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अंधेरे की पुकार
📚 Journey of the Mantralok

अंधेरे की पुकार

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इधर दूसरी ओर, अभय की माँ उसे अपनी काँपती बाँहों में थामे हुई थी।

उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। हर सिसकी के साथ उसका दिल जैसे थोड़ा और टूटता जा रहा था — जैसे कोई चीज़ भीतर से धीरे-धीरे बिखर रही हो। उसे ऐसा लग रहा था मानो यह उसकी आख़िरी रात हो। मानो वह अपने पुत्र को हमेशा के लिए खो चुकी हो।

रोते-रोते कब उसकी आँखें भारी हो गईं — उसे ख़ुद भी पता नहीं चला।

अभय को सीने से लगाए, उसी अवस्था में वह सो गई।

पर उसे क्या पता था —

जिस पुत्र को वह शांत नींद में सोता हुआ समझ रही थी, वही अभय इस समय अपने भीतर एक महायुद्ध लड़ रहा था।

___

अभय की चेतना एक अनजान लोक में खड़ी थी।

वहाँ वह ख़ुद को देख रहा था — एक और अभय, जो उससे बिल्कुल अलग था, फिर भी वही था।

चारों ओर उजाला फैला हुआ था। आकाश स्वच्छ था। हवा में एक ऐसी शांति थी जो असली दुनिया में कभी नहीं मिलती। वह अपने पिछले जन्म के माता-पिता के साथ हँस रहा था, खेल रहा था। उनकी हँसी सच्ची थी — निश्छल, किसी डर से मुक्त।

यह उसका पिछला जन्म था।

वह यादें, जो उसने कभी जानबूझकर नहीं जानी थीं — आज उसके सामने जीवित थीं।

माँ का स्नेह। पिता का कंधों पर बैठाकर घुमाना। और वह सुरक्षा — जो हर बच्चे को मिलनी चाहिए, पर हर बच्चे को नहीं मिलती।

अभय उन पलों को देखकर कुछ क्षण के लिए भूल गया — कि वह कौन है। कहाँ है। और क्यों है।

उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ गई।

लेकिन तभी —

उजाले में दरार पड़ने लगी।

हवा ठंडी हो गई। आकाश का रंग बदलने लगा। दूर कहीं से अंधकार रेंगता हुआ आ रहा था — धीरे, पर निश्चित। जैसे उसे कोई जल्दी नहीं थी। जैसे वह जानता था — यह जगह उसी की है।

अभय का हृदय ज़ोर से धड़क उठा।

पहले तो भय ने उसे जकड़ लिया। उसका शरीर काँपने लगा। वह पीछे हटना चाहता था — पर पैर जैसे ज़मीन में जड़ हो गए हों।

अंधकार उसके चारों ओर फैलने लगा। मानो वह उसकी यादों को निगलना चाहता हो।

वह अंधकार केवल खालीपन नहीं था। उसमें क्रोध था। लालच था — पर साधारण लालच नहीं। शक्ति की लालच। और रक्त की गंध।

अभय को अचानक कुछ याद आया।

एक नाम।

एक चेहरा।

एक भयावह अस्तित्व।

अभय।

तांत्रिक खेल का वह खलनायक — जिसने अपने तंत्र-कोर को रक्त से सींचा था। जिसने पूरे राज्य की बलि चढ़ा दी थी — अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए।

"नहीं।"

अभय के होंठ काँपे।

"क्या मैं… वही हूँ?"

डर ने उसके मन को जकड़ लिया। उसे लगा जैसे यह अंधकार उसी का प्रतिबिंब हो। जैसे वह अपना ही चेहरा आईने में देख रहा हो — पर आईने में जो है, वह उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है।

लेकिन तभी —

उसके भीतर कुछ बदला।

उसने गहरी साँस ली।

अपने काँपते मन को स्थिर किया।

"अगर यह मेरा अतीत है।"

वह ख़ुद से बोला।

"तो मैं इससे भागूँगा नहीं।"

उसकी आँखों में दृढ़ता चमक उठी — वैसी दृढ़ता, जो किसी तीन साल के बच्चे में नहीं होती।

