बारिश लगातार गिर रही थी।
पुरानी ट्रेन की खिड़कियों पर पानी इस तरह बह रहा था जैसे बाहर का शहर धीरे-धीेरे पिघल रहा हो। काँच के उस पार अंधेरा फैला था—बीच-बीच में पीली रोशनियाँ चमकतीं, फिर धुँध में खो जातीं।
रोहन ने माथा ठंडी खिड़की से टिकाया।
उसने पिछले तीन घंटों में शायद एक भी पूरा वाक्य नहीं बोला था।
सामने वाली बर्थ पर बैठा बूढ़ा आदमी उसे कई बार देख चुका था। आखिरकार उसने बीड़ी बुझाते हुए पूछा,
“पहली बार जा रहे हो अर्धरात्रि?”
रोहन ने नज़र हटाए बिना कहा, “नहीं।”
“फिर लौट क्यों रहे हो?”
सवाल साधारण था।
लेकिन रोहन के भीतर कुछ हल्का-सा खिंचा।
जैसे किसी ने पुराने घाव पर उँगली रख दी हो।
उसने जवाब नहीं दिया।
बूढ़ा आदमी मुस्कुराया नहीं। बस गर्दन झुकाकर खिड़की से बाहर देखने लगा।
“अजीब शहर है,” उसने धीरे से कहा, “कुछ लोगों को पकड़कर रखता है।”
ट्रेन अचानक झटके से धीमी हुई।
पहियों की घिसती आवाज़ रात के भीतर लंबी चीख की तरह फैल गई।
दूर कहीं धुँध में प्लेटफ़ॉर्म की बत्तियाँ दिखाई दीं।
अर्धरात्रि जंक्शन।
बारिश और तेज़ हो गई।
स्टेशन पर उतरते ही गंध ने उसका स्वागत किया।
गीली मिट्टी।
जंग।
कोयले का धुआँ।
और…
कुछ जला हुआ।
कुछ ऐसा जिसकी पहचान दिमाग तुरंत नहीं करना चाहता।
रोहन कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।
प्लेटफ़ॉर्म लगभग खाली था। ऊपर लगे पुराने स्पीकरों से टूटी हुई घोषणा गूँज रही थी। कुछ कुली कम्बल ओढ़े बैठे थे। एक आवारा कुत्ता पानी से बचने के लिए बेंच के नीचे सिकुड़ा हुआ था।
लेकिन सबसे अजीब बात—
इतने लोगों के बावजूद स्टेशन अस्वाभाविक रूप से शांत था।
जैसे सब धीमे बोल रहे हों।
या सुन रहे हों।
रोहन ने बैग कंधे पर डाला और बाहर की ओर बढ़ गया।
स्टेशन के बाहर शहर बारिश में धुँधला चमक रहा था।
पुरानी इमारतें।
झुके हुए बिजली के खंभे।
तंग गलियाँ जिनमें पीली रोशनी काँप रही थी।
कहीं दूर मंदिर की घंटी बजी।
एक बार।
फिर बंद।
ऑटो वालों की भीड़ सामान्य शहरों जैसी नहीं थी। कोई जोर से चिल्ला नहीं रहा था। बस लोग उसे देखते रहे।
जैसे पहचानने की कोशिश कर रहे हों।
एक दुबला ऑटो ड्राइवर आगे आया।
“कहाँ?”
“राजघाट के पास,” रोहन ने कहा।
ड्राइवर कुछ पल चुप रहा।
“पुराना मकान?”
रोहन ने पहली बार उसकी ओर देखा।
“हाँ।”
ड्राइवर ने धीरे से सिर हिलाया।
“बैठ जाइए।”
ऑटो चल पड़ा।
बारिश की बूँदें तिरपाल पर लगातार थाप दे रही थीं। शहर धीरे-धीरे खुलने लगा।
संकरी गलियाँ।
भीगे मंदिर।
दीवारों पर उखड़े पोस्टर।
कुछ दुकानों में अभी भी पीली रोशनी जल रही थी।
रोहन ने महसूस किया—
यह शहर वैसा नहीं था जैसा उसे याद था।
या शायद…
वह खुद बदल गया था।
ऑटो एक मोड़ से गुज़रा और अचानक सड़क खुल गई।
सामने विरजा नदी फैल गई।
काली।
धीमी।
बारिश उसके पानी पर गोल-गोल कंपन बना रही थी।
घाटों पर दूर-दूर आग जल रही थी।
चिताएँ।
रोहन की आँखें कुछ सेकंड वहीं अटक गईं।
बचपन में उसने पहली बार यहीं किसी को जलते देखा था।
उस रात वह कई दिनों तक सो नहीं पाया था।
लेकिन अभी…
उसे डर नहीं लगा।
अजीब बात थी।
उसे लगा जैसे वह किसी परिचित चीज़ को देख रहा हो।
ऑटो ड्राइवर ने धीरे से कहा, “आज बहुत चिताएँ जल रही हैं।”
रोहन ने पूछा, “क्यों?”
