Chapter 1
Rebirth
Journey of the Mantralok
रात का समय था। अस्पताल की चौथी मंज़िल पर बना वह कमरा किसी कब्र की तरह शांत पड़ा था। बाहर गलियारे में जलती पीली रोशनी कमरे के अंदर तक पहुँचते-पहुंचते कमज़ोर पड़ जाती थी, जैसे वह भी यहाँ ज़्यादा देर रुकना नहीं चाहती हो। कमरे में रखी मशीनों से आती बीप… बीप… की आवाज़ हर कुछ सेकंड में उस सन्नाटे को चीर देती थी, और फिर सब कुछ दोबारा वैसा ही खामोश हो जाता था।
उस बिस्तर पर एक लड़का लेटा हुआ था। उसकी साँसें इतनी धीमी और टूटी हुई थीं कि हर साँस के बाद ऐसा लगता, जैसे अब अगली साँस आएगी ही नहीं। उसकी छाती मुश्किल से ऊपर-नीचे हो रही थी, मानो वह हर बार सांस लेने के लिए अपनी पूरी बची-खुची ताक़त झोंक रहा हो। उसके होंठ सूखे थे, और शरीर इतना कमजोर कि उंगलियाँ तक कांप रही थीं।
उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें अब ज़िंदगी कम और थकान ज़्यादा दिखाई दे रही थी। आँसू चुपचाप उसकी आँखों के किनारों से निकलकर तकिये में समा रहे थे। वह रो नहीं रहा था—उसके पास रोने की ताक़त भी नहीं बची थी। वह बस सोच रहा था।
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”
उसके दिमाग में यही सवाल बार-बार गूंज रहा था। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी आँखों के सामने घूमते हुए देखी। कोई अपराध नहीं, कोई गलत रास्ता नहीं। फिर भी यह सज़ा?
उसके होंठ हल्के से हिले। आवाज़ इतनी कमज़ोर थी कि कमरे में मौजूद मशीनों की आवाज़ भी उस पर भारी पड़ रही थी।
“मैंने… कभी किसी का बुरा नहीं किया…”
वह एक पल के लिए रुका। साँस लेने में उसे कुछ सेकंड लग गए।
“ना… ही किसी को… करने दिया…”
उसकी आवाज़ टूट रही थी, जैसे हर शब्द उसके गले से निकलने से पहले ही हार मान लेता हो। उसकी उंगलियाँ चादर को कसकर पकड़ गईं, मानो वह ज़िंदगी को ही पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।
“मैंने… अपनी ताक़त में रहते हुए… सब किया…”
उसकी आँखें छत की ओर टिक गईं।
“पर… आज…”
एक लंबा सन्नाटा।
“आज मैं… बिल्कुल अकेला हूँ…”
कमरे में फिर वही बीप की आवाज़ गूंज उठी—इस बार पहले से थोड़ी धीमी।
अस्पताल की मशीनों की बीप… बीप… की आवाज़ के अलावा कमरे में कुछ भी नहीं था। कोई कदमों की आहट नहीं, कोई फुसफुसाहट नहीं—बस वही दोहराती हुई आवाज़, जो उसे यह याद दिला रही थी कि उसका दिल अभी भी चल रहा है… किसी तरह। हर बीप के बीच का सन्नाटा पहले से लंबा लगता जा रहा था, मानो समय खुद भी थक चुका हो और अब आगे बढ़ना नहीं चाहता हो।
उसने खाली कमरे की तरफ़ एक बार फिर देखा। बिस्तर के पास रखी कुर्सी पूरी तरह खाली थी। वहाँ बैठने वाला कोई नहीं था। न कोई जो उसका हाथ पकड़ सके, न कोई जो यह कह सके कि “मैं यहीं हूँ।”
उसके होंठ बहुत हल्के से हिले, और उसने खुद से ही बुदबुदाकर कहा—
“इस आख़िरी समय में… मेरे साथ देने वाला कोई नहीं है।”
उसके शब्द हवा में ही घुल गए। उन्हें सुनने वाला कोई नहीं था।
