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खलनायक अभय
📚 Journey of the Mantralok

खलनायक अभय

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अभय कुछ पल तक उस कंकाल को देखता रहा। उसके भीतर हल्का-सा डर था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा स्पष्टता थी। वह समझ चुका था कि यह सामना संयोग नहीं है। उसने अपनी आँखें सिंहासन पर बैठे कंकाल से हटाए बिना शांत स्वर में कहा, “अगर आपको कुछ करना ही होता, तो आप मुझे पहले ही मार देते। यहाँ लाने का कोई कारण है। मुझे बताइए कि आप मुझे यहाँ क्यों लाए हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई तीन साल का बच्चा आपकी किसी तरह मदद कर सकता है।” उसके शब्द सीधे थे, बिना किसी झिझक के। यह बात उस जगह के लिए असामान्य थी, जहाँ अब तक सिर्फ़ चीखें और मौतें गूंजी थीं। कंकाल राजा यह सुनकर हँस पड़ा। उसकी हँसी दरबार में फैल गई, लेकिन उसमें क्रूरता नहीं थी। वह सिंहासन पर थोड़ा पीछे टिक गया और बोला, “बच्चे, तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हें यहाँ लाने की वजह क्या हो सकती है?” उसके स्वर में खेल-सा भाव था, जैसे वह किसी पहेली का उत्तर सुनना चाहता हो। अभय ने हल्के से कंधे उचकाए और लगभग मासूमियत से कहा, “मुझे क्या पता। मैं तो अभी तीन साल का बच्चा हूँ।” उस उत्तर में न चालाकी थी, न बनावट। बस एक सादा सच था। कंकाल राजा फिर हँसा, लेकिन इस बार उसकी हँसी धीमी थी। उसकी खोखली आँखों में जलती लाल आग थोड़ी और तेज़ हो गई। वह सिंहासन पर सीधा बैठ गया और अभय को ध्यान से देखने लगा, जैसे वह उसके शरीर को नहीं, उसके भीतर झाँक रहा हो। “हाँ,” वह गहरी आवाज़ में बोला, “तुम्हारा शरीर भले ही तीन साल का हो… लेकिन मैं उस अठारह साल के लड़के से बात करना चाहता हूँ, जो पृथ्वी लोक से आया है।” उस पल अभय का शरीर स्थिर रह गया। उसकी साँस एक क्षण के लिए रुक-सी गई। यह बात कोई और नहीं जान सकता था। यह सच सिर्फ़ उसी के भीतर दफ़न था। दरबार का अँधेरा और गहरा हो गया। अभय को ऐसा लगा जैसे उसकी चेतना दो हिस्सों में बँट रही हो—एक हिस्सा उस छोटे बच्चे का, जो इस नई दुनिया में पैदा हुआ था, और दूसरा उस अठारह साल के लड़के का, जिसने पृथ्वी पर दर्द, अकेलापन और मौत देखी थी। वह समझ गया था। यह कंकाल राजा उसे उसके शरीर के कारण नहीं, उसकी आत्मा के कारण यहाँ लाया गया था। अभय ने धीरे से साँस ली और पहली बार महसूस किया कि यह स्थान कोई कब्र नहीं था। यह एक सीमा थी—दो ज़िंदगियों के बीच की सीमा। और जो इसके पार बैठा था, वह कोई साधारण मृत राजा नहीं, बल्कि ऐसा अस्तित्व था जो आत्माओं को पहचान सकता था। कंकाल राजा की आवाज़ फिर गूंजी, “अब बताओ,” “क्या तुम अभी भी खुद को सिर्फ़ तीन साल का बच्चा मानते हो?” अभय ने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन उसके मौन में ही उत्तर छिपा था। और उसी मौन के साथ, दरबार की हवा बदलने लगी। यह मुलाक़ात अब सवाल-जवाब की नहीं रही थी। यह चयन की शुरुआत थी। और शायद— एक ऐसे सौदे की, जिसका मूल्य पूरी दुनिया मे बदलाव ला सकता था

