टूटा तंत्र कोर
कुछ देर बाद — या शायद बहुत समय बाद — उसे ख़ुद नहीं पता था।
एक अलग ही दुनिया में, एक तीन साल के बच्चे ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
पहले तो कुछ दिखाई ही नहीं दिया।
सब कुछ धुंधला था। जैसे किसी ने उसकी आँखों के सामने कोई मोटा, भारी पर्दा टाँग दिया हो। रोशनी थी — पर वैसी नहीं, जैसी वह जानता था। वह अस्पताल की तीखी, चुभने वाली रोशनी नहीं थी। यह नरम थी। गर्म थी। और अजीब तरह से — सुकून देने वाली।
उसने पलकें झपकाने की कोशिश की।
और पलकें झपक गईं।
यह हरकत इतनी साधारण थी — पर उसने उसे हैरान कर दिया। एक हल्की लहर उठी उसके भीतर।
"मैं… झपका पा रहा हूँ?"
पिछली याद में उसका शरीर उसका साथ छोड़ चुका था। वहाँ हर साँस एक जंग थी। हर हरकत एक सज़ा। उँगलियाँ उठाना भी जैसे पहाड़ उठाने जैसा था। लेकिन अब — अब उसके दिमाग़ का आदेश उसके शरीर तक पहुँच रहा था। बिना रुके। बिना टूटे।
जब धुंध थोड़ी कम हुई, तो उसने चारों तरफ़ देखना शुरू किया।
वह किसी अस्पताल में नहीं था।
यह कमरा बड़ा था। बहुत बड़ा।
छत ऊँची थी — इतनी ऊँची कि देखकर एक पल को सिर चकरा गया। दीवारें साफ़ थीं, चमकदार थीं। उन पर हल्के-हल्के नक़्काशीदार डिज़ाइन थे — वैसे जो किसी ऐसी जगह होते हैं जहाँ पैसे की कोई कमी नहीं। खिड़कियों से छनकर आती रोशनी फ़र्श पर सुनहरी लकीरें बना रही थी। हवा में एक हल्की-सी ख़ुशबू थी — किसी फूल की, या किसी जलती धूप की — जो बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी अस्पताल में होती है।
अस्पताल।
उस शब्द को सोचते ही उसके भीतर कुछ सिकुड़ा।
बिस्तर —
वह जिस बिस्तर पर लेटा था, वह नरम था। ज़रूरत से ज़्यादा नरम। इतना नरम कि उसका छोटा-सा शरीर उसमें धँस-सा गया था। उसका दिमाग़ तुरंत तुलना करने लगा — अस्पताल का बिस्तर इतना कठोर था कि रात को हड्डियाँ दर्द करने लगती थीं। यहाँ तो ऐसा लग रहा था जैसे बादलों पर लेटा हो।
उसने हिलने की कोशिश की।
तुरंत — एक दर्द की लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।
वह दर्द जाना-पहचाना नहीं था। पर पूरी तरह नया भी नहीं। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसके शरीर को बार-बार कुचला हो। जैसे कोई भारी चीज़ उसके ऊपर से कई बार गुज़री हो।
उसके चेहरे पर एक हल्की-सी सिकुड़न आई।
लेकिन एक बात हैरान कर रही थी — यह दर्द उसे तोड़ नहीं रहा था। पहले वाला दर्द अलग था। वह दर्द जो धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खाता है, जो हर रात और गहरा होता जाता है, जिसका कोई अंत नहीं दिखता — वह दर्द कुछ और था। यह दर्द — यह सहा जा सकता था।
"यह… अलग है।"
उसने अपने हाथ को देखने की कोशिश की।
