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काला भविष्य
📚 Journey of the Mantralok

काला भविष्य

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अभय के शरीर ने अचानक हर हरकत छोड़ दी।

आँखें आधी खुली थीं — पर उनमें कोई चमक नहीं थी। साँसें चल रही थीं — पर चेतना कहीं बहुत दूर जा चुकी थी।

यह दृश्य देखते ही महारानी का दिल जैसे थम गया।

उन्हें ऐसा लगा — जैसे उनके सामने उनका बेटा नहीं, बल्कि उसका निर्जीव शरीर पड़ा हो। जैसे वह जो साँस ले रहा है, वह सिर्फ़ शरीर की आदत है — भीतर कुछ बचा नहीं।

उनके कानों में एक ही आवाज़ गूँजने लगी —

"अब नहीं… अब मैं उसे फिर नहीं देख पाऊँगी।"

उनके हाथ काँपने लगे। पैरों ने साथ छोड़ दिया। दुनिया उनके सामने घूमने लगी।

"अभय…"

यह शब्द उनके होंठों से निकला — पर आवाज़ ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही टूट गई।

महारानी लड़खड़ाईं। उनका शरीर आगे की ओर झुक गया।

उसी पल — महाराज ने उन्हें थाम लिया।

मज़बूत भुजाओं ने उन्हें सहारा दिया। नहीं तो वह पल उन्हें भी तोड़ देता।

"संभालिए ख़ुद को, महारानी।"

महाराज की आवाज़ भारी थी — पर उसमें कठोरता नहीं थी। वह आवाज़ एक राजा की नहीं थी। वह एक पति की थी, जो ख़ुद भी उतना ही टूटा हुआ था — पर अभी टूट नहीं सकता था।

महारानी की आँखों से आँसू बहते रहे। उनका पूरा शरीर काँप रहा था।

"मुझे ऐसा लग रहा है…"

उनकी आवाज़ टूट गई।

"जैसे मैं अपने बेटे को खो चुकी हूँ।"

महाराज ने उन्हें अपने पास खींच लिया।

"नहीं।"

उन्होंने धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा।

"ऐसा मत कहिए।"

उन्होंने महारानी की आँखों में देखा — और उस नज़र में एक ऐसी बात थी, जो शब्दों में नहीं आ सकती।

"अगर आप ही टूट जाएँगी — तो हमारे पुत्र को कौन संभालेगा?"

ये शब्द किसी आदेश की तरह नहीं थे।

ये एक पति की गुहार थी। एक पिता का डर था।

महारानी की सिसकियाँ थोड़ी धीमी हुईं।

महाराज ने गहरी साँस ली।

"मुझे भी उसकी ऐसी हालत देखी नहीं जाती।"

उन्होंने स्वीकार किया — और उस स्वीकारोक्ति में एक दरार थी, जो बाहर से नहीं दिखती थी।

"वह सिर्फ़ युवराज नहीं है। वह मेरा बेटा है।"

उनकी आवाज़ एक पल के लिए काँप गई।

लेकिन अगले ही क्षण — वह फिर राजा बन गए।

"नियति को यही मंज़ूर है।"

उन्होंने कहा।

"पर इसका मतलब यह नहीं कि हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएँ।"

उन्होंने वैद्य की ओर देखा। फिर महारानी की ओर।

"आप चिंता मत करिए। हम इस दुनिया के हर वैद्य को बुलाएँगे।"

उनकी आँखों में अब आग थी — वह आग जो किसी पिता की आँखों में तब जलती है, जब उसके बच्चे पर आँच आती है।

"हर एक को।"

उन्होंने दोहराया।

"जो इस ज़हर को जानता हो। जो इसके तोड़ के बारे में कभी सुन चुका हो।"

महारानी ने उनकी ओर देखा। आँखों में अब भी डर था — पर उसके पीछे एक हल्की-सी उम्मीद भी थी। एक माँ की उम्मीद, जो हार मानने से इनकार करती है।

"मुझे विश्वास है।"

महाराज ने कहा।

"कि हर ज़हर का कोई न कोई तोड़ ज़रूर होता है।"

उन्होंने अभय की ओर देखा।

वह वहीं पड़ा था। निशब्द। अचेत।

उस छोटे-से शरीर को देखकर एक पल के लिए महाराज की आँखें भीग गईं — पर उन्होंने उस पल को ज़ाहिर नहीं होने दिया।

"वह हमारा पुत्र है।"

