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खेल है
📚 Journey of the Mantralok

खेल है

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दूसरी ओर, अभय अभी भी अपने बिस्तर पर गहरी नींद में सो रहा था। उसका बुखार अब काफी हद तक उतर चुका था और शरीर पहले जैसी तपन से मुक्त हो गया था। उसकी साँसें शांत और नियमित थीं, मानो कुछ भी असामान्य हुआ ही न हो। उसके पास ही उसकी माँ बैठी थी। वह ठंडे पानी की पट्टी से उसके माथे को धीरे-धीरे सहला रही थी। हर बार जब वह पट्टी बदलती, उसकी आँखें अनायास ही अपने बेटे के चेहरे पर टिक जातीं। उस चेहरे पर अब पीड़ा नहीं थी, केवल बाल-सुलभ शांति थी। अभय को इस तरह चैन से सोता देख उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। यह मुस्कान किसी महारानी की नहीं थी, बल्कि एक साधारण माँ की थी। सच ही कहा गया है—कोई भी माँ अपने बच्चे को सुरक्षित और शांत सोता देखकर संतोष से भर जाती है। लेकिन कुछ ही क्षणों बाद, उसकी दृष्टि में हल्का-सा बदलाव आया। जैसे किसी विचार ने उसके मन को छू लिया हो। मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। जिन आँखों में अभी तक केवल ममता थी, अब उनमें कहीं गहराई में एक ठंडी चिंगारी जल उठी। वे अब साधारण आँखें नहीं रहीं। उन नज़रों में वह शांति नहीं थी जो केवल रक्षा करती है, बल्कि वह दृढ़ता थी जो आवश्यकता पड़ने पर संहार भी कर सकती है। यह वह दृष्टि थी, जो किसी साधारण स्त्री की नहीं हो सकती थी। कुछ पल वह वहीं बैठी रही, मानो किसी निर्णय पर पहुँची हो। फिर बिना कोई आवाज़ किए, उसका शरीर धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह हवा में घुल रही हो। कुछ ही पलों में वह पूरी तरह अदृश्य हो गई। कमरे में अब कोई यह नहीं कह सकता था कि थोड़ी देर पहले वहाँ इस देश की महारानी मौजूद थी। न कोई आभा बची थी, न कोई चिह्न। केवल शांत हवा थी और एक गहरा सन्नाटा। अभय अब भी वैसे ही सो रहा था, अनजान कि उसकी शांति के पीछे कितनी खतरनाक परछाइयाँ हरकत में आ चुकी थीं। उस कक्ष की निस्तब्धता यह संकेत दे रही थी कि यह शांति स्थायी नहीं है, बल्कि आने वाले तूफ़ान से पहले की खामोशी है। और दूर कहीं

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महल के चारों ओर फैले घने जंगल उस रात अस्वाभाविक रूप से शांत थे। पत्तों की सरसराहट तक मानो थम गई थी, जैसे प्रकृति स्वयं किसी आने वाले संकट की प्रतीक्षा कर रही हो। उसी सन्नाटे को चीरते हुए काले वस्त्रों में लिपटी कई आकृतियाँ जंगल के भीतर से निकल पड़ीं। उनके कदम धरती पर पड़ते थे, पर आवाज़ नहीं होती थी। उनकी आँखें सूनी थीं—न जीवन की चमक, न भावना का संकेत—फिर भी उनके शरीर पूरी शक्ति से आगे बढ़ रहे थे। वे मनुष्य जैसे दिखते थे, पर उनकी गति मनुष्यों जैसी नहीं थी। हवा उनके पीछे छूटती जा रही थी। पेड़, झाड़ियाँ और उबड़-खाबड़ रास्ते उनके लिए बाधा नहीं थे, बल्कि सीढ़ियाँ थे। वे बिना रुके, बिना थके, केवल एक ही दिशा में दौड़ रहे थे—महल की ओर। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी अदृश्य डोर ने उन्हें बाँध रखा हो और वही डोर उन्हें खींचती चली जा रही हो। महल की प्राचीर दूर से ही दिखने लगी थी। चाँदनी में उसकी ऊँची दीवारें शांत खड़ी थीं, जैसे सदियों से खड़े रहना ही उनका धर्म हो। पर उस शांति के नीचे खतरे की परछाईं गहराने लगी थी। काले वस्त्रों में दौड़ते वे लोग अब और तेज़ हो गए। उनकी सांसें सुनाई नहीं देती थीं, पर उनकी मौजूदगी हवा को भारी बना रही थी। उसी समय महल के भीतर, गुप्त प्रहरी-चिह्नों ने हल्की-सी प्रतिक्रिया दी। प्राचीन रूनों पर हल्की चमक उभरी, मानो किसी ने सोए हुए पहरेदारों को धीरे से जगा दिया हो। पर अभी कोई घंटा नहीं बजा था। अभी किसी ने चेतावनी नहीं दी थी। खतरा पास आ चुका था, पर उसकी पहचान अभी अधूरी थी। जंगल से निकलते हुए वे आकृतियाँ अब खुले मैदान में थीं। उनके कदमों के साथ धूल नहीं उठी, पर धरती ने उन्हें महसूस किया। उनकी एक-सी चाल, एक-सा वेग और एक-सा मौन—सब कुछ किसी एक आदेश का पालन कर रहा था। वे सैनिक नहीं थे, और न ही साधारण हत्यारे। वे किसी और ही नियम से बँधे हुए थे। महल की दिशा में बढ़ते हुए उनके बीच कोई संवाद नहीं था। न इशारा, न संकेत। फिर भी वे एक साथ चलते थे, जैसे एक ही चेतना ने सबको घेर रखा हो। और जैसे-जैसे दूरी कम होती जा रही थी, वैसे-वैसे अंधकार घना होता जा रहा था। उस रात महल शांत था, पर शांति के पीछे एक प्रश्न खड़ा था तभी