अभय की नज़र उस कंकाल पर जमी हुई थी। उसकी आँखों में डर था, लेकिन उससे ज़्यादा उलझन थी। पत्थर के विशाल कक्ष में नीली आग की मशालें जल रही थीं, जिनकी रोशनी कंकाल की हड्डियों पर अजीब-सी चमक पैदा कर रही थी। हर हँसी के साथ ऐसा लगता, जैसे पूरी गुफा काँप रही हो। अभय ने हिम्मत जुटाकर कहा, ___ मुझे नहीं लगता कि कोई 18 साल का लड़का तुम्हारी कोई मदद कर सकता है।” उसकी आवाज़ छोटी थी, लेकिन शब्दों में आत्मसम्मान था। कंकाल ने सिर झुकाया, फिर ज़ोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी में क्रूरता भी थी और मनोरंजन भी। “बच्चे,” वह बोला, “तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हें यहाँ लाने की वजह क्या हो सकती है?” अभय ने कंधे उचकाए और थोड़े चिड़चिड़ेपन के साथ जवाब दिया, मुझे क्या पता? कंकाल की हँसी और गहरी हो गई। वह आगे झुका, जैसे अभय की आँखों के भीतर झाँक रहा हो।

उसके मन में विचारों का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। तो इसे पता है। सब पता है। इसका मतलब यह कोई साधारण खलनायक नहीं है। अभय ने मन ही मन बड़बड़ाया, अरे यार, क्या मुसीबत है। नॉर्मल स्टोरी में ऐसा कभी नहीं होता। न किसी ऐनिमे में। मैंने अभी लेवल शुरू भी नहीं किया और सीधे फाइनल बॉस के पास भेज दिया गया। अगर इतनी जल्दी मरना ही था, तो फिर मुझे पुनर्जन्म देना ही नहीं चाहिए था। मेरी किस्मत पक्के तौर पर गधे की पूँछ से लिखी गई है। उसने चारों ओर देखा। ना कोई सिस्टम मिला है, ना कोई प्राचीन मास्टर। बस मैं, ये कंकाल, और मेरी बदकिस्मती। अभय की बकबक सुनकर कंकाल फिर हँसने लगा। “तो, बच्चे,” वह बोला, “बताओ, तुम कैसे मरना चाहोगे? तुम्हें कच्चा चबा जाऊँ या तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर दूँ?” अभय ने आँखें मिचकाईं और बोला, “मेरे ख्याल से अगर मरना ही है, तो मैं बुढ़ापे से मरना ज़्यादा पसंद करूँगा।” यह सुनते ही कंकाल ठहाका मारकर हँसा। उसकी हँसी में इस बार दिलचस्पी थी, जैसे उसे कोई खिलौना मिल गया हो। कुछ देर बाद वह अचानक गंभीर हो गया। उसकी आँखों की लाल आग तेज़ हो उठी। “एक बात बताओ,” कंकाल ने पूछा, “क्या तुम्हारे दिमाग़ में ये ख्याल नहीं आया कि तुम यहाँ पहुँचे कैसे?” अभय चुप हो गया। उसके भीतर कुछ हिलने लगा। सच है… मैं यहाँ आया कैसे? क्या सच में ये सब महज़ संयोग है? या किसी ने मुझे जानबूझकर यहाँ भेजा है? उसने कंकाल की ओर देखा। अब डर से ज़्यादा जिज्ञासा थी। “अगर तुम्हें सब पता है,” अभय ने धीरे से कहा, “तो खुद ही बता दो। वरना मुझे लगता है… तुम मुझे अभी नहीं मारोगे।” कंकाल मुस्कराया। वह मुस्कान किसी मौत की घोषणा जैसी थी। “चालाक हो,” उसने कहा। “शायद इसलिए ही तुम्हें यहाँ लाया गया है।” कक्ष में सन्नाटा छा गया। और उसी सन्नाटे में, अभय को पहली बार महसूस हुआ कि यह मुलाक़ात उसकी कहानी की शुरुआत है… अंत नहीं।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। “मैं यहाँ आया नहीं हूँ,” उसने कहा, “मुझे यहाँ लाया गया है। और दूसरी बात—किसी के पास इतना समय नहीं होता कि वह किसी तीन साल के बच्चे या किसी टीनएजर से बेवजह बातें करे।” कंकाल ठहाका लगाकर हँसा। “हाहाहा! तुम्हारी मानसिकता वाकई मज़बूत है। इसी वजह से तुम आज यहाँ खड़े हो।” उसकी आवाज़ अचानक गंभीर हो गई। “तो बताओ… मैं तुम्हें यहाँ क्यों लाया हूँ?” अभय ने अपनी ठोड़ी पकड़ ली और कुछ पल सोचा। फिर उसने जवाब को दो हिस्सों में बाँट दिया। “अगर आप यह सवाल तीन साल के बच्चे से पूछ रहे हैं,” उसने कहा, “तो मुझे कुछ नहीं पता।” फिर उसने नज़र उठाई। “लेकिन अगर आप यह सवाल उस अठारह साल के लड़के से पूछ रहे हैं… तो इसका मतलब है कि आपको मुझसे कुछ बातें करनी हैं।” कुछ क्षणों के लिए पूरा हाल शांत हो गया। फिर कंकाल ज़ोर से हँस पड़ा। “हाहाहा! बिल्कुल!” वह बोला, “इसी वजह से मैं तुम्हें यहाँ लाया हूँ।” उसने सिंहासन पर पीछे झुकते हुए कहा— “अब तक तुम यह समझ ही गए होगे… कि तुमने जो गेम खेला था, वह कोई गेम नहीं था।” उसकी लाल जलती आँखें और तेज़ चमक उठीं। “वह इस दुनिया की असलियत थी।” और उसी पल, अभय को एहसास हुआ— यह मुलाकात उसकी कहानी की शुरुआत नहीं थी… यह उसकी नियति से पहली सीधी बातचीत थी।