और यहीं पर उसका दिमाग़ सच में रुक गया।
हाथ —
वे उसके हाथ नहीं थे।
वे बहुत छोटे थे। मुलायम थे। उन पर न वे नसें थीं जो बीमारी के आखिरी दिनों में त्वचा के नीचे उभर आई थीं, न वह पीलापन जो मौत के क़रीब होने की निशानी था। ये हाथ साफ़ थे। नाज़ुक थे। किसी बच्चे के हाथ।
उसने उँगलियों को हिलाया।
उँगलियाँ हिल गईं।
उसकी साँस एक पल के लिए अटक गई।
"ये… बच्चा है।"
यह एहसास धीरे-धीरे नहीं आया। यह सीधे उसके सिर पर गिरा — किसी हथौड़े की तरह।
उसने अपने पूरे शरीर को महसूस किया।
छोटा धड़। हल्की टाँगें। कमज़ोर, पर जीवित।
तीन साल। शायद उससे भी कम।
उसका दिमाग़ उस सच को मानने से इनकार कर रहा था — पर शरीर हर पल उसे याद दिला रहा था।
वह अब वह आदमी नहीं था, जो एक अंधेरे अस्पताल के कमरे में अकेले मर रहा था।
वह — फिर से जी रहा था।
कुछ देर वह बस वहीं पड़ा रहा। न हिला, न कुछ बोला। उसके भीतर एक अजीब-सा खालीपन था।
खुशी नहीं। डर भी नहीं। बस — उलझन।
"मैं मर गया था।"
"तो फिर… यह क्या है?"
उसके दिमाग़ के किसी कोने में एक नाम उभरा।
अभय।
नाम पूरी तरह साफ़ नहीं था — जैसे कोई चीज़ धुंध में छिपी हो, पर अपनी मौजूदगी जताती रहे। वह नाम उसका था — पर उसके अर्थ को समझने के लिए अभी वक़्त चाहिए था।
"अभय।"
उसने यह नाम अपने भीतर दोहराया। आवाज़ बाहर नहीं निकली। शायद यह गला भी नया था। शायद उसे अभी अभ्यास चाहिए था।
उसने महसूस किया — थोड़ी देर आराम के बाद वह शायद बैठ सकता है। चल सकता है। साँस ले सकता है — बिना जंग लड़े।
यह एहसास उसे अजीब तरह से भारी लगा।
क्योंकि पहली बार — मरने के बाद — उसके सामने आगे बढ़ने का रास्ता था।
लेकिन वह रास्ता कहाँ जाता है — यह सवाल अभी अधूरा था।
___
दरवाज़े के बाहर अचानक हलचल हुई।
अभय की नज़र उस दिशा में गई।
एक छोटी-सी लड़की — साधारण पर साफ़-सुथरी नौकरानी की पोशाक में — गलियारे से तेज़ी से दौड़ती जा रही थी। उसकी चाल में हड़बड़ाहट साफ़ झलक रही थी। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी, जैसे किसी बड़ी बात की ख़बर देने की जल्दी हो। उसकी साँसें फूली हुई थीं।
"मालकिन… मालकिन!"
उसकी पुकार पूरे गलियारे में गूँज रही थी।
अभय ने उसे देखा — पर समझ नहीं पाया।
मालकिन?
यह शब्द उसके लिए कोई अर्थ नहीं रखता था। वह जानता था कि वह किसी अमीर घर में है — पर यह सब उसके लिए बस तस्वीरों जैसा था। बिना आवाज़, बिना अर्थ।
"वह क्यों भाग रही है? और किसके लिए?"
ये सवाल उसके मन में उठे — पर जवाब तक पहुँचने से पहले ही वह फिर अपने ख़यालों में डूब गया।
उसका ध्यान अपने छोटे-से हाथों पर चला गया। उस हल्के दर्द पर जो अब भी कहीं-कहीं चुभ रहा था।
क्या यह सब सच है?
क्या यह मरते हुए दिमाग़ की आख़िरी कल्पना है?