उनकी आवाज़ में अब केवल संकल्प था।

"और हम उसे यूँ नहीं खो सकते।"

महारानी ने काँपते हाथों से अभय का माथा सहलाया।

"तुम्हें कुछ नहीं होगा, अभय।"

उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा।

"माँ यहीं है। माँ कहीं नहीं जाएगी।"

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

पर यह सन्नाटा पहले जैसा नहीं था।

इस बार — यह हार का नहीं, बल्कि आने वाले संघर्ष का संकेत था।

क्योंकि इस महल में अब एक माँ का डर और एक पिता का संकल्प — दोनों जाग चुके थे।

और नियति — अब उन्हें रोक नहीं सकती थी।

___

वैद्य ने अभय की नाड़ी एक आख़िरी बार देखी और धीरे से खड़ा हो गया।

"महाराज," उसने शांत स्वर में कहा, "अभी युवराज को अकेला छोड़ देना ही उचित होगा। उनके शरीर और मन — दोनों को विश्राम की सख़्त आवश्यकता है।"

महाराज ने सिर हिलाया।

वैद्य ने हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी और कमरे से बाहर चला गया।

उसके जाते ही कक्ष में एक अजीब-सी ख़ामोशी छा गई।

अब वहाँ कोई वैद्य नहीं था, कोई औषधि नहीं थी — सिर्फ़ एक माँ, एक पिता, और उनका अचेत पुत्र।

महाराज ने द्वार की ओर देखा और सैनिक को संकेत किया।

"भोजन लाया जाए।"

कुछ ही समय में सादा पर पौष्टिक भोजन आ गया।

महारानी अब भी थकी हुई थीं। आँखें सूजी हुई। शरीर शिथिल। उनके हाथों में भोजन उठाने की भी ताक़त नहीं थी।

महाराज ने ख़ुद थाली उठाई।

उन्होंने धीरे-धीरे महारानी को भोजन कराया — एक राजा की तरह नहीं, एक पति की तरह।

महारानी ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप खाती रहीं — मानो बोलने की शक्ति ही शेष न हो।

भोजन के बाद महाराज ने उन्हें अभय के बिस्तर के पास बैठा दिया।

"यहीं रहिए।"

उन्होंने नरम स्वर में कहा।

"उसके पास।"

महारानी ने अभय का हाथ थाम लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — पर साँसें चल रही थीं। वह ज़िंदा था। अभी।

महाराज ने एक आख़िरी बार अपने पुत्र की ओर देखा।

उस पल में जो था — वह शब्दों में नहीं आ सकता। एक पिता का प्यार, एक राजा की मजबूरी, एक इंसान का दर्द — सब एक साथ।

फिर वह कमरे से बाहर निकल आए।

जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ —

उनका चेहरा बदल गया।

जो कोमलता कुछ क्षण पहले तक वहाँ थी — वह जा चुकी थी। उसकी जगह अब कुछ और था। कुछ ठंडा। कुछ तेज़। कुछ ऐसा जो किसी शत्रु के लिए — बहुत ख़तरनाक था।

उनकी आँखें लाल हो गईं। जबड़ा कस गया।

"हमें लगता था…"

उन्होंने धीमे, पर ज़हर भरे स्वर में कहा —

"कि तुम नियमों के पक्के हो।"

उनके क़दम तेज़ हो गए।

"हमें लगता था कि तुम ऐसी घृणित चालें नहीं चलोगे।"

उनकी मुट्ठियाँ भींच गईं।

"पर यहाँ हमारी ही भूल थी।"

गलियारा शांत था — पर महाराज के भीतर तूफ़ान उठ चुका था।

यह सिर्फ़ उनके पुत्र पर हमला नहीं था।

यह एक पिता की सीमा तोड़ने का प्रयास था।

और जब कोई पिता टूटता है — तो एक राजा जन्म लेता है।

___

"अगर हमारा वंशज साधना नहीं कर सकता —"

महाराज की आवाज़ धीमी थी। पर उसमें ऐसा भार था जो हवा को भी थर्रा दे।

"तो हम यह तय ज़रूर करेंगे — कि तुम्हारे वंश में भी कोई साधना न कर सके।"