ड्राइवर ने कंधा उचकाया।
“कौन जाने। कभी-कभी शहर भूखा हो जाता है।”
रोहन उसकी ओर देखने ही वाला था कि तभी—
उसने उसे देखा।
घाट की सीढ़ियों के बीच।
बारिश के पार।
एक स्त्री।
काली साड़ी।
भीगे बाल।
स्थिर खड़ी।
पास जलती चिता की आग उसके चेहरे पर काँप रही थी।
वह बाकी लोगों जैसी नहीं लग रही थी।
न ही शोकाकुल।
न ही डरी हुई।
वह बस देख रही थी।
सीधे उसकी ओर।
ऑटो आगे बढ़ रहा था लेकिन रोहन की नज़र उससे हट नहीं रही थी।
बारिश अचानक और घनी हो गई।
कुछ सेकंड के लिए धुआँ और पानी सब ढक गए।
फिर—
वह गायब थी।
रोहन सीधा बैठ गया।
“रुको।”
ऑटो ड्राइवर ने ब्रेक लगाया।
“क्या हुआ?”
रोहन पीछे मुड़ा।
घाट अब आधा धुँध में डूबा था। आग अब भी जल रही थी। कुछ लोग सफेद कपड़ों में खड़े थे।
लेकिन वह स्त्री नहीं थी।
“अभी वहाँ कोई खड़ा था…” रोहन बुदबुदाया।
ड्राइवर ने घाट की तरफ देखा।
उसके चेहरे का रंग हल्का बदल गया।
“रात में नदी की तरफ ज़्यादा मत देखा कीजिए, साहब।”
“मैंने किसी को देखा।”
ड्राइवर ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर बहुत धीमे बोला,
“अर्धरात्रि में कुछ चीज़ें चाहती हैं कि आप उन्हें देखें।”
हवा अचानक ठंडी लगी।
रोहन ने फिर घाट की ओर देखा।
खाली।
सिर्फ बारिश।
सिर्फ आग।
सिर्फ धुआँ।
ऑटो फिर चल पड़ा।
लेकिन कुछ दूर जाने के बाद…
उसे फिर वही एहसास हुआ।
जैसे कोई अब भी उसे देख रहा हो।
और इस बार—
बहुत करीब से।
_
“...बहुत करीब से।”
ऑटो के लोहे के ढाँचे में बारिश की आवाज़ भर गई थी। तिरपाल हवा में फड़फड़ा रहा था। रोहन ने पीछे देखने की कोशिश छोड़ी, लेकिन गर्दन के पीछे वह एहसास बना रहा—जैसे किसी की नज़र त्वचा पर टिक गई हो।
ड्राइवर अब चुप था।
पूरे रास्ते उसने फिर एक शब्द नहीं कहा।
सड़कें संकरी होती गईं। शहर का यह हिस्सा पुराना था। इतना पुराना कि कुछ इमारतें सीधी खड़ी कम और यादों के सहारे टिके ढाँचों जैसी ज़्यादा लग रही थीं।
काई लगी दीवारें।
लोहे की जालियों वाली खिड़कियाँ।
बरसाती पानी से भरी टूटी सीढ़ियाँ।
ऊपर उलझे बिजली के तार, जिनमें से कुछ से पानी टपक रहा था।
ऑटो एक बेहद तंग गली में मुड़ा।
गली लगभग खाली थी।
एक जगह छोटी-सी चाय की दुकान आधी खुली थी। भीतर पीली रोशनी में दो आदमी बैठे थे। दोनों ने ऑटो गुजरते देखा।
फिर रोहन को।
उनकी नज़र कुछ सेकंड ज़्यादा देर तक रुकी रही।
रोहन ने अनजाने में अपनी जैकेट की जेब दबाई।
ड्राइवर ने धीरे से कहा, “यहीं आगे है।”
ऑटो रुका।
सामने तीन मंज़िला पुराना मकान खड़ा था।
नमी से काली पड़ चुकी दीवारें।
लकड़ी की लंबी खिड़कियाँ।
ऊपर बालकनी की टूटी रेलिंग।
और दरवाज़े के ऊपर जंग खाया पीतल का नंबर:
“17”
रोहन कुछ देर उसे देखता रहा।
अचानक उसे याद आया—
बचपन में वह इसी दरवाज़े के पीछे छुपा था जब पहली बार बिजली गई थी। उसकी माँ मोमबत्ती ढूँढ़ रही थी और ऊपर वाली मंज़िल से किसी के चलने की आवाज़ आई थी।
जबकि ऊपर कोई रहता नहीं था।
उसने तुरंत वह याद दिमाग से हटाई।
ड्राइवर सामान नीचे रख चुका था।
“कितने हुए?”
