Chapter 2

मे आ गई

📖 Rudra: The Ghost Hunter
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"काली पहाड़ी का दरवाज़ा"

अंधेरा।

इतना गहरा कि हाथ आंखों के सामने रखने पर भी दिखाई न दे।

रुद्र बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

उसने अपनी सांस रोक ली।

अंधेरे में देखने से ज्यादा जरूरी था — सुनना।

पीछे…

धीमे, भारी कदम।

ग्रेवकीपर।

आगे…

हल्की सी हंसी।

वह बच्चा।

और बीच में — वह खुद।

उसने धीरे से अपनी प्राण ऊर्जा फैलानी शुरू की। यह कोई हमला नहीं था, बल्कि एक अदृश्य स्पर्श जैसा था, जिससे वह आसपास की चीजों की मौजूदगी महसूस कर सकता था।

बाईं ओर दीवार।

दाईं ओर टूटी रेलिंग।

फर्श पर कांच।

और ठीक तीन कदम सामने…

वह बच्चा खड़ा था।

अचानक गुब्बारे के रगड़ने की आवाज आई।

चीईं…

जैसे नाखून कांच पर खींच दिए गए हों।

बच्चे ने फुसफुसाया, "आप भाग क्यों नहीं रहे?"

रुद्र ने शांत स्वर में कहा, "क्योंकि तुम मुझे भागने नहीं दोगे।"

कुछ सेकंड की चुप्पी।

फिर—

बच्चा हंसा।

वह हंसी मासूम नहीं थी।

उसमें एक अजीब परिपक्वता थी… जैसे कोई बूढ़ा आदमी बच्चे की आवाज में हंस रहा हो।

"सही जवाब।"

अचानक गलियारे के दूर वाले छोर पर हल्की नीली रोशनी जली।

बस उतनी कि आकृतियां छाया बनकर दिखने लगें।

रुद्र ने देखा —

ग्रेवकीपर रुक गए थे।

वे बच्चे से करीब दस कदम दूर खड़े थे।

लेकिन आगे नहीं बढ़ रहे थे।

जैसे कोई अदृश्य सीमा हो।

रुद्र के दिमाग में तुरंत एक विचार चमका।

"वे इससे बच रहे हैं…"

इसका मतलब साफ था।

यह बच्चा… उनसे भी खतरनाक हो सकता है।

बच्चे ने सिर टेढ़ा किया।

"आप समझदार हैं। इसलिए अभी तक जिंदा हैं।"

रुद्र ने पूछा, "तुम क्या हो?"

बच्चे ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसने गुब्बारा छोड़ दिया।

लेकिन गुब्बारा ऊपर नहीं गया।

वह हवा में वहीं रुक गया।

फिर धीरे-धीरे खुद घूमने लगा।

जैसे कोई उसे पकड़े हो… जबकि वहां कोई नहीं था।

"मैं?" बच्चा बोला, "मैं यहां रहता हूँ।"

"नाम?"

कुछ पल चुप्पी।

फिर—

"लोग मुझे 'दरवाज़े वाला' कहते थे।"

रुद्र की भौंह हल्की सिकुड़ी।

"दरवाज़ा?"

बच्चे ने पीछे की ओर इशारा किया।

रुद्र ने मुड़कर देखा।

और पहली बार उसे एहसास हुआ —

गलियारे की दीवार पर… एक दरवाज़ा था।

लेकिन वह सामान्य दरवाज़ा नहीं था।

पूरी तरह काला।

उस पर कोई हैंडल नहीं।

कोई ताला नहीं।

बस लकड़ी पर उभरे हुए सैकड़ों छोटे हाथों के निशान।

जले हुए।

जैसे किसी ने अंदर से निकलने की कोशिश की हो।

रुद्र ने धीरे से पूछा, "यह पहले यहां नहीं था… है ना?"

बच्चा मुस्कुराया।

"यह हमेशा यहीं था। बस… हर किसी को दिखाई नहीं देता।"

पीछे खड़े ग्रेवकीपर हल्के-हल्के कांपने लगे।

उनकी दूधिया आंखें अब दरवाज़े पर थीं।

पहली बार रुद्र ने उनमें डर जैसा कुछ देखा।

बच्चा बोला, "आपने एक दुल्हन को मुक्त किया। इसलिए यह जाग गया।"

"यह क्या है?"

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

उसकी आवाज अब फुसफुसाहट में बदल गई।

"यह रास्ता है… जहां अधूरी मौतें जाती हैं।"

रुद्र के शरीर में ठंडक उतर गई।

अचानक…

दरवाज़े के उस पार से आवाज आई।

ठक।

जैसे किसी ने अंदर से थपकी दी हो।

फिर…

ठक… ठक…

फिर कई।

ठक ठक ठक ठक।

रुद्र का गला सूख गया।

"अंदर… कितने हैं?"

बच्चे ने धीरे से कहा, "गिनती किसी ने नहीं की।"

एक लंबी दरार दरवाज़े पर उभरी।

जैसे लकड़ी सांस ले रही हो।

रुद्र ने तुरंत नजर हटाई।

"इसे खोलना नहीं चाहिए।"

बच्चे ने उसे देखा।

"आप पहले ही खोल चुके हैं।"

उसी पल—

रुद्र के सिस्टम में तेज झटका महसूस हुआ।

New Location Registered. Black Hill Gate.

Hidden Quest Triggered.

Seal the Gate.

Reward: ??? Failure: Catastrophic Event.

रुद्र की आंखें सिकुड़ गईं।

"सील करूँ? कैसे?"

उत्तर नहीं मिला।

सिस्टम शांत हो गया।

पीछे खड़े ग्रेवकीपर अचानक एक साथ घुटनों पर गिर गए।

जैसे किसी भारी दबाव ने उन्हें झुका दिया हो।

बच्चा धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

उसने अपनी छोटी हथेली उस पर रखी।

ठकठक की आवाज बंद हो गई।

पूरी बिल्डिंग में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

फिर उसने कहा,

"मैं इसे ज्यादा देर रोक नहीं सकता।"

रुद्र ने पूछा, "तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो?"

बच्चा कुछ देर सोचता रहा।

फिर बोला,

"क्योंकि… चूहें बिल्ली का खेल मुझे पसंद है।"

अचानक…

रुद्र को एक और मौजूदगी महसूस हुई।

लेकिन इस बार न आगे… न पीछे।

ऊपर।

उसने सिर उठाया।

छत पर…

काले दाग फैल रहे थे।

जैसे पानी रिस रहा हो।

लेकिन वह पानी नहीं था।

वह परछाइयां थीं।

और वे नीचे टपकने लगीं।

पहली बूंद फर्श पर गिरी।

और तुरंत एक हाथ का आकार बन गया।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

कुछ ही सेकंड में…

फर्श पर दर्जनों काले हाथ रेंग रहे थे।

बच्चा फुसफुसाया,

"वे जाग रहे हैं…"

ग्रेवकीपर पीछे हटने लगे।

रुद्र ने गंडासा उठाया।

"इनसे लड़ सकता हूँ?"

बच्चे ने सीधे उसकी आंखों में देखा।

और पहली बार… उसके चेहरे पर डर साफ दिखा।

"इनसे नहीं। इनसे सिर्फ भागा जाता है।"