यह शब्द क्रोध का विस्फोट नहीं थे।

यह एक निर्णय था।

ऐसा निर्णय — जो पीढ़ियों तक असर डालता है।

यह कहकर महाराज महल की सीमा से बाहर निकल आए।

रात गहरी हो चुकी थी। आसमान पर बादल छाए थे और चाँद की रोशनी भी मानो रास्ता दिखाने से इनकार कर रही थी। जंगल की हवा ठंडी थी — ऐसी ठंडी जो हड्डियों तक उतरती है।

महाराज अकेले थे।

उनके क़दम महल की रोशनी से दूर — उस अंधेरे जंगल की ओर बढ़ते चले गए, जहाँ कोई साधारण मनुष्य जाने की हिम्मत नहीं करता। जहाँ पेड़ों की छाया इतनी घनी होती है कि दोपहर में भी रात जैसा लगता है। जहाँ जानवर भी रात को आवाज़ नहीं करते — जैसे वे भी जानते हों कि यह जगह उनके लिए नहीं है।

जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए — धरती ने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया।

उनके पैरों के नीचे हल्की-सी ऊर्जा घूमने लगी। पहले धुँधली — जैसे किसी पुरानी लौ की पहली चिनगारी। फिर धीरे-धीरे वह ऊर्जा स्पष्ट होने लगी — आकार लेने लगी।

एक नीला कमल।

शांत। गंभीर। और अत्यंत शक्तिशाली।

कमल पूर्ण होते ही महाराज का शरीर धरती से ऊपर उठ गया।

वे उड़ नहीं रहे थे — बल्कि मानो हवा ने ख़ुद उन्हें अपने ऊपर ले लिया हो। जैसे यह जंगल उनका विरोध नहीं, बल्कि स्वागत कर रहा हो।

पेड़, लताएँ, चट्टानें — सब उनके रास्ते से स्वयं हटती चली गईं।

कुछ ही समय में वे एक विशाल पत्थर के सामने रुके।

बाहर से वह साधारण पहाड़ जैसा दिखता था। पुराना, खुरदरा, समय से घिसा हुआ। हज़ारों बरस की धूप और बारिश ने उसे एक ऐसा रंग दे दिया था जो किसी इतिहास से पुराना लगता था।

पर महाराज जानते थे —

यह साधारण नहीं है।

उन्होंने अपना दाहिना हाथ उस पत्थर पर रखा। और अपने मंत्र-कोर से ऊर्जा प्रवाहित कर दी।

नीली ऊर्जा पत्थर में समाने लगी। पहले धीरे — जैसे पानी किसी सूखी ज़मीन में उतरता है। फिर तेज़ी से।

पत्थर के भीतर से दरारों की आवाज़ आने लगी। एक गहरी, भारी गूँज — जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ नींद से जाग रही हो।

और फिर —

वह विशाल पत्थर कई टुकड़ों में बँट गया।

लेकिन वे टुकड़े ज़मीन पर नहीं गिरे। वे हवा में स्थिर हो गए — मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें थाम लिया हो।

पत्थर के हटते ही — उसके पीछे छुपा हुआ सत्य सामने आ गया।

एक विशाल प्राचीन द्वार।

द्वार काले और भूरे पत्थर से बना था — जिस पर समय की मार साफ़ दिखती थी। पर उस पर उकेरे गए चित्र — वे समय से नहीं घिसे थे। वे उतने ही जीवंत थे, जितने किसी ज़िंदा प्राणी का चेहरा होता है।

सर्प — कुंडलियाँ मारे, आँखें बंद किए हुए।

कमल — पूरी तरह खिला हुआ, केंद्र में एक बिंदु के साथ।

सिंह — गर्जना की मुद्रा में, अयाल हवा में फैली हुई।

हाथी — स्थिर, विशाल, स्मृति और बुद्धि का प्रतीक।

गरुड़ — पंख फैलाए, जैसे किसी भी पल आकाश को चीरने के लिए तैयार हो।

मोर — पूंछ फैलाए, रहस्य और चेतना का संकेत।

ये केवल चित्र नहीं थे।

ये प्रतीक थे। देवों और प्राचीन शक्तियों के साक्ष्य। किसी ऐसी सभ्यता के अवशेष, जो मनुष्यों के इतिहास से भी पुरानी थी।

महाराज ने द्वार की ओर देखा।

उनकी आँखों में न डर था, न हिचक।

सिर्फ़ एक अडिग निश्चय।

"मेरे पुत्र के भविष्य को तबाह करके तुम चैन से नहीं जी पाओगे।"

उन्होंने मन ही मन कहा।

"मैं किसी शत्रु पर दया नहीं करूँगा।"