ड्राइवर ने रकम बताई। रोहन ने पैसे दिए।
ड्राइवर नोट जेब में रखते हुए बोला, “अगर रात में घंटियों की आवाज़ सुनें…”
वह रुक गया।
रोहन ने देखा, “तो?”
ड्राइवर ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।
“खिड़की मत खोलिएगा।”
उसके बाद वह तुरंत ऑटो घुमाकर बारिश में गायब हो गया।
रोहन कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
बारिश अब हल्की हो चुकी थी। पानी छज्जों से टपक रहा था। कहीं दूर फिर मंदिर की घंटी बजी।
एक बार।
फिर दूसरी बार।
फिर अचानक बंद।
रोहन ने बैग उठाया और दरवाज़े तक गया।
पुरानी चाबी अभी भी काम कर गई।
ताला खुलते ही भीतर से बंद हवा की गंध बाहर आई।
पुरानी लकड़ी।
धूल।
नमी।
और बहुत हल्की…
अगरबत्ती जैसी कोई चीज़।
उसने दरवाज़ा खोला।
घर अंधेरे में डूबा था।
रोहन ने स्विच दबाया।
पीली रोशनी झपकी लेकर जली।
कमरा वैसा ही था जैसा उसे याद था— और बिल्कुल वैसा नहीं भी।
दीवारों का रंग उतर चुका था।
लकड़ी की अलमारी पर धूल जमी थी।
पुराना सोफ़ा सफेद चादर से ढका था।
लेकिन कमरे में सबसे ज़्यादा ध्यान खींच रही थी नमी।
दीवारों पर गहरे धब्बे फैले थे।
कुछ धब्बे इतने अजीब आकार के थे कि पहली नज़र में वे इंसानी आकृतियों जैसे लगे।
रोहन ने नज़र फेर ली।
“बेकार,” उसने खुद से कहा।
उसने बैग नीचे रखा और धीरे-धीरे घर के भीतर बढ़ा।
हर कदम पर लकड़ी चरमराती।
ऊपर वाली मंज़िल से हवा की आवाज़ आ रही थी।
या शायद…
कुछ और।
उसने खुद को फिर रोका।
बाहर की यात्रा की थकान अब शरीर में उतर रही थी। लेकिन इसके नीचे एक और चीज़ थी—
बेचैनी।
जैसे घर खाली नहीं।
बस शांत हो।
रसोई में जाकर उसने नल खोला।
पहले कुछ सेकंड जंग मिला भूरा पानी निकला।
फिर साफ।
उसने चेहरा धोया।
ठंडा पानी त्वचा पर पड़ा तो उसे एहसास हुआ कि उसका माथा गर्म था।
बहुत गर्म।
उसने आईने में देखा।
थका हुआ चेहरा।
भीगे बाल।
आँखों के नीचे हल्की सूजन।
लेकिन कुछ और भी।
उसे लगा जैसे उसके गाल पर राख लगी हो।
उसने हाथ फेरकर देखा।
कुछ नहीं।
उसने हल्की हँसी छोड़ी।
“बहुत बढ़िया शुरुआत है।”
तभी—
ऊपर किसी चीज़ के घिसटने की आवाज़ आई।
रोहन का हाथ वहीं रुक गया।
घर फिर शांत हो गया।
उसने ऊपर देखा।
अंधेरी सीढ़ियाँ।
लकड़ी की रेलिंग।
ऊपर पूरा हिस्सा अंधेरे में डूबा था।
उसे याद आया— ऊपरी मंज़िल सालों से बंद थी।
फिर आवाज़ कैसे आई?
