कमल साधना
अभय चुपचाप सिंघासन पे बैठा था।लेकिन उसके मन में उठते विचार उससे कहीं ज़्यादा गहरे थे। उसने अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे कसी। “आगे क्या करना है… यही असली सवाल है।” इस जीवन में वह भागना नहीं चाहता था। न ही वह अंधी क्रोध में बहकर सब कुछ जलाना चाहता था। पिछले जन्म में उसने यही गलती की थी। इस बार— वह देखेगा, समझेगा, और फिर निर्णय करेगा।
अभय की आँखों के सामने उसके पिता की छवि उभरी। शांत, गंभीर और अपार गहराई वाले व्यक्ति। उनकी साधना तकनीक— नील कमल साधना थी यह साधना जल तत्व पर आधारित थी, लेकिन साधारण जल नहीं— यह वह जल था जो शांत दिखता है, लेकिन भीतर सुनामी छिपाए रहता है। नील कमल साधन का पहला स्तर साधक को जल की धड़कन महसूस करना सिखाता था। दूसरा स्तर— जल को आदेश देना। और तीसरा स्तर… पूरा समुदाय डुबो देने वाली सुनामी। अभय को पिता के शब्द आज भी याद थे— “जल को कमज़ोर मत समझना, अभय। सबसे कठोर चट्टान भी अंत में उसी के आगे झुकती है।” अगर कोई साधक इस तकनीक पर पूर्ण नियंत्रण पा ले— तो वह पानी की एक पतली धार बनाकर पूरे पहाड़ को दो हिस्सों में काट सकता था। शांत… लेकिन निर्दयी। बिलकुल उसी तरह जैसे अभय बनना चाहता था। और उसकी माँ जो सबसे खतरनाक रहस्य मे लिपटी हुई है अभय की माँ के बारे मे सोचता है और उस game के अंदर जो खलनायक अभय की माँ की जानकरी थी एक साधारण सी औरत की तरह। लेकिन अभय जानता था। यह साधारण नहीं है। अगर वह साधक नहीं है तो आज भी सोलह साल की लड़की जैसी नहीं दिखती। उसकी माँ एक साधक थी… लेकिन उसने अपनी शक्ति का इस्तमाल कभी नहीं किया था क्योंकि वह आती थी— विष्कान्या के वंश से। एक ऐसा वंश, जहाँ लाखों विष्कान्याएँ रहती थीं। ऐसी औरतें— जो मुस्कुराते हुए किसी आदमी को बिना एहसास दिलाए मौत के घाट उतार सकती थीं। उनका ज़हर— न दिखता है, न महकता है, और न ही दर्द देता है। जब तक एहसास होता है— सब खत्म हो चुका होता है। “खलनायक का परिवार कभी साधारण नहीं होता…” अभय ने मन ही मन सोचा। अभय का निर्णय अभय खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब कोई भ्रम नहीं था।
और उसका अनुभव— उसे गलतियाँ दोहराने से बचाएगा। ___ अभय की साँस थोड़ी भारी हो गई। उसके दिमाग के अंधेरे कोने से एक नाम फिर उभरा— खलनायक अभय। वह अभय… जिसने अपनी ताकत से लगभग सभी नायकों और नायिकाओं को समाप्त कर दिया था। न कोई दया, न कोई संकोच। लेकिन अजीब बात यह थी— वे सभी लोग कभी न कभी उससे जुड़े थे। कुछ मित्र थे। कुछ शत्रु। कुछ ऐसे… जो अंत तक उसका साथ देना चाहते थे। और यही सबसे डरावनी सच्चाई थी— वे उसे कभी छोड़कर नहीं गए। वे उसका भला चाहते थे, चाहे उसने उनके साथ कुछ भी किया हो। अभय की आँखें धीरे से बंद हो गईं। फिर एक और स्मृति उभरी— पूर्णजन्म। नायक… नायिकाएँ… सबने पुनर्जन्म लिया था। वे फिर लौट आए थे। इस बार… एक नई दुनिया में। निर्णय की मुट्ठी अभय ने अपनी मुट्ठी कस ली। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं— डर से नहीं… निर्णय के भार से। “अगर वे लौट आए हैं…” “तो मुझे भी आगे बढ़ना होगा।” वह जानता था— अगर वह सिर्फ पुराने खलनायक अभय जितना ही बना, तो वही त्रासदी दोहराई जाएगी। इसलिए— उसे उससे कहीं अधिक ताकतवर बनना होगा। लेकिन— न सत्ता चाहिए थी। न पूरी दुनिया पर राज। न हत्या। न रक्तपात। उसकी इच्छा आश्चर्यजनक रूप से… साधारण थी। “मैं सिर्फ एक आम जिंदगी जीना चाहता हूँ।” लेकिन दुनिया अक्सर ऐसी इच्छाओं को सबसे पहले कुचलती है। अभय ने खलनायक अभय की स्मृतियाँ के भीतर झाँका। खलनायक अभय की यादें— एक-एक करके खुलने लगीं। सैकड़ों साधनाएँ। अनगिनत तंत्र प्रयोग। हज़ारों असफलताएँ। और उन्हीं यादों में— एक बेहद महत्वपूर्ण सच्चाई। इस दुनिया में साधना और तंत्र Core के बीच एक गहरा, अटूट संबंध है। Core— यानी वह मूल केंद्र जहाँ से तंत्र ऊर्जा जन्म लेती है। खलनायक अभय ने तंत्र Core को कई अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया था Core को तीन से पाँच प्रकारों में बाँटा था— लेकिन यह ज्ञान दुनिया से छुपा हुआ था। सवर्ण Core — उच्च कोटि का — Aura साधना में असाधारण वृद्धि — अत्यंत दुर्लभ लाल Core — सामान्य मंत्रियों के पास — स्थिर लेकिन सीमित शक्ति नीला Core — साधारण दुकानदार, कारीगर — व्यावहारिक तंत्र ऊर्जा सफेद Core — आम नागरिक — न्यूनतम तंत्र प्रवाह काला Core — जो लोग मर चुके होते है उनका core Core जितना ऊँचा— तंत्र ऊर्जा की गति, घनत्व, और प्रभाव उतना ही तेज़ और गहरा।
अभय की आँखें चमकीं। अब तक— हर साधक सिर्फ एक Core पर निर्भर था। लेकिन खलनायक अभय की स्मृतियों में एक अपूर्ण विचार था— “अगर…” “एक से ज़्यादा Core का उपयोग किया जाए?” अभय की धड़कन तेज़ हो गई। “अगर मैं कई तंत्र Core को एक साथ साध सकूँ…” यह विचार पागलपन था। दुनिया के नियमों के विरुद्ध। लेकिन— यही नियम तोड़ने से नई विद्याए जन्म लेती हैं। अभय ने उसी क्षण निर्णय लिया— वह एक नई तंत्र विद्या विकसित करेगा। ऐसी विद्याय, जिसमें एक नहीं… बल्कि कई Core एक साथ कार्य करेंगे। अभय ने अपने पिछले जन्म की स्मृति को याद किया जहाँ— 7 चक्र मानव शरीर के लिए अत्यंत महत्व पुन था शरीर, मन और आत्मा— सब कुछ उन संख्याओं से जुड़ा था। “अगर…” अभय ने धीमे से सोचा— “मैं 7 चक्रों के बजाए 7 तंत्र Core को खुद सै जोड़ दूँ…” उसके भीतर एक खतरनाक लेकिन सुंदर रास्ता खुलने लगा।
लेकिन अभय के भीतर— एक नई विद्या चुपचाप जन्म ले चुकी थी। जो न नायक थी, न खलनायक— बल्कि कुछ ऐसा, जो दोनों से ऊपर था। ___ अभय ने अपने हाथो मे भविष्य सै आया खलनायक अभय का कोर देखा। उसके सामने वह Core था—भविष्य से आया हुआ, लगभग निष्प्राण, फिर भी भीतर हल्की-सी धड़कन लिए। उस धड़कन में भय नहीं था… चेतावनी थी। वह जानता था—जल्दबाज़ी यहाँ मृत्यु के बराबर थी। अभय ने गहरी साँस ली और आँखें बंद कर लीं। अंधेरी दुनिया उसके मन के अनुरूप ढलने लगी। दीवारें, छायाएँ, हवा—सब कुछ शांत। अब यहाँ केवल वह था, उसका निर्णय था, और समय था। “एक