पुनीर्जणाम
रात का समय था।
अस्पताल की चौथी मंज़िल पर बना वह कमरा किसी कब्र की तरह शांत पड़ा था। बाहर गलियारे में जलती पीली रोशनी दरवाज़े की दहलीज़ तक आते-आते इतनी मद्धिम पड़ जाती थी, जैसे वह भी इस कमरे में दाखिल होने की हिम्मत न जुटा पाती हो। दीवारों का सफ़ेद रंग अँधेरे में धुंधला पड़ चुका था। खिड़की के बाहर शहर अभी भी जाग रहा था — दूर कहीं गाड़ियों के इंजन की आवाज़ें, किसी होटल की रोशनी की धुंधली परछाईं — पर इस कमरे तक उस दुनिया का कोई शोर नहीं पहुँचता था।
यहाँ सिर्फ़ एक आवाज़ थी।
बीप… बीप… बीप…
मशीनों की वह लयबद्ध आवाज़ — जो हर कुछ सेकंड में उस सन्नाटे को चीरती थी और फिर सब कुछ वापस उसी गहरी खामोशी में डूब जाता था। जैसे वह आवाज़ भी जानती हो कि यहाँ उसकी ज़रूरत नहीं, फिर भी वह अपनी औपचारिकता निभाए जा रही हो।
उस बिस्तर पर एक लड़का लेटा हुआ था।
उम्र ज़्यादा नहीं थी — पर चेहरे पर जो थकान थी, वह किसी बूढ़े आदमी की थकान से भी गहरी लगती थी। साँसें टूटी हुई थीं — इतनी धीमी कि हर साँस के बाद एक लम्हे के लिए यक़ीन ही नहीं होता था कि अगली आएगी भी। छाती मुश्किल से ऊपर उठती, फिर रुक जाती, जैसे शरीर हर बार ज़िंदगी से कोई नया सौदा कर रहा हो। होंठ सूखे थे, उंगलियाँ कँपकँपाती थीं, और आँखें — आँखें खुली थीं। लेकिन उनमें ज़िंदगी की वह चमक नहीं थी, जो किसी ज़िंदा इंसान की आँखों में होती है। वहाँ सिर्फ़ एक भारी, बुझी हुई रोशनी थी — जैसे कोई दीया हो, जिसका तेल ख़त्म हो चुका हो और वह बस अंतिम लौ पर जल रहा हो।
आँसू थे — पर रोना नहीं था।
वह रो नहीं सकता था। इसलिए नहीं कि उसे दर्द नहीं था — बल्कि इसलिए कि रोने की ताक़त भी कब की चुक चुकी थी। आँसू बस चुपचाप आँखों के किनारों से निकलते थे और तकिये में समा जाते थे। जैसे वे भी जानते हों कि यहाँ शोर मचाने का कोई फ़ायदा नहीं।
उसके दिमाग़ में एक ही सवाल था — जो घंटों से घूम रहा था।
"मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?"
न ईश्वर से पूछा, न किसी इंसान से। बस उस सफ़ेद छत से पूछा — जो उसकी बातें सुनने वाली एकमात्र चीज़ बची थी।
उसने ज़िंदगी याद की। एक-एक पल। _ बचपन की वह सुबहें, जब माँ होती तो थी — पर थी कहाँ? जिस्म था, घर था, खाना था — पर वह ख़ास ऊष्मा नहीं थी जो माँ की उपस्थिति से आती है। पिता थे — पर उनकी अपनी दुनिया थी। वह दुनिया जिसमें उस लड़के के लिए कोई जगह नहीं थी।
स्कूल में अकेला था। कॉलेज में भी अकेला रहा। कोई दोस्त नहीं जो सच में दोस्त हो। कोई रिश्ता नहीं जो टिका हो। बीमारी आई — और जो थे, वे भी चले गए। धीरे-धीरे। बिना कोई वजह बताए।
कोई अपराध नहीं किया था उसने। कोई गलत रास्ता नहीं चुना था। जितना उसके बस में था — उतना सही किया था।
फिर भी यहाँ था।
इस कमरे में। इस बिस्तर पर। इन मशीनों के साए में। अकेला।
उसके होंठ हिले। आवाज़ इतनी धीमी थी कि मशीन की बीप भी उस पर भारी पड़ रही थी।
"मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया।"
एक पल रुका। साँस लेने में वक़्त लगा।
"न किसी को करने दिया।"
उंगलियाँ चादर में धँस गईं। शायद थामने की कोशिश थी — पर किसे? ज़िंदगी को? या बस कुछ भी?