वह इन सवालों में इतना खो गया था कि दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भी उसे ठीक से सुनाई नहीं दी।
बस अचानक — कमरे में किसी की मौजूदगी महसूस हुई।
अभय की नज़र अपने आप दरवाज़े की तरफ़ उठी।
वहाँ दो लोग खड़े थे।
एक औरत — और उसके साथ एक आदमी।
औरत का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसकी आँखें लाल थीं — जैसे वह रोते-रोते यहाँ तक आई हो, और रास्ते में रुकी न हो। उसकी साँसें उखड़ी हुई थीं, और हाथ हल्के-से काँप रहे थे। जैसे ही उसकी नज़र अभय पर पड़ी — उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक आ गई। डर, राहत और दर्द — तीनों एक साथ।
आदमी उसके पीछे खड़ा था।
उसका चेहरा सख़्त था — पर उसकी आँखें कुछ और कह रही थीं। वह मज़बूत दिखता था, पर उस मज़बूती के नीचे चिंता साफ़ झलक रही थी। कंधे तने हुए थे, जैसे वह ख़ुद को संभाले हुए हो — सिर्फ़ इसलिए कि सामने वाले को टूटता न देखना पड़े।
अभय ने दोनों को देखा।
उसके दिल में कोई पहचान नहीं जगी। कोई याद नहीं। कोई अपनापन नहीं।
बस एक सवाल —
"ये लोग कौन हैं?"
वह औरत एक पल भी नहीं रुकी।
जैसे ही उसकी नज़र पूरी तरह अभय पर पड़ी, वह तेज़ क़दमों से आगे बढ़ी — और बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
अभय का छोटा-सा शरीर अचानक एक गर्म, काँपते हुए आलिंगन में था।
वह चौंक गया।
उसका शरीर सख़्त हो गया। यह स्पर्श उसके लिए नया था। इतना पास — इतना गहरा — और इतनी भावनाओं से भरा हुआ। न उसे पता था क्या करे, न समझ आया कि इसे स्वीकार करे या हटे।
औरत रो रही थी।
उसकी सिसकियाँ अभय के कान के पास साफ़ सुनाई दे रही थीं। उसकी पकड़ मज़बूत होती जा रही थी — जैसे वह डर रही हो कि अगर ढीला किया, तो फिर से खो देगी।
"बेटा।"
उसकी आवाज़ टूट रही थी।
"बेटा, अब माँ तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेगी। कभी नहीं।"
अभय की आँखें खुली की खुली रह गईं।
माँ?
वह शब्द उसके दिमाग़ से टकराया जैसे कोई पत्थर शीशे से टकराए।
औरत रोते-रोते बोल रही थी। शब्द बिखरे हुए थे — पर भावनाएँ बिल्कुल साफ़ थीं।
"मुझे माफ़ कर दो। माँ से बहुत बड़ी ग़लती हो गई।"
एक सिसकी।
"मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रख पाई। लेकिन अब — अब सब ठीक हो जाएगा। माँ वादा करती है।"
उसकी हथेलियाँ अभय की पीठ पर सहल रही थीं। उसकी ठुड्डी उसके सिर से टिकी हुई थी। और उसके आँसू उसके छोटे-से कपड़ों को भिगो रहे थे।
अभय कुछ नहीं कर पाया।
न वह उसे वापस पकड़ सका। न ख़ुद को अलग कर पाया।
उसका दिमाग़ तेज़ी से चल रहा था।
"यह औरत — मेरी माँ है? या इस शरीर की?"
