नहीं?"
उसके भीतर एक अनिश्चितता जन्म लेने लगी।
"शायद… मुझे किसी बड़े राज्य में जाना होगा…"
यही विचार उसके मन में घूम रहा था—
तभी—
एक चेहरा अचानक उसकी चेतना में उभरा।
देविका।
अर्जुन की आँखों में एक क्षण के लिए हल्की चमक आई—
लेकिन अगले ही पल—
उसने अपना सिर झटक दिया।
"नहीं…"
उसने उस विचार को तुरंत दबा दिया।
यह समय भावनाओं का नहीं था।
अर्जुन ने अपनी दृष्टि उठाई और मुख्य आचार्य की ओर देखा।
"आचार्य…"
उसका स्वर शांत था—
"यह शिष्य… अभी कुछ नहीं जानता।"
कक्ष में हल्का सन्नाटा छा गया।
"अभी तक इसका केवल एक ही लक्ष्य रहा है—साधना करना।"
उसने धीमे से कहा—
"अपनी शक्ति को समझना… और उसे बढ़ाना।"
एक क्षण का विराम—
"परंतु… इसके आगे का कोई स्पष्ट लक्ष्य इस शिष्य ने अभी तक निर्धारित नहीं किया है।"
अर्जुन की आवाज़ में ईमानदारी थी।
न कोई दिखावा… न कोई झूठ।
सिर्फ सत्य।
मुख्य आचार्य उसे ध्यान से देख रहे थे।
उनकी आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभरी—
जैसे उन्हें यही उत्तर अपेक्षित था।
"हूँ…"
उन्होंने धीरे से कहा।
कक्ष में एक अजीब सी शांति फैल गई—
मानो यह प्रश्न केवल एक शुरुआत थी…
किसी बड़े मार्ग की।
—
मुख्य आचार्य ने अर्जुन की ओर स्थिर दृष्टि से देखते हुए कहा—
"मुझे नहीं पता… तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो।"
उनका स्वर धीमा था, पर उसमें एक अजीब सी दृढ़ता थी।
"लेकिन मैं तुम्हें एक बात स्पष्ट कर देता हूँ—भविष्य में तुम कुछ करो या मत करो…"
उन्होंने हल्का विराम लिया—
"…पर अपने से कमजोर के साथ अन्याय मत करना।"
कक्ष में सन्नाटा छा गया।
"हर किसी को दूसरा अवसर नहीं मिलता, अर्जुन।"
यह शब्द जैसे सीधे अर्जुन के भीतर उतर गए।
एक क्षण के लिए—
वह सच में लड़खड़ा गया।
उसकी आँखों में एक हल्की सी चमक आई, फिर उसने खुद को संभाला।
उसने आचार्य की ओर देखा—इस बार केवल एक शिष्य की तरह नहीं… बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति की तरह, जो उत्तर खोज रहा हो।
"आचार्य…" उसका स्वर थोड़ा भारी था, "आप… मुझ पर इतना विश्वास क्यों करते हैं?"
उसने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा—
"बिना मुझे पूरी तरह जाने… बिना कुछ समझे…"
उसके भीतर का संदेह अब स्पष्ट हो चुका था—
"…आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?"