कुछ सेकंड तक वह वहीं खड़ा सुनता रहा।
बारिश।
दूर ट्रैफिक।
पानी टपकने की आवाज़।
फिर—
टक।
जैसे ऊपर कोई धीरे से चला हो।
रोहन ने गहरी साँस ली।
“पुराना घर है,” उसने खुद से कहा।
लेकिन उसकी आवाज़ कमरे में अजीब लगी।
जैसे दीवारों ने उसे निगल लिया हो।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
पहला कदम।
चर्ररर—
दूसरा।
ऊपर अंधेरा थोड़ा और गहरा लगता था।
तीसरे कदम पर पहुँचते ही—
उसे गंध आई।
राख की।
गीली राख।
ठीक वैसी…
जैसी घाट पर थी।
रोहन रुक गया।
उसकी उँगलियाँ रेलिंग पर कस गईं।
ऊपर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी अब।
बस अंधेरा।
और वह गंध।
धीरे-धीरे…
उसे एहसास हुआ—
यह गंध ऊपर से नहीं आ रही।
उसके ठीक पीछे से आ रही है।
रोहन पलटा।
नीचे का कमरा खाली था।
लेकिन मुख्य दरवाज़ा…
जो उसने खुद बंद किया था…
अब आधा खुला हुआ था।
_
“...अब आधा खुला हुआ था।”
रोहन कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।
उसकी साँस धीमी हो गई।
बारिश की आवाज़ बाहर से आ रही थी, लेकिन घर के भीतर एक अलग तरह की खामोशी फैल चुकी थी। भारी। सुनती हुई।
उसने नीचे उतरना शुरू किया।
लकड़ी हर कदम पर कराह रही थी।
दरवाज़ा हवा से खुल सकता था।
पुराना मकान था।
ढीली कुंडी।
नमी।
हवा।
बस इतना ही।
रोहन ने खुद को यही समझाया।
लेकिन जैसे-जैसे वह नीचे आया, राख की गंध तेज़ होती गई।
अब वह सिर्फ हल्की महक नहीं थी।
जैसे किसी ने अभी-अभी भीगे कोयले बुझाए हों।
कमरे की पीली रोशनी काँप रही थी।
मुख्य दरवाज़े तक पहुँचकर उसने बाहर झाँका।
गली खाली थी।
बरसात अब रुक चुकी थी। छज्जों से पानी टपक रहा था। दूर कहीं किसी रेडियो की आवाज़ हवा में टूटती हुई आ रही थी।
लेकिन गली में कोई नहीं था।
रोहन ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।
ठंडी हवा भीतर आई।
और उसी पल—
उसे लगा जैसे कोई अभी-अभी दरवाज़े के सामने खड़ा था।
वह एहसास इतना स्पष्ट था कि उसका हाथ अनजाने में दरवाज़े की चौखट पर कस गया।
लेकिन सामने सिर्फ गीली गली थी।
उसने नीचे देखा।
सीढ़ियों के पास पानी जमा था।
उस पानी में कुछ काला घुला हुआ था।
रोहन झुका।
उसने उँगली लगाई।
राख।
गीली राख।
उसकी रीढ़ में धीमी ठंड उतर गई।
ऊपर से फिर वही आवाज़ आई।
टक।
इस बार साफ़।
जैसे लकड़ी पर किसी ने नाखून खींचा हो।
रोहन सीधा खड़ा हुआ।
कुछ देर तक वह बस सुनता रहा।
फिर उसने दरवाज़ा बंद किया।
कुंडी चढ़ाई।
और बिना ऊपर देखे कमरे के बीच लौट आया।
“थक गया हूँ,” उसने खुद से कहा, “बस।”
लेकिन शरीर उसकी बात नहीं मान रहा था।
उसे लग रहा था— घर में कोई rhythm है।
जैसे दीवारें साँस ले रही हों।
उसने बैग खोला, पानी की बोतल निकाली, लंबा घूँट लिया।
हाथ हल्के काँप रहे थे।
मोबाइल जेब में vibration करने लगा।
KIRAN CALLING.