उसके भीतर एक उलझन पैदा हो गई थी — जो जल्दी सुलझने वाली नहीं थी।
उसने प्यार देखा था। पर वह प्यार — वह उसके लिए नहीं था। वह उस बच्चे के लिए था, जिसका शरीर वह अब पहन रहा था। वह बच्चा जो शायद वाक़ई उस औरत का बेटा था। वह बच्चा जो — शायद — अब यहाँ नहीं था।
आदमी चुपचाप वहीं खड़ा रहा।
उसने कुछ नहीं कहा। बस अपनी पत्नी और बच्चे को देखता रहा — जैसे यह पल उसके लिए भी आसान नहीं था। जैसे वह भी रोना चाहता था — पर रो नहीं सकता था।
कमरे में कुछ देर तक सिर्फ़ उस औरत की सिसकियाँ गूँजती रहीं।
धीरे-धीरे, उसका रोना कम हुआ।
पर कमरे में जो भारी-सी चुप्पी फैली — वह कम नहीं हुई।
अभय उस आलिंगन में था।
ज़िंदा। सुरक्षित। प्यार से घिरा हुआ।
फिर भी — अकेला।
___
उन दोनों के साथ एक और व्यक्ति कमरे में दाख़िल हुआ।
उसकी चाल धीमी थी — पर हर क़दम में अनुभव झलकता था। साधारण कपड़े, पर चेहरे पर एक अलग ही गंभीरता — वैसी जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरे पर होती है, जिन्होंने ज़िंदगी और मौत को बहुत क़रीब से देखा हो। बालों में सफ़ेदी थी। आँखों में एक थकान — पर उस थकान के पीछे एक तेज़ी भी थी, जो किसी को आसानी से नज़र न आए।
वह वैद्य था।
जैसे ही वह कमरे में पहुँचा — माहौल बदल गया।
जहाँ अभी तक सिर्फ़ भावनाएँ थीं — वहाँ अब निर्णय और भाग्य की गंध घुलने लगी।
वह बिना किसी औपचारिकता के सीधे अभय के पास आया और बिस्तर के किनारे बैठ गया। उसके हाथ स्थिर थे — न घबराहट, न जल्दबाज़ी। उसने अभय की कलाई हल्के से थामी और नाड़ी देखने लगा।
कमरे में पूरी तरह चुप्पी छा गई।
माँ की सिसकियाँ जैसे वहीं रुक गई हों।
पिता की आँखें वैद्य के हर छोटे से हाव-भाव पर टिकी थीं।
अभय सब महसूस कर रहा था — कलाई पर छूती उँगलियाँ, हाथ की हल्की गर्माहट। और उस स्पर्श के साथ एक अजीब-सी अनुभूति — जैसे कोई उसके भीतर झाँक रहा हो।
वैद्य की आँखें कुछ देर के लिए बंद हो गईं।
साँसें गहरी हो गईं।
फिर उसने दूसरी हथेली अभय के सीने के पास रखी — मानो वह सिर्फ़ शरीर नहीं, उसके भीतर किसी और चीज़ को भी टटोल रहा हो।
एक लंबा मौन।
फिर उसने आँखें खोलीं।
"महाराज," उसने शांत आवाज़ में कहा, "युवराज अब स्थिर हैं। उनकी जान को तत्काल कोई ख़तरा नहीं है।"
यह सुनते ही माँ के चेहरे पर एक पल के लिए राहत उतर आई।
पर वह पल बहुत छोटा था।
"पर—"
वह एक शब्द जैसे कमरे में गिरा नहीं — टकराया।
पिता की आँखों में तुरंत एक चमक आई।
"पर क्या?"
उनकी आवाज़ में अनुरोध नहीं था। वह आदेश था।
वैद्य का गला सूख गया। उसने हल्का-सा सिर झुकाया। और फिर, जैसे हर शब्द को तोलकर बोल रहा हो —
"महाराज… युवराज का तंत्र-कोर… तोड़ दिया गया है।"
उस पल कमरे में जो सन्नाटा फैला — वह किसी चीख़ से ज़्यादा भारी था।
पिता का चेहरा सख़्त हो गया।
"बकवास।"
उन्होंने गुस्से में कहा। एक क़दम आगे बढ़े।
"वैद्य, तुम्हारा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया? अगर तंत्र-कोर टूट गया होता — तो इस बच्चे की साँसें अभी तक चल ही नहीं रही होतीं!"