"मैंने जितना हो सकता था — सब किया।"
आवाज़ टूट गई। पर शिकायत नहीं थी उसमें। सिर्फ़ एक बयान था — उस ज़िंदगी का, जो अब ख़त्म होने जा रही थी।
"पर आज…"
एक लंबा सन्नाटा।
मशीन ने बीप की।
"आज मैं बिल्कुल अकेला हूँ।"
बात पूरी हो गई। कोई रुदन नहीं, कोई आक्रोश नहीं। बस एक सच — जो उसने ख़ुद के लिए कहा, और उसी सन्नाटे में घुल गया।
___
बिस्तर के पास रखी कुर्सी खाली थी।
वह हमेशा से खाली थी।
उसने उस कुर्सी को देखा। देखता रहा। न कोई जो उसका हाथ थामे, न कोई जो उसके बालों पर हाथ फेरे, न कोई जो कहे — "मैं यहाँ हूँ। जा नहीं रहा।" शब्द दुनिया की सबसे छोटी चीज़ होते हैं — पर जब वे नहीं होते, तो उनकी जगह सबसे भारी होती है।
उसके होंठ हिले।
"इस आख़िरी वक़्त में भी… कोई नहीं।"
वह फुसफुसाया — अपने लिए। जैसे उस बात को कहना ज़रूरी था। भले ही सुनने वाला कोई न हो। शब्द हवा में घुल गए, और कमरे ने उन्हें निगल लिया।
कुछ देर वह बस छत को देखता रहा।
फिर काँपते हाथों से उसने सामने रखा gaming laptop उठाने की कोशिश की।
वह हल्का नहीं था — या शायद अब उसके हाथों में उतनी ताक़त नहीं बची थी। उंगलियाँ सुन्न थीं। कलाई में एक धीमा, जलन भरा दर्द था। बाँहें ऐसे थकी हुई थीं जैसे उन्होंने पहाड़ उठाया हो। पर उसने हार नहीं मानी। एक बार। दो बार। तीन बार कोशिश की। बड़ी मुश्किल से laptop को अपनी छाती के पास खींच लिया।
स्क्रीन जली।
नीली रोशनी कमरे के अँधेरे को चीरती हुई उसके चेहरे पर फैल गई — और उसके पीले पड़ चुके चेहरे को और भी बेरंग बना दिया। थकी हुई आँखों में उस रोशनी की झलक थी। पलकें खुली रखना भी आसान नहीं था — पर उसने रखीं।
स्क्रीन पर — ending icon।
उस खेल का, जिसे उसने एक दिन पहले पूरा किया था। तब, जब शरीर में थोड़ी ताक़त बची थी। उस दिन आख़िरी boss हारा था। कहानी अंत तक पहुँची थी। जीत हुई थी।
पर आज उस जीत को दोबारा महसूस करने की ताक़त नहीं थी। हाथ controller तक नहीं पहुँच सकते थे। खेलने की इच्छा थी — पर शरीर ने साफ़ मना कर दिया था।
वह बस देख सकता था।
सिर्फ़ देख सकता था।
"अजीब है," उसने मन ही मन सोचा। "ज़िंदगी में पहली बार कुछ पूरा किया — और उसे मनाने वाला कोई नहीं।"
मुस्कान नहीं आई। आती भी तो किसके लिए?