मुख्य आचार्य ने उसे कुछ क्षणों तक चुपचाप देखा।
फिर—
उनके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई।
"क्योंकि…"
उन्होंने धीरे से कहा—
"मैं तुम्हारा गुरु हूँ।"
अर्जुन की भौंहें हल्की सिकुड़ीं।
"और इस गुरुकुल में…" आचार्य ने आगे कहा, "…मैंने एक सिद्धांत हमेशा निभाया है।"
उनकी आँखों में अब एक गहरी चमक थी—
"हर शिष्य को… एक अवसर।"
उन्होंने स्पष्ट कहा—
"चाहे उसने कितनी ही बड़ी गलती क्यों न की हो।"
अर्जुन चुप था।
"मुझे तुम्हें समझने की आवश्यकता नहीं है," आचार्य का स्वर अब और भी शांत हो गया, "…न ही यह जानने की कि तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो।"
एक क्षण का विराम—
"लेकिन…"
उन्होंने अर्जुन की आँखों में सीधे देखते हुए कहा—
"यह संसार तुम्हारे बारे में क्या सोचता है… उससे मुझे फर्क पड़ता है।"
कक्ष में गहरी शांति छा गई।
"अब तुम जा सकते हो, अर्जुन।"
अर्जुन ने धीरे से सिर झुकाया—
"आज्ञा, आचार्य।"
वह मुड़ा… और बिना पीछे देखे कक्ष से बाहर निकल गया।
जब अर्जुन कक्ष से बाहर निकला ही था—
चिकित्सा कक्ष के एक अंधेरे कोने में हल्की सी हलचल हुई।
परछाई से सेनापति धीरेधीरे बाहर आए।
उनकी नजरें उसी दिशा में टिकी थीं, जहाँ से अभीअभी अर्जुन गया था।
कुछ क्षण तक वे चुपचाप उसे जाते हुए देखते रहे।
न कोई प्रश्न… न कोई आदेश… बस एक गहरी, सतर्क नजर।
फिर—
उन्होंने बिना कुछ कहे पीछे कदम बढ़ाए और उसी परछाई में विलीन हो गए, जैसे वे कभी वहाँ थे ही नहीं।
मुख्य आचार्य अब भी उसी दिशा में देख रहे थे।
उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान उभरी।
धीरे से उन्होंने खुद से कहा—
"मुझे निराश मत करना… अर्जुन।"
अपने निवास कक्ष में पहुँचकर, वह चुपचाप बैठ गया।
कमरे में हल्की रोशनी थी… और बाहर से आती हवा परदे को धीमेधीमे हिला रही थी।
लेकिन उसके भीतर—
शांति नहीं थी।
उसका मन बारबार उसी बातचीत पर अटक रहा था।
"आचार्य… मेरी मदद क्यों कर रहे हैं?"
उसने आँखें बंद कीं।
उनके शब्द… उनके भाव… उनका व्यवहार—
सब कुछ सामान्य नहीं था।
"क्या… उन्हें पता है?"
यह विचार अचानक उसके भीतर उठा।
"क्या वे जानते हैं… मैं कौन हूँ?"
उसका दिल एक पल के लिए तेज़ी से धड़का।
"क्या उन्हें यह भी पता है… कि मैंने अपनी शक्ति कैसे प्राप्त की?"
उसके भीतर पुराने दृश्य उभरने लगे—
युद्ध… विश्वासघात… रक्त…
उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं।
"अगर उन्हें सब पता है… तो…"
उसकी आँखें धीरेधीरे खुलीं—
"…वे मुझे बचा क्यों रहे हैं?"
कोई उत्तर नहीं था।
सिर्फ प्रश्न।
और वही प्रश्न उसके मन को अंदर से कुरेद रहे थे।
कुछ क्षणों बाद—
अर्जुन ने गहरी सांस ली।
उसने सिर झटक दिया।
"नहीं…"
उसने खुद से कहा—
"यह सोचने का समय नहीं है।"
वह जानता था—
यह रास्ता उसे कहीं नहीं ले जाएगा।
उसने अपने विचारों को एक ओर धकेला।
"भविष्य…"
उसने धीरे से फुसफुसाया।
"जब समय आएगा… सब स्पष्ट हो जाएगा।"
उसकी आँखों में अब फिर से वही कठोरता लौट आई।
क्योंकि—
वह पहले भी एक बार भरोसा कर चुका था।
और उस भरोसे की कीमत—
उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।
"इस बार…"
उसने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं—
"…मैं किसी पर भरोसा नहीं करूँगा।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
और उसी सन्नाटे के बीच—
अर्जुन का संकल्प और भी मजबूत हो गया।
अगला दिन
सुबह की ठंडी हवा के साथ अर्जुन अपने कक्ष के बाहर खड़ा था।
लेकिन आज उसका मन साधना में नहीं था—
बल्कि निर्णय में था।
"अब आगे क्या…?"