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अचानक पायल की छन-छन की आवाज़ गूँजने लगी, मानो किसी ने जंगल की आत्मा को छेड़ दिया हो। यह आवाज़ पहले बहुत हल्की थी, इतनी कि काले वस्त्रों में दौड़ रहे लोग उस पर ध्यान ही नहीं दे पाए। वे पूरी गति से आगे बढ़ते रहे, उनकी आँखों में न जीवन था और न ही कोई भावना, फिर भी उनके कदम बिना रुके महल की दिशा में बढ़ रहे थे। कुछ ही क्षणों में जंगल का वातावरण अजीब तरह से बदलने लगा। पत्तों की सरसराहट थम गई, हवा मानो स्थिर हो गई और चारों ओर ऐसा सन्नाटा फैल गया जो सामान्य नहीं था। यह शांति किसी विश्राम जैसी नहीं, बल्कि मृत्यु के आने से पहले की चेतावनी जैसी थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरा जंगल किसी अनदेखे भय के आगे नतमस्तक हो गया हो। आसमान में अभी हल्का-सा अंधेरा बना हुआ था और सामान्यतः इस समय उजाला फैलने लगता, पर यहाँ ऐसा नहीं हुआ। ऐसा लगा मानो सुबह ने इस स्थान में प्रवेश करने से मना कर दिया हो। न कोई पक्षी चहचहाया और न ही किसी जीव की कोई आवाज़ सुनाई दी। पूरा वन क्षेत्र पूर्ण सन्नाटे में डूब चुका था। इसी बीच पायल की आवाज़ और तेज़ होने लगी। अब वह केवल एक ध्वनि नहीं थी, बल्कि एक स्पष्ट उपस्थिति बन चुकी थी, जो धीरे-धीरे पास आती जा रही थी। हर छन-छन के साथ वातावरण और अधिक भारी तथा डरावना होता जा रहा था। तभी अचानक उनमें से एक व्यक्ति गायब हो गया। न किसी ने उसे गिरते देखा, न कोई चीख़ सुनाई दी और न ही संघर्ष का कोई संकेत मिला। एक क्षण पहले वह वहाँ था और अगले ही पल वह पूरी तरह से लुप्त हो चुका था। यह देखकर बाकी सभी लोग ठिठक गए। पहली बार उनके कदम रुक गए और उनकी दृष्टि उसी स्थान पर टिक गई जहाँ उनका साथी कुछ पल पहले मौजूद था। उन्होंने उसे खोजने की कोशिश की, आसपास नज़र दौड़ाई और जंगल में झाँका, लेकिन उन्हें वहाँ कुछ भी नहीं मिला। न कोई शरीर था, न खून का निशान और न ही कोई संकेत कि वहाँ कभी कोई था। उस स्थान पर केवल एक चीज़ बची थी—गूँजती हुई पायल की लगातार छन-छन, जो यह संकेत दे रही थी कि यह जंगल अब शिकार का मैदान बन चुका था। तभी ____ एक भयानक दृश्य ने सब कुछ बदल दिया। एक आदमी के सीने को चीरते हुए अचानक एक हाथ बाहर निकला। वह हाथ किसी पुरुष का नहीं था। कलाई में पड़ी चूड़ियाँ खनक रही थीं—खून से सनी, चमकती हुई। उस हाथ की मुट्ठी में उसी आदमी का दिल था, जो अभी भी धड़क रहा था। धक… धक… धक… हर धड़कन जंगल की खामोशी में हथौड़े की तरह गिर रही थी। उस आदमी की आँखें फटी रह गईं। मुँह खुला, पर आवाज़ नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा—निष्प्राण। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, पास खड़ा एक और व्यक्ति अजीब तरह से कांपने लगा। उसकी त्वचा लहराने लगी, जैसे वह ठोस नहीं, मोम से बनी हो। धीरे-धीरे उसका शरीर पिघलने लगा, मानो उसे किसी अदृश्य भट्टी में डाल दिया गया हो। मांस बह गया, हड्डियाँ झुक गईं, और कुछ ही क्षणों में वह ज़मीन पर फैल गया। एक के बाद एक… और भी शरीर पिघलने लगे। डर अब समझ से परे था। यह हमला नहीं था—यह संहार था। तभी जंगल ने अपनी असली शक्ल दिखाई। पेड़ हिलने लगे। शाखाएँ मरोड़ खाने लगीं। जड़ें ज़मीन के भीतर सरकने लगीं, जैसे वे भी इस रक्त-यज्ञ में भाग लेना चाहती हों। पूरा वन जीवित हो उठा—भूखा, क्रूर, और निर्दयी। और उसी खामोशी के बीच… पायल की आवाज़ फिर गूंजी। इस बार बिल्कुल पास। छन… छन… मानो कोई मुस्कुरा रहा हो। मानो मौत चलकर आ रही हो।