Core… नहीं,” उसने मन ही मन कहा। “मैं वह गलती नहीं दोहराऊँगा।” उसने अपने भीतर झाँका। वहाँ उसका अपना कोर था—चावल के दाने जितना छोटा, निष्क्रिय। न Aura का प्रवाह, न शक्ति का कंपन। फिर भी… वह मौजूद था। तीन वर्ष की उम्र में बना हुआ Core—यह स्वयं में असंभव था। अभय के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। “अगर यह असंभव है,” उसने सोचा, “तो मैं इसी असंभव को रास्ता बनाऊँगा।” उसने निर्णय किया—पहला Core उसका स्वयं का होगा। वही प्रधान Core बनेगा। वही सभी Core को समेटेगा, नियंत्रित करेगा, और अंततः एक संपूर्ण संरचना बनाएगा। दैवीय औषधि उसी में थी—टूटे Core को जोड़ने की क्षमता रखने वाली। उसकी दृष्टि फिर उस बड़े Core पर गई—खलनायक अभय का Core। लगभग बुझ चुका था, पर उसकी Aura अब भी भय पैदा करती थी। अभय के हाथ हल्के-से काँपे, पर डर से नहीं—सम्मान से। “तुम ताकतवर थे,” उसने धीमे से कहा, “पर अधूरे।” उसे याद आया—खलनायक अभय ने कितनी विद्याएँ सीखी थीं। साम्राज्य, उप-साम्राज्य, वेद, तंत्र—सब कुछ। पर उसने कभी कई -कोर मार्ग नहीं चुना। कभी संतुलन की साधना नहीं की। यही उसकी हार थी। अभय ने नायक और नायिकाओं के बारे में सोचा। उनके पुनर्जन्म। उनके भविष्य में मौजूद Core। वर्तमान में… शून्य। उलझन आई, पर टिक नहीं पाई। उसकी नज़र रक्त Core पर पड़ी—जिसमें अब भी हल्का Aura शेष था। एक संभावित कुंजी। पर वह जानता था—अभी नहीं। “एक समय में एक कदम,” उसने खुद से कहा। उसने अंतिम सीमा तय की— बारह वर्ष की आयु तक, सात Core। न अधिक, न कम। सात—चक्रों का अंक। सात—संतुलन का संकेत। अभय ने अपनी मुट्ठी कस ली। यह शक्ति की भूख नहीं थी। यह नियंत्रण की प्रतिज्ञा थी। “मैं साधक बनूँगा,” उसने मन में कहा, “पर राक्षस नहीं।” अंधेरी दुनिया शांत रही— मानो उसके निर्णय को स्वीकार कर रही हो। और वहीं, उसी क्षण— कई -कोर साधना के मार्ग का पहला कदम रखा जा चुका था। ____ दूसरी ओर— द्वार के भीतर— महाराज रुद्रसेन एक ऐसे स्थान में खड़े थे जहाँ समय जैसे थम गया था। न हवा चल रही थी, न कोई ध्वनि थी— फिर भी ऊर्जा हर ओर व्याप्त थी। यहाँ अंधेरा था, पर भय नहीं। महाराज ने सामने देखा और शांत स्वर में कहा “मैं आ गया हूँ।” अंधेरे ने कोई शब्द नहीं कहे, पर उसकी उपस्थिति स्वयं उत्तर बन गई। महाराज रुद्रसेन आगे बढ़े। उनकी आँखों से निकलती नीली आभा अंधकार को चीरती चली जा रही थी। वे आँखें केवल देखने की शक्ति नहीं देती थीं— वे किसी दिव्य मणि की भाँति अंधेरे में चमक रही थीं, मानो स्वयं प्रकाश को मार्ग दिखा रही हों। कुछ ही क्षणों में वह एक विशाल कक्ष के भीतर पहुँच गए। चारों ओर धूप और दुर्लभ मसालों की अग्नि जल रही थी। उनकी सुगंध हवा में तैर रही थी। कक्ष के दोनों ओर सशस्त्र पहरेदार खड़े थे— अत्यंत अनुशासित, अत्यंत भयावह। जैसे ही उन पहरेदारों की दृष्टि महाराज रुद्रसेन पर पड़ी, उन्होंने तुरंत घुटने टेक दिए। “महाराज रुद्रसेन का प्रताप अमर रहे।” पर यह स्थान केवल अनुशासन और सम्मान का नहीं था— यह