उसी पल—

काला दरवाज़ा भीतर की ओर हल्का सा खुला।

बस एक इंच।

लेकिन उस एक इंच की दरार से जो हवा बाहर आई…

वह सड़ांध नहीं थी।

वह मौत की गंध थी।

और उस अंधेरे में…

कुछ विशाल हिला।

इतना विशाल… कि दरवाज़ा छोटा लगने लगा।

रुद्र की पकड़ गंडासे पर कस गई।

उसने महसूस किया —

यह तो बस शुरुआत है।

रुद्र को सबसे पहले गंध आई। वह गंध इतनी हल्की थी कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति वहाँ खड़ा होता तो शायद उसे महसूस भी नहीं करता। लेकिन रुद्र अब सामान्य नहीं रहा था। पिछले कुछ घंटों में उसके अंदर कुछ बदल गया था — जैसे उसकी इंद्रियाँ तेज हो गई हों, जैसे दुनिया की परतें अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई देने लगी हों। यह गंध सड़ी हुई मिट्टी और पुराने लोहे की मिली-जुली थी… और उसके पीछे एक और गंध छिपी थी — ताज़े खून की। वह धीरे-धीरे पलटा। वह वहा से निकल और दरवाजा बंद कर दिया सीढ़ियों के उस अंधेरे हिस्से की तरफ, जहाँ बल्ब कुछ मिनट पहले ही बुझ गया था। वहाँ कुछ नहीं दिख रहा था। लेकिन "कुछ नहीं" भी कभी-कभी सबसे डरावनी चीज़ होती है। ऊपर की मंज़िल से हल्की-सी खट… खट… की आवाज़ आई। जैसे कोई नंगे पैर धीरे-धीरे चल रहा हो। रुद्र ने गंडासे की पकड़ कस ली। उसका हाथ ठंडा था, लेकिन हथेलियों में पसीना था। उसने अपने आप को याद दिलाया — डरना मना है। डरोगे तो मरोगे। उसने धीरे से आवाज़ लगाई, "कौन है?" कोई जवाब नहीं। बस वही खट… खट… फिर अचानक आवाज़ बंद हो गई। पूरा बिल्डिंग फिर से वैसी ही खामोशी में डूब गया, जिसमें अपने दिल की धड़कन भी बहुत तेज सुनाई देने लगती है। तभी उसकी आँखों के सामने हल्की-सी नीली रोशनी चमकी। सिस्टम। एक पारदर्शी पैनल हवा में उभरा। "चेतावनी — शत्रु की उपस्थिति दर्ज की गई है।" "दूरी — लगभग 12 मीटर।" "स्थिति — छिपा हुआ।" रुद्र का गला सूख गया। बारह मीटर। मतलब वह चीज़ बहुत दूर नहीं थी। उसने सीढ़ियों की तरफ देखा। ऊपर अंधेरा था, नीचे अंधेरा था। बीच में सिर्फ वह खड़ा था — एक इंसान, जिसके पास एक हथियार था और एक साल की जिंदगी। लेकिन उसके अंदर कहीं एक और भावना उठ रही थी। जिज्ञासा। अगर वह भाग जाता तो शायद बच सकता था… कुछ समय के लिए। लेकिन सिस्टम ने साफ कहा था — जिंदगी बढ़ाने का एक ही तरीका है। शिकार करो। उसने धीरे से पहला कदम ऊपर रखा। सीढ़ी ने कर्र… की आवाज़ की। वह रुक गया। फिर दूसरा कदम। तीसरा। हर कदम के साथ उसे ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरा उसे देख रहा हो। जैसे दीवारों में आँखें हों। पहली मंज़िल का गलियारा सामने था। दरवाजे बंद थे। कुछ पर ताले लगे थे, कुछ आधे खुले थे — जैसे लोग जल्दी में भागे हों। एक दरवाजे के बाहर बच्चों की छोटी-सी चप्पल पड़ी थी। रुद्र का दिल हल्का-सा डूबा। यहाँ कभी लोग रहते थे। हँसी होती होगी। टीवी की आवाज़ आती होगी। अब सिर्फ सन्नाटा था। तभी दाईं तरफ के एक खुले दरवाजे से हल्की-सी फुसफुसाहट आई। जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे रो रहा हो। रुद्र दरवाजे के पास गया। उसने अंदर झाँका। कमरा लगभग खाली था। फर्श पर धूल जमी थी। एक कोने में टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी। और दीवार पर… लाल हाथों के निशान। छोटे… बड़े… घसीटे हुए… जैसे किसी ने बाहर निकलने की कोशिश की हो। उसका गला फिर सूख गया। सिस्टम का पैनल फिर चमका। "शत्रु दूरी — 8 मीटर।" मतलब वह चीज़ इस कमरे में नहीं थी। उसके बहुत करीब थी। तभी पीछे से ठंडी हवा का झोंका आया। इतना ठंडा कि उसकी गर्दन के पीछे की त्वचा सिहर गई। वह झटके से पलटा। गलियारे के आखिर में कोई खड़ा था। एक औरत। या कम से कम… उसका आकार। उसके लंबे बाल चेहरे पर झूल रहे थे। सफेद कपड़ा उसके शरीर से ऐसे लटक रहा था जैसे वह भीग चुका हो। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि उसके पैर फर्श को छू नहीं रहे थे। वह हल्का-सा हवा में झूल रही थी। रुद्र का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। फिर सिस्टम की आवाज़ आई। "लक्ष्य पहचाना गया।" "प्रकार — बंधी हुई आत्मा।" "खतरे का स्तर — मध्यम।" मध्यम। यह शब्द सुनकर उसके अंदर थोड़ी हिम्मत आई। अगर यह मध्यम है… तो शायद वह कर सकता है। उसने गंडासा थोड़ा ऊपर उठाया। औरत हिली नहीं। बस खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे उसका सिर उठा। बालों के पीछे से दो काली, गहरी आँखें दिखीं। उनमें कोई चमक नहीं थी। बस खालीपन। फिर उसका मुँह खुला। और एक अजीब-सी आवाज़ निकली — जैसे कई लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों। "तुम… देख सकते हो मुझे…" रुद्र ने जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हर कदम नापा हुआ। उसने सिस्टम से पूछा, "कमज़ोरी?" कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर शब्द उभरे। "सिर और हृदय क्षेत्र पर प्रहार प्रभावी होगा।" "निकट दूरी की लड़ाई की सिफारिश।" निकट दूरी। मतलब उसे बहुत पास जाना होगा। उसने गहरी सांस ली और कदम तेज कर दिए। बस तीन मीटर। दो मीटर। और तभी— औरत का शरीर अचानक झटके से मुड़ा। इतनी तेज कि आँखें उसका पीछा नहीं कर पाईं। अगले ही पल वह उसके सामने थी। उसका चेहरा अब बिल्कुल पास था। त्वचा फटी हुई… होंठ नीले… और आँखों के नीचे काले गड्ढे। उसके मुँह से सड़ांध की गंध आ रही थी। "क्यों आए हो…?" उसने फुसफुसाया। रुद्र ने जवाब दिया, "जिंदा रहने के लिए।" और गंडासा पूरी ताकत से घुमाया। हवा चिरी। लेकिन ब्लेड उसके आर-पार निकल गया। जैसे वह धुआँ हो। अगले ही पल उसके सीने पर किसी ने जोर से धक्का मारा। वह पीछे जा गिरा। गंडासा फर्श पर टकराया। उसकी सांस रुक गई। औरत अब उसके ऊपर झुकी थी। उसकी उंगलियाँ लंबी थीं… अस्वाभाविक रूप से लंबी। वे धीरे-धीरे रुद्र के गले की तरफ बढ़ रही थीं। सिस्टम चमका। "चेतावनी — जीवन ऊर्जा घट रही है।" रुद्र ने झटके से गंडासा उठाया और इस बार सीधा उसके सिर की तरफ नहीं, बल्कि उस जगह पर वार किया जहाँ उसका शरीर सबसे ज्यादा ठोस दिख रहा था — गर्दन के नीचे। इस बार ब्लेड रुका। जैसे किसी कठोर चीज़ से टकराया हो। औरत चीखी। आवाज़ इतनी तीखी थी कि खिड़कियों के शीशे कांप गए। रुद्र ने मौका नहीं गंवाया। उसने फिर वार किया। फिर। फिर। हर वार के साथ उसकी पकड़ मजबूत होती गई। और अचानक — वह आकृति टूटने लगी। जैसे काँच पर दरारें पड़ती हैं। उसका शरीर टुकड़ों में बिखरने लगा… और फिर काले धुएँ में बदल गया। गलियारा फिर से खाली था। सिर्फ रुद्र की भारी सांसें बची थीं। कुछ सेकंड बाद सिस्टम चमका। "लक्ष्य समाप्त।" "पुरस्कार — जीवनकाल + 3 महीने।" "कुल शेष जीवन — 1 वर्ष 3 महीने।" रुद्र फर्श पर बैठ गया। उसके हाथ कांप रहे थे। लेकिन उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। यह काम कर गया। वह सच में… इसे मार सकता है। तभी सिस्टम में एक नया संदेश उभरा। "नया मिशन उपलब्ध।" "स्थान — काली पहाड़ी सोसाइटी का बेसमेंट।" "गत 10 वर्षों में 17 लापता।" "खतरे का स्तर — उच्च।" रुद्र ने धीरे से सिर उठाया। बेसमेंट। उसे अचानक याद आया — इस बिल्डिंग का बेसमेंट हमेशा बंद रहता था। लोग कहते थे वहाँ पानी भर जाता है। कुछ कहते थे… आवाज़ें आती हैं। उसने अंधेरे की तरफ देखा, जहाँ नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ थीं। और पहली बार… उसे लगा कि शायद असली शिकार अभी शुरू हुआ है।

रुद्र कुछ देर तक वहीं बैठा रहा। उसकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन दिल अभी भी तेज धड़क रहा था। अभी कुछ मिनट पहले जो हुआ था, वह किसी बुरे सपने जैसा लग सकता था… अगर उसके सामने तैरता हुआ सिस्टम पैनल इस बात की गवाही न दे रहा होता कि सब सच था। उसने अपने हाथों की तरफ देखा। वे हल्के-हल्के कांप रहे थे। डर से? या उत्साह से? शायद दोनों से। उसने खुद से एक सवाल पूछा — "क्या मैं अब लोगों जैसा नहीं रहा?" और भीतर से एक शांत जवाब आया — "नहीं। अब तुम शिकारी हो।" गलियारे में फैली ठंडी हवा अब पहले जितनी भयावह नहीं लग रही थी। बल्कि उसमें एक अजीब-सी स्पष्टता थी। जैसे उसकी इंद्रियाँ इस अंधेरे की आदी होने लगी हों। तभी सिस्टम फिर चमका। "पहली आत्मा के विनाश पर बोनस सक्रिय।" "नई क्षमता अनलॉक — संवेदन दृष्टि।" रुद्र की भौंहें सिकुड़ गईं। "सक्रिय करो," उसने धीरे से कहा। अगले ही पल उसकी आंखों के सामने दुनिया बदल गई। गलियारे की दीवारें अब वैसी नहीं दिख रही थीं। जहाँ पहले सिर्फ पुराना पेंट और दरारें थीं, वहाँ अब हल्की-हल्की काली लकीरें रेंगती नजर आ रही थीं — जैसे धुआँ दीवारों के भीतर बह रहा हो। कुछ जगहों पर वह धुआँ ज्यादा गाढ़ा था। एक दरवाजे के पास तो लगभग जम-सा गया था। सिस्टम ने तुरंत जानकारी दी। "नकारात्मक ऊर्जा के अवशेष।" "हाल ही में सक्रिय आत्मा का प्रभाव।" रुद्र धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसने महसूस किया कि उसका शरीर पहले से हल्का लग रहा है। जैसे थकान उतनी गहरी नहीं रही। क्या यह उन तीन महीनों का असर था? या सिस्टम शरीर को भी बदल रहा था? उसने गंडासा उठाया और सीढ़ियों की तरफ देखा। नीचे — बेसमेंट। उच्च खतरा। सामान्य इंसान होता तो शायद सुबह होने का इंतजार करता। लेकिन रुद्र जानता था — डर से भागना अब विकल्प नहीं था। और सच कहें तो… उसके भीतर एक अजीब-सी खिंचाव भी थी। जैसे अंधेरा उसे बुला रहा हो। वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। पहला कदम नीचे रखते ही तापमान बदल गया। ऊपर की मंज़िल ठंडी थी। लेकिन यहाँ… यह ठंड अलग थी। भारी। गीली। जैसे हवा में पानी घुला हो। नीचे से एक बदबू उठ रही थी — सड़ी हुई चीज़ों की, फफूंदी की… और कुछ ऐसा जिसकी पहचान उसका दिमाग नहीं करना चाहता था। हर कदम पर सीढ़ियाँ हल्की-सी कराहतीं। नीचे पहुंचते-पहुंचते ऊपर की रोशनी पूरी तरह गायब हो गई। अब सिर्फ अंधेरा था। रुद्र ने मोबाइल निकाला और टॉर्च ऑन की। पीली रोशनी ने एक संकरी जगह को उजागर किया। बेसमेंट उम्मीद से बड़ा था। कंक्रीट के मोटे खंभे, जिन पर काई जमी थी। फर्श पर जगह-जगह पानी भरा था। और दीवारों पर पुराने नंबर लिखे थे — शायद पार्किंग स्लॉट। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी… यहाँ कोई आवाज़ नहीं थी। बिल्कुल भी नहीं। यहाँ तक कि पानी की बूंद गिरने की भी नहीं। जैसे इस जगह ने ध्वनि को निगल लिया हो। सिस्टम अचानक चमका। "चेतावनी।" "उच्च घनत्व की नकारात्मक ऊर्जा दर्ज।" रुद्र ने टॉर्च घुमाई। रोशनी एक खंभे पर पड़ी। और वह जम गया। खंभे पर लंबी-लंबी खरोंचें थीं। ऊपर से नीचे तक। जैसे किसी ने नाखूनों से कंक्रीट को नोच डाला हो। उसने हाथ बढ़ाकर एक खरोंच को छुआ। गहरी थी। बहुत गहरी। यह किसी इंसान का काम नहीं हो सकता। तभी टॉर्च की रोशनी थोड़ी आगे गई… और फर्श पर कुछ चमका। रुद्र पास गया। वह एक चाबी का गुच्छा था। जंग लगा हुआ। उसके पास ही एक पुराना मोबाइल पड़ा था — स्क्रीन टूटी हुई। उसने उसे उठाया। फोन बंद था। लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ उस पर पड़ीं, सिस्टम सक्रिय हो गया। "मृत वस्तु से स्मृति अंश प्राप्त।" अगले ही पल उसके दिमाग में एक झटका-सा लगा। और तस्वीरें उभरने लगीं। एक आदमी। लगभग चालीस साल का। घबराया हुआ। वह इसी बेसमेंट में भाग रहा था। बार-बार पीछे देख रहा था। उसकी सांसें टूट रही थीं। वह चिल्लाया — "कोई है?! दरवाजा खोलो!" फिर… अंधेरे से कुछ हिला। बहुत बड़ा। नीचे झुका हुआ। चार पैरों पर? नहीं… शायद घिसटता हुआ। आदमी की चीख गूंजी। तस्वीर अचानक टूट गई। रुद्र ने फोन गिरा दिया। उसका दिल जोर से धड़क रहा था। "यह… क्या था?" सिस्टम ने जवाब दिया। "संभावित लक्ष्य — विकृत आत्मा।" "खतरे का स्तर — उच्च।" उसी क्षण… पानी में हल्की-सी लहर उठी। रुद्र ने टॉर्च नीचे की। पानी स्थिर था। लेकिन अभी उसने साफ देखा था — कुछ हिला था। फिर… छपाक। इस बार आवाज़ भी आई। बेसमेंट के दूसरे छोर से। रुद्र ने रोशनी उधर घुमाई। कुछ नहीं। बस खंभों की कतार। और उनके बीच गहरा अंधेरा। वह स्थिर खड़ा रहा। कुछ सेकंड। कुछ नहीं हुआ। उसने एक कदम आगे बढ़ाया। छप… उसका जूता पानी में पड़ा। और उसी पल… बेसमेंट के भीतर कहीं बहुत दूर से एक धीमी-सी आवाज़ आई। जैसे कोई भारी चीज़ घसीट रहा हो। घ्रररर… घ्रररर… आवाज धीरे-धीरे साफ होती जा रही थी। रुद्र का गला सूख गया। उसने गंडासा कस लिया। टॉर्च की रोशनी कांप रही थी — शायद उसके हाथ की वजह से। फिर उसने देखा। दो खंभों के बीच… अंधेरा थोड़ा ज्यादा गहरा था। और उस अंधेरे में… कुछ हिल रहा था। पहले उसे लगा कि यह उसका भ्रम है। लेकिन फिर एक लंबी, अस्वाभाविक भुजा रोशनी में आई। त्वचा धूसर। हड्डियाँ उभरी हुई। और उंगलियाँ इतनी लंबी कि वे पानी को छू रही थीं। फिर दूसरी भुजा। फिर… धीरे-धीरे एक शरीर बाहर आया। वह चीज़ सीधी खड़ी नहीं थी। उसकी रीढ़ टेढ़ी थी। सिर एक तरफ झुका हुआ। और चेहरा… चेहरा जैसे था ही नहीं। बस मांस का धंसा हुआ हिस्सा। सिस्टम की आवाज़ तेज हो गई। "लक्ष्य पहचाना गया।" "विकृत आत्मा।" "खतरे का स्तर — उच्च।" उस प्राणी ने अचानक हवा सूंघी। फिर उसका सिर झटके से रुद्र की दिशा में मुड़ा। भले ही उसकी आंखें नजर नहीं आ रही थीं… लेकिन रुद्र को पूरा यकीन था। उसने उसे देख लिया है। एक पल की खामोशी। और अगले ही क्षण… वह चीज़ अविश्वसनीय गति से उसकी तरफ झपटी।