उनके शब्दों में तर्क था। इस दुनिया का नियम था।
तंत्र-कोर ही जीवन का आधार था। उसके बिना — जीवन असंभव।
यह सुनते ही माँ का बाँध टूट गया।
वह और ज़ोर से रोने लगी। उसने अभय को फिर से कसकर पकड़ लिया — जैसे उसे इस सच से बचा लेना चाहती हो।
"नहीं… ऐसा नहीं हो सकता। मेरा बेटा…"
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
वैद्य ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। चेहरा और भी पीला पड़ गया।
"महाराज," उसने धीरे से कहा, "यह बात — वैसी है भी, और नहीं भी।"
"पहेलियाँ मत बुझाओ।" पिता की आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था — पर उसकी जगह जो था, वह शायद और भी ख़तरनाक था। "पूरी बात साफ़-साफ़ बताओ।"
वैद्य ने गहरी साँस ली।
"युवराज पर जिन लोगों ने हमला किया — उन्होंने सिर्फ़ हत्या का प्रयास नहीं किया।"
उसके शब्द कमरे में धीरे-धीरे भारी होते चले गए।
"उन्होंने ज़हर का भी इस्तेमाल किया था।"
यह सुनते ही पिता का चेहरा बदल गया।
यह अब सिर्फ़ एक हादसा नहीं था।
यह एक साज़िश थी।
वैद्य आगे बोला — आवाज़ काँप रही थी।
"वह ज़हर शरीर को नहीं — तंत्र-कोर को निशाना बनाता है। उसने कोर को पूरी तरह नष्ट नहीं किया — पर उसे तोड़ दिया। अधूरा बना दिया।"
कमरे में फिर से सन्नाटा।
अभय यह सब सुन रहा था। शब्द उसके कानों में जा रहे थे।
तंत्र-कोर। साधना। ज़हर।
पर एक बात साफ़ थी —
यह जीवन — सामान्य नहीं होने वाला था।
___
वैद्य ने एक पल के लिए चुप्पी साध ली।
उसकी आँखें नीचे झुकी थीं — जैसे जो कहने जा रहा है, उसका बोझ पहले ख़ुद पर लेने की कोशिश कर रहा हो। कमरे में हर व्यक्ति उस चुप्पी को महसूस कर सकता था। यह चुप्पी साधारण नहीं थी — यह आने वाले सच की आहट थी।
"महाराज," वैद्य ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया, "यह ज़हर — बहुत ही दुर्लभ है।"
उसने यह शब्द ऐसे कहे जैसे हर अक्षर का अपना वज़न हो।
"इतना दुर्लभ कि सामान्य तांत्रिक या साधारण वैद्य इसके बारे में सुनते तक नहीं। लगभग न के बराबर पाया जाता है। इसे तैयार करने की विधि भी हर किसी को ज्ञात नहीं।"
राजा की आँखें सिकुड़ गईं।
यह कोई अच्छी ख़बर नहीं थी।
वैद्य ने गहरी साँस ली।
"यह ज़हर शरीर में आम विषों की तरह नहीं फैलता। यह ख़ून को नहीं जलाता। अंगों को नहीं सड़ाता। इसका लक्ष्य केवल एक होता है — तंत्र-कोर।"
यह सुनते ही कमरे का तापमान जैसे गिर गया।
"यह ज़हर," वैद्य ने समझाते हुए कहा, "युवराज के तंत्र-कोर के चारों ओर फैल चुका है। ठीक वैसे ही — जैसे कोई अदृश्य दीवार कोर को चारों तरफ़ से घेर ले।"
उसने अपनी उँगलियों से हवा में एक गोल आकृति बनाई।
"इस घेरे के बनने के बाद, तंत्र-कोर तक किसी भी प्रकार की ऊर्जा नहीं पहुँच पाती। न बाहरी ऊर्जा — न ही शरीर के भीतर उत्पन्न होने वाली।"
माँ की आँखें फैल गईं।
उसके होंठ काँपने लगे।
"तो… इसका मतलब…?"