स्क्रीन की रोशनी कमरे में अचानक बहुत चमकीली लगी।
रोहन ने तुरंत कॉल उठाई।
“आख़िरकार।” दूसरी तरफ़ किरण की आवाज़ आई। “तुम मर गए थे क्या?”
रोहन के होंठों पर हल्की थकी मुस्कान आई।
“अभी पहुँचा हूँ।”
“तीन घंटे पहले पहुँचने वाले थे।”
“ट्रेन लेट थी।”
“तुम्हारी ज़िंदगी की तरह?”
“बहुत funny.”
किरण हँसी।
उसकी हँसी सुनते ही कमरे की घुटन कुछ सेकंड के लिए हल्की लगी।
जैसे किसी ने खिड़की खोल दी हो।
“तो?” उसने पूछा, “महान अर्धरात्रि कैसा लग रहा है?”
रोहन चुप रहा।
उसने कमरे के चारों तरफ देखा।
पीली दीवारें।
गीली नमी।
सीढ़ियों के ऊपर फैला अंधेरा।
और राख की वह गंध।
“अजीब,” उसने धीरे से कहा।
“तुम्हारे लिए perfect जगह।”
“Thanks.”
“मैं compliment दे रही थी।”
“तुम्हारे compliments हमेशा threats जैसे लगते हैं।”
“क्योंकि तुम emotionally defective हो।”
रोहन हल्का हँसा।
लेकिन उसी समय—
ऊपर कुछ घिसटा।
धीरे।
लंबा।
जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर खींची जा रही हो।
रोहन की हँसी तुरंत रुक गई।
“क्या हुआ?” किरण ने पूछा।
उसने जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र सीढ़ियों पर थी।
ऊपर अंधेरा स्थिर पड़ा था।
लेकिन अब उसे साफ़ महसूस हो रहा था—
वहाँ कुछ है।
“रोहन?”
“हाँ…”
“तुम ठीक हो?”
उसने आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश की।
“ऊपर शायद बिल्ली है।”
“घर में?”
“पुराना घर है।”
किरण कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली, “तुम वहाँ अकेले रहोगे?”
“हाँ।”
“Bad idea.”
“तुम हर चीज़ को bad idea बोलती हो।”
“क्योंकि तुम हर बार weird जगह चुनते हो रहने के लिए।”
उसने सिगरेट जलाने की क्लिक की आवाज़ सुनी।
“सुनो,” किरण फिर बोली, “कल मिल रही हूँ तुमसे। और अगर तुमने फिर last moment पर गायब होने की कोशिश की ना—”
ऊपर अचानक ज़ोर से धड़ाम हुआ।
जैसे कोई चीज़ गिर पड़ी हो।
कॉल के दूसरी तरफ़ किरण तुरंत चुप हो गई।
रोहन का दिल तेज़ धड़कने लगा।
कुछ सेकंड तक घर पूरी तरह शांत रहा।
फिर…
बहुत हल्की आवाज़।
ऊपर से।
जैसे कोई नंगे पैर चल रहा हो।
धीरे।
घसीटते हुए।
किरण की आवाज़ फुसफुसाहट जैसी हो गई, “रोहन…”
उसने जवाब नहीं दिया।
वह सीढ़ियों को घूर रहा था।
एक-एक कदम।
अंधेरा।
नमी।
पीली रोशनी।
और ऊपर…
कुछ चल रहा था।
उसका गला सूख गया।
फिर अचानक—
घर की सारी लाइट एक साथ झपकी।
एक बार।
दो बार।
और तीसरी बार बुझते-बुझते रुक गईं।
कमरे में आधा अंधेरा भर गया।
मोबाइल स्क्रीन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
तभी—
ऊपर वाली मंज़िल से बहुत धीमी स्त्री-आवाज़ आई।
इतनी धीमी कि शायद वह भ्रम भी हो सकती थी।
लेकिन शब्द साफ़ थे।
“...रोहन...”