स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती रही — जैसे वह उसकी आख़िरी साथी हो। मशीन ने फिर बीप की — इस बार थोड़ी धीमी, थोड़ी भारी।
___
तांत्रिक अकादमी।
लोग कहते थे — यह गेम मुश्किल है। बहुत जटिल। बहुत निर्दयी।
उसे कभी ऐसा नहीं लगा।
मुश्किल वह होता है जब इंसान घबराता है। जब जल्दबाज़ी करता है। जब शक्ति को समझे बिना उसे थामने की कोशिश करता है।
यह दुनिया धैर्य माँगती थी। और वह धैर्य जानता था।
उस दुनिया में क़दम रखते ही ऐसा लगता था जैसे समय की कोई अदृश्य परत पार हो गई हो। वहाँ कोई आधुनिक इमारत नहीं थी, कोई तेज़ रोशनी नहीं — बस प्राचीनता की एक गहरी, भारी साँस थी, जो हवा में तैरती रहती थी। भारत के पुराने पौराणिक ग्रंथों की गूँज उस संसार की नींव में थी।
मंत्र वहाँ केवल शब्द नहीं थे — वे अनुशासन थे। देवता केवल पात्र नहीं थे — वे परीक्षा थे।
हर मंत्र का उच्चारण सोच-समझकर करना पड़ता था। ग़लत स्वर, ग़लत भावना — सब कुछ पलट सकती थी। शक्ति माँगने से पहले यह समझना ज़रूरी था कि वह शक्ति तुम्हें स्वीकार करेगी भी या नहीं — और अगर नहीं, तो तुम उसके बोझ तले कहाँ दब जाओगे, यह भी सोचना ज़रूरी था।
उसने देखा था — जो बिना समझे आगे बढ़े, वे टूट गए।
कुछ गुफाओं में हमेशा के लिए खो गए। कुछ मंदिरों में अपनी ही साधना का भार नहीं झेल पाए। कुछ ऐसे थे जो बहुत तेज़ थे — पर तेज़ी उनकी दुश्मन बन गई।
और फिर भी — वह दुनिया उसे खींचती रही।
शायद इसलिए — क्योंकि वहाँ उसके निर्णयों का वज़न था। वहाँ हर चुनाव कुछ कहता था। तुम कौन हो। तुम क्या बनना चाहते हो।
देवताओं से संवाद आसान नहीं था। वे सीधे जवाब नहीं देते थे। सवालों के बदले सवाल रखते थे — और कई बार, सिर्फ़ मौन। और उस मौन में जो सच्चाई छिपी होती थी, वह शब्दों में नहीं आ सकती थी।
घने जंगलों के भीतर दबे प्राचीन आश्रम — जहाँ पत्तों की सरसराहट भी किसी मंत्र का हिस्सा लगती थी। अंधेरी गुफाएँ — जिनकी दीवारों पर उकेरे गए चिन्ह समय से भी पुराने थे, जैसे किसी ने उन्हें इतिहास से पहले लिखा हो। खंडहर मंदिर — जिनकी टूटी मूर्तियों में भी एक चेतना बाकी थी, जो तुम्हें देखती थी, परखती थी, और तय करती थी — लायक हो या नहीं।
हर यात्रा अलग थी। हर रास्ता नया। हर अंत — कुछ सिखाता था।
उसने यह खेल सिर्फ़ पूरा नहीं किया था।
उसने उसे जिया था।
असली दुनिया में जहाँ उसका शरीर धीरे-धीरे हार रहा था — उस दुनिया में वह कमज़ोर नहीं था। वहाँ उसकी साँसें नहीं टूटती थीं। वहाँ उसके फ़ैसले मायने रखते थे। वहाँ कोई बिस्तर नहीं था, कोई मशीन नहीं थी, कोई खाली कुर्सी नहीं थी।
वहाँ — वह था।
पूरा। भरा हुआ। ज़िंदा।
यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर वाले अनुभवी गेमर्स — सब असफल रहे थे। किसी को इस खेल की कोई निश्चित ending नहीं मिली थी। पर उसने मिलाई। किसी शोर-शराबे के बिना। किसी तालियों के बिना। बस रणनीति। और धैर्य।
एक हल्का-सा गर्व उसके भीतर उठा — शांत, गहरा। वह गर्व नहीं था जो दूसरों को दिखाया जाए। वह गर्व था जो अकेले में, ख़ुद के लिए महसूस किया जाता है।
"अगर एक मौका और मिलता…" उसने सोचा। "तो इसे फिर से खेलता।"
हर छिपा रहस्य। हर अनदेखा रास्ता। हर वह पल जो पहली बार में चूक गया।
उसकी आँखें स्क्रीन पर ठहरी रहीं।
___
रात और गहरी हो गई।
कमरा अब किसी बंद ताबूत जैसा लग रहा था। मशीन की बीप अनियमित हो चुकी थी — कभी तेज़, कभी धीमी, जैसे वह भी किसी निर्णय के इंतज़ार में हो।
उसके मन में एक सवाल था — बहुत देर से घूम रहा था।
"आख़िर… कोई और इसे क्यों पूरा नहीं कर पाया?"
