8 हाथो वाला कंकाल
अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसके क़दमों की आवाज़ इस विशाल कक्ष में अजीब तरह से गूँज रही थी — जैसे हर क़दम का हिसाब यहाँ पहले से दर्ज हो।
यह कोई साधारण कमरा नहीं था।
यह एक राजदरबार था।
या यूँ कहें — जो कभी राजदरबार हुआ करता था।
चारों ओर ख़ून के सूखे निशान फैले हुए थे। फ़र्श पर, दीवारों पर, यहाँ तक कि टूटे स्तंभों पर भी। वे निशान इतने गहरे थे कि समय भी उन्हें मिटा नहीं पाया था। ऐसा प्रतीत होता था — मानो यहाँ कोई युद्ध नहीं, बल्कि एक नरसंहार हुआ हो।
अभय की दृष्टि चारों ओर बिखरे कंकालों पर गई।
वे यूँ ही नहीं गिरे थे।
हर कंकाल की मुद्रा बता रही थी — कि वे लड़ते हुए मरे थे। कोई आगे की ओर झुका था — मानो वार करते समय गिरा हो। कोई पीछे की ओर टूटा हुआ था — जैसे अंतिम क्षण में किसी घातक प्रहार से बचने की कोशिश की हो।
अभय का गला सूखने लगा।
वह आगे बढ़ा।
दरबार के दोनों ओर सिंहासन जैसे ऊँचे आसन दिखाई दे रहे थे। मंत्री-सिंहासन।
और हर एक सिंहासन पर — एक कंकाल।
किसी के सीने में तलवार धँसी हुई थी। किसी की पसलियों को चीरता भाला अटका था। किसी के शरीर को एक त्रिशूल ने दीवार से जकड़ रखा था।
यहाँ कोई विजेता नहीं था।
सिर्फ़ मृतक थे।
अभय की आँखें अंततः दरबार के केंद्र पर टिक गईं।
और वहीं — उसकी साँस अनायास रुक गई।
बीचों-बीच एक विशाल सिंहासन था।
उस सिंहासन पर बैठा कंकाल बाकियों से पूरी तरह अलग था।
उसके भीतर अब भी एक राजसी आभा शेष थी — इतनी प्रबल, कि मृत्यु भी उसे पूरी तरह छू नहीं पाई थी। जैसे यह अस्तित्व मरा नहीं था — बस रुका हुआ था।
उस कंकाल के आठ हाथ थे।
और हर हाथ में — एक और कंकाल जकड़ा हुआ था।
मानो मृत्यु के क्षण में भी उसने किसी को छोड़ने से इनकार कर दिया हो।
अभय ने ध्यान से देखा।
जिन कंकालों को उसने पकड़ रखा था — उनके वस्त्र अलग-अलग थे।
सात कंकाल स्त्रियों के वस्त्रों में थे। फटे हुए — पर अब भी पहचान में आने योग्य। उनकी मुद्राएँ यह दर्शा रही थीं कि वे केवल दरबारी नहीं थीं। वे कुछ और थीं। कुछ बहुत अधिक निकट।
और उन सात के बीच एक कंकाल ऐसा था — जिसने पुरुषों के वस्त्र पहन रखे थे।
वह अलग था।
उसकी स्थिति, उसका स्थान — मानो वह इन सातों और सिंहासन के बीच एक सेतु हो।
अभय के मन में एक विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगा।
यह कोई साधारण दरबार नहीं था।
यह शक्ति का केंद्र था। बंधन का स्थान था। और शायद — बलिदान का।
हवा अचानक और भारी हो गई।
उस राजसी कंकाल की आभा धीरे-धीरे पूरे कक्ष में फैलने लगी।
अभय को पहली बार स्पष्ट रूप से महसूस हुआ —
यह सब अतीत नहीं है।
यह अभी भी जीवित है।
और जैसे ही उसने सिंहासन की ओर एक और क़दम बढ़ाया — कंकालों के बीच हवा में एक हल्की-सी कंपन उभरी। मानो यह दरबार अब उसकी उपस्थिति को पहचान चुका हो।
अभय समझ गया —
यह जगह उसे डराने के लिए नहीं बनी।
यह जगह उसे परखने के लिए है।
और जो परीक्षा यहाँ शुरू होने वाली है — वह अब तक की सबसे भयानक होगी।