रुद्र को प्रतिक्रिया देने का समय ही नहीं मिला। वह प्राणी जिस गति से उसकी ओर झपटा, वह किसी जंगली जानवर से भी तेज था। पानी छिटककर हवा में उठा, और अगले ही पल एक सड़ी हुई गंध रुद्र की नाक से टकराई। लेकिन घबराहट के बावजूद उसकी साधना बेकार नहीं गई थी। उसका शरीर दिमाग से पहले हरकत में आया। वह बाएं तरफ लुढ़क गया। धड़ाम! जहाँ वह एक सेकंड पहले खड़ा था, वहाँ कंक्रीट का फर्श चटक गया। उस विकृत आत्मा की लंबी भुजा इतनी ताकत से गिरी थी कि पत्थर में दरार पड़ गई। रुद्र ने जमीन पर हाथ टिकाकर खुद को उठाया और तुरंत गंडासा घुमाया। धाऽऽक! धार उस प्राणी की भुजा से टकराई। लेकिन… आवाज अजीब थी। जैसे लोहे ने गीले चमड़े को नहीं, बल्कि किसी मोटे रबर को काटने की कोशिश की हो। भुजा आधी कटी। काली, चिपचिपी तरल चीज़ बाहर निकली — खून जैसी, मगर खून नहीं। प्राणी पीछे नहीं हटा। बल्कि उसने एक तीखी, कर्कश चीख निकाली। वह आवाज़ कानों से ज्यादा सीधे दिमाग में गूंजी। रुद्र का सिर झनझना उठा। सिस्टम तुरंत सक्रिय हुआ। "मानसिक आक्रमण दर्ज।" "चेतावनी — यह आत्मा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक प्रभाव भी डालती है।" रुद्र ने दांत भींच लिए। अगर वह एक पल भी ढीला पड़ा — तो खत्म। प्राणी ने फिर हमला किया। इस बार ऊपर से। उसकी दोनों भुजाएं फैल गईं, जैसे वह रुद्र को जकड़कर कुचल देना चाहता हो। रुद्र पीछे नहीं हटा। वह आगे बढ़ा। ठीक उस पल जब भुजाएं गिरने वाली थीं, उसने कदम भीतर की तरफ डाला — दुश्मन की पहुंच के अंदर। "काल-भैरव — प्रथम चाल।" उसकी पकड़ बदल गई। गंडासा नीचे से ऊपर की ओर बिजली की तरह उठा। छ्राऽऽक! इस बार वार गहरा था। भुजा लगभग अलग हो गई। प्राणी बेकाबू होकर तड़पा। उसका शरीर अस्वाभाविक तरीके से मुड़ा, जैसे हड्डियाँ हों ही नहीं। रुद्र पीछे हटने ही वाला था कि अचानक— एक और भुजा! उसने देखा ही नहीं था कि उस चीज़ की पीठ से एक अतिरिक्त, पतली भुजा निकली हुई थी। वह सांप की तरह लहराई और रुद्र की गर्दन लपेट ली। सब कुछ एक झटके में हुआ। गंडासा उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा। भुजा का दबाव बढ़ने लगा। सांस रुकने लगी। दुनिया सिकुड़ने लगी। रुद्र ने उस सड़ी हुई त्वचा को पकड़कर हटाने की कोशिश की — लेकिन उसकी पकड़ पत्थर जैसी मजबूत थी। सिस्टम चमका। "ऑक्सीजन स्तर गिर रहा है।" "तीन मिनट में चेतना लुप्त होने की संभावना।" रुद्र की नजर धुंधली होने लगी। उसी धुंध में उसे एक झलक दिखी। वह खूनी लग्न-पत्रिका… उसकी जेब में… फिर से गर्म हो रही थी। गर्मी बढ़ती गई। इतनी कि जैसे अंगारा रखा हो। अचानक— उसके दिमाग में एक फुसफुसाहट गूंजी। मुलायम। स्त्री स्वर। "मरना मत…" रुद्र की आंखें फैल गईं। यह आवाज़… उस विकृत आत्मा की नहीं थी। यह अलग थी। ठंडी… लेकिन अजीब तरह से जीवित। अगले ही पल पत्रिका जेब से खुद बाहर सरक आई। हवा के बिना भी उसके पन्ने फड़फड़ाने लगे। और फिर— उस पर लिखा उसका नाम हल्की लाल रोशनी में चमक उठा। प्राणी अचानक ठिठक गया। उसकी पकड़ ढीली पड़ी। जैसे किसी और, ज्यादा खतरनाक उपस्थिति को महसूस कर लिया हो। रुद्र जमीन पर गिर पड़ा और हवा के लिए हांफने लगा। वह समझ नहीं पाया कि अभी क्या हुआ… लेकिन मौका था। उसने बिना देर किए गंडासा उठाया। "द्वितीय चाल।" इस बार वार सीधा गर्दन पर था। छन्न! धार भीतर तक उतर गई। प्राणी की चीख इतनी तीखी थी कि बेसमेंट की छत तक कांप गई। उसका शरीर कुछ सेकंड बेतहाशा तड़पता रहा… फिर ढह गया। धीरे-धीरे वह काला तरल धुएं में बदलने लगा। सिस्टम की परिचित ध्वनि गूंजी। "लक्ष्य नष्ट।" "प्राण ऊर्जा अवशोषित हो रही है।" रुद्र वहीं बैठ गया। उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी। कुछ सेकंड बाद पैनल साफ हुआ। "जीवनकाल + 8 महीने।" वह ठहाका मारकर हंस पड़ा। "तो… मैं अभी नहीं मरने वाला।" लेकिन उसकी नजर तुरंत उस पत्रिका पर गई। वह अब जमीन पर शांत पड़ी थी। जैसे कुछ हुआ ही न हो। रुद्र ने उसे उठाया। कागज ठंडा था। मानो वह आग कभी लगी ही न हो। उसने धीमे स्वर में कहा, "अभी… मेरी मदद किसने की?" कोई जवाब नहीं। लेकिन… एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई खड़ा है। बहुत करीब। इतना कि अगर वह मुड़े… तो शायद उसकी सांस अपनी गर्दन पर महसूस करे। रुद्र ने धीरे-धीरे पीछे देखा। कुछ नहीं। खाली बेसमेंट। टूटे खंभे। काला पानी। फिर भी… अब वह पूरी तरह अकेला नहीं लग रहा था। सिस्टम अचानक फिर चमका। "विशेष सूचना।" "प्रेत-विवाह सक्रिय अवस्था में प्रवेश कर चुका है।" "दुल्हन ने वर को चिन्हित कर लिया है।" रुद्र के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। "तो… तुम सच में हो।" बेसमेंट की ठंडी हवा में कहीं बहुत हल्की… पायल जैसी आवाज़ गूंजी। और तुरंत गायब हो गई।

रुद्र बेसमेंट से बाहर निकलते समय पहले जैसा नहीं रहा था। उसकी चाल धीमी थी, लेकिन उसमें अब एक अजीब-सा आत्मविश्वास था। जैसे उसने अभी-अभी मौत की आंखों में झांककर वापस लौटने का फैसला किया हो। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अनुभव ने उसे सिखा दिया था — कुछ जगहों को बार-बार नहीं देखना चाहिए। वरना वे तुम्हें देखने लगती हैं। ऊपर की मंजिल पर पहुँचते ही उसे एहसास हुआ कि बिल्डिंग पहले से ज्यादा शांत है। यह सामान्य सन्नाटा नहीं था। यह वैसा सन्नाटा था जो तूफान से ठीक पहले आता है। उसने कमरे का दरवाजा खोला। किर्र… दरवाजे की आवाज़ खाली गलियारे में गूंज गई। कमरे में कदम रखते ही उसकी नजर सीधे उस लग्न-पत्रिका पर गई जो अभी भी उसके हाथ में थी। वह कुछ सेकंड उसे घूरता रहा। फिर धीरे से बोला, “आज… तुमने मेरी जान बचाई।” कोई जवाब नहीं। स्वाभाविक था। वह एक कागज ही तो था। लेकिन रुद्र अब इतना अनुभव पा चुका था कि वह जानता था — यह सिर्फ कागज नहीं है। उसने पत्रिका को टेबल पर रखा। जैसे ही उसने हाथ छोड़ा… कागज हल्का-सा खिसक गया। रुद्र का दिल एक पल को रुक गया। खिड़की बंद थी। पंखा बंद था। हवा का कोई झोंका नहीं। फिर भी… पत्रिका उसकी तरफ घूम गई। धीरे-धीरे। जैसे कोई अदृश्य उंगलियाँ उसे धकेल रही हों। रुद्र की सांस भारी हो गई। “अगर तुम सच में हो…” उसने फुसफुसाकर कहा, “तो सामने आओ।” कमरे का तापमान अचानक गिर गया। इतना कि उसकी सांस हल्की धुंध में बदलने लगी। और तभी— छन… बहुत हल्की। बहुत दूर से आती हुई। पायल की आवाज़। रुद्र के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। आवाज दरवाजे की दिशा से आई थी। छन… छन… धीरे। मापी हुई। जैसे कोई नंगे पांव नहीं, बल्कि गहनों के साथ चल रहा हो। दरवाजा अपने आप बंद हो गया। धड़ाम। रुद्र ने गंडासा उठाने की कोशिश की… लेकिन उसने खुद को रोक लिया। अजीब बात थी — उसे खतरा महसूस नहीं हो रहा था। डर था। लेकिन वह वैसा डर नहीं था जैसा किसी राक्षस को देखकर होता है। यह… प्रतीक्षा जैसा था। कमरे के कोने में रखा आईना हल्का-सा धुंधला होने लगा। मानो किसी ने उस पर गर्म सांस छोड़ी हो। धीरे-धीरे उस धुंध पर एक निशान उभरा। पहले एक रेखा। फिर दूसरी। और कुछ सेकंड बाद… एक शब्द। “रुद्र” उसका गला सूख गया। “तुम… लिख रही हो?” धुंध फिर बदली। इस बार अक्षर बनने में ज्यादा समय नहीं लगा। “मैं… आई थी।” रुद्र की धड़कन इतनी तेज हो गई कि उसे खुद सुनाई दे रही थी। “अभी?” उसने पूछा। आईने पर अगला शब्द उभरा। “हमेशा।” कमरे की हवा और ठंडी हो गई। उसके पीछे से अचानक हल्की-सी खुशबू आई। चंदन और गीली मिट्टी की मिली-जुली महक। यह सड़न नहीं थी। यह मौत की गंध नहीं थी। यह… किसी दुल्हन जैसी थी। रुद्र धीरे-धीरे पलटा। कोई नहीं। लेकिन— फर्श पर धूल जमी थी। और उस धूल पर… ताजे पैरों के निशान बन रहे थे। एक-एक कदम। जैसे कोई अदृश्य स्त्री उसकी तरफ बढ़ रही हो। रुद्र स्थिर खड़ा रहा। पहली बार उसके भीतर शिकारी नहीं… एक आदमी जागा। उसके सामने कदम रुक गए। उनके बीच मुश्किल से दो फीट की दूरी थी। उसकी सांस अटक गई। “क्या… तुम वही हो?” कुछ सेकंड की खामोशी। फिर… उसके कंधे पर कुछ बेहद ठंडा आकर टिका। जैसे बर्फ से बनी उंगलियाँ। रुद्र का शरीर जड़ हो गया। वह भाग सकता था। वार कर सकता था। लेकिन उसने कुछ नहीं किया। धीरे-धीरे वह ठंडा स्पर्श उसकी गर्दन तक आया। और फिर— एक बहुत हल्की फुसफुसाहट। इतनी पास कि जैसे होंठ उसके कान को छू रहे हों। “मेरे… पति…” उसकी रीढ़ में बिजली दौड़ गई। यह आवाज़ भयावह नहीं थी। यह खाली भी नहीं थी। उसमें एक गहरी, अंतहीन अकेलापन था। रुद्र ने मुश्किल से शब्द निकाले। “तुमने… मुझे क्यों चुना?” कुछ पल तक कोई जवाब नहीं आया। फिर उसकी हथेली अपने आप उठी। जैसे किसी ने पकड़कर ऊपर की हो। उसकी उंगली में अचानक ठंडक महसूस हुई। रुद्र ने नीचे देखा— एक पतली, पुरानी चांदी की अंगूठी उसकी उंगली में थी। वह चौंक गया। “यह कब—” फुसफुसाहट फिर आई। “अब… तुम मेरे हो।” रुद्र ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। “और तुम?” कुछ सेकंड। फिर— उसके सीने पर एक अदृश्य सिर टिक गया। वह वजन बहुत हल्का था। लेकिन एहसास बिल्कुल साफ। जैसे कोई सचमुच उससे लगकर खड़ा हो। “मैं… हमेशा से थी।” उसकी आंखें अनायास नरम हो गईं। “तुम्हारा नाम?” कमरा अचानक और ठंडा हो गया। आईने पर धुंध फिर उभरी। लेकिन इस बार अक्षर बनते ही मिट गए। जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक रही हो। फुसफुसाहट बदली। अब उसमें चेतावनी थी। “अभी… नहीं।” उसी पल सिस्टम चमका। “चेतावनी।” “उच्च श्रेणी की सत्ता निकट है।” रुद्र का चेहरा सख्त हो गया। “यहाँ कोई और है?” ठंडा स्पर्श तुरंत हट गया। पायल की आवाज़ तेजी से पीछे गई। छन… छन… छन… और अचानक रुक गई। दरवाजे के बाहर… गलियारे में… कुछ भारी घसीटने की आवाज़ आई। धीरे। जानबूझकर। जैसे कोई चीज़ जानती हो कि अंदर कौन है। सिस्टम की आवाज़ गूंजी— “ध्यान दें।” “यह उपस्थिति… दुल्हन से भी प्राचीन है।”