यह सवाल गर्व से नहीं उठा था। जिज्ञासा से उठा था। उसने कभी ख़ुद को दूसरों से बेहतर नहीं माना था — बस अलग था। उसकी सोच थोड़ी अलग चलती थी।
उसे हर छोटी बात याद रहती थी।
किस मंदिर में किस देवता की मूर्ति का कौन-सा हिस्सा टूटा हुआ था। किस गुफा में प्रवेश करते समय हवा की दिशा बदलती थी। कौन-सा साधु जवाब सुनने से पहले चुप रहता था — और उस चुप्पी में क्या था। किस नदी का पानी रात को रंग बदलता था, और क्यों।
वह सीधे नहीं चलता था। पहले चारों तरफ़ देखता था। संकेतों को जोड़ता था। संवादों के पीछे छिपे अर्थ ढूँढता था। जहाँ दूसरे लोग आगे भागते थे — वह रुककर सोचता था।
लोग मज़ाक में कहते थे — "तेरी डिटेक्टिव वाली सोच है।"
शायद यही वजह थी।
याददाश्त। और वह आदत जो उसे ज़बरदस्ती सोचने पर मजबूर करती थी — तब भी, जब सोचना थका देने वाला हो।
स्क्रीन पर ठहरी ending अब उसे अधूरी लगने लगी।
जैसे कुछ अब भी छुपा हो। जैसे यह अंत — सच में अंत न हो।
"एक बार और।" उसने सोचा। आवाज़ नहीं थी — बस एक इरादा था। "इस बार — सब कुछ।"
इस बार वह नया किरदार चुनना चाहता था। एक साधारण इंसान। कोई विशेष शक्ति नहीं, कोई दुर्लभ वंश नहीं। बस एक स्वस्थ शरीर — जो थके न, जो टूटे न। और ऐसे माता-पिता, जो बिना शर्त प्यार करते हों। जो उसकी कुर्सी कभी खाली न छोड़ें।
शायद वह वह ज़िंदगी थी — जो उसे कभी मिली ही नहीं।
उसकी उंगलियाँ keyboard की ओर बढ़ीं…
और वहीं रुक गईं।
पलकें भारी हो गईं — अचानक, जैसे किसी ने एक ही पल में उसकी सारी बची-खुची ताक़त खींच ली हो। साँसें और धीमी हो गईं। आँखें खुली थीं — पर फ़ोकस टूट रहा था, दुनिया धुंधली होती जा रही थी।
उसने laptop को सँभालने की कोशिश की।
शरीर ने जवाब नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे उसी पर झुक गया।
कोई दर्द नहीं। कोई घबराहट नहीं। कोई आख़िरी चीख़ नहीं।
बस — एक लंबी, थकी हुई साँस।
और फिर —
कुछ नहीं।
उसका शरीर बिस्तर पर स्थिर हो गया। मशीन एक बार लड़खड़ाई — उसकी आवाज़ ने कमरे को एक पल के लिए हिला दिया — और फिर —
खामोश।
पूरी तरह खामोश।
पर laptop की स्क्रीन — अब भी जल रही थी।
कोई loading नहीं। कोई game restart नहीं। कोई परिचित संगीत नहीं। बस वही नीली रोशनी — जो अब भी उसके निश्चल चेहरे पर पड़ रही थी।
और फिर, उस नीली रोशनी के बीच, काले background पर — धीरे-धीरे, एक-एक करके — शब्द उभरे।
"Welcome to the world of मंत्रलोक"
वे शब्द किसी खेल की घोषणा नहीं थे।
वे किसी system message जैसे भी नहीं थे।
वे — एक आमंत्रण थे।
कमरा पूरी तरह शांत था। खाली कुर्सी अब भी वहीं थी। मशीन अब भी खामोश थी। और वह लड़का — जिसने अकेले जीया, अकेले जीता, और अकेले ही इस दुनिया को छोड़ा —
अब किसी और दुनिया की दहलीज़ पर खड़ा था।
उस सन्नाटे में —
एक नई यात्रा ने जन्म लिया।
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