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नई ताकत
📚 Journey of the Mantralok

नई ताकत

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अभय उस लाल गेंद जैसी वस्तु को देर तक निहारता रहा, उसकी धड़कनें अनजाने भय और जिज्ञासा के बीच फँसी हुई थीं। पहली नज़र में वह केवल एक साधारण-सी चमकती हुई वस्तु लगती थी, लेकिन जैसे-जैसे अभय ने अपनी चेतना को उस पर केंद्रित किया, उसकी सतह के भीतर बहता हुआ गाढ़ा प्रकाश किसी जीवित हृदय की तरह धड़कता हुआ प्रतीत होने लगा। कुछ ही पलों में अभय को यह एहसास हो गया कि यह कोई सामान्य वस्तु नहीं, बल्कि खलनायक अभय का रक्त-साधना कोर था—एक ऐसा कोर, जो समय की सीमाओं को लांघकर, मानो भविष्य से यहाँ आ पहुँचा था। उस खोज के बाद अभय बिना किसी हिचकिचाहट के आगे बढ़ा और उस भव्य सिंहासन पर बैठ गया, जो उस विशाल कक्ष के केंद्र में स्थित था। वही सिंहासन, जिस पर कभी खलनायक अभय बैठकर इस संसार के भाग्य को मोड़ता रहा था। जैसे ही अभय ने आँखें बंद कीं, सिंहासन और रक्त-साधना कोर से जुड़ी स्मृतियाँ उसकी चेतना में उतरने लगीं। वे स्मृतियाँ बोझिल थीं, पीड़ा से भरी हुई थीं, और हर क्षण उसके मन पर किसी अदृश्य हथौड़े की तरह प्रहार कर रही थीं। समय वहाँ अपना अर्थ खो चुका था। न जाने कितनी देर बाद—या शायद अनंत काल बीत जाने के बाद—अभय को धीरे-धीरे यह समझ आने लगा कि जिसे संसार ने खलनायक कहा, वह उतना क्रूर नहीं था, जितना इतिहास ने उसे बताया था। उसके कर्मों के पीछे अंधकार से अधिक विवशता छिपी हुई थी, और उसकी चुप्पी के पीछे असहनीय पीड़ा का सागर उमड़ रहा था। अभय को यह भी ज्ञात हुआ कि खलनायक अभय ने कभी स्वेच्छा से रक्त-साधना का मार्ग नहीं चुना था। उसने शक्ति की लालसा में नहीं, बल्कि जीवित रहने के लिए वह राह अपनाई थी। जैसे ही उसने कुछ सामर्थ्य प्राप्त की, उस पर फिर से हमला हुआ, और तब से वह निरंतर शिकार बनता चला गया—ऐसा शिकार, जिसे विश्राम का एक क्षण भी नसीब नहीं हुआ। सबसे गहरा रहस्य उसकी नौकरानी से जुड़ा हुआ था। वह नौकरानी, जिसने उसके लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था, केवल एक सेवक नहीं थी, बल्कि उसकी आख़िरी ढाल थी। उसने अपनी बलि इसलिए दी, क्योंकि खलनायक अभय उस वक़्त उन शत्रुओं से गिरा हुआ था अगर उस वक़्त अभय साधना करके अपनी शक्ति सै सामना नहीं करता तो उस दिन उन दोनों का अंत हो जाता उसकी नौकरानी को यह बात पता थी इसलिए उस स्त्री ने अपने ही हाथों से अपने प्राण त्यागे, और उसी क्षण रक्त-साधना पहली बार जाग उठी, जैसे किसी सोई हुई राक्षसी शक्ति ने आँखें खोल दी हों। उस एक घटना के बाद जो हुआ, वह कभी भी उस game की कहानी में नहीं दिखाया गया था। रक्त-साधना के जागते ही विनाश की ऐसी लहर उठी, जिसने लगभग पूरे देश को मिटा दिया। नगर राख में बदल गए, नदियाँ रक्त से लाल हो गईं, और इतिहास ने उस सच्चाई पर हमेशा के लिए परदा डाल दिया। अब, उस सिंहासन पर बैठा अभय, पहली बार उस छुपी हुई सच्चाई को पूरी तरह समझ चुका था—और उसे यह भी एहसास हो गया था कि आगे की राह पहले से कहीं अधिक खतरनाक होने वाली थी। और वह कसम खाता है की उस नौकरानी को वो इस जन्म मे अपना हमसफर बनाएगा