___
अभय ने एक बार फिर उस आठ हाथों वाले कंकाल की ओर ध्यान से देखा।
और तभी — उसकी दृष्टि उसके वस्त्रों पर टिक गई।
जैसे ही उसने उन वस्त्रों को पहचाना — उसका हृदय एक क्षण के लिए रुक-सा गया।
वे वस्त्र किसी और के नहीं थे।
वे उसी खलनायक अभय के थे — जिसे वह अपने पिछले अस्तित्व में जानता था। तांत्रिक अकादमी का वह खलनायक, जिसने पूरी दुनिया को ख़ून में रँग दिया था।
यह एहसास उसे भीतर तक हिला गया।
उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसका खलनायक रूप इस प्रकार — एक मृत कंकाल के रूप में — उसके सामने खड़ा होगा।
उसने आसपास खड़े अन्य कंकालों को देखा।
धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा — वे सभी तांत्रिक अकादमी के मुख्य पात्र थे।
उन आठ कंकालों में से सात स्त्रियों के थे — जिनके वस्त्र स्पष्ट दर्शा रहे थे कि वे उस कहानी की नायिकाएँ थीं। और आठवाँ कंकाल — वही खलनायक अभय था।
उन सात नायिकाओं में से एक की तलवार सीधे खलनायक अभय के कंकाल की आँख में घुसी हुई थी। मानो उसने अंतिम क्षण तक संघर्ष किया था — हार स्वीकार करने से पहले भी वार किया था।
पर खलनायक अभय के सात हाथ — उन सात नायिकाओं के कंकालों को भेदते हुए दूसरी ओर निकल चुके थे। और उन हाथों में उनके सूखे हुए हृदय जकड़े हुए थे।
यह कोई साधारण युद्ध नहीं था।
यह पूर्ण विनाश था।
उन आठ कंकालों में एक और था — जो सबसे अलग दिखाई देता था। उसका सिर उसके शरीर से पूरी तरह अलग था।
अभय तुरंत समझ गया — वह कंकाल नायक का था।
उसे याद आया — नायक के पास टेलीपोर्टेशन की शक्ति थी। उसका इस प्रकार मारा जाना लगभग असंभव माना जाता था।
अभय ने आसपास नज़र दौड़ाई — और कुछ दूरी पर उसे एक अलग पड़ी हुई खोपड़ी दिखाई दी। धूल में लिपटी हुई। कुछ दूर।
नायक ने भागने की कोशिश की थी।
पर सफल नहीं हो सका।
यह समझ उसके मन को और अधिक विचलित कर गई। यह घटना नियति के नियमों के विरुद्ध थी। किसी भी कहानी में, किसी भी संसार में, किसी भी नियम में — खलनायक का नायक और नायिकाओं दोनों को समाप्त कर देना संभव नहीं होता।
यह कार्य स्वयं नियति के विरुद्ध जाता है।
फिर भी — उसके सामने खड़ा यह दरबार इस बात का प्रमाण था।
खलनायक अभय ने असंभव को संभव कर दिखाया था।
इस एहसास के साथ अभय के भीतर एक गहरी सिहरन दौड़ गई।
यह स्थान केवल उसके अतीत का अवशेष नहीं था।
यह उसके भविष्य के लिए एक चेतावनी थी।
यह दरबार उसके अंत का संकेत नहीं था — यह उस मार्ग की शुरुआत थी, जहाँ से उसकी कहानी नियति के नियमों से परे जाने वाली थी।
___
अभय स्तब्ध खड़ा था।
तभी अचानक — खलनायक अभय के कंकाल की आँखों में लाल आग भड़क उठी।
वह आग ऐसी थी — जैसे किसी मृत शरीर में फिर से आत्मा भर दी गई हो। पर वह आत्मा मानव नहीं थी। वह शुद्ध विनाश थी।
अगले ही क्षण — खलनायक अभय उस सिंहासन से उठ खड़ा हुआ।
जिस पर वह सदियों से जड़ की तरह बैठा था।
उसके उठते ही पूरा दरबार मानो कराह उठा। हवा भारी हो गई। अभय को अपने सीने में अजीब-सा दबाव महसूस हुआ — जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसके अस्तित्व को तौल रही हो।