___ अभय कुछ पल तक उस कंकाल को देखता रहा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था—बस एक सीधा सवाल था। “पर तुमने यह सब क्यों किया?” कंकाल ने कोई जवाब तुरंत नहीं दिया। वह बस अपने ही शरीर की ओर इशारा करता है। टूटे हुए, जले हुए, समय से परे पड़े हुए हड्डियों के ढाँचे की ओर। “मेरी हालत देखो,” उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे हर शब्द किसी पुराने बोझ से निकल रहा हो। “यह सब… उस नियति की वजह से हुआ है।” अभय चुप रहा। कंकाल आगे बोलता है— “जब मैं जीत गया था… तब भी मुझे जीतने नहीं दिया गया।” उसकी आँखों में जलती लाल आग कुछ पल के लिए तेज़ हो उठी। “नियति ने इस दुनिया का समय पलट दिया। पूरे संसार को पीछे खींच लिया।” अभय की भौंहें तन गईं। “नायक और नायिकाओं को,” कंकाल ने ठंडे स्वर में कहा, “एक और मौका दे दिया गया… मेरा अंत करने का।” इसी क्षण अभय की बाईं आँख अचानक फड़कने लगी। जैसे किसी अदृश्य सच्चाई ने भीतर दस्तक दी हो। “तो इसका मतलब…” अभय धीमे से बोला, “उनका भी पुनर्जन्म हुआ है?” कंकाल ने कुछ नहीं कहा। वह बस “हाँ” में सिर हिला देता है। उस मौन ने शब्दों से ज़्यादा कह दिया। “अब मुझे यहाँ से जाना होगा,” कंकाल की आवाज़ अब पहले से हल्की थी। मानो उसका समय सच में खत्म हो रहा हो। “मरते वक़्त मैंने अपनी आत्मा का एक टुकड़ा बनाया था।” वह अपने सीने की ओर इशारा करता है। “इसमें मेरी सारी यादें हैं—मेरी गलतियाँ, मेरी लड़ाइयाँ, और वह सच… जिसे नियति ने दबा दिया।” हवा भारी हो जाती है। दरबार की रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ने लगती है। “यह तुम्हारे काम आएगी,” कंकाल आख़िरी बार अभय की ओर देखता है। उसकी आँखों की आग और तेज होने लगती है, और उसी के साथ उस जगह की गूंज भी। अभय समझ जाता है— यह मुलाक़ात कोई चेतावनी नहीं थी। यह एक विरासत थी। और इस विरासत के साथ, उसकी कहानी अब सिर्फ उसकी नहीं रही। अब यह— नियति के खिलाफ़ लिखी जाने वाली कहानी थी।