अंधकार और पास आया।

पर इस बार अभय नहीं डरा।

वह खड़ा रहा — सीधा, शांत, आँखें खुली।

उस क्षण अंधकार रुक गया।

मानो पहली बार किसी ने उसे चुनौती दी हो। मानो वह इस जवाब के लिए तैयार नहीं था।

अभय की चेतना के भीतर एक हल्की-सी चमक उत्पन्न हुई।

यह कोई साधारण ऊर्जा नहीं थी — यह स्मृति और इच्छाशक्ति का संगम था। दो जन्मों का बोझ, एक निर्णय में।

और उसी क्षण —

वास्तविक संसार में, बिस्तर पर सोए अभय की भौंहें हल्के से हिलीं।

उसके चेहरे पर शांति बनी रही —

पर उसके भीतर…

एक नई कहानी जन्म ले चुकी थी।

___

अभय उस अंधकार की ओर बढ़ने लगा।

उसे ख़ुद भी समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।

सामान्य स्थिति में कोई भी इंसान उस दिशा से दूर भागता। कोई भी उस अज्ञात, डरावने अंधेरे की ओर क़दम नहीं बढ़ाता। पर अभय के भीतर कुछ ऐसा था — जो उसे रोक नहीं पा रहा था।

यह केवल जिज्ञासा नहीं थी। और न ही यह पूरी तरह मूर्खता कही जा सकती थी।

यह ऐसा था — जैसे उस अंधकार के भीतर कोई उसे बुला रहा हो। जैसे कोई भूली-बिसरी आवाज़ उसके मन के सबसे गहरे कोने से पुकार रही हो।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

चारों ओर सब कुछ काले अंधेरे से ढका हुआ था। न ज़मीन साफ़ दिखाई दे रही थी, न आसमान, न दिशा, न अंत। बस एक अंतहीन शून्य — जो साँस लेने की आवाज़ भी सोख लेता था।

फिर अचानक —

उस अंधेरे के बीच कुछ हिला।

धुँधले, काले बादल — अजीब से, भारी और गाढ़े। वे धीरे-धीरे एक जगह इकट्ठा होने लगे — मानो किसी अनदेखी शक्ति के इशारे पर आकार ले रहे हों।

अभय रुक गया।

उसके भीतर हल्का डर पैदा हुआ — पर वह डर उसे पीछे नहीं खींच रहा था। बल्कि उसके क़दम और मज़बूत हो गए।

काले बादलों के बीच अचानक एक दृश्य उभरा।

वह ख़ुद को देख रहा था।

पर यह वह अभय नहीं था जो अभी वहाँ खड़ा था। यह उसका असली अभय था — इस दुनिया का अभय। एक छोटा-सा बच्चा, जिसकी आँखों में मासूमियत और आत्मविश्वास दोनों थे। एक बच्चा जो दुनिया से डरा नहीं था — जो हर चीज़ को उत्सुकता से देखता था।

वह देख रहा था — कैसे वह बचपन से ही असाधारण था। कैसे छोटी उम्र में उसने एक जंगली भेड़िये को हरा दिया था। कैसे डर उसके लिए कभी बाधा नहीं बना था।

फिर दृश्य बदला।

वह अपनी माँ के हाथों का बना खाना खा रहा था। चेहरे पर सच्ची मुस्कान। आँखों में खुशी। उस पल में कोई अंधकार नहीं था। कोई लालच नहीं। कोई क्रूरता नहीं।

अभय का मन काँप उठा।

"तो यही था।"

"असल मैं।"

लेकिन उसे ज़्यादा देर उस शांति में रहने नहीं दिया गया।

काले बादल फिर से हिले — तेज़ी से, क्रूरता से। वह दृश्य टूट गया — जैसे किसी ने जबरदस्ती स्मृति को चीर दिया हो।

अगला दृश्य बना।

वह वही रात थी।

काले लिबास पहने लोग। छुपे हुए चेहरे। ठंडी आँखें। हमला। चारों ओर अफ़रा-तफ़री। दर्द। ख़ून। असहायता।

अभय यह सब देख रहा था — पर इस बार वह चिल्ला नहीं पाया। भाग नहीं पाया।

बस देखता रहा।

उसके भीतर कुछ टूटा।

फिर —

काले बादल एक बार और आकार बदले।

इस बार जो दृश्य बना — वह पहले से भी ज़्यादा भयावह था।

एक विशाल क़ब्रिस्तान।

जहाँ तक नज़र जाती थी — क़ब्रें ही क़ब्रें। लाखों क़ब्रें। हवा भारी थी। ख़ामोशी इतनी गहरी कि साँसों की आवाज़ भी डरावनी लगने लगे।