खलनायक अभय ने बिना किसी भावना के — अपने शरीर से जुड़े सातों नायिकाओं के कंकालों को झटके से अलग कर दिया।
वे कंकाल हवा में उछले।
दीवारों से टकराकर चटकते हुए टूट गए। कुछ काले स्तंभों से टकराए और उनके टुकड़े चारों दिशाओं में बिखर गए।
यह दृश्य साफ़ कर रहा था —
उसके लिए अब न प्रेम था। न विश्वास। और न कोई बंधन।
फिर उसकी दृष्टि नायक के कंकाल पर पड़ी।
खलनायक अभय ने अपने पैर से उसे बेरहमी से ठोकर मारी। वह ज़मीन पर जा गिरा। फिर उसने अपना पैर उस कंकाल पर रखा — और पूरी शक्ति से दबा दिया।
हड्डियों के टूटने की आवाज़ पूरे दरबार में गूँज उठी।
नायक का अस्तित्व टुकड़ों में बिखर गया।
अभय यह सब देख रहा था — पर हिल नहीं पा रहा था।
उसके भीतर डर नहीं था। उससे भी गहरी कोई चीज़ थी। एक बेचैनी — जैसे वह अपने ही भविष्य को देख रहा हो।
खलनायक अभय ने फिर अपनी दाहिनी आँख की ओर हाथ बढ़ाया।
उस आँख में धँसी हुई नायिका की तलवार को — उसने धीरे-धीरे बाहर खींचा।
तलवार निकलते ही उसकी आँख से लाल-सुनहरी चिंगारियाँ फूट पड़ीं — मानो कोई लोहार जलते लोहे पर हथौड़ा मार रहा हो। पर उसकी आँख खाली नहीं हुई — उसमें आग बनी रही।
उसने उस तलवार को एक पल देखा — जैसे किसी पुराने धोखे को पहचान रहा हो।
फिर बिना किसी हिचक के — उसने तलवार को ज़मीन पर पटक दिया।
एक तेज़ धमाके के साथ तलवार कई टुकड़ों में टूट गई।
दरबार में अब सिर्फ़ ख़ामोशी थी।
कंकालों के ढेर। टूटा हुआ सिंहासन। बिखरे हुए हथियार — सब कुछ एक ही कहानी कह रहा था।
यह कोई साधारण युद्ध का परिणाम नहीं था।
यह नियति के ख़िलाफ़ लड़ी गई लड़ाई का अंत था।
अभय के भीतर एक ठंडी लहर दौड़ गई।
उसे अब समझ आने लगा था — खलनायक अभय ने न केवल नायक और नायिकाओं को मारा था, बल्कि उस दुनिया के नियमों को भी तोड़ा था। यही कारण था कि यह स्थान आज भी अस्तित्व में था।
और यही कारण था — कि उसे यहाँ खींच लाया गया था।
खलनायक अभय ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया।
उसकी जलती हुई आँखें सीधे अभय पर टिक गईं।
उस दृष्टि में कोई आश्चर्य नहीं था। कोई क्रोध नहीं था। सिर्फ़ पहचान थी।
मानो वह कह रहा हो —
"आख़िरकार, तुम आ ही गए।"
अभय ने पहली बार गहराई से साँस ली।
यह जगह कोई सपना नहीं थी।
यह उसका अंत नहीं था।
यह उस विरासत का द्वार था — जिसे ख़ून, विश्वासघात और विनाश से सील किया गया था।
और अब वह द्वार — धीरे-धीरे खुल रहा था।
___
वह कंकाल धीरे-धीरे मुड़ा।
एक राजा की गरिमा के साथ — अपने सिंहासन पर जाकर बैठ गया।
टूटा हुआ, ख़ून से सना हुआ वह सिंहासन — जैसे उसी के लौटने का इंतज़ार कर रहा हो। उसके बैठते ही दरबार की हवा बदल गई। ऐसा लगा मानो यह स्थान फिर से अपने स्वामी को पहचान गया हो।
वह कंकाल अपनी खोखली आँखों से अभय की ओर देखता रहा।
उन आँखों में माँस नहीं था — पर दृष्टि जीवित थी। बेहद तीखी। बेहद गहरी।
कुछ क्षण तक वह अभय को देखता रहा।
फिर शांत स्वर में पूछा —
"तो बच्चे, यहाँ आकर कैसा लग रहा है?"