कांपते हुए हाथों से उसने अपने सामने रखा gaming laptop उठाने की कोशिश की। वह हल्का नहीं था, या शायद अब उसके हाथों में उतनी ताक़त ही नहीं बची थी। उंगलियाँ सुन्न पड़ चुकी थीं, और कलाई में हल्का-सा दर्द उठ रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह किसी भारी पत्थर को उठा रहा हो, फिर भी उसने हार नहीं मानी। बड़ी मुश्किल से उसने laptop को अपनी छाती के पास खींच लिया।
स्क्रीन ऑन होते ही नीली रोशनी कमरे के अंधेरे को चीरती हुई उसके चेहरे पर फैल गई। वही रोशनी उसके पीले पड़ चुके चेहरे को और भी बेरंग बना रही थी। उसकी थकी हुई आँखों में उस स्क्रीन की चमक झिलमिला रही थी, लेकिन पलकें खुली रखना भी अब उसके लिए आसान नहीं था।
वह स्क्रीन को देखता रहा।
उस पर गेम का ending icon चमक रहा था।
वह खेल… जिसे उसने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में पूरा किया था।
वह खेल, जिसे उसने एक दिन पहले ही खत्म किया था—तब, जब उसके शरीर में अभी थोड़ी-सी ताक़त बची हुई थी। उस दिन उसने जीत हासिल की थी, आख़िरी boss को हराया था, कहानी को उसके अंत तक पहुँचाया था। लेकिन आज… आज उस जीत को दोबारा महसूस करने की ताक़त उसमें नहीं थी।
उसके हाथ controller या keyboard तक पहुँचने की हालत में नहीं थे। खेलने की इच्छा थी, लेकिन शरीर ने साफ़ मना कर दिया था।
वह बस देख सकता था।
सिर्फ़ देख सकता था।
“अजीब है…”
उसने मन ही मन सोचा।
“ज़िंदगी में पहली बार… कुछ पूरा किया… और उसे मनाने वाला… कोई नहीं।”
उसकी आँखें थोड़ी देर के लिए बंद हो गईं। स्क्रीन की नीली रोशनी अब भी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जैसे वह उसकी आख़िरी साथी हो। कमरे में फिर से वही बीप की आवाज़ गूंजी—इस बार पहले से थोड़ी धीमी, थोड़ी भारी।
गेम खत्म हो चुका था।
और शायद…
उसकी कहानी भी।
वह हल्का-सा मुस्कुराया। मुस्कान नहीं थी, बस होठों का एक सूना-सा मोड़।
“चलो भी… कुछ भी नहीं होता,”
उसने खुद से कहा, जैसे अपने ही डर को चुप करा रहा हो।
तांत्रिक अकादमी—
लोग कहते थे कि यह गेम बहुत मुश्किल है। बहुत जटिल। बहुत निर्दयी।
पर उसे कभी ऐसा नहीं लगा।
मुश्किल तब होता है जब इंसान घबराता है।
जब वह जल्दबाज़ी करता है।
जब वह शक्ति को समझे बिना उसे पकड़ने की कोशिश करता है।
यह दुनिया धैर्य माँगती थी।
स्क्रीन पर ठहरी उस आख़िरी छवि को देखते हुए, उसका मन फिर उसी रहस्यमय संसार में डूबने लगा। वह दुनिया जहाँ कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे समय की एक परत पार हो गई हो। वहाँ कोई आधुनिक इमारतें नहीं थीं, कोई तेज़ रोशनी नहीं—बस प्राचीनता की एक गहरी, भारी-सी साँस।
भारत के पुराने पौराणिक ग्रंथों की गूँज उस दुनिया की हवा में बसी थी।
मंत्र केवल शब्द नहीं थे, वे अनुशासन थे।
देवता केवल पात्र नहीं थे, वे परख थे।
हर मंत्र का उच्चारण सोच-समझकर करना पड़ता था, क्योंकि गलत स्वर, गलत भावना—सब कुछ बदल सकता था। वहाँ शक्ति माँगने से पहले यह समझना ज़रूरी था कि क्या वह शक्ति तुम्हें स्वीकार भी करेगी या नहीं।
उसने कई बार देखा था—
जो बिना समझे, बिना तैयारी के आगे बढ़े… वे टूट गए।
कुछ गुफाओं में हमेशा के लिए खो गए।
कुछ मंदिरों में अपनी ही साधना का भार नहीं झेल पाए।