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी — जैसे वह जवाब सुनना ही नहीं चाहती हो।
वैद्य ने सिर झुका लिया।
"इसका मतलब यह है, महारानी — कि युवराज तंत्रिका साधना नहीं कर पाएँगे।"
ये शब्द कमरे में गूँजने लगे।
तंत्रिका साधना —
एक राजकुमार के लिए यह केवल शक्ति का मार्ग नहीं था। यह उसका भविष्य था। उसकी पहचान थी। उसकी सुरक्षा थी। और उसकी राज्य के प्रति उपयोगिता थी।
राजा कुछ नहीं बोले।
उनका गुस्सा अब शांत हो चुका था — पर उसकी जगह जो ले ली थी, वह और भी ख़तरनाक थी। एक ठंडी, क्रूर समझ।
अगर युवराज साधना नहीं कर पाएगा — तो उत्तराधिकार कमज़ोर होगा।
और कमज़ोर उत्तराधिकारी — राज्य के लिए ख़तरा।
वैद्य ने बात जारी रखी।
"यह स्थिति मृत्यु से अलग है, महाराज। शरीर जीवित रहेगा। साँसें चलती रहेंगी। लेकिन साधना का मार्ग — बंद रहेगा।"
माँ अब ख़ुद को संभाल नहीं पा रही थी।
उसने अभय को और कसकर पकड़ लिया — जैसे उसे इस दुनिया के सच से दूर रख सके। जैसे माँ का आलिंगन किसी भी सच्चाई से बड़ा हो सकता हो।
"नहीं। मेरा बेटा।"
उसकी आवाज़ में अब चीख़ नहीं थी। बस खालीपन था — जो चीख़ से कहीं ज़्यादा दर्दनाक था।
राजा ने आख़िरकार बोलना चुना।
"तुम यह सब इतनी निश्चितता से कैसे कह सकते हो?"
उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था — सिर्फ़ संदेह और सावधानी।
वैद्य ने सिर उठाया।
"महाराज — मैं इस ज़हर को इसलिए पहचान पाया — क्योंकि यह आपके शत्रु राज्य का सबसे ख़तरनाक ज़हर है।"
यह सुनते ही राजा की आँखों में एक अलग ही चमक आई।
शत्रु राज्य।
वह नाम लिए बिना ही समझ गए। वह राज्य — जो खुले युद्ध से ज़्यादा छाया में वार करता था। जहाँ तलवार से पहले ज़हर चलाया जाता था। जहाँ दुश्मन को मारने से ज़्यादा — उसे तोड़ने पर विश्वास किया जाता था।
"यह ज़हर," वैद्य ने कहा, "उसी राज्य के शाही तांत्रिकों द्वारा विकसित किया गया था। इसे ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए बनाया गया था — जिनका तंत्र-कोर मज़बूत होता है।"
उसने अभय की ओर देखा।
"ऐसे युवराजों के लिए।"
कमरे में फिर सन्नाटा।
अभय यह सब सुन रहा था।
तंत्र-कोर। साधना। युवराज।
पर एक भावना साफ़ थी —
कुछ उससे छीना गया था। कुछ ऐसा, जो उसे कभी मिला ही नहीं था — फिर भी उसका होना चाहिए था।
उसने अपनी छोटी-सी मुट्ठी हल्के से भींच ली।
वह अभी बच्चा था। कमज़ोर था। बिस्तर पर पड़ा हुआ था।
लेकिन उसके भीतर — कहीं बहुत गहरी जगह — कुछ चुपचाप बदलने लगा था।
___
अभय की आँखें खुली हुई थीं।
पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी बहुत गहरे सपने के भीतर फँसा हो — और सपना था ही नहीं।
आवाज़ें उसके कानों तक आ रही थीं। स्पष्ट। साफ़। पर समझ से परे।
कोई "युवराज" कह रहा था। कोई "तंत्र-कोर" की बात कर रहा था। कोई ज़हर, कोई शत्रु राज्य, कोई साधना।
अभय के मन में बस एक ही विचार था —
"ये सब क्या है? ये लोग कौन हैं? और ये मुझसे ऐसे क्यों बात कर रहे हैं — जैसे मैं कोई और हूँ?"