गलियारे में घसीटने की वह आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी। घ्ररर… घ्ररर… जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर रेंगती हुई आगे बढ़ रही हो। रुद्र दरवाजे के सामने स्थिर खड़ा था। उसकी पकड़ गंडासे पर कस गई। अभी कुछ क्षण पहले जो ठंडा स्पर्श उसे घेरे हुए था, वह पूरी तरह गायब हो चुका था। लेकिन उसकी उंगली में पड़ी चांदी की अंगूठी अब भी बर्फ जैसी ठंडी थी। वह जा चुकी थी। या… छिप गई थी। सिस्टम फिर चमका। "चेतावनी — अत्यंत प्राचीन नकारात्मक ऊर्जा दर्ज।" "खतरे का स्तर — अज्ञात।" अज्ञात। यह शब्द रुद्र को बिल्कुल पसंद नहीं आया। उच्च खतरा समझ आता है। मृत्यु का जोखिम भी समझ आता है। लेकिन अज्ञात — इसका मतलब होता है कि सिस्टम के पास भी पूरी जानकारी नहीं है। और जब सिस्टम अनजान हो… तब इंसान को और ज्यादा सावधान होना पड़ता है। घसीटने की आवाज़ दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई। खामोशी। इतनी गहरी कि रुद्र को अपनी दिल की धड़कन भी भारी लगने लगी। धक… धक… धक… अचानक— टक… टक… दरवाजे पर दो हल्की दस्तक हुई। रुद्र की आंखें सिकुड़ गईं। यह हमला नहीं था। यह… जैसे कोई अनुमति मांग रहा हो। फिर तीसरी दस्तक। इस बार थोड़ी धीमी। जिद्दी। रुद्र ने एक लंबी सांस ली। "जो भी है… अंदर आने का इंतजार क्यों कर रहा है?" उसी क्षण उसकी उंगली में पड़ी अंगूठी हल्की-सी गर्म हुई। बहुत हल्की। जैसे किसी ने चेतावनी में छुआ हो। रुद्र ने समझ लिया। वह चीज़ बाहर है — और दुल्हन चाहती है कि वह दरवाजा न खोले। टक… इस बार दस्तक नहीं। दरवाजे के निचले हिस्से पर कुछ रगड़ा। धीरे-धीरे। जैसे नाखून लकड़ी पर घिस रहे हों। एक पतली, कराहती आवाज़ निकली। रुद्र ने नीचे देखा। दरवाजे के नीचे की संकरी दरार से कुछ काला-सा भीतर सरकने की कोशिश कर रहा था। धुआँ नहीं। परछाईं नहीं। कुछ और। वह तुरंत पीछे हट गया। सिस्टम चमका। "सीमा उल्लंघन का प्रयास।" "यह सत्ता आम आत्माओं की तरह बाधाओं से नहीं रुकती।" रुद्र के भीतर एड्रेनालिन दौड़ गया। अगर यह चीज़ कमरे में घुस आई… तो लड़ाई टाली नहीं जा सकेगी। दरवाजे के दूसरी तरफ अचानक एक आवाज़ आई। सूखी। बहुत बूढ़ी। जैसे किसी का गला सदियों से पानी न देख पाया हो। "खोलो…" रुद्र के शरीर में सिहरन दौड़ गई। वह आवाज़ इंसानी थी — लेकिन बिल्कुल जीवित नहीं। "मैं… जानता हूँ… वह अंदर है…" रुद्र का दिल एक पल को रुक गया। क्या यह दुल्हन के बारे में कह रहा है? अंगूठी अचानक और गर्म हो गई। अब यह सिर्फ चेतावनी नहीं थी। यह बेचैनी थी। लगभग… डर। रुद्र की भौंहें सिकुड़ गईं। "तुम उससे डरती हो?" यह सोचते ही उसके भीतर कुछ बदल गया। जिस सत्ता से उसकी दुल्हन डरती है… वह साधारण नहीं हो सकती। दरवाजे के बाहर फिर आवाज़ आई। इस बार धीमी हंसी के साथ। "छोटे साधक…" "उसे छिपा नहीं सकते…" "वह मेरी है…" कमरे का तापमान अचानक गिर गया। लेकिन यह दुल्हन वाली ठंड नहीं थी। यह सड़ी हुई कब्र जैसी ठंड थी। रुद्र के भीतर गुस्सा उठ खड़ा हुआ। "मेरी है।" यह शब्द उसके कानों में गूंजा। उसने पहली बार जोर से कहा— "यहाँ से चले जाओ।" कुछ सेकंड की खामोशी। फिर… दरवाजे के उस पार से एक लंबी सांस की आवाज़ आई। जैसे कोई लकड़ी की दरार से उसकी गंध सूंघ रहा हो। "तुम… अलग हो…और वापस आ गए हो " "इसलिए उसने तुम्हें चुना…" रुद्र का दिमाग तेजी से काम करने लगा। तो यह सत्ता दुल्हन को जानती है। शायद… बहुत पहले से। अचानक— धड़ाम! दरवाजे पर इतना जोरदार प्रहार हुआ कि पूरी चौखट कांप गई। लकड़ी चरमराई। दीवार से धूल झरने लगी। दूसरा प्रहार। और भी शक्तिशाली। सिस्टम चमका। "संरचना क्षति — 32%" तीसरा प्रहार… दरवाजे के बीचों-बीच एक उभरी हुई आकृति दिखी। जैसे बाहर से कोई चेहरा लकड़ी पर दबा हो। धीरे-धीरे लकड़ी फटने लगी। और उस दरार से… एक आंख दिखाई दी। धुंधली। सफेद। पुतली लगभग गायब। वह आंख सीधे रुद्र को देख रही थी। रुद्र के हाथ खुद-ब-खुद गंडासा उठाने लगे। अगर दरवाजा टूटा— तो वह पीछे नहीं हटेगा। उसी पल— अंगूठी जल उठी। इस बार सचमुच। रुद्र ने दर्द से दांत भींच लिए। और अचानक— उसके और दरवाजे के बीच हवा कांपने लगी। जैसे गर्मी में सड़क कांपती है। धीरे-धीरे… एक आकृति बनी। पहले धुंध। फिर एक पतली रूपरेखा। लंबे बाल। झुका हुआ सिर। और लाल किनारी वाला घूंघट… जो हवा न होने पर भी हल्का हिल रहा था। रुद्र की सांस अटक गई। वह पूरी तरह दिखाई नहीं दे रही थी। जैसे आधी इस दुनिया में… आधी कहीं और। दरवाजे के उस पार की आंख अचानक फैल गई। पहली बार… डर उसमें दिखा। एक कराहती आवाज़ निकली। "तुम… जाग गई…" कमरे का तापमान और गिर गया। लेकिन अब यह ठंड नहीं चुभ रही थी। यह… संरक्षक दीवार जैसी लग रही थी। घूंघट वाली आकृति ने बहुत धीरे सिर उठाया। चेहरा अब भी साफ नहीं दिख रहा था। बस दो हल्की, लाल चमकती बिंदु… जहाँ उसकी आंखें होनी चाहिए थीं। उसकी आवाज़ आई। बहुत धीमी। लेकिन आदेश जैसी। "यह… मेरा है।" अगले ही पल— दरवाजे के बाहर से एक भयावह चीख गूंजी। ऐसी चीख… जो इंसान की नहीं हो सकती। कुछ भारी चीज़ तेजी से पीछे घसीटी गई। घ्ररररर… फिर सन्नाटा। पूरी बिल्डिंग जैसे राहत की सांस ले रही थी। आकृति कुछ सेकंड वहीं खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे रुद्र की ओर मुड़ी। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लगा वह सुन लेगी। वह एक कदम करीब आई। रुद्र हिला नहीं। भागा नहीं। डरा… जरूर था। लेकिन उससे ज्यादा — खिंचा हुआ था। ठंडा हाथ फिर उसके सीने पर आकर रुका। ठीक दिल के ऊपर। "अब… कोई तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकता।" उसके बाद… पहली बार… घूंघट थोड़ा-सा उठा। बस एक पल के लिए। रुद्र ने जो देखा — वह पूरा चेहरा नहीं था। बस— असाधारण रूप से सुंदर ठुड्डी… हल्के लाल होंठ… और मृत्यु जैसी पीली त्वचा। फिर घूंघट वापस गिर गया। "अभी… तुम्हारे देखने का समय नहीं आया।" उसकी उंगली की अंगूठी धीरे-धीरे ठंडी हो गई। आकृति पीछे हटने लगी। रुद्र से अचानक निकल गया— "रुको…" वह थम गई। कुछ सेकंड की खामोशी। फिर रुद्र ने धीमे स्वर में पूछा— "तुम… मेरी रक्षा क्यों करती हो?" लंबा विराम। इतना लंबा कि लगा वह जा चुकी है। फिर फुसफुसाहट आई— "क्योंकि… तुमने मुझे स्वीकार किया था …" "पहली बार…" रुद्र की सांस थम गई। और उसके गायब होने से ठीक पहले… उसे एक आखिरी वाक्य सुनाई दिया— "जल्द ही… विवाह की रात आएगी।" कमरा फिर खाली था। लेकिन अब रुद्र जान चुका था— यह सिर्फ शिकार और जीवित रहने की कहानी नहीं रही। यह एक बंधन की शुरुआत थी। एक ऐसा बंधन… जिससे लौटना शायद संभव नहीं।