पीड़ा का भी केंद्र था। कक्ष के भीतर अनेक लोग जंजीरों में जकड़े पड़े थे। किसी के हाथ नहीं थे, किसी के पैर। कई की हड्डियाँ अस्वाभाविक कोणों पर मुड़ी हुई थीं। कुछ की आँखें निकाल ली गई थीं, तो कुछ के शरीर पर केवल गहरे घाव शेष थे— सूखे हुए, जले हुए, सड़ते हुए। कोनों में कंकालों के ढेर लगे थे— गवाही देते हुए कि यह स्थान कितनों की अंतिम मंज़िल रहा था। महाराज रुद्रसेन का चेहरा निर्विकार रहा। उनकी दृष्टि में न क्रोध था, न दया— केवल निर्णय। वे कक्ष के अंत में स्थित उस सबसे ऊँची कुर्सी की ओर बढ़े और उस पर विराजमान हो गए। कुछ क्षण का मौन। फिर उन्होंने एक सैनिक को संकेत किया। “वे लोग कहाँ हैं?” सैनिक ने सिर झुकाकर उत्तर दिया— “महाराज, सभी को पकड़ लिया गया है। पर… उनमें कुछ गड़बड़ है।” महाराज रुद्रसेन की नीली आँखों में हल्की चमक उभरी। “तो हमें उन्हीं के पास ले चलो,” उन्होंने शांत पर कठोर स्वर में कहा। “हम स्वयं देखना चाहते हैं— कि हमारे पुत्र पर हाथ उठाने वाले अपनी शेष ज़िंदगी कैसे बिताने वाले थे।” ___
थोड़ी देर बाद महाराज रुद्रसेन और वह सैनिक एक गहरे कक्ष में प्रवेश करते हैं। कक्ष के भीतर का दृश्य भयावह था। कुछ लोगों को निर्दयता से पीटा जा रहा था। घूंसे, कोड़े और लोहे की छड़ें लगातार उनके शरीर पर बरस रही थीं। मांस फट रहा था, हड्डियाँ टूट रही थीं— लेकिन उस पूरे कक्ष में एक भी चीख़ नहीं गूँज रही थी। न कराह थी। न दर्द की कोई पुकार। न ही जीवन का कोई संकेत। वे लोग खड़े थे— सीधे, स्थिर,जंजीरो मे बन्दे मानो जीवित देह के भीतर बंद लाशें हों। जैसे ही कोड़े बरसाने वालों की दृष्टि महाराज रुद्रसेन पर पड़ी, उनके हाथ उसी क्षण थम गए। सबने तुरंत पीछे हटकर रास्ता दे दिया। पर कैदी— न गिरे, न हिले, न ही उनके चेहरे के भाव बदले। वे उसी अवस्था में खड़े रहे, मानो मृत्यु ने उन्हें बहुत पहले ही जकड़ लिया हो। महाराज के पास एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और घुटनों पर झुक गया। उसकी आवाज़ काँप रही थी। “महाराज… क्षमा कीजिएगा,” उसने कहा। “हमने हर तरह से इन्हें तोड़ने की कोशिश की। कुछ की आँखें निकाल लीं, कुछ के हाथ-पैर काट दिए… लेकिन फिर भी इनमें से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ।” वह क्षण भर रुका, फिर धीमे स्वर में बोला— “ऐसा लगता है… जैसे ये लोग पहले से ही मर चुके हों।” यह सुनते ही महाराज रुद्रसेन की नीली आँखों में क्रोध की लहर दौड़ गई। वे बिना कुछ कहे आगे बढ़े और एक कैदी के सामने जा खड़े हुए। “तुम कहाँ से आए हो?” उनका स्वर कठोर था। कोई उत्तर नहीं आया। अगले ही क्षण— महाराज की मुट्ठी चली। कैदी का सिर फट गया। लेकिन जो दृश्य सामने आया, वह सामान्य नहीं था। उस सिर से खून नहीं निकला। न ताज़ा, न गरम। अंदर से केवल सूखा, काला द्रव टपका— मानो शरीर बहुत पहले ही जीवन खो चुका हो। महाराज का क्रोध क्षण भर में संदेह में बदल गया। उन्होंने एक-एक करके अन्य कैदियों पर भी वही किया। पर हर बार परिणाम एक-सा ही रहा। कोई