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अभय ने आँखें खोलीं तो वह अब भी उसी विशाल सभागार में था, लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था। हवा भारी थी, मानो दीवारें भी उन रहस्यों को सुन चुकी हों जिन्हें अभी-अभी उसने जाना था। वह सिंहासन से उठा नहीं—क्योंकि उठने से पहले उसे अपने भीतर उठते हुए सवालों को थामना था। उस लाल core से अब कोई प्रकाश नहीं निकल रहा था, पर उसकी मौजूदगी ही चेतावनी बन चुकी थी। अभय समझ गया था कि यह केवल शक्ति का अवशेष नहीं, बल्कि एक कहानी का अंतिम अध्याय था—और उसी कहानी का पहला पन्ना अब उसके हाथ में था। उसने पहली बार उस संगठन के बारे में गंभीरता से सोचा। वही संगठन, जिनके शहरों पर खलनायक अभय ने प्रहार किया था। यह संयोग नहीं था। यह प्रतिशोध था—सटीक, ठंडा और योजनाबद्ध। इसका अर्थ साफ़ था: दुनिया ने खलनायक को बनाया, और फिर उसी से डरकर उसे राक्षस घोषित कर दिया। अभय ने गहरी साँस ली। उसके भीतर उठती बेचैनी अब भय नहीं रही थी; वह सतर्कता में बदल चुकी थी। अगर कोई शक्ति पर्दे के पीछे से नियति को मोड़ रही थी, तो अगला मोहरा वही हो सकता था। और अगर ऐसा था, तो उसे मोहरा नहीं—खिलाड़ी बनना होगा। उसने हाथ बढ़ाया। काले बादल फिर से उसकी उँगलियों के चारों ओर घूमने लगे, लेकिन इस बार वे अनियंत्रित नहीं थे। वे आज्ञाकारी थे। अभय ने उन्हें सिमटने का संकेत दिया—और वे उसके भीतर समा गए, जैसे उसकी धड़कन का हिस्सा हों। तभी सभागार की दीवारों पर हल्की दरारें चमकीं। कोई तंत्र सक्रिय हुआ था—कोई संदेश, कोई निमंत्रण या शायद चेतावनी। अभय ने पीछे मुड़कर देखा। यह स्थान अब केवल स्मृतियों का मकबरा नहीं रहा था; यह एक द्वार बन चुका था। उसने अंतिम बार सिंहासन की ओर देखा—न सम्मान से, न घृणा से—बल्कि समझ के साथ। खलनायक अभय की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई थी। वह अब उसके भीतर बह रही थी। और जैसे ही अभय ने पहला कदम आगे बढ़ाया, अंधेरी दुनिया ने उसे पहचान लिया। यह दुनिया अब उसके इरादों सै चलने लगी थी।

____ अभय की नज़र उस ball-size core पर टिक गई। वह उसे यूँ देख रहा था, जैसे वही उसके सारे सवालों का जवाब हो। उसके भीतर एक अजीब-सी भावना उठी—डर और उम्मीद के बीच झूलती हुई। यह वही core था, जिसमें खलनायक अभय की पूरी विरासत, उसकी यादें और उसकी शक्ति बंद थी। एक ऐसा core, जिसने एक इंसान को राक्षस बनाया… और शायद अब उसी राक्षस की शक्ति किसी टूटे हुए core को बचा सकती थी। ____