_
आवाज़ इतनी हल्की थी कि उसका पहला ख़याल यही आया—
शायद किरण ने कुछ कहा।
लेकिन फोन के दूसरी तरफ़ पूरी खामोशी थी।
रोहन की नज़र सीढ़ियों पर जमी रही।
ऊपर अंधेरा स्थिर था।
फिर मोबाइल में किरण की धीमी आवाज़ आई, “तुमने सुना?”
उसका गला सूख गया।
“क्या?”
“किसी ने तुम्हारा नाम लिया।”
कमरे की हवा अचानक और ठंडी लगने लगी।
रोहन ने फोन कान से थोड़ा दूर किया।
उसे अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
ऊपर फिर कुछ हिला।
बहुत हल्का।
लकड़ी की चरमराहट।
जैसे कोई वजन बदल रहा हो।
किरण अब पूरी तरह serious थी। “रोहन… वहाँ और कोई है क्या?”
उसने जवाब देने से पहले खुद को मजबूर किया साँस लेने के लिए।
“नहीं।”
“तुम sure हो?”
उसने ऊपर देखा।
अंधेरा।
बस अंधेरा।
लेकिन वह एहसास जा नहीं रहा था।
जैसे कोई सीढ़ियों के ठीक ऊपर खड़ा उसे देख रहा हो।
“मैं बाद में call करता हूँ,” उसने धीरे से कहा।
“रोहन—”
उसने कॉल काट दी।
कुछ सेकंड तक वह वहीं खड़ा रहा।
फोन स्क्रीन बुझ गई।
कमरा और भी धुँधला लगने लगा।
फिर—
टक।
ऊपर से।
इस बार आवाज़ सीढ़ियों के बिल्कुल पास से आई।
रोहन का शरीर खुद-ब-खुद पीछे हट गया।
उसके दिमाग का एक हिस्सा कह रहा था: ऊपर मत जाओ।
दूसरा हिस्सा— जो धीमे-धीमे पूरी रात जाग रहा था— कह रहा था: देखो।
उसने दीवार के पास रखा पुराना लोहे का candle stand उठा लिया।
बेकार हथियार।
लेकिन खाली हाथ से बेहतर।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
हर कदम पर लकड़ी लंबी कराह निकालती।
ऊपर की हवा नीचे से अलग थी।
ठंडी।
और राख की गंध अब बहुत तेज़ थी।
ऐसा लग रहा था जैसे ऊपर कहीं ताज़ा चिता बुझी हो।
रोहन तीसरे मोड़ तक पहुँचा।
अब ऊपर का गलियारा दिखाई दे रहा था।
लंबा।
संकरी छत।
दोनों तरफ बंद दरवाज़े।
और अंत में— एक छोटी खिड़की जहाँ से बारिश की फीकी रोशनी भीतर आ रही थी।
सब शांत।
इतना शांत कि उसकी अपनी साँस अजनबी लग रही थी।
उसने एक कदम और बढ़ाया।
चर्ररर—
आवाज़ पूरे गलियारे में फैल गई।
तभी…
उसे महसूस हुआ।
कोई अभी-अभी उसके पास से गुज़रा।
हवा की तरह नहीं।
शरीर की तरह।
बहुत करीब से।
उसके कंधे के पास अचानक बर्फ जैसी ठंड छुई।
रोहन झटके से पलटा।
पीछे कोई नहीं था।
लेकिन राख की गंध अचानक इतनी तेज़ हो गई कि उसे खाँसी आ गई।
उसने candle stand कसकर पकड़ा।
“कौन है?”