___ कंकाल की आँखों से अचानक लाल अग्नि निकलकर सीधे अभय की आँखों में समा गई। जैसे ही वह आग उसके भीतर गई, अभय की आँखों में असहनीय दर्द फैल गया। उसकी आँखें ताबड़तोड़ झपकने लगीं, उसकी चेतना मानो किसी भारी आग में झुलस रही हो। एक झटके में अभय जमीन पर गिर पड़ा। उसकी छोटी-सी आवाज़ में दर्द और डर के मिश्रित चीखें गूँजने लगीं—“आ… आ…”। वह जोर-जोर से तड़प रहा था, उसके शरीर के प्रत्येक अंग में एक अजीब सी आग दौड़ रही थी। यह केवल शारीरिक पीड़ा नहीं थी; यह उसकी आत्मा पर किसी ने निशान छोड़ दिया हो ऐसा महसूस हो रहा था। इसी बीच वास्तविक दुनिया में भी परिणाम दिखाई देने लगे। अभय का शरीर पूरी तरह लाल हो गया। उसकी साँसें तेज़ और अनियमित हो गईं। बुखार ने उसका छोटा-सा शरीर हिला दिया, उसकी हर मांसपेशी काँप रही थी। यह कोई सामान्य बुखार नहीं था; जैसे भीतर की किसी शक्तिशाली आग ने शरीर को पकड़ लिया हो। अभय की माँ, जो उसे अपनी बाहों में लेकर सो रही थी, अचानक बेचैनी महसूस करते हुए जाग उठी। उसने देखा कि उसका बच्चा पूरी तरह लाल और बुखार से तप रहा है। उसका हृदय डर और चिंता से भर गया। उसने तुरंत देखा कि अभय को बुखार था—माँ ने घबराहट में तेज़ आवाज़ लगाई— “दासियों! जल्दी आओ!” कुछ ही क्षणों में महल की दासियाँ दौड़ती हुई पहुँच गईं। “हाँ महारानी, क्या आज्ञा है?” एक दासी ने उत्तर दिया। माँ ने बिना समय गंवाए आदेश दिया— “तुरंत वैद्य को बुलाओ। और साथ में ठंडे पानी की पट्टी और ठंडे पानी का बर्तन लेकर आओ। जल्दी करो!” महल में अफरा तफरी मच गई कि यह असाधारण घटना कैसे हुई। अभय के भीतर कुछ असाधारण घट चुका था। उसकी चेतना और शरीर दोनों पर एक रहस्यमयी शक्ति ने अपनी छाया डाल दी थी। अभय, जमीन पर गिरा हुआ, जोर-जोर से चीखते हुए भी धीरे-धीरे यह महसूस कर रहा था कि अब उसके भीतर और उसके आस-पास सब कुछ बदल चुका है। लाल अग्नि ने उसे छू लिया था—और अब वह सिर्फ एक बच्चा नहीं रह गया था। वह उस शक्ति का केंद्र बन चुका था। महल में दासियाँ भाग-दौड़ कर रही थीं। वैद्य आ गया और तुरंत अभय का निरीक्षण शुरू किया। ठंडे पानी की पट्टी उसके शरीर पर रखी गई, और धीरे-धीरे बुखार कम होने लगा। लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह केवल शुरुआत थी—एक बड़ी और खतरनाक कहानी का आरंभ, जो नियति और शक्ति के बीच बुनाई गई थी। अभय की माँ, उसकी बाहों में उसका शरीर पकड़े, उस रहस्यमयी आग और बुखार को देखकर रो रही थी, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी उम्मीद भी जाग रही थी—शायद उसका बच्चा अब और भी शक्तिशाली बन चुका था।

___ अभय अपने आप से ही बड़बड़ाने लगा। “अरे बेवकूफ! इसमें इतना दर्द हो रहा है, इसे देने से पहले थोड़ी देर इंतजार तो कर लेते।” उसने खुद को कोसा, खुद से झुंझलाया, और फिर भी कोई उत्तर नहीं मिला। वह जमीन पर तड़पता रहा। दर्द उसकी चेतना को चीरने की कोशिश कर रहा था। हर साँस जैसे आग की तरह उसके शरीर में फैल रही थी। उसके छोटे-से शरीर के हर अंग में एक अलग पीड़ा दौड़ रही थी। लेकिन अभय हार नहीं मान रहा था। उसके मन में किसी अज्ञात साहस ने जन्म लिया था—चाहे जितनी भी कठिनाई हो, वह इसे सह लेगा। फिर, अचानक, वह महसूस करता है कि दर्द गायब हो गया। आँखों में लगी आग धीरे-धीरे ठंडी होने लगी, शरीर की पीड़ा कम होने लगी। अभय कुछ पल तक चुपचाप लेटा रहा, साँसों को समेटता हुआ, जैसे वह अब किसी नई वास्तविकता के लिए तैयार हो रहा हो। जैसे ही उसने आँखें खोली, वह फिर से उस अंधेरी दुनिया में था। पर कुछ बदल चुका था। अब उसे सब कुछ अजीब तरीके से दिखाई दे रहा था। हर चीज़ में वह aura और रेखाएं देख सकता था। यह दृष्टि किसी साधारण आँख की नहीं थी। यह आँखें रक्त साधना करने वाले की शक्ति समेटे हुए थीं—जो किसी का भी संबंध, किसी का भी रिश्ता और किसी का भी मनोभाव पहचान सकती थीं। अभय ने धीरे-धीरे अपनी दृष्टि को समझने की कोशिश की। पहले वह चौंका—यह शक्ति इतनी तेज़ थी कि हर रेखा, हर संकेत उसके लिए तुरंत दिखाई दे रहा था। लेकिन उसने खुद को संयमित किया। उसने अपनी आँखों को काबू में करना शुरू किया। धीरे-धीरे, वह अनियंत्रित संकेत और रेखाओं को पहचानने और उन्हें नियंत्रित करने में सक्षम हुआ। कुछ ही समय में वह महसूस करने लगा कि अब उसकी दृष्टि स्थिर हो गई थी। वह अब यह देख सकता था कि आसपास कौन शक्तिशाली है, कौन कमजोर है, और कौन किसका विरोधी है। उसकी आँखें अब सिर्फ देखने का माध्यम नहीं थीं। यह शक्ति, यह दृष्टि, अब उसके अंदर का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी थी। अभय ने अपने छोटे-से हाथों को मुट्ठी में बंद किया। “तो यह है… मेरी नई शक्ति,” उसने धीरे-धीरे कहा। “अब मैं सिर्फ खुद के लिए नहीं… नियति के खिलाफ भी तैयार हूँ।” अंधेरी दुनिया में खड़े अभय ने चारों तरफ देखा। हर चीज़ अब पहले से अधिक स्पष्ट, अधिक संवेदनशील, और अधिक खतरनाक लग रही थी। उसने महसूस किया कि अब वह केवल बच्चा नहीं रहा—वह अब उस शक्ति का केंद्र बन चुका था, जो उसे नियति, जीवन और मौत के बीच खड़ा कर रही थी।