फिर अभय पूरी उस आंतरिक दुनिया को काबू करने की कोशिश करता है, और वह दुनिया उसके हिसाब से अपना रंग-रूप बदलने लगती है। वह उस जगह को अपने पिछले जन्म के ननिहाल जैसा बना देता है, जहाँ उसके घर के पीछे गंगा नदी बहती है। मौसम हमेशा सुहावना और मन को छू लेने वाला रहता है। यह सब करने के बाद वह अपनी शारीरिक संरचना पर ध्यान देता है, जहाँ उसे अपना एक कोर दिखाई देता है, जो खलनायक अभय के कोर से बहुत छोटा होता है—लगभग एक चावल के दाने जितना। खुद को देखकर अभय खुद पर ही हँसने लगता है। फिर वह एक बार कोर से जुड़ी सभी यादों को खंगालना शुरू करता है। अंत में वह यह समझ पाता है कि यह ज़हर वास्तव में एक तरह की दवाई है, जिसे टूटे हुए कोर को ठीक करने के लिए विकसित किया गया था। लेकिन अगर इसकी ज़्यादा मात्रा दे दी जाए, तो यह उस कोर को पूरी तरह से बंद कर देता है, जिससे ऑरा और ऊर्जा दोनों ही रुक जाती हैं। वह यही सोच ही रहा था कि इसका इलाज कैसे ढूँढा जाए, तभी उसकी नज़र अपने हाथ पर पड़े बॉल साइज के खलनायक अभय के कोर पर पड़ती है।

___ अभय के मन में उठता वह विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगा था। पहले जो सिर्फ एक पागल-सा ख्याल था, अब वह एक ठोस संभावना बनता जा रहा था। अगर उसने वह कर लिया… जो अभी उसके दिमाग़ में घूम रहा था… तो वह सिर्फ भविष्य से आए खलनायक अभय से आगे नहीं निकलेगा, बल्कि उस रास्ते से ही हट जाएगा जिस पर चलकर खलनायक बना जाता है। उसे साफ़ याद था— खलनायक अभय ने कभी अपने पिता या माँ की साधना तकनीकों को अपनाने की कोशिश तक नहीं की थी। उसने सिर्फ रक्त-साधना को ही अपना सब कुछ बना लिया था। वही उसकी ताकत बनी… और वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। अभय की आँखों में हल्की चमक उभर आई। अगर उसकी समझ सही थी, तो उसके पिता कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। उसके पिता नीलम कमल की साधना करते थे एक ऐसी तकनीक, जो देखने में शांत लगती थी, पर भीतर से गहरी, स्थिर और बेहद खतरनाक थी। वह साधना जो विनाश नहीं, बल्कि नियंत्रण सिखाती थी। और उसकी माँ… अभय के होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आ गई। दुनिया उसे भले ही कमजोर समझती हो, पर वह जानता था— उस औरत के पीछे विषकन्याओं की एक पूरी सेना खड़ी थी। एक ऐसा अदृश्य जाल, जो उसके एक संकेत पर पूरे देश को निगल सकता था। इतनी विरासत होने के बावजूद भी खलनायक अभय टूट गया था। तो क्या यह सिर्फ नियति थी? अभय ने सिर हल्के से झटका। “नहीं…” वह बुदबुदाया। “मुझे यह जन्म अलग तरह से जीना है।” वह न किसी नायिका के पीछे भागना चाहता था, न किसी भविष्य के नायक या खलनायक की भूमिका निभाना चाहता था। वह बस… एक आम इंसान की तरह जीना चाहता था। अपनी शर्तों पर। लेकिन तभी उसके दिमाग़ में खलनायक अभय की बात गूँज उठी— “सभी पात्रों का पुनर्जन्म हो चुका है।” अभय की भौंहें सिकुड़ गईं। “अगर ऐसा है…” “तो फिर नियति इतनी अंधी कैसे हो सकती है?” जिस नियति को स्वयं नारायण भी नहीं रोक पाए थे। जिसके कारण महाभारत जैसा युद्ध हुआ। उसी नियति को यह कैसे नहीं दिखा कि अभय के पास वह क्षमता है जो समय को पीछे छू सकती है? मंत्र-core को भूतकाल में भेजने की क्षमता। अभय की आँखें धीरे-धीरे ठंडी हो गईं। डर की जगह अब वहाँ समझ थी। और समझ के साथ एक खतरनाक शांति। “या तो यह नियति नहीं है…” वह धीमे स्वर में बोला। “या फिर कोई है जो नियति को भी मोहरे की तरह चला रहा है।” और अगर ऐसा है— तो यह कहानी सिर्फ नायक और खलनायक की नहीं थी। यह कहानी उस बच्चे की थी जो बहुत पहले समझ चुका था कि असली युद्ध तलवारों से नहीं, सही निर्णय से जीते जाते हैं।