उसने अपने भीतर झाँका।
वह अपने तीसरे चक्र के बिल्कुल करीब पहुँच चुका था…
लेकिन—
स्वाधिष्ठान चक्र अभी भी उसके नियंत्रण में पूरी तरह नहीं था।
यही उसकी सबसे बड़ी समस्या थी।
क्योंकि—
जब तक वह इस चक्र को पूरी तरह नियंत्रित नहीं करता…
वह अपनी स्वर्गीय बिजली और स्वर्गीय अग्नि—दोनों को अपनी इच्छा अनुसार प्रयोग नहीं कर सकता।
कभी ऊर्जा अचानक भड़क जाती… कभी बिल्कुल शांत हो जाती… जैसे वह शक्ति उसकी नहीं… बल्कि किसी और की हो।
अर्जुन ने आँखें बंद कीं।
कुछ क्षण तक गहरी सोच में डूबा रहा।
फिर—
उसकी आँखें खुलीं।
"आयुर्वेद…"
उसने धीमे से कहा।
"अगर मैं अपनी ऊर्जा को जड़ीबूटियों की सहायता से संतुलित करूँ…"
उसके मन में विचार स्पष्ट होने लगे—
"तो मैं अपने स्वाधिष्ठान चक्र को नियंत्रित कर सकता हूँ… और फिर तीसरे चक्र तक पहुँच सकता हूँ।"
यह एक जोखिम भरा रास्ता था—
लेकिन प्रभावी।
इसी विचार के साथ अर्जुन गुरुकुल के औषधि कक्ष की ओर बढ़ा।
वहाँ पहुँचकर उसने अंदर प्रवेश किया।
उसकी आँखें तुरंत चारों ओर घूमने लगीं—
लकड़ी की अलमारियों में सजी हुई दुर्लभ जड़ीबूटियाँ… काँच के पात्रों में बंद चमकती औषधियाँ… कुछ ऐसी जिनसे हल्की दिव्य आभा निकल रही थी…
अर्जुन कुछ कदम आगे बढ़ा।
उसने एक शीशी उठाई—
उसमें नीले रंग की सूखी पत्तियाँ थीं।
"'नीलज्योति वल्लरी'…" उसने पहचान लिया।
उसकी आँखों में हल्की चमक आई—
"यह स्वाधिष्ठान चक्र को स्थिर करने में मदद कर सकती है…"
फिर उसने दूसरी जड़ी देखी—
लाल रंग की, जैसे अंगार हो।
"'अग्निमूल'…"
वह हल्का सा मुस्कुराया—
"यह ऊर्जा को बढ़ाएगा… लेकिन नियंत्रित रूप में।"
लेकिन—
अगले ही पल—
उसने धीरे से सिर हिला दिया।
"नहीं…"
उसने शीशी वापस रख दी।
क्योंकि—
वह एक सच्चाई जानता था।
इन जड़ीबूटियों की कीमत… अत्यंत अधिक थी।
नीलज्योति वल्लरी, अग्निमूल, चंद्ररस कंद—इनमें से सबसे सस्ती भी उसकी पहुँच से परे थी। और अर्जुन के पास था भी क्या—मुश्किल से पैंतालीस अंक।
वह हल्का सा हँसा—
"मैं यहाँ खड़ा होकर इन्हें देख सकता हूँ…"
"लेकिन खरीद नहीं सकता।"
अब समस्या और भी स्पष्ट थी।
उसे जड़ीबूटियाँ चाहिए थीं—लेकिन ऐसे स्थान से, जहाँ वह बिना ध्यान आकर्षित किए जा सके, और जल्दी वापस भी लौट सके।
उसके दिमाग में एक जगह उभरी—
गुरुकुल के बाहरी वन क्षेत्र।
वहाँ—
कुछ निम्न स्तर की, लेकिन उपयोगी जड़ीबूटियाँ मिल सकती थीं।
लेकिन—
अर्जुन तुरंत सतर्क हो गया।
"नहीं…"
उसने सोचा—
"बहुत दूर गया… तो समस्या हो सकती है।"
क्योंकि—
अनंत रहस्येश्वर मंदिर का प्रवेश—
सिर्फ आचार्यों को ज्ञात था।
और—
वह मौका वह खोना नहीं चाहता था।
अर्जुन ने गहरी सांस ली।
उसकी आँखों में अब एक नई योजना आकार ले रही थी।
"मुझे…"
"ऐसी जगह ढूंढनी होगी…"
"जो खतरनाक भी हो…"
"और लाभदायक भी।"
उसने धीरे से अपनी मुट्ठी कसी—
"और जहाँ…"
उसकी आँखों में हल्की चमक उभरी—
"…मैं बिना किसी के ध्यान में आए… अपनी शक्ति बढ़ा सकूँ।"
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