उसने बोलने की कोशिश की।
गला हिला। होंठ काँपे।
पर आवाज़ बाहर नहीं आई।
उस पल पहली बार उसे एहसास हुआ — यह शरीर अभी तक उसका नहीं बना था।
तभी अचानक — किसी ने उसे कसकर बाँहों में भर लिया।
बहुत कसकर।
इतना कसकर कि उसकी साँसें रुकने लगीं।
वह औरत — जिसकी आँखें लाल थीं, चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ, और हाथ काँप रहे थे — वह उसे सीने से लगाए रो रही थी।
"बेटा… मेरा अभय।"
उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
"चिंता मत करो बेटा। सब ठीक हो जाएगा। माँ यहाँ है।"
अभय का शरीर सख़्त हो गया।
बेटा? मेरा?
वह शब्द — "माँ" — उसके दिमाग़ में जैसे एक दीवार से टकराया।
औरत ने उसका सिर अपने कंधे से लगा लिया।
"तुम भले ही साधना न कर सको — पर माँ तुम्हारी हर तकलीफ़ ख़ुद सह लेगी।"
माँ।
अभय का दिल ज़ोर से धड़का।
उसने धीरे से उस औरत की तरफ़ देखा।
चेहरे पर कोई पहचान नहीं। कोई याद नहीं। कोई जुड़ाव नहीं।
सिर्फ़ एक अजनबी — जो उसे माँ की तरह पकड़ रही थी।
उसने बड़ी मुश्किल से होंठ खोले। आवाज़ कमज़ोर थी। लगभग फुसफुसाहट जैसी।
"आप… आप कौन हैं?"
यह शब्द जैसे कमरे की दीवारों से टकराकर टूट गए।
औरत की पकड़ ढीली पड़ गई।
उसकी साँस अटक गई।
वह आदमी — जो अभी तक वैद्य से बात कर रहा था — अचानक मुड़ गया। उसकी आँखें अभय पर टिक गईं। पहली बार — उस चेहरे से गुस्सा ग़ायब था।
वहाँ सिर्फ़ — डर था।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
"अभय बेटा।"
उसकी आवाज़ भारी हो गई थी।
"क्या तुम… अपने पापा को नहीं पहचानते?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अभय ने उस आदमी को देखा। ऊँचा क़द। राजसी वस्त्र। एक गंभीर चेहरा जो अभी तक मज़बूत दिखने की कोशिश में था।
उसके दिल में कोई हलचल नहीं हुई। कोई याद नहीं उभरी। कोई तस्वीर नहीं बनी।
धीरे से — बहुत धीरे से —
अभय ने अपना सिर "ना" में हिला दिया।
बस इतना ही।
कोई शब्द नहीं। कोई सफ़ाई नहीं। सिर्फ़ एक छोटा-सा इशारा।
और उसी पल —
वह औरत ज़मीन पर बैठ गई।
जैसे उसके घुटनों से सारी ताक़त एक साथ निकल गई हो।
"नहीं।"
उसके मुँह से बस यही निकला।
वह आदमी वहीं खड़ा रहा।
राजा। पिता। और अब — एक ऐसा इंसान, जिसे उसका ही बेटा नहीं पहचान रहा था।
अभय सब देख रहा था।
पर उसे समझ नहीं आ रहा था — इन सबका उससे क्या रिश्ता है।
उसे नहीं पता था —
यह सपना नहीं है।
यह उसकी नई ज़िंदगी की शुरुआत है।
___
राजा ने भारी आवाज़ में वैद्य की ओर देखा।
"और यह क्या है, वैद्य?"
आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था — बस एक ठंडा, थका हुआ सवाल।
वैद्य ने एक पल के लिए अभय की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर दया और संकोच दोनों साफ़ झलक रहे थे।
"महाराज," वह धीरे से बोला, "तंत्र-कोर और उसके स्वामी का संबंध टूट जाने पर ऐसा होना — असाधारण नहीं है। स्मृति का धुंधला होना, अपनों को न पहचान पाना — यह सब अस्थायी हो सकता है।"
राजा की आँखों में उम्मीद की एक हल्की-सी चमक आई।
"तो वह ठीक हो जाएगा? याद लौट आएगी?"