चीख़ नहीं। कोई पीड़ा नहीं। कोई जीवन नहीं। महाराज ने धीरे से हाथ उठाया। पूरा कक्ष स्तब्ध हो गया। “वेद्य को बुलाओ,” उन्होंने आदेश दिया। “और मुझे बताओ— इन लोगों के साथ आखिर हो क्या रहा है। ये जीवित हैं… या मृत? और अगर मृत हैं, तो फिर चल कैसे रहे हैं?” कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। काले खून की गंध हवा में फैल चुकी थी। अब यह स्पष्ट हो चुका था— यह साधारण अपराधियों का मामला नहीं था। यह किसी ऐसी विद्या का संकेत था जो मृत्यु और जीवन— दोनों को काबू करती थी। और जो सीधा राजकुमार अभय पर हुए हमले से जुड़ी हो सकती थी। ___
वेद्य के कदमों की आहट कक्ष में गूँजती है। वह एक वृद्ध पुरुष था— सफेद दाढ़ी, धूसर आँखें, और हाथों में हज़ारों शल्य–विद्याओं का अनुभव। उसकी नज़र जैसे ही कैदियों पर पड़ी, उसका चेहरा कठोर हो गया। वह झुका, एक कैदी की कलाई थामी, और पल भर में ही उसे छोड़ दिया। “महाराज…” उसकी आवाज़ पहली बार काँपी। “ये लोग जीवित नहीं हैं।” कक्ष में खड़े सभी सैनिक सिहर उठे। महाराज रुद्रसेन ने एक कदम आगे बढ़ाया। “स्पष्ट बोलो,” उनका स्वर शांत था, पर उसमें आदेश छिपा था। वेद्य ने गहरी साँस ली। “इनके भीतर आत्मा नहीं है। पर देह भी पूरी तरह मृत नहीं है।” उसने उँगली से उस काले रक्त की ओर इशारा किया। “यह रक्त नहीं… यह मृत-तंत्र द्रव है।” सैनिक की भौंहें सिकुड़ गईं। “मृत-तंत्र?” वेद्य ने सिर हिलाया। “एक निषिद्ध विद्या। __ ऐसी विद्या जो शरीर सै आत्मा को निकाल लेती है और उसे एक कट पुतली की तरह चलाती है। जिसमें पीड़ा नहीं होती, डर नहीं होता, और आदेश के सिवा कुछ नहीं बचता।” महाराज की नीली आँखों में ठंडक और गहराई आ गई। “किसका आदेश?” वेद्य कुछ पल चुप रहा। फिर बोला— “जो इनका स्वामी है, वह या तो मायोम लोक से जुड़ा है… या फिर नियति से भी आगे खड़ा है।” यह शब्द सुनते ही महाराज रुद्रसेन की उँगलियाँ अनजाने में मुट्ठी बन गईं। “मेरे पुत्र पर हमला,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “और अब यह…” उन्होंने कक्ष के हर कैदी को देखा। उनकी सूनी आँखें, सूखे चेहरे, और वह काला रक्त। “ये लोग यहाँ कैसे भेजे गए थे?” महाराज ने पूछा। वेद्य ने उत्तर दिया— “जासूसी के लिए नहीं, महाराज।” “बल्कि देखने के लिए।” “किसे देखने के लिए?” वेद्य ने सिर झुकाया। “आपके पुत्र को।” कक्ष में हवा भारी हो गई। दीपकों और मसालो की लौ काँप उठी। सैनिक ने तलवार के मूठ पर हाथ रख लिया। “तो इसका मतलब— अभय केवल लक्ष्य नहीं है…” महाराज रुद्रसेन ने वाक्य पूरा किया। “वह केंद्र है।” उन्होंने धीरे से मुड़कर बाहर की ओर देखा— मानो पत्थरों के पार, कहीं बहुत दूर, अपने पुत्र की धड़कन सुन रहे हों। “मायोंम लोक मे किसने ये कदम चल दिया है,” उन्होंने कहा। “अब— हम पीछे नहीं हटेंगे।” और उसी क्षण, काले रक्त से भरे कक्ष में, एक अदृश्य तरंग उठी— मानो किसी ने दूर कहीं मुस्कुरा कर कहा हो— “खेल शुरू हो चुका है।”
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