उसकी आवाज़ में न क्रोध था, न धमकी।
वह किसी राक्षस की तरह नहीं बोल रहा था — बल्कि किसी पुराने शासक की तरह। जैसे यह बातचीत उसके लिए कोई विशेष घटना नहीं, बल्कि एक पुरानी परंपरा हो।
अभय का दिल एक पल के लिए ज़ोर से धड़का।
उसका शरीर उसे चेतावनी दे रहा था — कि सामने बैठा अस्तित्व साधारण नहीं है।
पर उसी पल उसके भीतर एक और विचार जन्म लिया —
अगर यह कंकाल उसे मारना चाहता, तो वह अब तक मर चुका होता।
उसे यहाँ खड़ा रहने देने का मतलब था — यह मुलाक़ात किसी और कारण से हो रही है।
अभय ने गहरी साँस ली।
बिना झुके, बिना काँपे, एकदम सामान्य लहजे में जवाब दिया —
"ठीक-ठाक लग रहा है। अगर थोड़ी सफ़ाई होती — तो और अच्छा लगता।"
उसके शब्द दरबार में गूँजे।
यह उत्तर इस जगह के लिए बिल्कुल असंगत था।
पर शायद — यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त थी।
कुछ क्षण तक कंकाल राजा उसे देखता रहा।
फिर अचानक — उसके जबड़े खुले।
और वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
उसकी हँसी पत्थरों से टकराकर लौटी। टूटी दीवारें काँप उठीं। ज़मीन में दबी हुई हड्डियाँ जैसे उस हँसी का उत्तर दे रही थीं।
वह हँसी भयावह थी — पर उसमें पागलपन नहीं था।
उसमें मनोरंजन था।
उसमें रुचि थी।
हँसी थमने के बाद कंकाल राजा ने फिर अभय की ओर देखा।
"बुरा नहीं है, बच्चे।"
उसने कहा।
"सच में बुरा नहीं है।"
यह प्रशंसा अप्रत्याशित थी।
फिर वह थोड़ा आगे झुका। उसकी आवाज़ गहरी हो गई — और इस बार शब्दों का वज़न अलग था।
"पर एक बात बताओ।"
उसने पूछा।
"तुम मुझसे डर क्यों नहीं रहे?"
अभय कुछ पल चुप रहा।
उसने इस सवाल का उत्तर ढूँढने की कोशिश नहीं की। बल्कि अपने भीतर झाँका। महसूस किया — डर वहाँ था। पर वह उस पर हावी नहीं था।
अभय ने शांत स्वर में कहा —
"क्योंकि डरने से पहले मैं यह सोचता हूँ कि अगर आप मुझे नुकसान पहुँचाना चाहते — तो मैं यहाँ खड़ा ही नहीं होता।"
वह एक पल रुका।
"और शायद इसलिए भी — क्योंकि मुझे लग रहा है कि आप मुझे मारने के लिए नहीं, बल्कि किसी और काम के लिए बुलाए हैं।"
दरबार में फिर से सन्नाटा छा गया।
कंकाल राजा की आँखों में जलती आग थोड़ी तेज़ हो गई।
वह सीधा बैठ गया।
उसके चेहरे पर वही भयावह मुस्कान लौट आई — पर इस बार उसमें संतोष भी था।
"समझदार हो।"
उसने कहा।
"बहुत कम लोग होते हैं — जो मौत के सामने खड़े होकर भी सोच पाते हैं।"
वह सिंहासन की बाँह पर अपनी हड्डियों से बनी उँगलियाँ टिकाता है।
गहरी आवाज़ में आगे कहा —
"पर याद रखना, बच्चे।"
एक पल रुका।
"जो डर से ऊपर उठ जाता है — उसके लिए रास्ते भी बदल जाते हैं।"
अभय को अब साफ़ महसूस हो रहा था।
यह दरबार, यह राजा, यह सब किसी अंत का संकेत नहीं था।
यह एक चयन था।
एक आमंत्रण था।
और शायद —
एक ऐसी विरासत की शुरुआत थी, जिसे उठाने के लिए —
डर का मर जाना ज़रूरी था।
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