वैद्य ने एक पल रुककर कहा — "यादें — कुछ समय में लौट सकती हैं। पर…"
उसकी आवाज़ रुक गई।
राजा का चेहरा फिर कठोर हो गया।
"पर क्या।"
यह सवाल नहीं था। आदेश था।
"पर युवराज — अब कभी साधना नहीं कर पाएँगे।"
ये शब्द कमरे में किसी भारी पत्थर की तरह गिरे।
रानी की सिसकियाँ फिर तेज़ हो गईं।
राजा की मुट्ठियाँ भींच गईं — पर वह कुछ नहीं बोले।
दोनों धीमी आवाज़ में बात करने लगे —
राज्य। शत्रु। भविष्य। उत्तराधिकारी।
वे शब्द जो बड़े लोग तब बोलते हैं जब कोई छोटी-सी तकलीफ़ उनके लिए बड़ी राजनीति बन जाती है।
पर अभय —
अभय यह सब सुन रहा था।
शब्द उसके कानों में जा रहे थे।
तंत्र-कोर। साधना। युवराज।
और फिर अचानक — उसके दिमाग़ में एक नाम बिजली की तरह कौंधा।
अभय।
उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा।
रुको।
यह नाम —
उसकी आँखें फैल गईं।
उसे याद आया।
अपने पिछले जीवन का एक टुकड़ा — तांत्रिक अकादमी का। वह dark fantasy game, जिसे उसने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में पूरा किया था।
उस game में —
सबसे ख़तरनाक खलनायक का नाम भी अभय था।
अभय की साँस अटक गई।
उसका गला सूखने लगा।
नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।
लेकिन यादें रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।
वह खलनायक — जिसका तंत्र-कोर सामान्य नहीं था। जिसे साधारण साधना से शक्ति नहीं मिलती थी। उसकी शक्ति बढ़ती थी —
बलि से।
नरबलि।
यादें अब साफ़ होने लगीं।
ख़ून से सना हुआ एक विशाल यज्ञ स्थल। आग की लपटों में चीखते लोग। आसमान तक उठती काली ऊर्जा।
एक राज्य — पूरा का पूरा राज्य —
पुरुष। स्त्रियाँ। बच्चे। गर्भवती माताएँ।
सबकी बलि।
सिर्फ़ शक्ति पाने के लिए।
वह खलनायक सभी में सबसे ख़तरनाक था। सबसे निर्दयी। सबसे ताक़तवर। और उसका अंत —
game के अंत में भी नहीं आया था।
वह खलनायक किसी ने नहीं हराया था।
और अब —
अगर मैं वही अभय हूँ —
तो मेरा अंत — पहले से तय है।
अभय का शरीर काँपने लगा।
सीने में तेज़ दर्द उठने लगा।
नज़र धुंधली होने लगी।
वह कुछ कहना चाहता था। चिल्लाना चाहता था। सच बताना चाहता था —
पर शब्द बाहर नहीं आए।
उसने बस इतना देखा —
अपनी तरफ़ भागते हुए दो चेहरे।
एक औरत — जिसकी आँखों में सिर्फ़ डर और ममता थी।
एक आदमी — जिसका चेहरा मज़बूत दिखने की कोशिश कर रहा था, पर आँखों में टूटन साफ़ थी।
उस पल —
खलनायक की उन यादों के बीच —
अभय ने उन्हें देखा।
अपने इस जन्म के माता-पिता।
और फिर —
अंधेरा।
उसकी चेतना टूट गई।
शरीर बिस्तर पर निढाल पड़ गया।
कमरे में अफ़रा-तफ़री मच गई।
"अभय!"
"युवराज!"
पर अभय अब कुछ नहीं सुन रहा था।
उसका मन एक ही सवाल में डूब चुका था —
अगर मैं वही खलनायक हूँ — तो क्या इस बार भी मेरा रास्ता ख़ून से ही होकर जाएगा?
क्या यही मेरी नियति है?
या —
क्या मैं इसे बदल सकता हूँ?
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