अभय बिना कुछ बोले आगे बढ़ने लगा।

एक पतले-से रास्ते पर — जिसका अंत दिखाई नहीं देता था।

हर क़दम के साथ उसके भीतर एक अजीब शांति उतरती जाती थी। न डर। न पछतावा। मानो वह जानता हो — यह रास्ता उसके सच तक ले जाएगा।

और जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया —

क़ब्रों के बीच खड़ा वह अकेला बालक — धीरे-धीरे अपने उस अस्तित्व की ओर बढ़ रहा था, जिससे वह भागना चाहता था।

___

अंत में, वह रास्ता उसे एक ऐसे स्थान पर ले आया जहाँ हवा तक मरी हुई लगती थी।

क़ब्रों की कतारें अचानक थम गईं —

और उनके बीच खड़ा था —

एक वीरान, टूटा-फूटा मंदिर।

अभय वहीं रुक गया।

पहली नज़र में ही उसे कुछ बहुत ग़लत महसूस हुआ। यह अनुभूति उँगलियों से नहीं, आत्मा से महसूस होती थी — जैसे भीतर कुछ सिकुड़ रहा हो।

"क़ब्रिस्तान… और यहाँ मंदिर?"

उसने धीरे-धीरे चारों ओर देखा।

यह एक ईसाई क़ब्रिस्तान था — लकड़ी के टूटे हुए क्रॉस, ज़मीन में धँसी क़ब्रें, और उन पर जले हुए नाम। और ठीक उनके बीच — एक मंदिर।

अभय के भीतर अजीब-सी सिहरन दौड़ गई।

यह असंगति डरावनी थी। जैसे दो अलग-अलग वास्तविकताओं को जबरदस्ती एक साथ जोड़ दिया गया हो।

वह मंदिर बाहर से ही इतना विशाल था कि उसकी ऊँचाई का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। उसकी दीवारें ऊपर जाती चली जाती थीं — जैसे उनका कोई अंत ही न हो। पत्थर काले पड़ चुके थे। दरारों में से अजीब-सी ठंडी हवा निकल रही थी।

अभय को ऐसा लगा — जैसे यह मंदिर उसे देख रहा हो।

वह जानता था — उसे यहाँ से लौट जाना चाहिए।

पर उसके क़दम आगे बढ़ते चले गए।

मंदिर के मुख्य द्वार के सामने आकर वह रुका।

दरवाज़ा बेहद विशाल था। मोटा, भारी और प्राचीन। ऐसा दरवाज़ा जिसे एक छोटा बच्चा हिला भी नहीं सकता।

अभय ने धीरे से अपना हाथ उस पर रखा।

हाथ काँपा।

उसने हल्की-सी दस्तक दी।

ट… ट…

कुछ नहीं हुआ।

वह एक पल रुका — फिर दोबारा दस्तक दी। थोड़ी ज़ोर से।

फिर भी कुछ नहीं।

वह मुड़ा। कुछ क़दम वापस चला। पर फिर — न जाने क्या सूझा — वापस आया।

और उसने उस दरवाज़े को धक्का दिया।

यह ख़याल ही बेतुका था — एक तीन साल का बच्चा, दो मंज़िल लंबे दरवाज़े को धक्का देकर खोलने की कोशिश कर रहा है।

पर तभी —

"की — की — की —"

एक डरावनी आवाज़ गूँजी।

अभय की आँखें फैल गईं।

वह दरवाज़ा — खुल रहा था।

भारी पत्थर का वह द्वार — जिसे खोलना असंभव होना चाहिए था — धीरे-धीरे अपने आप खुलने लगा।

जैसे उसे इसी का इंतज़ार था।

अभय पीछे नहीं हटा।

उसने अंदर क़दम रख दिया।

___

अंदर का दृश्य उसकी साँसें रोक देने वाला था।

चारों ओर — कंकाल।

हर तरफ़ बिखरे हुए मानव कंकाल। कुछ दीवारों से चिपके हुए — जैसे आख़िरी वक़्त में उन्होंने दीवार को पकड़ने की कोशिश की हो। कुछ ज़मीन पर गिरे हुए। और कुछ ऐसे — जैसे भागते-भागते वहीं मर गए हों।