___ अभय ने धीरे-धीरे समझ लिया कि यह कोई सिस्टम नहीं है, लेकिन इसका अनुभव उसके जैसे ही था। “कुछ तो सही है, कुछ गलत… पर जो सही है, वही काम आएगा,” उसने अपने आप से कहा। उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और देखा कि उसके चारों तरफ काला बादल घुमने लगा। यह बादल उसके लिए आश्चर्यजनक था—यह शक्ति अब उसकी मदद करने के लिए तैयार थी। वह महसूस कर रहा था कि यह शक्ति इतनी विशाल है कि नियति का नायक भी इसे हराने में विफल रहा था। काला बादल धीरे-धीरे आईने की तरह बदल गया। अभय ने उसमें खुद को देखा। पहले उसे कोई अंतर नहीं दिखाई दिया, लेकिन जब उसने ध्यान से देखा, तो आँखॉ की पुतली लाल थी। यदि कोई ध्यान से न देखता, तो उसे कोई फर्क नहीं पता चलता। यह दृष्टि अब उसकी नई शक्ति का प्रतीक बन चुकी थी—एक ऐसी दृष्टि, जो उसे आने वाले खतरों और छिपे हुए संकेतों को पहचानने में मदद करेगी। अभय ने चारों तरफ़ देखा और खलनायक अभय को ढूंढने की कोशिश की। उसे याद आया कि वह वही जगह है जहाँ उसे रक्त विरासत दी गई थी। पर अब वहां कुछ भी वैसा नहीं था जैसा पहले था। सिर्फ खाली हड्डियों का ढेर और खलनायक के अवशेष बिखरे हुए थे। वह उन अवशेषों में खलनायक के कपड़े पहचानता है—वे वही काले कपड़े थे जो पहले उसने पहने थे। हड्डियों के बुरादे के बीच में एक लाल रंग की अजीब वस्तु चमक रही थी। यह वस्तु अभय को देखकर डर और जिज्ञासा दोनों दे रही थी। उसने महसूस किया कि यह सिर्फ खतरनाक नहीं, बल्कि किसी शक्तिशाली और रहस्यमय शक्ति का स्रोत भी हो सकती थी। अभय ने खुद से कहा, “तो यही वह शक्ति है, जो मेरे लिए अब दिशा और हथियार दोनों बन सकती है।” उसने अपने हाथों को फैलाया और देखा कि काला बादल उसकी इच्छा के अनुसार घूम रहा था। यह शक्ति अब उसके नियंत्रण में थी। अभय ने ठान लिया—अब चाहे कितना भी खतरनाक मार्ग हो, चाहे जितनी भी कठिनाई आए, वह इसे सामना करेगा। वह अपने अंदर की नई दृष्टि और शक्ति का अनुभव करता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हर कदम पर उसे यह एहसास होता रहा कि अब वह केवल बच्चा नहीं रहा। वह उस शक्ति और उन रहस्यों का केंद्र बन चुका था, जिनके लिए खलनायक और नियति ने पहले कई लोगों को नष्ट किया था। और वह लाल वस्तु, हड्डियों और खतरनाक अवशेषों के बीच खड़ी, उसे यह बता रही थी कि अब संघर्ष केवल शुरू हुआ है—अभय की असली परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।

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