हवा भारी हो गई।

जंगल पूरी तरह शांत हो गया — इतना शांत कि अपनी ख़ुद की साँस सुनाई दे।

मानो पूरी दुनिया इस द्वार के खुलने की प्रतीक्षा कर रही हो।

और यह द्वार — अब फिर से — किसी के लिए खुलने वाला था।

___

जैसे-जैसे महाराज अपनी ऊर्जा उस प्राचीन द्वार में प्रवाहित करते गए — द्वार पर उकेरे गए चित्रों में हलचल होने लगी।

सबसे पहले सर्प की आँखें खुलीं।

पत्थर की पुतली में नीली चमक दौड़ गई — जैसे किसी ने अँधेरे कमरे में दीप जला दिया हो।

फिर कमल की पंखुड़ियाँ हल्के से हिलीं — मानो शताब्दियों की निद्रा से जाग रही हों।

एक-एक करके —

सिंह ने अपनी गर्दन उठाई। हाथी की आँखों में चेतना लौटी। गरुड़ के पंखों में कंपन हुआ। मोर की जमी हुई पूंछ धीरे से फैल गई।

वे चित्र नहीं रहे।

वे जीवित हो चुके थे।

महाराज की ऊर्जा उन्हें छूते ही — वे सभी द्वार से अलग हो गए। और उनके सामने मार्ग बना दिया।

फिर —

एक साथ —

सभी देवीय जानवरों ने महाराज की ओर सिर झुका दिया।

यह सम्मान किसी राजा को नहीं दिया जा रहा था।

यह उस वंश को था। उस रक्त को, जिसे वे पहचानते थे। जिससे उनका कोई पुराना नाता था — किसी ऐसे युग से, जब देव और मनुष्य एक साथ चलते थे।

जानवर हटे —

और द्वार अपने आप खुल गया।

बिना किसी शब्द के। बिना किसी मंत्र के।

जैसे यह द्वार किसी ताले से नहीं — किसी पहचान से बंद था।

द्वार के भीतर घोर अंधकार था।

इतना गहरा — कि जैसे प्रकाश ने वहाँ जाना ही छोड़ दिया हो। जैसे यह अंधकार कोई अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक उपस्थिति हो — जो देख रही हो, परख रही हो।

पर महाराज नहीं रुके।

उनकी आँखें नीली चमकने लगीं।

ऐसी चमक — जो अंधेरे को चीरती चली जाती है। मानो वह अंधेरे में नहीं देख रहे थे — बल्कि अंधेरा स्वयं उनके सामने प्रकट हो रहा था।

महाराज ने एक क़दम आगे बढ़ाया —

और उस अज्ञात कक्ष के भीतर प्रवेश कर गए।

जैसे ही उनका शरीर अंदर समाया — द्वार अपने आप बंद हो गया।

एक भारी, अंतिम गूँज के साथ।

___

बाहर —

देवीय जानवर वापस अपनी जगह लौट आए।

उनकी देह फिर से पत्थर बन गई। उनकी आँखें फिर से निर्जीव हो गईं।

हवा में तैर रहे पत्थर के टुकड़े धीरे-धीरे नीचे आए — और फिर से एक विशाल शिला का रूप ले लिया।

कुछ ही पलों में — वह स्थान वैसा ही हो गया जैसा पहले था।

एक साधारण जंगल।

एक साधारण पहाड़।

किसी को देखकर यह विश्वास करना असंभव था — कि यहाँ अभी-अभी देवों से जुड़ा द्वार खुला था।

अगर कुछ बचा था — तो बस धरती पर बने महाराज के पैरों के निशान।

वे निशान ही गवाही दे रहे थे — कि यह कोई भ्रम नहीं था।

___

और द्वार के भीतर —

महाराज एक ऐसे स्थान में खड़े थे, जहाँ समय स्थिर था।

जहाँ हवा नहीं थी — पर ऊर्जा हर ओर थी।

जहाँ अंधेरा था — पर भय नहीं।

यह वह जगह थी जहाँ साधारण नियम नहीं चलते। जहाँ केवल शक्ति बोलती है — और शक्ति का स्रोत बोलता है।

महाराज ने आगे देखा।

"मैं वापस आ गया हूँ।"

उन्होंने शांत स्वर में कहा।

और अंधेरे ने जवाब देना शुरू किया —

"महाराज रुद्रसेन का स्वागत है।"

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