उनकी हड्डियाँ टूटी हुई थीं। खोपड़ियों पर गहरे निशान थे।

यह साफ़ था —

उन्हें मारा गया था। और वह भी बेरहमी से।

अभय का गला सूख गया।

उसने एक क़दम आगे बढ़ाया।

तभी उसकी नज़र ऊपर गई।

मंदिर की छत — सामान्य नहीं थी।

वहाँ कोई ठोस छत नहीं थी। हवा में — लाशें तैर रही थीं।

मानव शरीर — आधे जले हुए, मरोड़े हुए, और फिर भी हवा में स्थिर। उनके चारों ओर आग जल रही थी। लेकिन वह आग उन्हें पूरी तरह जला नहीं रही थी।

वे जल रहे थे — लगातार।

न गिर रहे थे। न ख़त्म हो रहे थे।

बस जलते रहे।

अभय की आँखें काँप गईं।

उसके भीतर डर उठा — पर पैर पीछे नहीं हटे।

उसे ऐसा लगा जैसे यह सब पहले भी देखा हो। जैसे यह दृश्य किसी भूली हुई स्मृति का हिस्सा हो — किसी ऐसे अतीत का, जो उसने जिया तो था, पर जिसे वह याद नहीं रखना चाहता था।

मंदिर के भीतर एक अजीब-सी गूँज थी।

कोई आवाज़ नहीं — फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे हज़ारों चीखें दीवारों में कैद हों। जैसे इन पत्थरों ने उन सबकी पीड़ा सोख ली हो — और अब उसे धीरे-धीरे बाहर उगल रहे हों।

अभय आगे बढ़ता रहा।

हर क़दम के साथ उसका दिल भारी होता जाता था।

उसे समझ में आने लगा —

यह मंदिर कोई साधारण स्थान नहीं है।

यह बलि का स्थान है। पाप का भंडार है। और शायद — उसकी क़िस्मत की जड़।

मंदिर के बीचों-बीच एक अंधकार खड़ा था।

गहरा। शांत। और बुलाता हुआ।

अभय वहीं रुक गया।

उसके चेहरे पर डर नहीं था। न ही घृणा।

बस एक अजीब-सी शांति — जैसे वह जानता हो कि अब पीछे लौटने का रास्ता बंद हो चुका है।

और इसी मंदिर में, इसी क्षण —

अभय के भीतर का युद्ध अपने सबसे ख़तरनाक मोड़ की ओर बढ़ने लगा।

___

यह सब देखने के बाद भी अभय के क़दम नहीं रुके।

उसका दिल तेज़ धड़क रहा था — पर पैर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। जैसे किसी ने उसके भीतर से डर को अलग कर दिया हो। निकाल दिया हो। और उसकी जगह कुछ और भर दिया हो — कुछ जो शांत था, पर ख़ाली नहीं।

वह आगे बढ़ता गया।

उसे ख़ुद नहीं पता कि रास्ता कैसे मिल रहा था। न कोई निशान, न कोई दिशा। फिर भी वह भटक नहीं रहा था।

जैसे यह जगह उसे रास्ता दिखा रही हो।

रास्ते के दोनों ओर पड़े कंकाल। आधे जले हुए शव। टूटी हड्डियाँ।

उन्हें देखकर अभय को एहसास हुआ —

यही रास्ता है।

मानो ये लोग — जब ज़िंदा थे — इसी दिशा में दौड़े होंगे। किसी को रोकने के लिए। किसी ऐसी शक्ति को, जो उनके लिए बहुत ज़्यादा थी।

और अब — मौत के बाद भी — उनके शरीर इसी रास्ते की ओर इशारा कर रहे थे।

"शायद इन लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की होगी।"

अभय ने सोचा।

"और अंत में इन्हें सिर्फ़ एक ही चीज़ मिली — मौत।"