उसकी आवाज़ गलियारे में अजीब गूँजी।
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ…
टप।
टप।
टप।
गलियारे के आखिरी हिस्से से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी।
रोहन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
फर्श पर नमी फैली थी।
और फिर उसने देखा—
गीले पैरों के निशान।
नंगे पैर।
एकदम ताज़ा।
वे गलियारे के बीच से गुजरते हुए आखिरी कमरे तक जा रहे थे।
रोहन रुक गया।
उसका गला कस गया।
ऊपर कोई था।
अभी।
यहीं।
निशानों के पास झुकते ही उसे एहसास हुआ— यह सिर्फ पानी नहीं।
राख मिली हुई थी उसमें।
काले-भूरे धब्बे।
उसे अचानक घाट वाली स्त्री याद आई।
भीगे बाल।
काली साड़ी।
सीधा उसे देखते हुए।
उसने तुरंत सिर उठाया।
गलियारे का आखिरी दरवाज़ा आधा खुला था।
जबकि उसे याद था— सब दरवाज़े बंद थे।
हवा नहीं चल रही थी।
फिर भी दरवाज़ा बहुत हल्के-हल्के हिल रहा था।
टक…
टक…
टक…
रोहन धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ा।
हर कदम के साथ उसके भीतर कुछ और जाग रहा था।
डर।
लेकिन सिर्फ डर नहीं।
जिज्ञासा।
खिंचाव।
जैसे दरवाज़े के पीछे कुछ ऐसा हो जिसे वह पहले से जानता हो।
उसका हाथ धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँचा।
उँगलियाँ ठंडी लकड़ी को छुईं।
और उसी क्षण—
नीचे सड़क से अचानक श्मशान के मंत्रोच्चार जैसी आवाज़ उठी।
दूर से।
धीमी।
लेकिन स्पष्ट।
“राम नाम सत्य है…”
रोहन ठिठक गया।
आवाज़ रात में बहती हुई ऊपर आ रही थी।
उसने खिड़की की तरफ देखा।
नीचे गली में सफेद कपड़ों में कुछ लोग जा रहे थे।
एक अंतिम यात्रा।
बारिश में भीगती हुई।
लेकिन अजीब बात—
उनके बीच जो शव ले जाया जा रहा था…
उसकी चिता पहले से जल रही थी।
आग बारिश में भी बुझ नहीं रही थी।
रोहन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर धीरे-धीरे उसकी नज़र जुलूस के पीछे चली गई।
और वहाँ—
गली के मोड़ पर—
वही स्त्री खड़ी थी।
श्रावणी।
इस बार पहले से ज्यादा साफ़।
उसकी काली साड़ी बारिश में भीगी हुई शरीर से चिपकी थी। माथे की गहरी लाल बिंदी पानी के बीच भी अजीब चमक रही थी। हाथों की काली चूड़ियाँ हल्की-हल्की खनक रही थीं।
वह बाकी सब लोगों से अलग स्थिर खड़ी थी।
जैसे जुलूस उससे डरता हो।
और उसकी आँखें…
सीधे ऊपर।
रोहन पर।
फिर बहुत धीरे—
उसने सिर हल्का-सा झुकाया।
मानो पहचानती हो।
अगले ही पल—
गलियारे के पीछे वाले कमरे से अचानक किसी के तेज़ साँस लेने की आवाज़ आई।
_
“...ह्ह्ह्ह…”
पीछे से आती वह साँस इंसानी थी।
लेकिन पूरी तरह नहीं।
रोहन का शरीर तुरंत पलटा।
गलियारे का आखिरी कमरा आधा खुला था। भीतर घुप्प अंधेरा फैला था। बाहर की बारिश की फीकी रोशनी दरवाज़े की दरार से अंदर गिर रही थी।
और उस अंधेरे के भीतर…
कुछ हिल रहा था।
बहुत धीमे।
जैसे कोई झुककर बैठा हो।
रोहन का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा आवाज़ गलियारे में गूँज रही होगी।
नीचे सड़क से अंतिम यात्रा के मंत्र अब दूर जाते सुनाई दे रहे थे।
“राम नाम सत्य है…”
“राम नाम सत्य है…”
फिर धीरे-धीरे वे भी धुँधले हो गए।
अब सिर्फ घर था।
अंधेरा।
और वह साँस।
रोहन ने फिर नीचे झाँकने की कोशिश की।
गली का मोड़ खाली था।
श्रावणी गायब।
इतनी जल्दी जैसे वह कभी थी ही नहीं।