और फिर भी…
वह दुनिया उसे अपनी ओर खींचती रही।
शायद इसलिए क्योंकि वहाँ उसके निर्णयों का वजन था।
वहाँ हर चुनाव कुछ कहता था—तुम कौन हो, और तुम क्या बनना चाहते हो।
देवताओं से संवाद आसान नहीं था।
वे सीधे उत्तर नहीं देते थे।
वे सवालों के बदले सवाल रखते थे, और कई बार… मौन।
और उस मौन में ही सच्चाई छिपी होती थी।
घने जंगलों के बीच फैले प्राचीन आश्रम, जहाँ पत्तों की सरसराहट भी किसी मंत्र का हिस्सा लगती थी।
अंधेरी गुफाएँ, जहाँ दीवारों पर उकेरे गए चिन्ह समय से भी पुराने प्रतीत होते थे।
खंडहर बन चुके मंदिर, जिनकी टूटी मूर्तियों में भी अब भी एक चेतना बाकी थी।
हर यात्रा अलग थी।
हर रास्ता नया।
और हर अंत…
अलग।
उसने यह खेल सिर्फ़ पूरा नहीं किया था।
उसने उसे जिया था।
असली दुनिया में जहाँ उसका शरीर धीरे-धीरे हार रहा था,
वहीं उस दुनिया में—
वह कमजोर नहीं था।
वह अकेला नहीं था।
वहाँ उसकी साँसें नहीं टूटती थीं।
वहाँ उसके फैसले मायने रखते थे।
उसकी आँखें फिर से स्क्रीन पर ठहर गईं।
अंत की वही छवि।
एक यात्रा, जो पूरी हो चुकी थी।
और एक ज़िंदगी…
जो अब धीरे-धीरे थम रही थी।
रात और गहरी हो चुकी थी।
अस्पताल की चौथी मंज़िल पर बना वह कमरा अब किसी बंद ताबूत जैसा लग रहा था। मशीनों की बीप… बीप… की आवाज़ अब पहले जैसी नियमित नहीं रही थी—कभी तेज़, कभी धीमी, जैसे वह भी किसी निर्णय के इंतज़ार में हो। हर बीप के बीच का सन्नाटा लंबा होता जा रहा था, और उसी सन्नाटे में उसकी साँसें खोती जा रही थीं।
वह बिस्तर पर लेटा हुआ था।
एक लड़का, जिसकी उम्र ज़्यादा नहीं थी, लेकिन थकान असहनीय।
हर साँस उसके लिए पहाड़ चढ़ने जैसी थी।
छाती मुश्किल से ऊपर उठती, फिर कुछ सेकंड तक रुक जाती—जैसे अगली साँस आएगी या नहीं, यह तय ही न हो। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें अब ज़िंदगी की चमक नहीं बची थी। वहाँ सिर्फ़ सवाल थे। और थकान।
वह बस देख सकता था।
“चलो भी…”
उसने खुद से कहा, जैसे अपने मन को समझा रहा हो।
“कुछ भी नहीं होता।”
लोग कहते थे कि यह गेम बहुत मुश्किल है।
बहुत जटिल।
बहुत निर्दयी।
पर उसे कभी ऐसा नहीं लगा।
उसने यह खेल सिर्फ़ पूरा नहीं किया था।
उसने उसे जिया था।
यूट्यूब जैसे विशाल प्लेटफॉर्म पर भी इस खेल की कोई निश्चित एंडिंग नहीं थी।
लाखों सब्सक्राइबर वाले बड़े-बड़े चैनल—
अनुभवी गेमर्स—
सब असफल रहे थे।
लेकिन उसने नहीं।
किसी शोर-शराबे के बिना।
किसी तालियों के बिना।
बस रणनीति।
और धैर्य।
एक हल्का-सा गर्व उसके भीतर उठा।
शांत।
गहरा।
“अगर… एक मौका और मिलता…”
उसने मन ही मन सोचा।
“तो इसे फिर से खेलता।”
हर छिपा रहस्य।
हर अनदेखा रास्ता।
स्क्रीन पर ending icon अब भी चमक रहा था।
कमरे में मशीन की आवाज़ अचानक लड़खड़ा गई।
बीप…
…
बी—
उसकी आँखें धीरे-धीरे भारी होने लगीं।
असली दुनिया में उसका शरीर हार रहा था।
पर उस दुनिया में…
वह कमजोर नहीं था।
वहाँ उसकी साँसें नहीं टूटती थीं।
एक लंबा सन्नाटा।
और फिर—
अंधेरा।
उसने आँखे बंद कर के उसके मन में एक सवाल बहुत देर से घूम रहा था।
“आख़िर… कोई और इसे क्यों पूरा नहीं कर पाया?”
यह सवाल गर्व से नहीं, जिज्ञासा से पैदा हुआ था। उसने कभी खुद को दूसरों से बेहतर नहीं माना था, बस अलग। उसने जितनी बार उस दुनिया को जिया था, उतनी बार उसने महसूस किया था कि वहाँ ताक़त या तेज़ उंगलियाँ नहीं, बल्कि याददाश्त और समझ काम आती थी।
उसे हर छोटी बात याद रहती थी।
किस मंदिर में किस देवता की मूर्ति टूटी हुई थी।
किस गुफा में प्रवेश करते समय हवा की दिशा बदलती थी।
कौन-सा साधु सवाल पूछने से पहले चुप रहता था, और कौन जवाब सुनने से पहले।
उसकी सोच हमेशा थोड़ी अलग रही थी।
वह सीधे रास्ते पर नहीं चलता था—वह पहले चारों तरफ़ देखता था।
संकेतों को जोड़ता था।
संवादों के पीछे छिपे अर्थ समझने की कोशिश करता था।
शायद यही कारण था।
याददाश्त।
और वह आदत, जिसे लोग मज़ाक में डिटेक्टिव वाली सोच कह देते थे।
उसने कई बार महसूस किया था कि यह दुनिया खुद अपने रहस्य नहीं खोलती—
उसे पढ़ना पड़ता है।
समझना पड़ता है।
और सबसे ज़रूरी… धैर्य रखना पड़ता है।
स्क्रीन पर ठहरी ending अब उसे अधूरी लगने लगी थी।
जैसे कुछ अब भी छुपा हो।
जैसे यह अंत… सच में अंत न हो।
“एक बार और…”
उसने धीमे से सोचा।
“इस बार सब कुछ।”
इस बार वह अलग तरह से शुरू करना चाहता था।
उसने नया किरदार चुनने की सोची—
एक साधारण इंसान।
कोई विशेष शक्ति नहीं।
कोई दुर्लभ पृष्ठभूमि नहीं।
एक ऐसा शरीर जो पूरी तरह स्वस्थ हो।
ऐसे माता-पिता, जो उसे बिना शर्त प्यार करते हों।
शायद वह वह ज़िंदगी थी, जो उसे कभी मिली ही नहीं।
उसकी उंगलियाँ हल्के से keyboard की ओर बढ़ीं…
लेकिन वहीं रुक गईं।
पलकें भारी हो गईं।
जैसे किसी ने अचानक उसकी सारी थकान एक साथ उसके सिर पर रख दी हो। उसकी आँखें खुली थीं, पर फोकस धुंधला होने लगा। साँसें पहले से भी धीमी हो गईं। उसने laptop को संभालने की कोशिश की, लेकिन शरीर ने अब जवाब देना बंद कर दिया था।
वह धीरे-धीरे उसी पर झुक गया।
कोई दर्द नहीं हुआ।
कोई घबराहट नहीं।
बस…
एक लंबी साँस।
और फिर…
कुछ भी नहीं।
उसका शरीर बिस्तर पर स्थिर हो गया।
मशीन की आवाज़ एक बार लड़खड़ाई—
फिर खामोश।
लेकिन laptop की स्क्रीन…
अब भी जल रही थी।
गेम स्टार्ट नहीं हुआ।
कोई loading नहीं।
कोई परिचित दृश्य नहीं।
नीली रोशनी के बीच, काले background पर कुछ शब्द उभरे—
“Welcome world of मंत्रलोक”
वे शब्द किसी खेल की तरह नहीं लगे।
वे किसी घोषणा जैसे भी नहीं थे।
बल्कि…
एक आमंत्रण।
कमरा पूरी तरह शांत था।
और उसी सन्नाटे में…
एक नई यात्रा ने जन्म लिया।