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"काली पहाड़ी का दरवाज़ा"
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अंधेरा।
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इतना गहरा कि हाथ आंखों के सामने रखने पर भी दिखाई न दे।
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रुद्र बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
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उसने अपनी सांस रोक ली।
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अंधेरे में देखने से ज्यादा जरूरी था — सुनना।
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पीछे…
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धीमे, भारी कदम।
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ग्रेवकीपर।
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आगे…
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हल्की सी हंसी।
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वह बच्चा।
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और बीच में — वह खुद।
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उसने धीरे से अपनी प्राण ऊर्जा फैलानी शुरू की। यह कोई हमला नहीं था, बल्कि एक अदृश्य स्पर्श जैसा था, जिससे वह आसपास की चीजों की मौजूदगी महसूस कर सकता था।
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बाईं ओर दीवार।
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दाईं ओर टूटी रेलिंग।
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फर्श पर कांच।
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और ठीक तीन कदम सामने…
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वह बच्चा खड़ा था।
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अचानक गुब्बारे के रगड़ने की आवाज आई।
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चीईं…
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जैसे नाखून कांच पर खींच दिए गए हों।
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बच्चे ने फुसफुसाया, "आप भाग क्यों नहीं रहे?"
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रुद्र ने शांत स्वर में कहा, "क्योंकि तुम मुझे भागने नहीं दोगे।"
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कुछ सेकंड की चुप्पी।
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फिर—
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बच्चा हंसा।
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वह हंसी मासूम नहीं थी।
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उसमें एक अजीब परिपक्वता थी… जैसे कोई बूढ़ा आदमी बच्चे की आवाज में हंस रहा हो।
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"सही जवाब।"
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अचानक गलियारे के दूर वाले छोर पर हल्की नीली रोशनी जली।
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बस उतनी कि आकृतियां छाया बनकर दिखने लगें।
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रुद्र ने देखा —
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ग्रेवकीपर रुक गए थे।
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वे बच्चे से करीब दस कदम दूर खड़े थे।
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लेकिन आगे नहीं बढ़ रहे थे।
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जैसे कोई अदृश्य सीमा हो।
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रुद्र के दिमाग में तुरंत एक विचार चमका।
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"वे इससे बच रहे हैं…"
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इसका मतलब साफ था।
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यह बच्चा… उनसे भी खतरनाक हो सकता है।
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बच्चे ने सिर टेढ़ा किया।
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"आप समझदार हैं। इसलिए अभी तक जिंदा हैं।"
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रुद्र ने पूछा, "तुम क्या हो?"
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बच्चे ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने गुब्बारा छोड़ दिया।
लेकिन गुब्बारा ऊपर नहीं गया।
वह हवा में वहीं रुक गया।
फिर धीरे-धीरे खुद घूमने लगा।
जैसे कोई उसे पकड़े हो… जबकि वहां कोई नहीं था।
"मैं?" बच्चा बोला, "मैं यहां रहता हूँ।"
"नाम?"
कुछ पल चुप्पी।
फिर—
"लोग मुझे 'दरवाज़े वाला' कहते थे।"
रुद्र की भौंह हल्की सिकुड़ी।
"दरवाज़ा?"
बच्चे ने पीछे की ओर इशारा किया।
रुद्र ने मुड़कर देखा।
और पहली बार उसे एहसास हुआ —
गलियारे की दीवार पर… एक दरवाज़ा था।
लेकिन वह सामान्य दरवाज़ा नहीं था।
पूरी तरह काला।
उस पर कोई हैंडल नहीं।
कोई ताला नहीं।
बस लकड़ी पर उभरे हुए सैकड़ों छोटे हाथों के निशान।
जले हुए।
जैसे किसी ने अंदर से निकलने की कोशिश की हो।
रुद्र ने धीरे से पूछा, "यह पहले यहां नहीं था… है ना?"
बच्चा मुस्कुराया।
"यह हमेशा यहीं था। बस… हर किसी को दिखाई नहीं देता।"
पीछे खड़े ग्रेवकीपर हल्के-हल्के कांपने लगे।
उनकी दूधिया आंखें अब दरवाज़े पर थीं।
पहली बार रुद्र ने उनमें डर जैसा कुछ देखा।
बच्चा बोला, "आपने एक दुल्हन को मुक्त किया। इसलिए यह जाग गया।"
"यह क्या है?"
बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।
उसकी आवाज अब फुसफुसाहट में बदल गई।
"यह रास्ता है… जहां अधूरी मौतें जाती हैं।"
रुद्र के शरीर में ठंडक उतर गई।
अचानक…
दरवाज़े के उस पार से आवाज आई।
ठक।
जैसे किसी ने अंदर से थपकी दी हो।
फिर…
ठक… ठक…
फिर कई।
ठक ठक ठक ठक।
रुद्र का गला सूख गया।
"अंदर… कितने हैं?"
बच्चे ने धीरे से कहा, "गिनती किसी ने नहीं की।"
एक लंबी दरार दरवाज़े पर उभरी।
जैसे लकड़ी सांस ले रही हो।
रुद्र ने तुरंत नजर हटाई।
"इसे खोलना नहीं चाहिए।"
बच्चे ने उसे देखा।
"आप पहले ही खोल चुके हैं।"
उसी पल—
रुद्र के सिस्टम में तेज झटका महसूस हुआ।
New Location Registered. Black Hill Gate.
Hidden Quest Triggered.
Seal the Gate.
Reward: ??? Failure: Catastrophic Event.
रुद्र की आंखें सिकुड़ गईं।
"सील करूँ? कैसे?"
उत्तर नहीं मिला।
सिस्टम शांत हो गया।
पीछे खड़े ग्रेवकीपर अचानक एक साथ घुटनों पर गिर गए।
जैसे किसी भारी दबाव ने उन्हें झुका दिया हो।
बच्चा धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।
उसने अपनी छोटी हथेली उस पर रखी।
ठकठक की आवाज बंद हो गई।
पूरी बिल्डिंग में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर उसने कहा,
"मैं इसे ज्यादा देर रोक नहीं सकता।"
रुद्र ने पूछा, "तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो?"
बच्चा कुछ देर सोचता रहा।
फिर बोला,
"क्योंकि… चूहें बिल्ली का खेल मुझे पसंद है।"
अचानक…
रुद्र को एक और मौजूदगी महसूस हुई।
लेकिन इस बार न आगे… न पीछे।
ऊपर।
उसने सिर उठाया।
छत पर…
काले दाग फैल रहे थे।
जैसे पानी रिस रहा हो।
लेकिन वह पानी नहीं था।
वह परछाइयां थीं।
और वे नीचे टपकने लगीं।
पहली बूंद फर्श पर गिरी।
और तुरंत एक हाथ का आकार बन गया।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
कुछ ही सेकंड में…
फर्श पर दर्जनों काले हाथ रेंग रहे थे।
बच्चा फुसफुसाया,
"वे जाग रहे हैं…"
ग्रेवकीपर पीछे हटने लगे।
रुद्र ने गंडासा उठाया।
"इनसे लड़ सकता हूँ?"
बच्चे ने सीधे उसकी आंखों में देखा।
और पहली बार… उसके चेहरे पर डर साफ दिखा।
"इनसे नहीं। इनसे सिर्फ भागा जाता है।"
उसी पल—
काला दरवाज़ा भीतर की ओर हल्का सा खुला।
बस एक इंच।
लेकिन उस एक इंच की दरार से जो हवा बाहर आई…
वह सड़ांध नहीं थी।
वह मौत की गंध थी।
और उस अंधेरे में…
कुछ विशाल हिला।
इतना विशाल… कि दरवाज़ा छोटा लगने लगा।
रुद्र की पकड़ गंडासे पर कस गई।
उसने महसूस किया —
यह तो बस शुरुआत है।