यह सोचकर उसकी रीढ़ में हल्की सिहरन दौड़ गई — पर वह रुका नहीं।

___

कुछ दूर आगे बढ़ते ही उसके क़दम अपने आप थम गए।

उसके सामने —

कंकालों का एक विशाल पहाड़ खड़ा था।

हज़ारों — नहीं — शायद लाखों हड्डियाँ। खोपड़ियाँ, रीढ़, हाथ, पैर — सब एक-दूसरे में उलझे हुए। जैसे किसी ने जानबूझकर उन्हें इस तरह जमा किया हो। जैसे यह संग्रह था — किसी का गर्व था।

पहली नज़र में अभय डर गया।

साँस अटकी। आँखें फैलीं।

पर अगले ही पल — उसने ख़ुद को संभाल लिया।

उसके भीतर एक ठंडी-सी शांति उतर आई।

"अगर सामने वाले को कुछ करना होता —"

"तो वह अब तक कर चुका होता।"

यह सोच उसके डर को काट गई।

वह कंकालों के उस पहाड़ को ध्यान से देखने लगा।

पर तभी — उसकी नज़र कुछ और ही चीज़ पर चली गई।

कंकालों के उसी पहाड़ के पीछे — एक और पहाड़ खड़ा था।

लेकिन यह हड्डियों का नहीं था।

यह —

एक विशाल इंसानी खोपड़ी का पहाड़ था।

इतनी बड़ी कि उसकी ऊँचाई देखकर अभय की गर्दन अपने आप ऊपर उठ गई। एक पूरी पहाड़ी — खोपड़ी के आकार में। जैसे किसी दैत्य का सिर ज़मीन में धँसा दिया गया हो।

खोपड़ी का एक हिस्सा टूटा हुआ था — जैसे किसी देवस्तर की शक्ति ने उसे तोड़ दिया हो।

और उसी टूटी हुई खोपड़ी के बीचों-बीच —

एक विशाल त्रिशूल धँसा हुआ था।

वह त्रिशूल साधारण नहीं था।

उसका आकार एक कई-मंज़िला इमारत जितना विशाल था। त्रिशूल की नोक खोपड़ी को पूरी तरह छेदती हुई उसे ज़मीन में एक कील की तरह ठोक रही थी।

मानो इस पूरी खोपड़ी के पहाड़ को — इसी त्रिशूल ने बाँधकर रखा हो। ताकि वह हिले नहीं। ताकि जो भीतर है — वह बाहर न आ सके।

त्रिशूल के चारों ओर काली और नीली आभा घूम रही थी।

हवा वहाँ पहुँचकर मुड़ जाती थी — जैसे वह भी उस शक्ति से डरती हो।

अभय की साँसें अपने आप धीमी हो गईं।

उसके भीतर एक अजीब-सा एहसास पैदा हुआ —

यह कोई सज़ा थी।

कोई चेतावनी नहीं।

यह किसी राजा को बाँधकर रखने का तरीका था।

___

अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

खोपड़ी के उस विशाल मुँह के भीतर एक रास्ता जाता दिखाई दे रहा था।

अंदर — अंधकार था।

लेकिन वह अंधकार खाली नहीं था। वह भारी था। पुराना था। और राजसी था। जैसे किसी सिंहासन में बैठी चुप्पी — जो शब्दों से ज़्यादा बोलती है।

अभय बिना रुके उस खोपड़ी के भीतर क़दम रख दिया।

अंदर का दृश्य उसकी सोच से भी ज़्यादा भयानक और भव्य था।

खोपड़ी के भीतर —

एक पूरा राज दरबार बना हुआ था।

काले पत्थरों से बने खंभे — इतने ऊँचे कि उनकी चोटी अंधेरे में खो जाती थी। दीवारों पर जमी सूखी रक्त-रेखाएँ — जैसे किसी ने अपने हाथों से कुछ लिखा हो, और फिर वे हाथ कभी न उठे।

और ज़मीन पर उकेरे गए अजीब, प्राचीन चिन्ह —

जो किसी भाषा में नहीं थे।

जो किसी इतिहास में नहीं थे।

जो सिर्फ़ — थे।

अभय वहाँ खड़ा था।

तीन साल का एक बच्चा। एक ऐसे दरबार में, जो शायद उसी के लिए बना था।

उसने आगे देखा।

सिंहासन था।

खाली।

पर उसके इर्द-गिर्द जो था — वह खाली नहीं था।

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