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जंगल के बीचों-बीच अंधेरा गहरा था। वहां से अचानक एक विशाल तना जमीन के भीतर से बाहर निकला और उन सभी लोगों को जकड़ लिया। उसकी शाखाएँ धीरे-धीरे फैल रही थीं, मानो अपनी पकड़ हर दिशा में बढ़ा रही हों। लोगों के हाथ-पैर फँस गए, और उनके गले में शाखाएँ कस गईं। अब वे चीख नहीं सकते थे, उनकी आवाज़ों पर जंगल का क़ब्ज़ा था। धीरे-धीरे तने की शाखाएँ उनके हड्डियों को तोड़ना शुरू करती हैं। कट-कट की आवाज़ जंगल में गूंजती है, जैसे कोई भयानक संगीत बज रहा हो। पर आश्चर्य की बात यह थी कि सभी लोग चुप थे। न कराह, न चीख़, न कोई विरोध—मानो मृत्यु ने उन्हें बहुत पहले ही जकड़ लिया हो। कोई आम इंसान यह देखता, तो डर के मारे बेहोश हो जाता। शायद दिल का दौरा पड़ने का खतरा भी होता। लेकिन यह सभी निर्जीव जैसे खड़े थे। जंगल की शक्ति और बढ़ गई। तना और शाखाएँ और अधिक मजबूत हो गईं। धीरे-धीरे उन सभी लोगों के शरीर हजारों टुकड़ों में बंट गए। कुछ ही समय में जंगल ने उन टुकड़ों को भी साफ कर दिया। अब इस जगह को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि थोड़ी देर पहले यहां भयानक नरसंहार हुआ था। केवल पत्तों पर काले खून की कुछ बूंदें ही बचे थे, जो इस अप्राकृतिक घटना का साक्ष्य थीं। कुछ देर बाद, पायल की छन-छन की आवाज़ धीरे-धीरे शांत हो गई। जंगल फिर से खामोश और सुनसान हो गया। हवा में कोई हलचल नहीं थी, पंछियों का चहचहाना बंद था। ऐसा लग रहा था कि यह पूरा जंगल अपनी शक्ति और रहस्य को भीतर ही भीतर दबा कर रख रहा है। और वहीं, जंगल की गहराई में, काले पोशाक के लोग और उनके अवशेष बिखरे हुए थे। जैसे कि कभी वहां कुछ हुआ ही नहीं हो। जंगल फिर पूरी तरह खामोश हो गया। वहीं पायल की छन-छन की आवाज भी अचानक गायब हो गई। सब कुछ शून्य और सुनसान लगने लगा। जंगल में अब केवल हवा की हल्की सरसराहट बची थी। लेकिन डर और रहस्य की शक्ति अभी भी वहीं मौजूद थी। जैसे कि जंगल खुद अभी भी अपनी चेतना में जागरूक था।

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