रुद्र को सबसे पहले गंध आई। वह गंध इतनी हल्की थी कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति वहाँ खड़ा होता तो शायद उसे महसूस भी नहीं करता। लेकिन रुद्र अब सामान्य नहीं रहा था। पिछले कुछ घंटों में उसके अंदर कुछ बदल गया था — जैसे उसकी इंद्रियाँ तेज हो गई हों, जैसे दुनिया की परतें अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई देने लगी हों। यह गंध सड़ी हुई मिट्टी और पुराने लोहे की मिली-जुली थी… और उसके पीछे एक और गंध छिपी थी — ताज़े खून की। वह धीरे-धीरे पलटा। वह वहा से निकल और दरवाजा बंद कर दिया सीढ़ियों के उस अंधेरे हिस्से की तरफ, जहाँ बल्ब कुछ मिनट पहले ही बुझ गया था। वहाँ कुछ नहीं दिख रहा था। लेकिन "कुछ नहीं" भी कभी-कभी सबसे डरावनी चीज़ होती है। ऊपर की मंज़िल से हल्की-सी खट… खट… की आवाज़ आई। जैसे कोई नंगे पैर धीरे-धीरे चल रहा हो। रुद्र ने गंडासे की पकड़ कस ली। उसका हाथ ठंडा था, लेकिन हथेलियों में पसीना था। उसने अपने आप को याद दिलाया — डरना मना है। डरोगे तो मरोगे। उसने धीरे से आवाज़ लगाई, "कौन है?" कोई जवाब नहीं। बस वही खट… खट… फिर अचानक आवाज़ बंद हो गई। पूरा बिल्डिंग फिर से वैसी ही खामोशी में डूब गया, जिसमें अपने दिल की धड़कन भी बहुत तेज सुनाई देने लगती है। तभी उसकी आँखों के सामने हल्की-सी नीली रोशनी चमकी। सिस्टम। एक पारदर्शी पैनल हवा में उभरा। "चेतावनी — शत्रु की उपस्थिति दर्ज की गई है।" "दूरी — लगभग 12 मीटर।" "स्थिति — छिपा हुआ।" रुद्र का गला सूख गया। बारह मीटर। मतलब वह चीज़ बहुत दूर नहीं थी। उसने सीढ़ियों की तरफ देखा। ऊपर अंधेरा था, नीचे अंधेरा था। बीच में सिर्फ वह खड़ा था — एक इंसान, जिसके पास एक हथियार था और एक साल की जिंदगी। लेकिन उसके अंदर कहीं एक और भावना उठ रही थी। जिज्ञासा। अगर वह भाग जाता तो शायद बच सकता था… कुछ समय के लिए। लेकिन सिस्टम ने साफ कहा था — जिंदगी बढ़ाने का एक ही तरीका है। शिकार करो। उसने धीरे से पहला कदम ऊपर रखा। सीढ़ी ने कर्र… की आवाज़ की। वह रुक गया। फिर दूसरा कदम। तीसरा। हर कदम के साथ उसे ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरा उसे देख रहा हो। जैसे दीवारों में आँखें हों। पहली मंज़िल का गलियारा सामने था। दरवाजे बंद थे। कुछ पर ताले लगे थे, कुछ आधे खुले थे — जैसे लोग जल्दी में भागे हों। एक दरवाजे के बाहर बच्चों की छोटी-सी चप्पल पड़ी थी। रुद्र का दिल हल्का-सा डूबा। यहाँ कभी लोग रहते थे। हँसी होती होगी। टीवी की आवाज़ आती होगी। अब सिर्फ सन्नाटा था। तभी दाईं तरफ के एक खुले दरवाजे से हल्की-सी फुसफुसाहट आई। जैसे कोई बहुत धीरे-धीरे रो रहा हो। रुद्र दरवाजे के पास गया। उसने अंदर झाँका। कमरा लगभग खाली था। फर्श पर धूल जमी थी। एक कोने में टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी। और दीवार पर… लाल हाथों के निशान। छोटे… बड़े… घसीटे हुए… जैसे किसी ने बाहर निकलने की कोशिश की हो। उसका गला फिर सूख गया। सिस्टम का पैनल फिर चमका। "शत्रु दूरी — 8 मीटर।" मतलब वह चीज़ इस कमरे में नहीं थी। उसके बहुत करीब थी। तभी पीछे से ठंडी हवा का झोंका आया। इतना ठंडा कि उसकी गर्दन के पीछे की त्वचा सिहर गई। वह झटके से पलटा। गलियारे के आखिर में कोई खड़ा था। एक औरत। या कम से कम… उसका आकार। उसके लंबे बाल चेहरे पर झूल रहे थे। सफेद कपड़ा उसके शरीर से ऐसे लटक रहा था जैसे वह भीग चुका हो। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि उसके पैर फर्श को छू नहीं रहे थे। वह हल्का-सा हवा में झूल रही थी। रुद्र का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। फिर सिस्टम की आवाज़ आई। "लक्ष्य पहचाना गया।" "प्रकार — बंधी हुई आत्मा।" "खतरे का स्तर — मध्यम।" मध्यम। यह शब्द सुनकर उसके अंदर थोड़ी हिम्मत आई। अगर यह मध्यम है… तो शायद वह कर सकता है। उसने गंडासा थोड़ा ऊपर उठाया। औरत हिली नहीं। बस खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे उसका सिर उठा। बालों के पीछे से दो काली, गहरी आँखें दिखीं। उनमें कोई चमक नहीं थी। बस खालीपन। फिर उसका मुँह खुला। और एक अजीब-सी आवाज़ निकली — जैसे कई लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों। "तुम… देख सकते हो मुझे…" रुद्र ने जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हर कदम नापा हुआ। उसने सिस्टम से पूछा, "कमज़ोरी?" कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर शब्द उभरे। "सिर और हृदय क्षेत्र पर प्रहार प्रभावी होगा।" "निकट दूरी की लड़ाई की सिफारिश।" निकट दूरी। मतलब उसे बहुत पास जाना होगा। उसने गहरी सांस ली और कदम तेज कर दिए। बस तीन मीटर। दो मीटर। और तभी— औरत का शरीर अचानक झटके से मुड़ा। इतनी तेज कि आँखें उसका पीछा नहीं कर पाईं। अगले ही पल वह उसके सामने थी। उसका चेहरा अब बिल्कुल पास था। त्वचा फटी हुई… होंठ नीले… और आँखों के नीचे काले गड्ढे। उसके मुँह से सड़ांध की गंध आ रही थी। "क्यों आए हो…?" उसने फुसफुसाया। रुद्र ने जवाब दिया, "जिंदा रहने के लिए।" और गंडासा पूरी ताकत से घुमाया। हवा चिरी। लेकिन ब्लेड उसके आर-पार निकल गया। जैसे वह धुआँ हो। अगले ही पल उसके सीने पर किसी ने जोर से धक्का मारा। वह पीछे जा गिरा। गंडासा फर्श पर टकराया। उसकी सांस रुक गई। औरत अब उसके ऊपर झुकी थी। उसकी उंगलियाँ लंबी थीं… अस्वाभाविक रूप से लंबी। वे धीरे-धीरे रुद्र के गले की तरफ बढ़ रही थीं। सिस्टम चमका। "चेतावनी — जीवन ऊर्जा घट रही है।" रुद्र ने झटके से गंडासा उठाया और इस बार सीधा उसके सिर की तरफ नहीं, बल्कि उस जगह पर वार किया जहाँ उसका शरीर सबसे ज्यादा ठोस दिख रहा था — गर्दन के नीचे। इस बार ब्लेड रुका। जैसे किसी कठोर चीज़ से टकराया हो। औरत चीखी। आवाज़ इतनी तीखी थी कि खिड़कियों के शीशे कांप गए। रुद्र ने मौका नहीं गंवाया। उसने फिर वार किया। फिर। फिर। हर वार के साथ उसकी पकड़ मजबूत होती गई। और अचानक — वह आकृति टूटने लगी। जैसे काँच पर दरारें पड़ती हैं। उसका शरीर टुकड़ों में बिखरने लगा… और फिर काले धुएँ में बदल गया। गलियारा फिर से खाली था। सिर्फ रुद्र की भारी सांसें बची थीं। कुछ सेकंड बाद सिस्टम चमका। "लक्ष्य समाप्त।" "पुरस्कार — जीवनकाल + 3 महीने।" "कुल शेष जीवन — 1 वर्ष 3 महीने।" रुद्र फर्श पर बैठ गया। उसके हाथ कांप रहे थे। लेकिन उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। यह काम कर गया। वह सच में… इसे मार सकता है। तभी सिस्टम में एक नया संदेश उभरा। "नया मिशन उपलब्ध।" "स्थान — काली पहाड़ी सोसाइटी का बेसमेंट।" "गत 10 वर्षों में 17 लापता।" "खतरे का स्तर — उच्च।" रुद्र ने धीरे से सिर उठाया। बेसमेंट। उसे अचानक याद आया — इस बिल्डिंग का बेसमेंट हमेशा बंद रहता था। लोग कहते थे वहाँ पानी भर जाता है। कुछ कहते थे… आवाज़ें आती हैं। उसने अंधेरे की तरफ देखा, जहाँ नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ थीं। और पहली बार… उसे लगा कि शायद असली शिकार अभी शुरू हुआ है।
रुद्र कुछ देर तक वहीं बैठा रहा। उसकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन दिल अभी भी तेज धड़क रहा था। अभी कुछ मिनट पहले जो हुआ था, वह किसी बुरे सपने जैसा लग सकता था… अगर उसके सामने तैरता हुआ सिस्टम पैनल इस बात की गवाही न दे रहा होता कि सब सच था। उसने अपने हाथों की तरफ देखा। वे हल्के-हल्के कांप रहे थे। डर से? या उत्साह से? शायद दोनों से। उसने खुद से एक सवाल पूछा — "क्या मैं अब लोगों जैसा नहीं रहा?" और भीतर से एक शांत जवाब आया — "नहीं। अब तुम शिकारी हो।" गलियारे में फैली ठंडी हवा अब पहले जितनी भयावह नहीं लग रही थी। बल्कि उसमें एक अजीब-सी स्पष्टता थी। जैसे उसकी इंद्रियाँ इस अंधेरे की आदी होने लगी हों। तभी सिस्टम फिर चमका। "पहली आत्मा के विनाश पर बोनस सक्रिय।" "नई क्षमता अनलॉक — संवेदन दृष्टि।" रुद्र की भौंहें सिकुड़ गईं। "सक्रिय करो," उसने धीरे से कहा। अगले ही पल उसकी आंखों के सामने दुनिया बदल गई। गलियारे की दीवारें अब वैसी नहीं दिख रही थीं। जहाँ पहले सिर्फ पुराना पेंट और दरारें थीं, वहाँ अब हल्की-हल्की काली लकीरें रेंगती नजर आ रही थीं — जैसे धुआँ दीवारों के भीतर बह रहा हो। कुछ जगहों पर वह धुआँ ज्यादा गाढ़ा था। एक दरवाजे के पास तो लगभग जम-सा गया था। सिस्टम ने तुरंत जानकारी दी। "नकारात्मक ऊर्जा के अवशेष।" "हाल ही में सक्रिय आत्मा का प्रभाव।" रुद्र धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसने महसूस किया कि उसका शरीर पहले से हल्का लग रहा है। जैसे थकान उतनी गहरी नहीं रही। क्या यह उन तीन महीनों का असर था? या सिस्टम शरीर को भी बदल रहा था? उसने गंडासा उठाया और सीढ़ियों की तरफ देखा। नीचे — बेसमेंट। उच्च खतरा। सामान्य इंसान होता तो शायद सुबह होने का इंतजार करता। लेकिन रुद्र जानता था — डर से भागना अब विकल्प नहीं था। और सच कहें तो… उसके भीतर एक अजीब-सी खिंचाव भी थी। जैसे अंधेरा उसे बुला रहा हो। वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। पहला कदम नीचे रखते ही तापमान बदल गया। ऊपर की मंज़िल ठंडी थी। लेकिन यहाँ… यह ठंड अलग थी। भारी। गीली। जैसे हवा में पानी घुला हो। नीचे से एक बदबू उठ रही थी — सड़ी हुई चीज़ों की, फफूंदी की… और कुछ ऐसा जिसकी पहचान उसका दिमाग नहीं करना चाहता था। हर कदम पर सीढ़ियाँ हल्की-सी कराहतीं। नीचे पहुंचते-पहुंचते ऊपर की रोशनी पूरी तरह गायब हो गई। अब सिर्फ अंधेरा था। रुद्र ने मोबाइल निकाला और टॉर्च ऑन की। पीली रोशनी ने एक संकरी जगह को उजागर किया। बेसमेंट उम्मीद से बड़ा था। कंक्रीट के मोटे खंभे, जिन पर काई जमी थी। फर्श पर जगह-जगह पानी भरा था। और दीवारों पर पुराने नंबर लिखे थे — शायद पार्किंग स्लॉट। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी… यहाँ कोई आवाज़ नहीं थी। बिल्कुल भी नहीं। यहाँ तक कि पानी की बूंद गिरने की भी नहीं। जैसे इस जगह ने ध्वनि को निगल लिया हो। सिस्टम अचानक चमका। "चेतावनी।" "उच्च घनत्व की नकारात्मक ऊर्जा दर्ज।" रुद्र ने टॉर्च घुमाई। रोशनी एक खंभे पर पड़ी। और वह जम गया। खंभे पर लंबी-लंबी खरोंचें थीं। ऊपर से नीचे तक। जैसे किसी ने नाखूनों से कंक्रीट को नोच डाला हो। उसने हाथ बढ़ाकर एक खरोंच को छुआ। गहरी थी। बहुत गहरी। यह किसी इंसान का काम नहीं हो सकता। तभी टॉर्च की रोशनी थोड़ी आगे गई… और फर्श पर कुछ चमका। रुद्र पास गया। वह एक चाबी का गुच्छा था। जंग लगा हुआ। उसके पास ही एक पुराना मोबाइल पड़ा था — स्क्रीन टूटी हुई। उसने उसे उठाया। फोन बंद था। लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ उस पर पड़ीं, सिस्टम सक्रिय हो गया। "मृत वस्तु से स्मृति अंश प्राप्त।" अगले ही पल उसके दिमाग में एक झटका-सा लगा। और तस्वीरें उभरने लगीं। एक आदमी। लगभग चालीस साल का। घबराया हुआ। वह इसी बेसमेंट में भाग रहा था। बार-बार पीछे देख रहा था। उसकी सांसें टूट रही थीं। वह चिल्लाया — "कोई है?! दरवाजा खोलो!" फिर… अंधेरे से कुछ हिला। बहुत बड़ा। नीचे झुका हुआ। चार पैरों पर? नहीं… शायद घिसटता हुआ। आदमी की चीख गूंजी। तस्वीर अचानक टूट गई। रुद्र ने फोन गिरा दिया। उसका दिल जोर से धड़क रहा था। "यह… क्या था?" सिस्टम ने जवाब दिया। "संभावित लक्ष्य — विकृत आत्मा।" "खतरे का स्तर — उच्च।" उसी क्षण… पानी में हल्की-सी लहर उठी। रुद्र ने टॉर्च नीचे की। पानी स्थिर था। लेकिन अभी उसने साफ देखा था — कुछ हिला था। फिर… छपाक। इस बार आवाज़ भी आई। बेसमेंट के दूसरे छोर से। रुद्र ने रोशनी उधर घुमाई। कुछ नहीं। बस खंभों की कतार। और उनके बीच गहरा अंधेरा। वह स्थिर खड़ा रहा। कुछ सेकंड। कुछ नहीं हुआ। उसने एक कदम आगे बढ़ाया। छप… उसका जूता पानी में पड़ा। और उसी पल… बेसमेंट के भीतर कहीं बहुत दूर से एक धीमी-सी आवाज़ आई। जैसे कोई भारी चीज़ घसीट रहा हो। घ्रररर… घ्रररर… आवाज धीरे-धीरे साफ होती जा रही थी। रुद्र का गला सूख गया। उसने गंडासा कस लिया। टॉर्च की रोशनी कांप रही थी — शायद उसके हाथ की वजह से। फिर उसने देखा। दो खंभों के बीच… अंधेरा थोड़ा ज्यादा गहरा था। और उस अंधेरे में… कुछ हिल रहा था। पहले उसे लगा कि यह उसका भ्रम है। लेकिन फिर एक लंबी, अस्वाभाविक भुजा रोशनी में आई। त्वचा धूसर। हड्डियाँ उभरी हुई। और उंगलियाँ इतनी लंबी कि वे पानी को छू रही थीं। फिर दूसरी भुजा। फिर… धीरे-धीरे एक शरीर बाहर आया। वह चीज़ सीधी खड़ी नहीं थी। उसकी रीढ़ टेढ़ी थी। सिर एक तरफ झुका हुआ। और चेहरा… चेहरा जैसे था ही नहीं। बस मांस का धंसा हुआ हिस्सा। सिस्टम की आवाज़ तेज हो गई। "लक्ष्य पहचाना गया।" "विकृत आत्मा।" "खतरे का स्तर — उच्च।" उस प्राणी ने अचानक हवा सूंघी। फिर उसका सिर झटके से रुद्र की दिशा में मुड़ा। भले ही उसकी आंखें नजर नहीं आ रही थीं… लेकिन रुद्र को पूरा यकीन था। उसने उसे देख लिया है। एक पल की खामोशी। और अगले ही क्षण… वह चीज़ अविश्वसनीय गति से उसकी तरफ झपटी।
रुद्र को प्रतिक्रिया देने का समय ही नहीं मिला। वह प्राणी जिस गति से उसकी ओर झपटा, वह किसी जंगली जानवर से भी तेज था। पानी छिटककर हवा में उठा, और अगले ही पल एक सड़ी हुई गंध रुद्र की नाक से टकराई। लेकिन घबराहट के बावजूद उसकी साधना बेकार नहीं गई थी। उसका शरीर दिमाग से पहले हरकत में आया। वह बाएं तरफ लुढ़क गया। धड़ाम! जहाँ वह एक सेकंड पहले खड़ा था, वहाँ कंक्रीट का फर्श चटक गया। उस विकृत आत्मा की लंबी भुजा इतनी ताकत से गिरी थी कि पत्थर में दरार पड़ गई। रुद्र ने जमीन पर हाथ टिकाकर खुद को उठाया और तुरंत गंडासा घुमाया। धाऽऽक! धार उस प्राणी की भुजा से टकराई। लेकिन… आवाज अजीब थी। जैसे लोहे ने गीले चमड़े को नहीं, बल्कि किसी मोटे रबर को काटने की कोशिश की हो। भुजा आधी कटी। काली, चिपचिपी तरल चीज़ बाहर निकली — खून जैसी, मगर खून नहीं। प्राणी पीछे नहीं हटा। बल्कि उसने एक तीखी, कर्कश चीख निकाली। वह आवाज़ कानों से ज्यादा सीधे दिमाग में गूंजी। रुद्र का सिर झनझना उठा। सिस्टम तुरंत सक्रिय हुआ। "मानसिक आक्रमण दर्ज।" "चेतावनी — यह आत्मा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक प्रभाव भी डालती है।" रुद्र ने दांत भींच लिए। अगर वह एक पल भी ढीला पड़ा — तो खत्म। प्राणी ने फिर हमला किया। इस बार ऊपर से। उसकी दोनों भुजाएं फैल गईं, जैसे वह रुद्र को जकड़कर कुचल देना चाहता हो। रुद्र पीछे नहीं हटा। वह आगे बढ़ा। ठीक उस पल जब भुजाएं गिरने वाली थीं, उसने कदम भीतर की तरफ डाला — दुश्मन की पहुंच के अंदर। "काल-भैरव — प्रथम चाल।" उसकी पकड़ बदल गई। गंडासा नीचे से ऊपर की ओर बिजली की तरह उठा। छ्राऽऽक! इस बार वार गहरा था। भुजा लगभग अलग हो गई। प्राणी बेकाबू होकर तड़पा। उसका शरीर अस्वाभाविक तरीके से मुड़ा, जैसे हड्डियाँ हों ही नहीं। रुद्र पीछे हटने ही वाला था कि अचानक— एक और भुजा! उसने देखा ही नहीं था कि उस चीज़ की पीठ से एक अतिरिक्त, पतली भुजा निकली हुई थी। वह सांप की तरह लहराई और रुद्र की गर्दन लपेट ली। सब कुछ एक झटके में हुआ। गंडासा उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा। भुजा का दबाव बढ़ने लगा। सांस रुकने लगी। दुनिया सिकुड़ने लगी। रुद्र ने उस सड़ी हुई त्वचा को पकड़कर हटाने की कोशिश की — लेकिन उसकी पकड़ पत्थर जैसी मजबूत थी। सिस्टम चमका। "ऑक्सीजन स्तर गिर रहा है।" "तीन मिनट में चेतना लुप्त होने की संभावना।" रुद्र की नजर धुंधली होने लगी। उसी धुंध में उसे एक झलक दिखी। वह खूनी लग्न-पत्रिका… उसकी जेब में… फिर से गर्म हो रही थी। गर्मी बढ़ती गई। इतनी कि जैसे अंगारा रखा हो। अचानक— उसके दिमाग में एक फुसफुसाहट गूंजी। मुलायम। स्त्री स्वर। "मरना मत…" रुद्र की आंखें फैल गईं। यह आवाज़… उस विकृत आत्मा की नहीं थी। यह अलग थी। ठंडी… लेकिन अजीब तरह से जीवित। अगले ही पल पत्रिका जेब से खुद बाहर सरक आई। हवा के बिना भी उसके पन्ने फड़फड़ाने लगे। और फिर— उस पर लिखा उसका नाम हल्की लाल रोशनी में चमक उठा। प्राणी अचानक ठिठक गया। उसकी पकड़ ढीली पड़ी। जैसे किसी और, ज्यादा खतरनाक उपस्थिति को महसूस कर लिया हो। रुद्र जमीन पर गिर पड़ा और हवा के लिए हांफने लगा। वह समझ नहीं पाया कि अभी क्या हुआ… लेकिन मौका था। उसने बिना देर किए गंडासा उठाया। "द्वितीय चाल।" इस बार वार सीधा गर्दन पर था। छन्न! धार भीतर तक उतर गई। प्राणी की चीख इतनी तीखी थी कि बेसमेंट की छत तक कांप गई। उसका शरीर कुछ सेकंड बेतहाशा तड़पता रहा… फिर ढह गया। धीरे-धीरे वह काला तरल धुएं में बदलने लगा। सिस्टम की परिचित ध्वनि गूंजी। "लक्ष्य नष्ट।" "प्राण ऊर्जा अवशोषित हो रही है।" रुद्र वहीं बैठ गया। उसकी छाती तेजी से उठ-गिर रही थी। कुछ सेकंड बाद पैनल साफ हुआ। "जीवनकाल + 8 महीने।" वह ठहाका मारकर हंस पड़ा। "तो… मैं अभी नहीं मरने वाला।" लेकिन उसकी नजर तुरंत उस पत्रिका पर गई। वह अब जमीन पर शांत पड़ी थी। जैसे कुछ हुआ ही न हो। रुद्र ने उसे उठाया। कागज ठंडा था। मानो वह आग कभी लगी ही न हो। उसने धीमे स्वर में कहा, "अभी… मेरी मदद किसने की?" कोई जवाब नहीं। लेकिन… एक पल के लिए उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई खड़ा है। बहुत करीब। इतना कि अगर वह मुड़े… तो शायद उसकी सांस अपनी गर्दन पर महसूस करे। रुद्र ने धीरे-धीरे पीछे देखा। कुछ नहीं। खाली बेसमेंट। टूटे खंभे। काला पानी। फिर भी… अब वह पूरी तरह अकेला नहीं लग रहा था। सिस्टम अचानक फिर चमका। "विशेष सूचना।" "प्रेत-विवाह सक्रिय अवस्था में प्रवेश कर चुका है।" "दुल्हन ने वर को चिन्हित कर लिया है।" रुद्र के होंठों पर हल्की मुस्कान आई। "तो… तुम सच में हो।" बेसमेंट की ठंडी हवा में कहीं बहुत हल्की… पायल जैसी आवाज़ गूंजी। और तुरंत गायब हो गई।
रुद्र बेसमेंट से बाहर निकलते समय पहले जैसा नहीं रहा था। उसकी चाल धीमी थी, लेकिन उसमें अब एक अजीब-सा आत्मविश्वास था। जैसे उसने अभी-अभी मौत की आंखों में झांककर वापस लौटने का फैसला किया हो। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अनुभव ने उसे सिखा दिया था — कुछ जगहों को बार-बार नहीं देखना चाहिए। वरना वे तुम्हें देखने लगती हैं। ऊपर की मंजिल पर पहुँचते ही उसे एहसास हुआ कि बिल्डिंग पहले से ज्यादा शांत है। यह सामान्य सन्नाटा नहीं था। यह वैसा सन्नाटा था जो तूफान से ठीक पहले आता है। उसने कमरे का दरवाजा खोला। किर्र… दरवाजे की आवाज़ खाली गलियारे में गूंज गई। कमरे में कदम रखते ही उसकी नजर सीधे उस लग्न-पत्रिका पर गई जो अभी भी उसके हाथ में थी। वह कुछ सेकंड उसे घूरता रहा। फिर धीरे से बोला, “आज… तुमने मेरी जान बचाई।” कोई जवाब नहीं। स्वाभाविक था। वह एक कागज ही तो था। लेकिन रुद्र अब इतना अनुभव पा चुका था कि वह जानता था — यह सिर्फ कागज नहीं है। उसने पत्रिका को टेबल पर रखा। जैसे ही उसने हाथ छोड़ा… कागज हल्का-सा खिसक गया। रुद्र का दिल एक पल को रुक गया। खिड़की बंद थी। पंखा बंद था। हवा का कोई झोंका नहीं। फिर भी… पत्रिका उसकी तरफ घूम गई। धीरे-धीरे। जैसे कोई अदृश्य उंगलियाँ उसे धकेल रही हों। रुद्र की सांस भारी हो गई। “अगर तुम सच में हो…” उसने फुसफुसाकर कहा, “तो सामने आओ।” कमरे का तापमान अचानक गिर गया। इतना कि उसकी सांस हल्की धुंध में बदलने लगी। और तभी— छन… बहुत हल्की। बहुत दूर से आती हुई। पायल की आवाज़। रुद्र के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। आवाज दरवाजे की दिशा से आई थी। छन… छन… धीरे। मापी हुई। जैसे कोई नंगे पांव नहीं, बल्कि गहनों के साथ चल रहा हो। दरवाजा अपने आप बंद हो गया। धड़ाम। रुद्र ने गंडासा उठाने की कोशिश की… लेकिन उसने खुद को रोक लिया। अजीब बात थी — उसे खतरा महसूस नहीं हो रहा था। डर था। लेकिन वह वैसा डर नहीं था जैसा किसी राक्षस को देखकर होता है। यह… प्रतीक्षा जैसा था। कमरे के कोने में रखा आईना हल्का-सा धुंधला होने लगा। मानो किसी ने उस पर गर्म सांस छोड़ी हो। धीरे-धीरे उस धुंध पर एक निशान उभरा। पहले एक रेखा। फिर दूसरी। और कुछ सेकंड बाद… एक शब्द। “रुद्र” उसका गला सूख गया। “तुम… लिख रही हो?” धुंध फिर बदली। इस बार अक्षर बनने में ज्यादा समय नहीं लगा। “मैं… आई थी।” रुद्र की धड़कन इतनी तेज हो गई कि उसे खुद सुनाई दे रही थी। “अभी?” उसने पूछा। आईने पर अगला शब्द उभरा। “हमेशा।” कमरे की हवा और ठंडी हो गई। उसके पीछे से अचानक हल्की-सी खुशबू आई। चंदन और गीली मिट्टी की मिली-जुली महक। यह सड़न नहीं थी। यह मौत की गंध नहीं थी। यह… किसी दुल्हन जैसी थी। रुद्र धीरे-धीरे पलटा। कोई नहीं। लेकिन— फर्श पर धूल जमी थी। और उस धूल पर… ताजे पैरों के निशान बन रहे थे। एक-एक कदम। जैसे कोई अदृश्य स्त्री उसकी तरफ बढ़ रही हो। रुद्र स्थिर खड़ा रहा। पहली बार उसके भीतर शिकारी नहीं… एक आदमी जागा। उसके सामने कदम रुक गए। उनके बीच मुश्किल से दो फीट की दूरी थी। उसकी सांस अटक गई। “क्या… तुम वही हो?” कुछ सेकंड की खामोशी। फिर… उसके कंधे पर कुछ बेहद ठंडा आकर टिका। जैसे बर्फ से बनी उंगलियाँ। रुद्र का शरीर जड़ हो गया। वह भाग सकता था। वार कर सकता था। लेकिन उसने कुछ नहीं किया। धीरे-धीरे वह ठंडा स्पर्श उसकी गर्दन तक आया। और फिर— एक बहुत हल्की फुसफुसाहट। इतनी पास कि जैसे होंठ उसके कान को छू रहे हों। “मेरे… पति…” उसकी रीढ़ में बिजली दौड़ गई। यह आवाज़ भयावह नहीं थी। यह खाली भी नहीं थी। उसमें एक गहरी, अंतहीन अकेलापन था। रुद्र ने मुश्किल से शब्द निकाले। “तुमने… मुझे क्यों चुना?” कुछ पल तक कोई जवाब नहीं आया। फिर उसकी हथेली अपने आप उठी। जैसे किसी ने पकड़कर ऊपर की हो। उसकी उंगली में अचानक ठंडक महसूस हुई। रुद्र ने नीचे देखा— एक पतली, पुरानी चांदी की अंगूठी उसकी उंगली में थी। वह चौंक गया। “यह कब—” फुसफुसाहट फिर आई। “अब… तुम मेरे हो।” रुद्र ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। “और तुम?” कुछ सेकंड। फिर— उसके सीने पर एक अदृश्य सिर टिक गया। वह वजन बहुत हल्का था। लेकिन एहसास बिल्कुल साफ। जैसे कोई सचमुच उससे लगकर खड़ा हो। “मैं… हमेशा से थी।” उसकी आंखें अनायास नरम हो गईं। “तुम्हारा नाम?” कमरा अचानक और ठंडा हो गया। आईने पर धुंध फिर उभरी। लेकिन इस बार अक्षर बनते ही मिट गए। जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक रही हो। फुसफुसाहट बदली। अब उसमें चेतावनी थी। “अभी… नहीं।” उसी पल सिस्टम चमका। “चेतावनी।” “उच्च श्रेणी की सत्ता निकट है।” रुद्र का चेहरा सख्त हो गया। “यहाँ कोई और है?” ठंडा स्पर्श तुरंत हट गया। पायल की आवाज़ तेजी से पीछे गई। छन… छन… छन… और अचानक रुक गई। दरवाजे के बाहर… गलियारे में… कुछ भारी घसीटने की आवाज़ आई। धीरे। जानबूझकर। जैसे कोई चीज़ जानती हो कि अंदर कौन है। सिस्टम की आवाज़ गूंजी— “ध्यान दें।” “यह उपस्थिति… दुल्हन से भी प्राचीन है।”
गलियारे में घसीटने की वह आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी। घ्ररर… घ्ररर… जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर रेंगती हुई आगे बढ़ रही हो। रुद्र दरवाजे के सामने स्थिर खड़ा था। उसकी पकड़ गंडासे पर कस गई। अभी कुछ क्षण पहले जो ठंडा स्पर्श उसे घेरे हुए था, वह पूरी तरह गायब हो चुका था। लेकिन उसकी उंगली में पड़ी चांदी की अंगूठी अब भी बर्फ जैसी ठंडी थी। वह जा चुकी थी। या… छिप गई थी। सिस्टम फिर चमका। "चेतावनी — अत्यंत प्राचीन नकारात्मक ऊर्जा दर्ज।" "खतरे का स्तर — अज्ञात।" अज्ञात। यह शब्द रुद्र को बिल्कुल पसंद नहीं आया। उच्च खतरा समझ आता है। मृत्यु का जोखिम भी समझ आता है। लेकिन अज्ञात — इसका मतलब होता है कि सिस्टम के पास भी पूरी जानकारी नहीं है। और जब सिस्टम अनजान हो… तब इंसान को और ज्यादा सावधान होना पड़ता है। घसीटने की आवाज़ दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई। खामोशी। इतनी गहरी कि रुद्र को अपनी दिल की धड़कन भी भारी लगने लगी। धक… धक… धक… अचानक— टक… टक… दरवाजे पर दो हल्की दस्तक हुई। रुद्र की आंखें सिकुड़ गईं। यह हमला नहीं था। यह… जैसे कोई अनुमति मांग रहा हो। फिर तीसरी दस्तक। इस बार थोड़ी धीमी। जिद्दी। रुद्र ने एक लंबी सांस ली। "जो भी है… अंदर आने का इंतजार क्यों कर रहा है?" उसी क्षण उसकी उंगली में पड़ी अंगूठी हल्की-सी गर्म हुई। बहुत हल्की। जैसे किसी ने चेतावनी में छुआ हो। रुद्र ने समझ लिया। वह चीज़ बाहर है — और दुल्हन चाहती है कि वह दरवाजा न खोले। टक… इस बार दस्तक नहीं। दरवाजे के निचले हिस्से पर कुछ रगड़ा। धीरे-धीरे। जैसे नाखून लकड़ी पर घिस रहे हों। एक पतली, कराहती आवाज़ निकली। रुद्र ने नीचे देखा। दरवाजे के नीचे की संकरी दरार से कुछ काला-सा भीतर सरकने की कोशिश कर रहा था। धुआँ नहीं। परछाईं नहीं। कुछ और। वह तुरंत पीछे हट गया। सिस्टम चमका। "सीमा उल्लंघन का प्रयास।" "यह सत्ता आम आत्माओं की तरह बाधाओं से नहीं रुकती।" रुद्र के भीतर एड्रेनालिन दौड़ गया। अगर यह चीज़ कमरे में घुस आई… तो लड़ाई टाली नहीं जा सकेगी। दरवाजे के दूसरी तरफ अचानक एक आवाज़ आई। सूखी। बहुत बूढ़ी। जैसे किसी का गला सदियों से पानी न देख पाया हो। "खोलो…" रुद्र के शरीर में सिहरन दौड़ गई। वह आवाज़ इंसानी थी — लेकिन बिल्कुल जीवित नहीं। "मैं… जानता हूँ… वह अंदर है…" रुद्र का दिल एक पल को रुक गया। क्या यह दुल्हन के बारे में कह रहा है? अंगूठी अचानक और गर्म हो गई। अब यह सिर्फ चेतावनी नहीं थी। यह बेचैनी थी। लगभग… डर। रुद्र की भौंहें सिकुड़ गईं। "तुम उससे डरती हो?" यह सोचते ही उसके भीतर कुछ बदल गया। जिस सत्ता से उसकी दुल्हन डरती है… वह साधारण नहीं हो सकती। दरवाजे के बाहर फिर आवाज़ आई। इस बार धीमी हंसी के साथ। "छोटे साधक…" "उसे छिपा नहीं सकते…" "वह मेरी है…" कमरे का तापमान अचानक गिर गया। लेकिन यह दुल्हन वाली ठंड नहीं थी। यह सड़ी हुई कब्र जैसी ठंड थी। रुद्र के भीतर गुस्सा उठ खड़ा हुआ। "मेरी है।" यह शब्द उसके कानों में गूंजा। उसने पहली बार जोर से कहा— "यहाँ से चले जाओ।" कुछ सेकंड की खामोशी। फिर… दरवाजे के उस पार से एक लंबी सांस की आवाज़ आई। जैसे कोई लकड़ी की दरार से उसकी गंध सूंघ रहा हो। "तुम… अलग हो…और वापस आ गए हो " "इसलिए उसने तुम्हें चुना…" रुद्र का दिमाग तेजी से काम करने लगा। तो यह सत्ता दुल्हन को जानती है। शायद… बहुत पहले से। अचानक— धड़ाम! दरवाजे पर इतना जोरदार प्रहार हुआ कि पूरी चौखट कांप गई। लकड़ी चरमराई। दीवार से धूल झरने लगी। दूसरा प्रहार। और भी शक्तिशाली। सिस्टम चमका। "संरचना क्षति — 32%" तीसरा प्रहार… दरवाजे के बीचों-बीच एक उभरी हुई आकृति दिखी। जैसे बाहर से कोई चेहरा लकड़ी पर दबा हो। धीरे-धीरे लकड़ी फटने लगी। और उस दरार से… एक आंख दिखाई दी। धुंधली। सफेद। पुतली लगभग गायब। वह आंख सीधे रुद्र को देख रही थी। रुद्र के हाथ खुद-ब-खुद गंडासा उठाने लगे। अगर दरवाजा टूटा— तो वह पीछे नहीं हटेगा। उसी पल— अंगूठी जल उठी। इस बार सचमुच। रुद्र ने दर्द से दांत भींच लिए। और अचानक— उसके और दरवाजे के बीच हवा कांपने लगी। जैसे गर्मी में सड़क कांपती है। धीरे-धीरे… एक आकृति बनी। पहले धुंध। फिर एक पतली रूपरेखा। लंबे बाल। झुका हुआ सिर। और लाल किनारी वाला घूंघट… जो हवा न होने पर भी हल्का हिल रहा था। रुद्र की सांस अटक गई। वह पूरी तरह दिखाई नहीं दे रही थी। जैसे आधी इस दुनिया में… आधी कहीं और। दरवाजे के उस पार की आंख अचानक फैल गई। पहली बार… डर उसमें दिखा। एक कराहती आवाज़ निकली। "तुम… जाग गई…" कमरे का तापमान और गिर गया। लेकिन अब यह ठंड नहीं चुभ रही थी। यह… संरक्षक दीवार जैसी लग रही थी। घूंघट वाली आकृति ने बहुत धीरे सिर उठाया। चेहरा अब भी साफ नहीं दिख रहा था। बस दो हल्की, लाल चमकती बिंदु… जहाँ उसकी आंखें होनी चाहिए थीं। उसकी आवाज़ आई। बहुत धीमी। लेकिन आदेश जैसी। "यह… मेरा है।" अगले ही पल— दरवाजे के बाहर से एक भयावह चीख गूंजी। ऐसी चीख… जो इंसान की नहीं हो सकती। कुछ भारी चीज़ तेजी से पीछे घसीटी गई। घ्ररररर… फिर सन्नाटा। पूरी बिल्डिंग जैसे राहत की सांस ले रही थी। आकृति कुछ सेकंड वहीं खड़ी रही। फिर धीरे-धीरे रुद्र की ओर मुड़ी। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लगा वह सुन लेगी। वह एक कदम करीब आई। रुद्र हिला नहीं। भागा नहीं। डरा… जरूर था। लेकिन उससे ज्यादा — खिंचा हुआ था। ठंडा हाथ फिर उसके सीने पर आकर रुका। ठीक दिल के ऊपर। "अब… कोई तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकता।" उसके बाद… पहली बार… घूंघट थोड़ा-सा उठा। बस एक पल के लिए। रुद्र ने जो देखा — वह पूरा चेहरा नहीं था। बस— असाधारण रूप से सुंदर ठुड्डी… हल्के लाल होंठ… और मृत्यु जैसी पीली त्वचा। फिर घूंघट वापस गिर गया। "अभी… तुम्हारे देखने का समय नहीं आया।" उसकी उंगली की अंगूठी धीरे-धीरे ठंडी हो गई। आकृति पीछे हटने लगी। रुद्र से अचानक निकल गया— "रुको…" वह थम गई। कुछ सेकंड की खामोशी। फिर रुद्र ने धीमे स्वर में पूछा— "तुम… मेरी रक्षा क्यों करती हो?" लंबा विराम। इतना लंबा कि लगा वह जा चुकी है। फिर फुसफुसाहट आई— "क्योंकि… तुमने मुझे स्वीकार किया था …" "पहली बार…" रुद्र की सांस थम गई। और उसके गायब होने से ठीक पहले… उसे एक आखिरी वाक्य सुनाई दिया— "जल्द ही… विवाह की रात आएगी।" कमरा फिर खाली था। लेकिन अब रुद्र जान चुका था— यह सिर्फ शिकार और जीवित रहने की कहानी नहीं रही। यह एक बंधन की शुरुआत थी। एक ऐसा बंधन… जिससे लौटना शायद संभव नहीं।