उसके हाथ की पकड़ candle stand पर और कस गई।
वह धीरे-धीरे कमरे के पास पहुँचा।
दरवाज़े के ठीक बाहर फर्श पर राख फैली थी।
किसी ने अंदर से गीले पैरों के निशान छोड़ते हुए चलकर दरवाज़े तक आना चाहा था…
लेकिन निशान वहीं खत्म हो गए।
जैसे वह चीज़ हवा में गायब हो गई हो।
कमरे से फिर आवाज़ आई।
इस बार हल्की फुसफुसाहट जैसी।
रोहन ने साँस रोकी।
कुछ शब्द।
बहुत धीमे।
समझ नहीं आए।
लेकिन उनमें एक अजीब rhythm थी।
जैसे कोई मंत्र उल्टा बोल रहा हो।
वह अब दरवाज़े के बिल्कुल सामने था।
उसने धीरे-धीरे हाथ बढ़ाया।
दरवाज़ा और खुला।
चर्ररर—
कमरे के भीतर बासी अंधेरा भरा था।
पुराने फर्नीचर सफेद कपड़ों से ढके थे। छत से पानी टपक रहा था। कोनों में मकड़ी के जाले थे।
लेकिन कमरे की सबसे अजीब चीज़…
बीच में रखा पुराना दर्पण था।
लंबा।
काले लकड़ी के फ्रेम वाला।
उसकी सतह पर धूल जमी थी।
फिर भी उसमें रोहन की धुँधली परछाईं दिख रही थी।
और उसके पीछे—
कोई खड़ा था।
रोहन की साँस रुक गई।
वह झटके से पलटा।
पीछे कोई नहीं।
गलियारा खाली।
उसने तुरंत फिर दर्पण की ओर देखा।
अब वहाँ सिर्फ उसकी अपनी परछाईं थी।
लेकिन कुछ गलत था।
उसकी reflection… कुछ सेकंड देर से हिल रही थी।
रोहन एक कदम पीछे हटा।
Reflection ने भी वही किया।
लेकिन आधा पल देर से।
उसके गले में ठंड उतर गई।
तभी—
दर्पण की सतह पर धीरे-धीरे धुआँ फैलने लगा।
भीतर से।
जैसे काँच के पीछे आग जल रही हो।
रोहन जड़ हो गया।
धुएँ के बीच कोई आकृति बन रही थी।
स्त्री जैसी।
लंबे बाल।
झुका हुआ चेहरा।
और फिर—
दर्पण के भीतर दो आँखें खुलीं।
सीधे उसकी तरफ।
रोहन पीछे हटने ही वाला था कि कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
इतना कि उसकी साँस धुएँ जैसी दिखने लगी।
फिर वही आवाज़।
इस बार उसके बिल्कुल कान के पास।
बहुत पास।
इतनी पास कि उसे किसी की ठंडी साँस महसूस हुई।
“...तुम वापस आ गए…”
रोहन घूम गया।
कोई नहीं।
लेकिन उसी क्षण—
नीचे घर का मुख्य दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
धड़ाम!
पूरे घर में आवाज़ गूँज गई।
फिर तुरंत—
सारी लाइट बुझ गईं।
पूर्ण अंधेरा।
कुछ सेकंड तक रोहन हिल भी नहीं पाया।
नीचे से हवा की तेज़ आवाज़ आ रही थी। जैसे दरवाज़ा खुला रह गया हो।
फिर…
उसे नीचे से किसी के चूड़ियों की बहुत हल्की खनक सुनाई दी।
छन्न…
छन्न…
धीमी।
नपी-तुली।
जैसे कोई घर के भीतर चल रहा हो।
रोहन का गला सूख गया।
आवाज़ सीढ़ियों तक पहुँची।
फिर पहला कदम।
चर्ररर—
दूसरा।
धीरे।
आराम से।
जैसे आने वाले को जल्दी न हो।
रोहन अंधेरे में जमे खड़ा रहा।
उसका शरीर भागना चाहता था।
लेकिन उसके भीतर कुछ और था—
वही अजीब खिंचाव।
वही curiosity।
वही एहसास…
कि यह सब उससे जुड़ा है।
सीढ़ियों पर कदम रुक गए।
पूरा घर शांत हो गया।
फिर नीचे से एक स्त्री-आवाज़ आई।
धीमी।
मुलायम।
और असंभव रूप से स्पष्ट।
“रोहन…”
उसकी उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं।
वह आवाज़ वही थी।
घाट वाली स्त्री।
श्रावणी।
फिर एक लंबी खामोशी।
और उसके बाद—
घर के भीतर कहीं से धुएँ की गंध उठी।
गीली राख।
जलती लकड़ी।
मानो पूरा मकान धीरे-धीरे किसी अदृश्य चिता में बदल रहा हो।
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