___ अभय वहाँ काफी देर तक खड़ा रहा, अपने मन में उठ रहे सवालों के घेरे में फंसा हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सब नियति की चाल थी—कि खलनायक अभय भूतकाल में जाए, और उस समय के अभय को चेतावनी दे? और फिर भूतकाल का अभय यानी की मे स्वयं—नायक और नायिकाओं से टकरा कर उनके लिए सिर्फ़ एक रास्ता बनु। उसके होंठों से हल्की-सी साँस निकली। यह सोचकर कि इस दुनिया में कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता, उसे अंदर से एक ठंडी सिहरन हुई। हर शक्ति की एक कीमत होती है, हर चमत्कार के पीछे किसी का बलिदान छिपा होता है। खलनायक अभय ने शायद कभी इन सब पर ध्यान नहीं दिया। वह केवल एक काली दुनिया में बँधा हुआ खलनायक था, बिना विकल्प और बिना किसी सहारे के, केवल अंत की ओर बढ़ता हुआ। अभय ने फिर खलनायक अभय की स्मृतियों पर ध्यान लगाना शुरू किया। अब वह भावनाओं में नहीं, बल्कि तर्क और विश्लेषण में डूबा हुआ था। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जो कुछ भी खलनायक अभय ने किया, वह केवल बुराई के लिए नहीं था। उसने अपने अंतिम समय में अपने तंत्र-core को नष्ट किया और उसे नायक की आत्मा से बाँध दिया—यह कोई साधारण निर्णय नहीं हो सकता था। अभय ने ध्यान से देखा कि खलनायक का तंत्र-core नायक की आत्मा से जुड़ा हुआ था। यह तथ्य उसे धीरे-धीरे समझ आया, और उसके दिमाग़ ने हर संभावना को जोड़ना शुरू कर दिया। स्मृतियों और घटनाओं की रेखाएँ उसकी आँखों के सामने स्पष्ट हो गईं। अंततः अभय एक भयंकर निष्कर्ष पर पहुँचा। अगर खलनायक का तंत्र-core नायक की आत्मा से बंधा हुआ था, तो इसका मतलब यह था कि जिस क्षण वह खलनायक की शक्तियाँ हासिल कर रहा था, उसी समय नया नायक—भविष्य का वह खुद—अपनी चेतना और यादों को भी प्राप्त कर रहा होगा। उस क्षण अभय को पता चल गया कि यह खेल एकतरफा नहीं है। यह केवल उसके लिए नहीं, बल्कि समय और नियति के पूरे चक्र के लिए चल रहा है। अगर वह जाग चुका है, तो दूसरी ओर भी कोई जाग चुका होगा। यह एहसास उसे भीतर से हिला गया, और एक नई चेतना ने उसके भीतर जन्म लिया—समझ कि अब वह न केवल अपनी ताकत, बल्कि नियति की पूरी गहराई को भी चुनौती देने वाला था

अभय ने अपनी मुठ्ठी कसते हुए खुद से वादा किया, “इस बार मैं तुम्हारे रास्ते में सीधे नहीं आउंगा, लेकिन मेरी नजर हमेशा तुम पर रहेगी। और अगर तुम फिर भी मुझे जीने नहीं देना चाहते, तो जान लो—भविष्य का खलनायक अभय केवल ताकतवर था, लेकिन यह वर्तमान का अभय न केवल ताकतवर है, बल्कि शांत, और निर्णायक भी है।”

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